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Full text of "ब्रह्मसूत्र"

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भूमिका. 


५ न+अफिोलशिवा- 


इस असार संसारमें धर्म, अथ, काम, मोक्ष नामक जो चार पदाथे - हैं उंने सब 
मोक्ष सर्वोत्तम है; क्योंकि आधिदेविक, आधिमौतिक, आध्यात्मिक नामक त्रिविध 
तापोंकी निवृत्तिपूवक निरतिशयानन्दरूपात्मक नित्य तथा अनावृत्तिरूप पदार्थकों मोक्ष 
कहते हैं. परंतु देह व इन्द्रियादिकॉंविंष अहंता, ममतारूप अमिनिवेश होनेके 
कारण कर्तृत्व भोक्‍तृत्वादिक अनात्म धर्मोकों जो आत्माके धमें मानते हैं तथा 
इसीप्रकारके अनेक कुतकीसे जिनका चित्त व्यञ्न होरहा है ऐसे पुरुषोंको भोक्षकाभ 
होना असंभवही है, इसमें किसीम्रकारका संदेह नहीं है. कि बहुना, ऐसे पुरुषोंकों तर्केचतुर, 
शुत्मथैविवेचक सह्लुरुकी शरण गये विना उपनिषत्सहसभी यथावत्‌ आत्मतत्त्वका बोध 
नहीं करासकते; अतएव, ऐसे पामर पुरुषोंका उद्धार करनेकी इच्छासे परम कारुणिक महर्षि 
भगवान्‌, पेदव्यास मुनिने अद्वेतब्ह्मात्मक श्रुतियोंके अर्थका यथार्थ निर्णय करनेके लिये 
अनेक न्यायोपबंहित सूत्नोंसे अध्यायचतुष्टयात्मक “उत्तरमीमांसा” अर्थात्‌ “वेदान्तद- 
शेन” अथवा “ब्रक्मसृत्र” नामक यह प्रवन्ध रचा, व्यासवाणी “रूध्बी गुर्वथगहरा ” 
अथौत्‌ अस्पाक्षरा, अर्थवहुला होनेके कारण दुर्विजेय है, ऐसा जानकर भगवत्पाद 
श्रीशंकराचार्य खामीने अपनी कुशापबुद्धिसे उस (वेदान्तद्शन)पर “शारीरकभाष्याँ 


बनाया. वह अत्यन्त गूढ्गम्भीराथे होनेके कारण उसके द्वाराभी सबवे साधारण विद्वानोंकों - 


यथावत्‌ अथ समझनेंमें बड़ी कठिनता पड़ती थी, यह सोच विचारके एक सिश्ने 
शांकरभाष्यकी छायासे इस ( वेदान्तदशेन )पर सरल (िन्दीभाषामें “ सूत्नभावार्थप्रका- 


शिका” नामक यह सरक और स॒विस्तृत भाषाटीका. चनाकर हमारे समीप भेजी. हमने . 


इस टीकाको उत्तम तथा छोकोपकारिणी जानकर हमारे मित्र विद्व्क्य, षड्द्शैनप्रविष्ट, सुमेर- 
पुरनिवासी,“आवसथी' आस्पदधारी श्रीपण्डित-देवकी नन्‍दनात्मज शाख्रिघुवंशशर्मा द्वारा 


: भूलके साथ यथास्थान संयुक्त करांकर अनुवादकके उत्कट अनुरोधसे भाषाके रूपमें अपे- 


क्षित सुधार न करते हुए केवल तात्प्यपर लक्ष्य देकर मूठ व्‌ टीका दोनों बड़े परिश्रमसे 
झुद्ध कराके इस अन्थको ऐसे उत्तम कागज और खुवाच्य टाइपमें छापके प्रसिद्ध किया है. 
इसमें अत्येक अध्यायोंके अत्येक पादम कितने व कौन २ से अधिकरणसूत्र हैं तथा कितने 
व कौन रे से युणसून्न हैं और उनमें प्रसंग क्या है, यह जाननेके लिये प्रत्येक अध्यायके 
प्रत्मेक पादंके आरंभमें अधिकरणसूत्र, गुणसूत्र तथा उन सूत्ोंका प्रसंग सूचित करनेवोढी 


। 


र्‌ 


- अनुक्रमणिकामी ढूगायी गयी है, तथा पाठकोंको सुगमता होनेके लिये औरभी एक सुल- 
भता की गयी है कि अकारादिवर्णसमाज्नायके ऋमसे “सूत्रावकोकनप्रकार” अर्थात्‌ 
सूत्रसूचीमी इस अंथके प्रष्ठभागमें ऐसी सुंदर छूगायी गयी है कि जिससे जो सूत्र देखना 
हो उसकी आदिका अक्षर मार्म होनेसे वह तत्कालही मिल जाता है. इंढ़नेका कुछभी 
परिश्रम नहीं करना पड़ता. ऐसे २ अनूठे प्रकारोंसे संयुक्त होनेके कारण सर्वे साधारणको इस 

: अंथके गूढतत्त्वका समझना अधिकांशमें सुछठम होगया है, ऐसा कहनेमें कोई संदेह नहीं है. 

अद्वैतकोस्तुम व वेदांतपरिभाषा आदि वेदांतके अनेक प्रकरणम्रंथोमें अंथकारोंने जो 

सूत्रमकरण लिखे हैं उनमें अनेक सूत्रोंके अर्थ नहीं लिखे हैं और सून्नोंका अथ टीका विना 

. ठीक ठीक होता नहीं. इसलिये यह सूत्रभावार्थप्रकाशिका टीका जिस पठन पठनवाले 

. महात्माके पास होगी वह प्रयत् विनाही सूत्रका अर्थ कर लेगा. अब हम इस विषयमे विं- 
दोष छिखना नहीं चाहते; क्योंकि विदृजन खयम्‌ अनुभव कर लेंगे 


इस ग्रंथपर और भी भाषाटीकायें छपी हैं परंतु उन टीकाओंसे पाठकोंको हानिके सि. 
बाय छाम किसीम्रकारका नहीं है; क्योंकि उनकी यह गति है कि मूछ तो आम कहता है, 
दीका इमली कहती है. महाशयो | आप खय्य॑ विचार कर देखो कि ऐसी टीकाओंके अब- 
लोकनसे पाठकोंकोी हानिके सिवाय क्या कमी किसी -प्रकारका छाममी हो सकता है! 

पपि नहीं. हमारी समझमें तो ऐसी टीकाओंका देखना एक अथाह अमके समुद्र डूब- 
ना है. अतएव, सदसद्विवेकी महाशयोंसे हमारी यही प्रार्थना है कि हमारी इस टीकाको 
तथा अ्रमजनक अपर टीकाओंको मिलाके देखें और मलाई बुराईको समझे तथा सुबोधदा- 
बिनी हमारी टीकाका जाद्योपान्‍्त अवकोकन कर अपना छाभ उठाव॑ और हमारे अपार 
परिश्रमकोी सफल करें. 


. पुनः सहृदय महाशयोंसे सविनय निवेदन यह है कि दृष्टिदोपसे रहे हुए प्रमादोंको 


सदयहृदय होकर क्षमा करें, 
हे विद्वह्ुणग्राही 


हारिप्रसाद भगीरधथजी- 
कालकादेवीरोड, रामवाड़ी-मुँबई- 


दवितीयाबृत्तिविषयक विज्ञप्ति: 


फ+ओ--०-..८६२१2:४3:व 


दार्शनिक विषय परिपक्ष विचारशून्य विषयी जनोंकों तत्कारू अपने जांढमें फैसानेवाले 
आपातरभपणीय अथोत्त्‌ आरंभमधुर और परिणाम्म विपमय विषयोंकी कामिन्यादि सामग्रीसे 
संगठित श्ंगारादि कल्पित रसोंसे रहित होनेके कारण साधारण जनोंको खभावहीसे ताइश 
प्रियकर नहीं होता; इसीसे प्रायः दर्शनग्रन्थ प्रकाशित ही नहीं होते. यदि भाग्यसंयोगसे 
कभी एकाघ प्रकाशित हुआ भी तो आहकोंके अभावसे पड़े २ सड़नेके सिवाय दूसरा 
आविष्करण होनेकी नौबत नहीं आती. परंतु परम कृपाढ परमेश्वर और गुणम्राही 
पाठकोंकी असाधारण कृपासे इस भाषानुवाद--समलुझत “्रह्मसुत्र अथवा वेदान्तदशन 
की सहसों प्रतियां बातकी वातम बिककर इसकी द्वितीयाइृत्ति प्रकाशित होनेका 
यह शुभ जवसर उपखित हुआ है, इसके लिये प्रकाशक सर्वशक्तिमान्‌ परमात्मा और 
अपने अनुआहक आहकोंको अनेकशः धन्यवाद देते हुए उनका सदाके लिये अत्यंत 
उपकृत होकर, संदेव इसी प्रकार कृपा करनेकी सवहुमान प्रार्थना करता है. 


, प्रथम प्रयत्न होनेके कारण अथवा मनुप्य-खभावसिद्ध अमादि अन्यान्य कारणोंसे प्रथमा- 

वृत्तिगं जो २ दोष रहगये थे दे तो सब इस आइत्तिमें बड़ी सावधानीके साथ बहुतही 
उत्तम रीतिसे सुधारे ही गये हैं, किन्तु और भी अधिकांश सुधार करनेके साथ २ कई 
नंगे २ ऐसे उपयुक्त विषय युक्त किये यये हैं कि जिनसे अब इसकी झुन्दरतामें पहलेकी 
अपेक्षा अत्यधिक अधिकता होगयी है; इससे विचारशीरू वाचक महाशय इसपर पूर्वके 
समानही अथवा अबकी वार किसी अंशर्मे उससे भी कुछ अधिक प्रेमभाव प्रकट कर 
प्रकाशकके और मेरे गुरुतर परिश्रमको सफल करते हुए हम लछोगोंक्ो प्रवल थोत्साहन 
देनेंसें अपनी अनुपम उदारताका पूर्ण परिचय दिये बिना न रहेंगे ऐसा हसकी हृढ 
विश्वास है. 'उप्संहारमें सारासारविचारचतुर उदारमना महाशर्योंसे बारवार यही प्रार्थना 
है कि यद्यपि अबकी बार बहुत खुधार किया गया है तो भी मनुष्यखभावानुसार यदि 
फिर भी इसमें किसी प्रकारका विकार रहगया हो तो क्षमा करनेकी कृपा करें. - 
सुमेरपुर-उन्नाव, |; - 


थ. नि, अर्गगा शास्त्री रघुवंशशर्सा आवसथी. 


अथ सूत्रावछोकनप्रकारः प्रारभ्यते । 


>> ८5८३. 


पृष्ठाद्राई। मत्राणि | पृष्ठाह्ला। | मृत्राणि | 

(अ) । ८१ अन्यार्थ तु जैमिनिः प्रश्नव्यास्यानाभ्या- 
2 अथातो अग्नजिज्ञाता ।११॥१ मपि चैवमेके ।१।9।१८। 

२१ अखिन्नस च तथोग शान्ति (!१९| ८३ अवखितेरिति काशइझत्सः ।१॥9२१। 

२४ अन्तनद्धमेपदेशान्‌ ।१॥१२० | ८४ अभिष्यानोपदेशाच ।१॥४२४। 
२६ अतग्ब थरागः ।११(२३। | <६ अभिमानिब्यपदेशस्तु॒विशेषानुगति- 
३२ अनुपपत्तेस्तु न शारीरः ।१।२॥१ ; भ्याम्‌ ।२१॥५। 
३४६ अभकोकस्लाचश्यपदेशाश्व नेति चेन्न! +० असदिति चेन्न प्रतिपेधमात्रत्वात्‌ ॥ 
निचाय्यलादेव गयोमवच ।शराण | मी शा 
* # ! ९० अपीतो तह॒ससंगादसमझसम|]२। १॥८। 
३५ अत्ता-चराचरमहणात्‌ । [द5। | ९४ असद्यपदेशात्रेति चेन्न धर्मान्तरेण 
८ अन्तर उप: ।१२१३॥ ः वाक्यशेपात्‌ ।२।१।१७ 


३% अनवसितिरसम्मवाच्च नेतरः।१९॥ १७, ५५ अधिक तु भेदनिर्देशात्‌ ।२।१।१२। 
2० अन्तयाम्यविदवादियु तद्धमेव्यपदेशात्‌ ।| ५६ अद्मादिवच्च तदनुपपत्तिः |२।१२३ 
९२१८ [१०४ अन्यत्राभावाच्च नतृणादिवत्‌ २२५) 
- ४५ अच्ययत्वादिगुणकों धर्मोक्तिः ।7१२१। (१०५ अभ्युपगमे5प्यरथोभावात्‌ ।२।२|६॥। 
9७ अतणएव न देवता भूत च । १२२७ १०९ अक्वित्वानुपपत्तेश्व २२।८। 


किम & अन्यथा 5नमितो 
४६ अभिव्यक्तिरित्याइ्मरथ्यः १२२९५। | १०६ अन्यथा5तुमिती च जशक्तिवियोगाद्‌। 


» अनुस्मृतेबोदारिं: ।0२१०। .. श३६। 

७३ अक्षरमम्बरान्तभ्ृतेः ।१३।१०। १०५ अपरिश्रह्मच्चात्मन्तमनपेक्षा ।२।२॥१७ 
४ ४55. मर 

०९ अन्यभावच्याइत्तेश् ।१३।१२। १११ असति प्रतिशोपरोधो योगपद्यमन्यथा | 


५० अल्पश्रुतेरिति चेचदुक्तम्‌ ।३२१। (११३ जनुछतेश ।२।रार५। ॥ 
&० अनुक्ृतेग्तस च |१शिरर। ११७ अन्तावख्ितेश्रोमयनित्यलादविशेष/। 


६० अपि च सर्यते ।१३।१३। २।२।३६। 


७० अम्यार्थश्र परामशः ।१।३॥२०। - राशर १) 
| ४ स्श् 5 
६३ अतणएव च नित्यलम्‌ ।१॥३)२९। ११४ अधिष्ठानानुपप्तेश्व ।२२३९॥। 


२्‌ सत्रावडोकनमकारः । 


पृष्ठाक्रा। | पत्राणि। 
११८ अन्तवत्त्वमसवैज्ञता वा १२।२।० १। 
१५२ असि तु २।३|२। 
१२९ असम्भवस्तु सत्तोडनुपपत्तेः |।२।३॥९॥ 
१२७ अन्तरा विज्ञानमनसी क्रमेण तहिड्ञा- 











पृष्ठाक्ा) । सूत्नाणि | 
क्‍ अपि चैवमेके ।३।२।१३। 
१७१ अरूपवर्देव हि तत्मधानत्वात]३।२।१४ 
१७२१ अतणएव चोपमा सूयकादिवत]३।२। १८ 
१७३ अम्बुबदअहणातु न तथात्वम) २।२।१९ 
दिति चेन्नाविशेषात्‌ ।१।३।१० [१७५ अपि संराधने प्रत्यक्षानुमानाभ्याम्‌ । 
१३० अविरोधश्रन्दनवत्‌ ।२।३॥२ ३। ३१९२४। 
१३० अवखितेवैंशेष्यादिति चेन्राभ्युपगमाव्‌ | १७५ अतोथनन्तेन तथाहि लिक्नम।३।२।२ ६। 
हृदि हि ।२।३॥२४। | १७९ अनेन स्वेगतत्वमायामशद्धादिस्यः । 
१३९ अंशो नानाव्यपरदेशादन्यथा चापि ३।२।३७। 
दाशकितवादित्वमधीयत एके |२। १८६ अन्यथाल॑ शब्दादिति चेन्नाविशेषात्‌। 
३॥४३॥ शर।६। 
१८५ जन्वयादिति चेत्लादवधारणात्‌ 
।१0१॥१७॥ 
१९६ अनियमः सवोसामविरोधः शब्धानुमा- 
नाम्थाम्‌ ३२)२।३ १। 
१९७ अक्षरधियां वव॒रोध; सामान्यतद्भावा- 
भ्यामोपशसदवत्तदुक्तम्‌ ।३।३।३ रे। 
१९५ अन्तरा भूतआमवत्खात्मनः३।३।३५०॥ 
१५९ अन्यथा भेदानुपपत्तिरिति चेन्नोपदेशा- 
न्तरचत्‌ ।६३३॥३६॥ 
२०४ अतिदेशान्र ।३॥३॥०६॥। 
२०५७ अनुबन्धादिम्यः प्रजान्तरप्थक्वबदृष्ट- 
शव तदुक्तम्‌ ३।१।५०। 
२०७ अजन्ञावषद्धास्तु न शाखाउु हि प्रतिवे- 
दम (३।३॥५५। 
२०९ अश्लेबु यथाअयभाव)३।३॥६ १| 
२१७ अधिकोपदेशात्ु बादरायणसैव तदर्श- 
नाव्‌ ।३॥४।८। 
२१५७ असावेत्रिकी (७१ ०] 
११६ अध्ययनमात्रवत्तः १३॥9।१ २। 


१३९ अपि च सर्यते ।९१३॥४७। 
१५१ अनुज्ञापरिहारों देहसम्बन्धाज्योतिरा- 
दिवत्‌ ।१॥३|४ ८। 
१०१ असन्ततेश्वाव्यतिकरः ।२।३।४९॥। 
१४२ जदृष्टानियमात्‌ १९३५१। 
१४४ अभिसन्ध्यादिष्वपि चेचर ।२।३॥५२॥ 
१४६ अणवश्च १४७. 
१४७ अकरणल्वाच्व न दोषसथाहि दर्शयति। 
२॥४।११। 
१४८ अणुश्च १२९३१ १। 
१५५ अम्यादिगतिश्रुतेरिति चेन्न भाक्तत्वात्‌। 
हु ३॥१।४। 
१५६ अश्वुतत्वादिति चेन्नेष्टादिकारिणां प्र- 
तीतेः ।११।६॥ 
१५८ अविष्टादिकारिणामपि श्रुतम्‌ ३।१।१२॥ 
१७९ अपि च स॒प्त (4॥१)१५। 
१६२ अन्याधिष्ठिते पूनबद्मिछापात्‌३।१॥२४ 
१६३ अशुद्धमिति चेन्न शब्दात्‌ ३११२८ 
१६८ अतः अबोधो5स्मात्‌ ।३२॥८। 


सूत्नावकोकनप्रकार: । 


पृष्ठा्गा। । सूत्राणि 
२१८ अनुऐ्ठेयं बादरायणः साम्यश्ुतेः 
।३॥४१९॥ 


२२० अतएव चाप्मीन्धनाथनपेक्षा।३।०२५। 
२२२ जवाघाच ।३॥४।२९ 
२२२ अपि च॑ स्यते ।३॥०।३०] 
२२३ अनभिभवं च दशैयति ।३६४३० 
२१२४ अन्तरा चापि तु तटष्टेः ।३॥9३६। 
२२४ भपि च सते ।३॥९।३७। 
२२४ अतस्त्वित्तरज्यायो लिज्ञच ।३।॥०।३९॥। 
२२८ अनाविप्कुवैन्नन्ववात्‌ ३॥४।५०। 
२३३ अचलढुत्व॑ चापेक्ष्य [2।१॥९। 
२३६ अनारव्धकार्ये एव तु पूर्वे तदवधेः 
११११५। 
२३६ अभिदोत्रादि ठ॒तत्कारययैव तददश- 
नात्‌ ।9।१॥१५। 
२३६ अतोडस्यापि ब्लेकेषामुभयो! ।9११७ 
२१९ अतएव च स्वोण्यनु ।१२।२। 
२४३ अख्व चोपपत्तेरेष ऊष्मा |४।२।१ १॥ 
२४५ अविभागो वचनात्‌ ।9२॥१६।॥ 
२४७ अतश्वायने5पिं दक्षिण |?२॥२०। 
२४५९ अर्निरादिना तत्मथितेः ।४॥३।१॥ 
२५७४ अप्रतीकारुम्बनानयहति बादरायण 
उभयथा<5दोषात्तत्कतुश्च ।9३॥१०॥। 
२७७ अविभागेन इृष्टलात्‌ (9३।४| 
२७५९ अत एवं चानन्याधिपतिः 99।९% 
२५५९ अभाव बादरिराह ब्येचम्‌ ।२।०।१०। 
२६३ अनादृत्तिः शब्दादनावृत्तिः शब्दात्‌ 
।9५२२। 
(आ ) 
<9 आत्मझृतेः परिणामात्‌ |१।०।२३। 


पृष्ठाड्डा। । सुत्राणि । 
१७१ आह च तन्मात्रम ।२।२।१६। 
१८ आनन्दमयोड्म्यासात्‌ ।१0११२। 
२५ आकाशसलिज्वत्‌ ।१।११२॥ 
४० आमनन्ति चेनमस्मित्‌ | १।२।३२। 
६८ आकाशोड<थोन्तरत्वादिव्यपदेशात्‌ । 
१३४ १। 
७२ आवनुमानिकमप्येकेषामिति चेन्न शरीर- 
रूपकविन्यसमृही तैदंशयति च। १४। १) 
९७ आत्मनि चेव॑ विचित्राश्व हि।२।११२८ 
११२ जआाकाझें चाडविशेषात्‌ ।९।२॥२४। 
१२७० आपः ।२।३।१ १॥ 
१४१ आमास एवं च ।२॥३॥९०) 
१७८ आनथथक्यमिति चेन्न तदपेक्षबात्‌ | 
३।१।१०। 
१८८ आननन्‍्दादयः प्रधानस्य ।३।३॥११। 
१८८ आध्यानाय प्रयोजनाभावात्‌] ३।१। १ ४। 
१८९ आत्मशब्दाच ।३।३॥१५९। 
१८९ आत्मगृहीतिरितरवदुत्तरात॥३।३।१६॥ 
२०२ आदरादकीपः ।३६॥३॥४ ०। 


३१३ आचारदशनात्‌ ।१४।३। 


२२७ आल्िज्यमित्यौड़लोमिस्तसे हि. परि- 
क्रीयते ।8॥99 ५ 
२३१ आवृत्तिरसक्ृदुपदेशात्‌ ।9१।१। 
२३१ आत्मेति तूपगच्छन्ति आहयन्ति च 
॥8१॥३॥ 
२३२ आदित्यादिमतयश्ाज्ञ उपपत्तेः 8१६ 
२३३ आसीनः सम्भवात्‌ ३१७ 
२३४ आप्रायणात्तत्रापि हि दृष्टमू ।9१॥१ २। 
२५७१ आतिवाहिकासहिन्ञत्‌ ।9३!४। 
२५७ आत्मा प्रकरणात्‌ ।9।9।३॥। 


2 सूत्रावडोकनम्रकारः , 


पूष्ठाड४ | : सत्राणि । पूृष्ठाड्ा। । पत्नाणि । 
(इ) . ३७ उपादानात्‌ ।१।३॥३८। 
७७ इततरपरामशौत्स इति चेन्नासम्भवात्‌ [१३५६ उपलव्धिवदनियमः ।९।३१३७। 
॥१॥३॥१ ८ | १७६ उभयव्यपदेशात्त्वहिकुण्डलवत्‌ . 
इतरेषां ठघे २।२७। 

८८" चानुपलव्घें: ।२।१॥२। ह , शरार 
९५ इतरव्यपदेशाद्विताकरणादिदोपग्रस- १७८ उपपत्तेश्व | २९३५ 

क्तिः ।२।११२१। | १८५ उपसंहारो3थोमिदाह्विबिशेषवत्‌ समा- 


११० इतरेतरमत्ययत्वादिति चेन्नोपत्तिमात्र-| नें पे शरद 
निमित्तत्वात्‌ ।९२११९॥ [१९६ उपपन्नसछक्षणारथेपछव्घेलेकिवत्‌ 

| हम 

१८८ इतरे त्वथसामान्यात्‌ ।३।३।१३॥ ।१३३३ ०। 


२०२ उपखितेतसद्वचनात्‌ ।१।३।० १। 
२१७ उपमर्द च ।३।०।१६। 
२२६ उपपूर्वमपि त्वेके भावमथ्नवत्तदुक्तम्‌ 


१९८ इयदामननात्‌ ।३१।३४। 
श्श्५ इतरस्पाप्येवम केषः पाते तु ।१०।१।१४। 
(३) 


कब अविटआ कअक २५७१ उमयव्यामोहात्तत्सिद्ेः ला 
, ५५ ईक्षतिकर्मव्यपदेशात्सः ।१।३।१३॥ (छू) हे 
5 २१७ ऊ्वरेत ने 
्लेति स्यु च शब्दे हि (३।४।१७। 
. २७ डपदेशमेदान्नेति चेन्नोमयस्मिन्नप्यवि- डे (ए) 
रोधात्‌ १२७ ८५ एंतेन सर्वे व्याख्याता व्याख्याताः 
.+5 उच्राचेदाविभूखरूपस्तु ।१॥३॥१९। ।शशश्ढ। 


८२ उत्क्रमिष्यत एवंभावादित्योडुकलोमिः | ८८ एतन योगः अत्युक्त: ।२।१॥३। 
।१9२१। | ९५२ एतेन शिष्टापरिग्रहा अपि व्याख्याताः 
. ९६ उपसंहारदशनान्नेति चेल्क्षीरवद्धि - वशाशएर। 
२।१।२४। [११६ एवं चात्माकारुन्वस ।२२।३४। 
१०१ उपपच्ते चाप्युपकस्यते च|२।१।३६। [१२४ एतेन मातरिशा व्याख्यातः।२।३।८। 
१०७ उभयथापि न क्मोडतस्तदभावः २०६ एक आत्मनः शरीरे भावात्‌।३।३।५१। 


।९२।१२। | २२९ एवं मुक्तिफलानियमसतद्वस्थावधृते- 

१०९ उमयथा च दोपात्‌ ।२॥२।१६। खद॒वस्थावक्षतेः ।३॥१।५२॥ 
१११ उत्तरोसादे च पू्निषेघात्‌!२।२।२०। |२५८ एवमप्युपन्यासात्यूवेमावादविरोध॑ बाद- 
११२ उभयथों च दोषातू. ।२२॥२१। रायणः | ।९॥९।० 
११३ उदासीनानामपि चैव॑ सिद्धि:२।२।२७| (ऐ 


ऐे 
११९ उसस्त्यसम्भवात्‌)२।२॥४२। २२५ ऐहिकमप्यप्रस्तुतप्रतिबन्धे तहरशनात्‌ 
१२५ उत्क्रान्तिगत्यागतीनाम ।२।३॥१९॥ * ४ ॥३॥श५ १। 


सून्नावलोकनप्रकार: | 


सत्राणि | 
पट 
३३ कमकतृत्यपरदेशाच |१(२९। 
६८ कम्पनाव्‌ ।१।३।३९५। 
७६ कस्पनोपदेशाच मध्वादिवदविरोधः 
!१४॥१० 
११८ करणबच्ेन्न भोगादिभ्यः ।२।२४ ० 
१३४ को शाखार्थवत्त्वात ।२।३।३ ३ 
९७ इत्सप्रसक्तिनिरवयवत्वशब्दकोपो वा 


इष्टाज्ा। | 


पृष्ठाह्मा। | मुत्राणि | 
१९५ गतेरथवत्त्वमुमयथाउन्यथा हि विरोधः 
र।श२९॥ 
३६ गुहां प्रविष्टावात्मानों हि तदर्शनात्‌ 
0२॥११। 
१३११ शुणाद्वा लोकवत्‌ ।२।१।२८। 
२०५ गुणसाधारण्यशुतेश्व (३॥३६४। 
१२ गौणश्रेत्रात्मशव्दात्‌ ११६॥ 
१२२ गौण्यसम्भवात्‌ |२।१॥३॥ 


११।२६। | १४४ गोण्यसम्भवात्‌ २शर। 


१३८ छकृत्तप्रयलापेक्षस्तु विहितमतिपिद्धावे- 
यथ्योदिम्यः २१४२। 


(च) 


७८ चमसवद॒बिशेषात्‌ ।१8८ 


१७७ छतात्ययेउनुशयवान्‌ दृष्टस्वृतिभ्यां य- | १९८ चराचरव्यपाश्रयस्तु स्वाचब्यपदेशो 


प्रेतमनेव च 
२२८ इृत्लभावात्तु ग्रहिणोपसंहारः 
३॥५१८। 
२१ कामाच नानुमानापेक्षा ।0११८। 
७५ कारणत्वेन चाकाशादियु यथाव्यप- 
दिष्टोक्ते ।१9१५। 
१९० कायोख्यानादपूर्वम्‌ ।३३१८। 
२०१ कामादीतरत्र चायतनादिभ्य॥३।३॥३९ 
२०८ काम्यास्तु यथाकाम समुच्ीयेरत्नवा पू- 
वेहेल्वभावात्‌ १३8६०। 
२१६ कामकारेण चैंके ।३॥०।१५। 
२५६ कार्य वाद्रिरस गत्युपपत्ते: (४१७ 
२५३ कार्यौत्यये तदृघ्यक्षेण सहातः परममि- 
धघानाव्‌ शर।१० 
(ग) 


१८ गतिसामान्यात्‌ १॥१॥१ ०। 


4११॥4। 


भाक्तस्तद्भावभावित्वातू ।२३३॥१ ६। 

१४७ चद्षुराद्विन्तु तत्सहशिष्टदादिम्यः 
'ाशध्न 
१०७ चरणादिति चेन्नोपलक्षणार्थेति काप्णो- 
जिनिः ११॥९॥ 
२५८ चिति तम्मात्रेण तदात्मकत्वादित्यौड- 
लोमिः 99६ 


(छ) 
२७ इउन्दोमिधानान्नेति चेन्न तथा चेतोपेण- 


निगदात्तथाहि दशनम्‌ ।११२८॥ 
१९५ छन्दत उभयाविरोधाद्‌ ।३।३॥२ ८! 
(ज) 


७ जन्मायस्र यतः |१।१॥२। 
८१ जगद्गाचित्वाव ।१।9।१ ६॥। 
२६२ जगद्यापारवर्ज प्रकरणादसबिहित- 
त्वाच्च ! 29१७ 


७६ गतिशव्दाम्यां तथाहि दृष्ट लिकं च। २७ ज्योतिश्वरणामिधानात्‌ !१।१२९ 


१श१णा 


रे 


&9 ज्योतिषि भावाच्र ।१३।३२॥। 


६ सूत्रावकोकनप्रकारः । 


पूष्ठाह्मः । सत्राणि । 
६८ ज्योतिर्देशनात्‌ ।१३॥४ ० २६ तदभिध्यानादेच तु तहिद्वात्सः । 
७६ ज्योतिरुपक्रमात्तु तथाह्यधीयत एके २॥३॥१३) 
१४९ | १३१ तथा च दर्शयति २१२७। 
७८ ज्योत्पिंकेपामसत्मने.. ।१9११॥ | १३२ तहुणसारत्वातु तश्यपदेंदः प्राशवत्‌ । 
१५८ ज्योतिराद्रधिष्ठानं तु तदामननात्‌ २॥३॥२९॥ 
।२११५॥ 
२९ जीवमुख्यम्राणलिज्ञान्नेति चेन्नोपासात्रै- 
विध्यादाश्रितत्वादिह तथ्योगाव्‌ 
॥१९१%३२ १। 
८१ जीवमुख्यप्राणलिड्ञान्नेति चेत्तद्वया- 
ख्यातम । १॥४।१७। 
(त्त) 
२७० तडितो5घिवरुणः सम्बन्धात्‌ ।४।३।३)। 
२४५ तदोकोअ्ग्रज्वलनं तत्मकाशितद्वारो वि- 
बासामथ्यीत्तच्छेपगत्यनुस्थतियोगान् 
हादानुगृहीतः शताधिकया |80२।१७। 
२६० तन्वभावे सन्ध्यवदुपपते ।9४।१३ 
६ तत्तु समन्वयात्‌ ११५ 
१४ तन्निष्ठत् मोक्षोपदेशात्‌ ।११।७ 
२० तड्ेतुब्यपदेशाच ।१॥१।१४ 
६२ तदुपयेपि वादरायणः सम्भवात्‌ । 
शशर६। 


पृष्ठाह्ा3 | सत्राणि | 












१४४ तथा प्राणा; २।३।१। 
१४४ तत्माकुश्रुतेश्व ।९॥2॥३॥ 
१४४ तत्पूबेकल्वाह्मचः ।२०॥९। 
१४५ तस््र च नित्यत्वात्‌ (₹।४१ ६॥ 
१४९ त इन्द्रियाणि तब्यपंदशादन्यत्र श्रे्ठात्‌। 
२॥२१७ 
१५०३ तदम्तरमतिपत्तो रंहति सम्परिप्वक्तः 
अश्वनिरूपणाभ्याम्‌ ।१॥१।१। 
१५६९ तत्नापि च तब्यापारादविरोध३।१।१७ 
१६१ तत्साभाव्यापत्तिरुपपत्ते: ।३।१२२। 
१६७ तदभावो नाडीएु तकछूतेरात्मनि च 
३॥२॥७। 
१७४ तदव्यक्तमाह हि ।३२२३॥ 
१७८ तथान्यप्रतिषेघात्‌ ।३२।३ ६॥ 
२०२ तन्निधौरणनियमस्तदृष्टे: प्रक्राध्य्र- 
तिबन्धः फलम। ३॥३४२॥ 
२१३ तछूतेः ।३।०५। 
६७ तदभावनिधीरणे-च मद्ते।१।३३७। | *११ तद्वतो विधानाव्‌ ३।४।६। 
७३ तदघीनस्वादर्थवत्‌ ।१३॥३। २२० तथा चेकवाक्यतोपवन्धात्‌ ।१॥४।२४। 
७४ जयाणामेव चैबमुपन्यासः प्रश्नश्ष । ४५ पहुतस तु नातह्ावो जैमिनेरपि 
१५६। |__ वियमातडूपाभावेभ्यः (३१३४०। 
९१ तकोम्रतिष्ठानादप्यन्यथानुमेयमिति १ अन्न तच्छव्द॑ विहाय “साभाव्यापत्ति:” 
चेदेवमप्यविमोक्षम्सज्ञ: |२।१॥११॥ ंति पाठो दुश्यते पु्कान्तरे। लेन धसौकयोंय 
९३ तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिस्यः | सकारक्रमेडपि ““साभाव्यापत्ति: ” इस्ेतड्िखित्वेदमे- 
; व सून्न॑ पुनन्यैस्तम । तत्सकारादिपाव्स्फूर्तिमता सका- 
२।१।१४। [रक्रमेब्बलोकनीयम । . 





सूज्ावल्ोकनप्रकारः । मर 


पृष्ठाह्मा । सुत्राणि। पृष्ठाक्गाः । सूत्राणि | 
२३५७ तदधिंगम उत्तरपूवीधयोस्क्रेषविनाशा-| ९5 धतेश्र महिल्लोड्लासिन्रुपलब्धेः ।१। 
है. चब्यपदेशात्‌ 8११३॥ ३।१६। 
२४० तनन्‍्मनः श्राण उत्तरात्‌ ।४२॥३॥ २३१३ ध्यानाच |४१॥८॥ 
२४२ तदापीतेः संसारव्यपदेशात्‌ ।9।२।८। (न) 
१०४ ज्यात्मकलवातु भूगस्वात्‌ १३१५९ | २८ न वक्तुरात्मोपदेशादिति चेद्ध्यात्मस- 
१६१ तृतीयशब्दाबरोधः संशोकजस्य । स्वन्धभूमा श्षस्मित्‌ १॥१॥२९॥ 
| ३।१।१२१।| ४१ न च स्मातंमतद्धमामिलापात | 
२४४ तानि परे तथाह्याह ।9।२॥१५। ११२१९॥ 
२१५ तुल्य तु दर्शनम्‌ ।३।४॥९। ७८ न सहुचओपसइहादपि नानाभावादति-' 
१२७ तेजोडत्तसथाह्याह ।२।३।१०। रेकाच !१॥४॥१ १ 
(द्‌) ८८ न विलक्षणलादस्थ तथात्व॑ च शब्दात्‌ । 
७५ दुहर उत्तरेभ्यः ।१॥३।१४। २१।४। 
१६१ दर्शनाश्व ।३६।१।२०। ९१ नतु दृष्टान्तमावात्‌ ।२। १॥९ 
१७२ दर्शयति चाथोडपि स्येते (ै२।१७। | ९०९ न प्रयोजनवत्त्वात्‌ ।२। १।६२। 
१७३ दर्शनाच ।३।२२१। १०० न कमोविभागादिति चेन्नानादित्वात्‌ | 
१८५ दरशयति च ।३३।४। २।१॥३५। 
१९१ दशेयति च ।३॥३।२२॥ ११४ न मावो5नुपरब्धेः ।९।२।३०। 
२०४ दुशशनाच ।३।३।४८। ११७ न च पयोयादप्यविरोधो विकारादिभ्य/ 
२१० दरशैनाशव ।३॥३॥६४। शाशाइ०। 
२०४ दुशेनाच ।४।३।१३॥ ११९ न च कतुः करणम्‌ ।२।२॥४ ३। 


२६३ दर्शयतश्ेद मत्यक्षानुमाने ।४।४।२०। [१९२ न वियदश्तेः ।२।३।१। 
9९ थुमभ्वाद्यायतनं खशब्दाव्‌ (१३।१। [१४६ न वायुकिये एथगुपदेशात्‌ ।२।४।९॥ 
२६० द्वाद्शाहवदुभयविर्ध बाद्रायणोडतः । [१६० न तृतीये तथोपरूब्बेः ।३१॥१८। 
४।४।१९। [१७० न खानतोडपि परस्ोभयलिज्ञ सवेत्र हि। 


९० दृश्यते तु २१।६॥ ३।२॥११। 

९६ देवादिवद॒पि छोके ।२।१।२७। १८६ न वा प्रकरणमेदात्परोवरीयस्त्वादिवत्‌। 

१६७ देहयोगाद्वा सोडपि ।३२।६। न ३॥१७। 
(घ) १९१ न वा विशेषात्‌ ३॥३।२ १। 

७२ घर्मोपपत्तेश्व ।0॥३॥९% * (२०७ न सामान्यादप्युपलब्पेसृत्युवन्नहि छो- 


१८० थम जैमिनिरत एवं ।३६॥२॥४ ०। कापत्तिः ह ३॥३॥९ १॥ 


८ 


पृप्ठाड्र) । सत्राणि । 
२१० न वा तत्सहमावाश्ुतेः ।३॥३।६७। 


२२५ न चाधिकारिकमपि पतनानुमानात्तद-|१३७ परान्ु तछुतेः २।३।४१। 


योगात्‌ ।३॥8।४ १। 
२३२ न ग्रतीके नहि सः ।४॥१५) 
२७४ नच कार्य प्रतिपत्त्यमिसन्धि।०।३॥ १५) 
७० नानुमानमतच्छव्दात्‌ । १॥६।३१॥ 

११६ नासतोडदृएतात्‌ ।९।२॥२६। 

११४ ना5माव उपलव्धेः १२।२।२८। 

' १२८ नात्माशुतेनित्त्वाच ताम्य:२॥३।१७। 
१२९ नाणुरतऋतेरिति चेच्ेतराधिकाराव्‌ । 

पर २॥३॥२१। 

१६२ नातिचिरेण विशेषात्‌ ।३।११३। 
२०८ नानाशब्दादिभेदात्‌ ।३।३।५८। 
२१६ नाविशेषात्‌ ।(३४।११॥ 
१०८ नित्यमेव च भावात्‌ १९।२।१४॥ 
१३४ नित्योपलव्ध्यनुपरव्धिप्रसज्लो3न्यतर- 


नियमो वान्यथा २३५२। 
१६६ निमोतार॑ तथा चैके पुत्नादयश्थ । 
३२॥२॥२॥। 


२१४ नियमाच्च ।३४।७| 
२४७ निशि नेति चेन्न सम्बन्धस्य यावदेहभा- 
विल्वाइशेयति |९२॥१९॥ 
२० नेतरोडनुपप्तेः ।११॥१६। 
११६ नैकस्मिज्नसम्भवात्‌ १९२३१ 
२४१ नैकसिन्दशेयतो हि ।४।२।६। 
२४२ नोपमर्देनातः ।8।२॥१०। 
(ः चच ) थ 
६९, पत्यादिशव्देम्यः ।१॥३।४ ३। 
९.४ पटवच्च १२।१॥१९॥ 
१०४ पयथोम्चुवच्चेत्तत्रापि (२।२।३॥ 


सूत्रावलोकनग्रकारः । 


पृष्ठाइगः । सूत्राणि। 
११७ पत्युरसामझसात्‌ ।९॥२॥३७। 
१४७ पश्चदृत्तिमनोवव्यपदिश्वते।२।४।१२ 
१६७ पराभिध्यानात्तु तिरोहित ततो छास्य ब- 
न्धविपययों श२।५। 
१२५ प्रथ्रिव्यधिकाररूपशब्दान्तरेम्य:।२।३॥ 
३५ गप्रकरणाच ।१॥२॥१०। 
७० प्रकरणाच ।१।३।६। 
५६ प्रसिद्धेश् 0॥१।१७ 
८२ ग्रतिज्ञासिद्धेर्लिक्रमाइ्मरथ्यः। १।४।२० 
८३ भ्रक्ृतिश्व॒ मतिज्ञादष्टान्तानुपरोधात्‌ । 
१शर शा 
१०४ ग्रवृत्तेश्व ।२२२। 
११२ अतिसद्जडचाउप्रतिसडयानिरोधाप्राप्तिर- 


विच्छेदात्‌ रारर। 
१२३ पतिज्ञाहानिरव्यतिरेकाच्छव्देम्यः 
२३।६। 


१४० प्रकाशादिवज्नै परः ९।३॥४ ६॥ 
१४२ प्रदेशादिति चेन्नान्तभोबात्‌]२।३।९ ३। 
१७४ ग्रकृतैतावत्त्व॑ हि मतिपेधति ततो 


त्रवीति थे सूथः ।२।२॥२२॥ 
१७५ प्रकाशादिवच्चावैश्येष्य प्रकाशश्र कर्म- 
प्यभ्यासात्‌ शर२७५। 


१७६ प्रकाशाश्रयवद्या तेजस्त्वात्‌ ३२।१८। 

१७६ ग्रतिषेधाच ३॥२।३० 

१७७ परमतः सेतून्मानसम्बन्धभेद्व्यपदे- 
शेभ्यः 2 १२॥३ १। 

२०३ प्रद्ानवरदेव तदुक्तम्‌ ।३॥३।४ ३। 

२०६ परेण च शब्द ताहिष्ये भूयस्त्वा- 


त्वनुबन्धः र३।५२। 


सूत्रावहोकनमकारः । ९ 


पृष्ठाद्रग सूत्राणि | पृष्ठाह्ाई । स्त्राणि ! 

२१८ परामर्श जैमिनिरचोदना चापवदति हि नसवत्‌ ।१३।५०। 
4॥४१८। (फ) 

२४३ प्रतिषेधादिति चेन्न शारीरात्‌ 9२।१२| १७९ फलमत उपपत्ते: (३।२।१८। 

२६१ प्रदीपवदावेशसथा हि द्शयति (ब) 
॥99१७।| २२६ वहिस्तूमयथाउपि स्मृतेराचाराज् 

२६२ भत्यक्षोपदेशादिति चेन्नाधिकारिकम- | ३॥99 ३। 

ण्डल्खोक्तेः ॥998१८।| २३२ अह्दृश्टिरित्कर्पात्‌ ।४।१।५) 


१७८ प्रथमेडश्रवणादिति चेन्न ता एवं छ्युप-| २५७ ब्राह्मेणजैमिनिरुपन्यासादिभ्यः29।५। 
प्त्ते १७८ वुच्यर्थ: पादवत्‌ ।३॥२।३३॥ 


१७१ अकाशवच्चाबैयथ्यांत्‌ ।१॥२।१७। (स) 
२८ आणसतथानुगमात्‌ ।१।१२८। ६४ भावं तु बादरायणोडसि हि. १।३।३३॥ 
५० ग्रागम्ृच्च ।१३॥७। ९३ भावाब्चोपछब्घे: (२।१।१५। 
७८ प्राणादयों वाक्यशेपात्‌ (१|०।१२) | १५६ भाक्त वानात्मवित्वात्रथाहि द्शयति 
१४८ प्राणवता शब्दात्‌ ।२9।१५। ।३।१॥७। 


२१५९ भावशव्दान्य ।३।०।२२॥ ॥! 
६० भाव॑जैमिनिर्विकर्पामननात्‌ 8।४।१ १ 
२६१ भावे जाअद्वत्‌ |92॥१४। 


१५४ प्राणगतेश्व ३।१३॥ 
२१९ पारिए्वाथों इति चेन्न विशेषित्वात्‌ 


३॥४।२२। व 
१८८ प्रियशिरस्त्वाबपरप्तिस्पचयापचयो हि। ४ भूतादिपादव्यपदेशोपपततेशवस्‌ । 
भेदे ।॥३४१ 88६ 


७१ भूमा सम्प्रसादादध्युपदेशात्‌ 0]३॥८ 
२०७ भून्नः ऋु॒वज्यायस्त्व॑ तथाहि दर्शयति 
११७५७। 


१०५ पुरुषाश्मवदिति चेत्तथापि२।२।७।१२। 
१३३ पुंस्त्वादिवत्त्वस्य सतोडमिव्यक्तियोगात्‌ 


९३॥३ १। मतेद कक है 
१९२ पुरुषविद्यायामिव चेतरेषामनाझ्ञानाद| 2 हेड तडुतः शर। 
श३।२श| ** मेंदव्यपदेशाच ।१।१।१७। 


२१२ पुरुषार्थोडतः शब्दादिति बादरायणः २४ भेदव्यपदेशाचान्यः ।१।१॥२१। 
।३॥४११।| ५० भेदव्यपदेशात्‌ ।१३।७। 
१७६ पूर्ववद्धा १॥२।२९॥ १४९ भेदश्रुते: ११०।१८। 
१८० पूर्व तु बादरायणो हेलुलवव्यपदेशात्‌| १७० भेदादिति चेन्न म्रत्येकमतद्ववचनात्‌ 
॥३॥२॥० १। १।२१२। 
३०३ पूर्वविकल्प: प्रकरणात्सात्‌ क्रियामा-| १८४ भेदादिति चेलेकसापि ।३।३॥२। 


१० सूनत्नावलोकनप्रकारः । 


पष्ठाक्काई। सूत्राणि। पृष्ठाह्ना: । भूत्राणि । 
९२ भोक्रापत्तेरविभागश्रेत्सालोकवत्‌ २॥३॥३०। 
7२११३। | १९६ यावदधिकारमवर्खितिराधिकारिका- 
२३७ भोगेन लितंरे क्षपयित्वा सम्पयते णाम्र्‌ १॥३। १२ 


9११९।।| «४ युक्तेः शब्दान्तरा् ॥११८। 
२६३ भोगमात्रसाम्यलिज्ञाच ।2।२२ १। ८७ योनिश्र हिं गीयते ।(॥9९२७। 


(स) १६६३ योनेः शरीरम्‌ ।३॥१।२७। 
६४ मध्वादिष्वसम्भवादनधिकारं जैमिनिः (२४७ योगिनः प्रति च स्यते स्मार्ते चेते 
१0१३ १। ॥0२।२ १। 
७५९ महद्वच्च ।१।॥४।७। (२) 


१०६ महद्दीधेवद्वा हखपरिमण्डकाभ्याम्‌ १०३ रचनानुपपत्तेश्य नानुमानम्‌ ।२।२॥१। 
२१२।११। [२०६ रमु्म्यनुसारी ।9२।॥१८। 
१६९ मन्नवर्णाच [२।१।४४ 9३ छझुपोपन्यासाच १२।२३॥ 
२०७ मन्नादिवद्वाइविरोधः ।३४३६।५६। १०८ रुपादिसत्वाच्व विपयेयो दर्शनात 
२० भाज्नरवर्णिकमेव च गीयते ।११।१७। ।२।२११७८। 
१०० मांसादि भौम॑ यथाशव्दमितरयोश्र १६३ रेतःसिग्योगो5थ ३॥१।२६॥ 
२॥९२१। (ल) 
१६६ मायामान्न तु कार्त्स्येनानभिव्यक्तल-|२०१ लिलक्नभूयस्त्वाचद्धि वलीयस्तदपि 
रूपत्वात्‌ शश३॥ ३)३॥४४। 
2९ मुक्तोपरृप्यव्यपदेशा |११३६।९। २३१ हछिज्ञाच ।9१२) 
१६९ मुग्धे5द्धेसम्पत्ति; परिशेषात्३७२।१०| ९५९ लोकवत्तु लीछाकैवल्यम्‌ ।२।१।३३॥ 


२५०७ मुक्तः मतिज्ञानात्‌ ।9॥9२। (व) 
२२९ मौनवदितिरेषामप्युपदेशात्‌ (8४९३। | ..,, बद्तीति चेन्न प्राशे हि प्रकरणात 
(य) शिशणा 
९७ यथा च आणादि ।२१।२०। १०४ व्यतिरिकानवस्ितेश्वानपेक्षत्वात्‌ 


“१३७ यथा च तक्षोमयथा ।२।३॥४ ०। २२॥४। 

२३४ यत्रेकाग्रता लत्राविशेषात्‌ ।2१११। | १३१ बव्यतिरिको गन्धवत्‌ ।२।३॥२६। 

२३७ यददेव विद्येति हि 8९।१८। | १३५ व्यपदेशात्व मक्रियायां न चेनिदेश- 

१२४ यावह्विकारं तु विभागो छोकवत्‌ू.. |. विपयेयः २।३।३ ६॥ 
२]३|७। | १७३ 

१३३ यावदात्मभावित्वान्व न दोषसतइशैनात्‌ स्वादेवम्‌ 


इंद्धिहासमाक्त्वमन्तर्मावाद भयसामञ्च 


।१२।२०। 


सूज्नावलोकनप्फारः | ११ 


पृष्ठाह्ग) । सत्राणि। |! पृछाडाः | सत्राणि | 
२०० व्यतिहारों विश्ियन्ति हीतरवत्‌. (२२३ विहितत्वाचाश्रमकर्मापि ।३शशर। 
।३६१।३७)।२२४ विशेषानुअहश्च ।३॥०॥३८। 
२०६ व्यतिरिकस्रद्भावामावित्वान्न तृपलन्धि-|२०२ विशेषितत्वाच ॥9३।८। 





ब्त्‌ विवा5श| २७५ विशेष च दर्शयति ।2)३।१६। 
४२ वाक्यान्वयात्‌ ।१।९।१९॥ २६२ विकारावार्ति च तथाहि स्थितिमाह 
१८७ ब्याप्तश्न समज़्सम्‌ ।३।३॥९% ४॥४।१९॥ 


२३५ वाज्मनसि दर्शनाच्छव्दाच् ।9२॥१। [१९२ वेधायर्थमेदात्‌ ।३३२०। 
२४९ वाबुमव्दादविशेषविशेषाभ्याम०।३॥२| 2९ वैश्वानरः साधारणशब्दविशेषात्‌ 


१९ विक्ारमव्दाचेति चेन्न प्राहुयात्‌ 'धिरारश 

१११३॥ ९९ वैपम्यनेपृण्येन सापेक्षत्वातथाहि दरशशे- 
३२ विवक्षितगुणोपपत्तेश्व ।१२॥२। यति ।२११४। 
३७ विद्येपणाच्र ।0११२। ११४ वैधम्याच्च न खम्तादिवत ।२२।२९॥ 


2३ विशेषणमेद्व्यपदेशाभ्यां च नेतरी [१५० वैलक्षण्यात् २।०१९। 
।!0२२२। | १५१ वैश्षेप्यातु तद्घादसद्वादः २।9२२। 
६२५ विरोध: कमणीति चेन्नानेकप्रतिपतेद-[ २५१ वैद्युतेनेव ततस्तछुतेः ।2३॥8। 
शैनाव्‌ शशरण (छा) 
९८ विकरणत्वान्नेति चेत्तदुक्तम्‌ २११।३१। ३३ शब्दविशेषात्‌ 8२।५। 
१०६ विप्रतिपेघाद्ासमख्सम्‌ ।ै२।१० | ४४ शब्दादिभ्योडन्तःमतिष्ठानाच्व नेति चेन्न 


११९ विज्ञानादिभावे वा तद्प्रतिपेघः तथा दृष्टचुपदेशादसम्भवात्युरुपमपि चै- 
2२॥9०४।|। नमधीयते 40२।२६। 

११९ विग्रतिपिधाच् ।२२४५। ६१ शद्धादेव प्रमितः 0३॥२४। 

१२७ विपयेयेण तु क्रमोइत उपपथते च | ६३ शब्द इति चेन्नातः प्रभवात्मत्यक्षानु- 
२३॥१४॥ | सानाभ्याम 8३॥२८। 

१३७ विहारोपदेशात्‌ ९२(२।३४। | ६७ अवणाध्ययनार्थ्रतिषेघात्सतेश्र 

१७९ विद्याकमंणोरिति ठु प्रकुृतवातू शशरटा। 


३॥१।१७। १२३ शद्घाच २॥३।४। 
२०४ विद्ेव तु निर्धारणात्‌ ६।४७। (१३६ शक्तिविपययात्‌ [२।३॥३८। 
२०८ विकल्पोडविश्विष्टफलल्वात्‌ | ३।३।५९। (२२१ शमदमायुपेतः ख्वात्तथापि तु तह्निवे- 
२१६ विभागः शतवत्‌ ।१9।१ १। | सदजझतया तेषामवरश्यानुष्ठेयलात । 


२१८ विधिवां धारणवत्‌ ।३।॥४२ ०। शाछार७। 


१२ 


पूछा: । सूत्राणि । 
२२३ शब्दआास्याकामकारे १३।०३ १। 
५ शाखयोनित्वात्‌ ।१।१।३॥ 
२५९ शाखदक्षा तूपदेशों वामदेवबत्‌। 
!0१३०। 
३१ शारीसश्वोमयेडपि हि भेदेनैनमघीयते। 
१॥२॥२०। 
२०९ शिष्टेश्व ।१३।६२॥। 
६५ शुगर्य तदनादरअवणात्तदाद्वणा- 
सूच्यते हि ।१३३४। 
१६ अतत्वाच्च ॥१११। 
३९ अ्रुतोपनिषत्कगगत्यभिधानाशञ्व १॥२।१६ 
९७ श्रुतेस्तु शब्दमूलत्वात्‌ ।९।१॥२७। 
१७९ अुतत्वाच्च (३२॥३९। 
२०४ शुत्यादिबलीयस्त्वाच्च नवाघः ३३३।४९ 
२२५७ श्रुतेश्व ।१/४।४ ६॥ 
२१३ शेषत्वात्युरुषार्थवादो यथान्येष्विति जै- 
मिनि ३ 
१३६ शओछ्ठश्व ९॥०८। 
(स) 
३२ सवेत्र अ्सिद्धोपदेशात्‌ ।१(२। १ 
३४ सम्मोगप्राप्तिरिति चेन्न वैशेष्यात्‌ 
रा८। 
४४ स्येमाणमनुमानं स्ादिति (१।२॥२७। 
२६ सम्पत्तेरिति जैमिनिसथाहि दशैयति 
8१२३ १ 
६३ समाननामरूपत्वान्चावृत्तावप्यविरोधो 
दरशेनात्त्मतेश्व 8१३॥३०। 
६६ संस्कारपरामशोत्तदभावामिलापाच्च 


११३ ६। 
७९ समाकषोत्‌ ।१।४।१७। 


सूत्रावकोकनमकारः । 


पृष्ठाड्रग) । सूत्राणि । 
९१ खपक्षदोषाच (२।११० 
९१३ सत्वाचावरस २॥१।१६॥ 
९.८ खपक्षदोषाल्व २।१॥२९। 
९८ सर्वोपेता च तदशेनात्‌ ।२।१(३०। 
१०१ सर्वेधर्मोपपत्तेश्व ।२।१॥३७। 
१०८ समवायाभ्युपगमाच साम्यादनवखितेः 
[२(२।११॥ 
१०९ समुदाय उमयहेतुकेडपि तदम्रापतिः 
२२१८ 
११५७ सर्वथाउनुपपत्तेश्व (२।२॥३२॥ 
११७ सम्बन्धानुपपतेश्व ९॥२।३८। 
१३० खशब्दोन्मानाम्यां च ।३।३२२। 
१३६ समाध्यमावाध्च ।९३॥३९॥ 
१४० समरन्ति वे [२।१॥३४७। 
१४५७ सप्तगतेर्विशेषितत्वाच्च [२०७ 
१०० संज्ञामूर्तिछृप्तिस्तु ज़िब्ृत्कुबेतउपदेशात्‌ 


२॥४।२०। 
१७८ संयमने त्वनुभूयेतरेषामारोहावरोही 
तह्गतिदशैनात्‌ (३११ ३॥ 


१७९ सरन्ति च ।३॥१।१४। 

१६० स्येत्तेडपे च छोके ।₹।१(१९॥ 
१६५ सन्ध्ये सष्टिराह हि ।३॥२।१। 
१६८ स॒ एवं 


३॥२॥९। 
१८३ सर्ववेदास्तप्रत्ययं॑ चोदनाथविशेषात्‌ 
३।३। १ 
१८७ संज्ञातश्रेत्तदुक्तमस्ति तु तद॒पि ३३८ 
१८७ स्वोभेदादन्यत्रेमे ।३।३।१०। 
१९० समान एवं चामेदात्‌ ३।३।१०९। 
१९१ सम्बन्धादेवमन्यत्रापि !३॥३॥२०। 


सत्रावडोकनम्रकारः । १३ 


पृष्ठाडु 8 । सत्राणि। पृष्ठाह्मा। । सत्राणि । 
१९२ सम्मृतियुव्याप्तिश्नातः: [३।३६।२२। [१७७ सामान्याज्ञु ।२॥३२। 
२०९ समाहाराव्‌ ।३३।६३॥ १०४ साम्पराये ततेव्याभावात्तथाह्मन्ये 
२१३ समन्वारम्भणाव्‌ ।१शण। ११२७ 


२२० सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेरधवत््‌ ॥ . [२५२ सामीप्यात्ु तद्व्यपदेशः ।9३॥९ 
३॥४।२६।। १५ ल्ाप्ययात्‌ ।१।१॥९। 
२२१ सर्वान्नानुमतिश्व प्राणात्मयये तदशनात्‌। ३८ खानादिव्यपदेशाब |१।२।१४। 
।१॥9२७। [१२३ ख्वाचेकस अद्मशब्दवत्‌ २३।५। 
२२३ सहकारित्वेन च ।३॥४।३३॥ १२५९ खात्मना चोत्तरयों: ।२।३॥२०। 
२२३ सर्वधापि त एयोभयलिज्ञात्‌ ३॥४।३ ४ | १७८ स्थानविशेषात्मकाशादिवत्‌ 
२२७ सहकार्यन्तरविधिः पक्षेण तृत्तीय॑ ।३॥२।३४ 
तद्ठ॒तोी विध्यादिवत्‌ (३[०४७। [१८४ खाध्यायस्य तथात्वेन हि समाचारे5- 
२४१ समाना चासत्युपक्रमादसतत्व॑ चानुपो- धिकाराच सवचच्च तन्नियमः ।३(३।३ 
प्य ।8२७। २२६ खामिनः फलशुतेरित्य॑त्रियः 
२५६ सम्पद्याविभावः खेन शब्दात्‌ ३॥9।9 2। 
४।9।१ २६१ खाप्ययसम्पत्त्योरन्यतरापेक्षमाविष्क्तत 
२७९ सहल्पादेव तु तछूतेः ।९।४।८। हि ।99।१ ६। 
२३३ समरन्ति च॑ ॥8।१।१०१| ५० खित्यदनाभ्यां च ।१।२।७ 
३३ स्थतेश्य ।0२॥६॥। १९८ सुकृतदुष्कृते एवेति वादरिः 
८७ स्मृत्यनवकाशदोपप्रसज्ञ इति चेन्नान्य- १११६॥ 
स्पृत्यनवकाशदोपप्रसज्ञाव्‌ ९११। | ३८ सुखविशिष्टाभिधानादेव च 
२४३ स्पष्टो श्ेकेषास 9२।१३॥ १२१५ 
२०४ खर्यते च ।9२१४। ६९ सुपुष्युत्कान्त्योरभेदेन |१३।४२॥ 
२०३ स्ट॒तेश्व ।9३॥१ १। ७३ सूक्ष्म तु तद॒देत्वात्‌ ।१।2२। 
२१६ स्त॒ुतयेड्नुमतिवी ।१०।१४। २४२ सूक्ष्म परिमाणतश्थ तथोपलब्धे: । 


२१९५ स्तुतिमात्रमुपादावादिति चेन्नापूर्वल्वात्‌ 89२॥९ 
३॥४।२१। [१६६ सूचकश्व हि श्रुतेराचक्षते च तद्विदः 


9६ साक्षादप्यपिरोध जैमिनिः श२।श। 
१२॥२ ८। [२०० सैव हि सत्यादयः ।३६॥३॥३८। 

७३ सा च प्रशासनात्‌ ।१।३१ १ २४० सोड्ध्यक्षे तदुपगमादिस्यः 

<9 साक्षाच्ोभयाज्नानात्‌ ।(9२५। 8२४। 


डे 


१७ सूत्रावक्ोकनग्रकारः । 


पृष्ठाह्ाघ। ” सत्राणि । पृछ्ठाडूगई । सूत्राणि। 
(ह) (क्र) 
६१ ह॒थयपेक्षया तु मनुष्याधिकारतात्‌। | क्षत्रियवगतेश्रोत्तरत्र 088 ह 
१३६२९ 
१४६ हस्तादयस्तु खितेउ्तो नैवम्‌ ।२।8।६॥ | * + अणिकलाच ।२।२।३१। 
१९, हानो तूपायनशब्दशेषत्वात्कुशा उन्दः (क्ष) 
सतुत्युपगानवत्तदुक्तम्‌ ३२३।२६॥ छ्रे ज्ञेयत्वावचनाच १॥9|४। 
१४ हेयत्वावचनाच ।११।८। ११८ ज्ञोज्त एवं २११८। 


इति सूत्रावकोकनप्रकार; समाप्तः । 


ओगणेशाय नमः । 


श्रीमबेद्यास्रणीतानि 
अह्यसूतज्राण | 


भावार्थप्रकाशिकाभाषाटीकासहितानि । 
तत्र अथसाध्यायस्थ ग्रथम) पाद+ १। 


ठीकाकारकृत भज्छाचरण और उपोद्धात ! 
दोहा-तातपय्य सब वेदका, जिसमें कहें महान्‌ ॥ 
हरकर पुनः विरोधको, सोई कीन विधान ॥ १॥ 
जिसे अथ पुनि कहे हैं, साधन बहुत प्रकार ॥ 
दोपकार फलरूप जो, वहुविध ताहि जहार ॥ २॥ 
इस अंथके चार अध्याय हैं. तहां प्रथम अध्यायमें सर्व वेदोंका अह्मविषे 
तात्पर्य सिद्ध किया है. दूसरेमें सर्व वादियॉंकी शंकाको दूर करके, सर्व वेदों- 
का बह्ममेंही तात्पर्य सिद्ध किया है. तीसरेमें साधनोंका विचार है. चतु- 
थम दो प्रकारके फलका विचार है. तिन चारों अध्यायोंके चार चार पाद हें. 
दोहा-डिविध लिंग हैं जाहिकेः ध्येय ज्ेय पुन जोय ॥ 
तिस परमात्मा देवको, बंद जोर कर दोय ॥ ३ ॥ 
तंहां म्रथम अध्यायके प्रथम पादमें स्पष्टलिंगयुक्त वाक्यनका विचार है, 
दूसरे पादमें अस्पष्टलिंगयुक्त वाक्यनका विचार है. ते वाक्य उपास्थ बह्मके 
बोधक हैं- तीसरेमें ज्ञेय अह्मघोधक अस्प्टलिंगयुक्त जे वाक्य तिनका विचार 
है. चतुर्थमें संदेहवान्‌ जे पद तिनकरके युक्त जे वाक्य तिनका विचार है. 
. तहां प्रथम पादके एक अधिक तीस सूत्र हें. अल्प जिनके अक्षर होवें तथा अथ 
बहुत होवे तिनको सूत्र कहे हैं. सो सूत्र दो मकारके होवे हैं. एक अधिकरण- 
रूप होवे हैं, एक गुणरूप होवे हैं. इस प्रथम पादमें एकादश अधिकरणरूप 
सूत्र हैं. वीस गुणरूप हैं. तथाहि-- 
सूत्रसंज्या । अधिकरण | गुण, प्रसंग- 
2 आ० के ब्रह्ममीमांसाविधान- 
बअल्लञ० १ 





सूत्रसंख्या । अधिकरण। 


चर अ० 
ह आ० 
छ आ० 
पड आठ 
छ््‌ नः 
कि न 
4 न 
९ न 
१२० न 
११ नः 
श्र अआछ 
श्र ने 
१४ न 
श्५ हि 
१६ न 
५७ न 
श्८ रन 
५९ है न 
२० अञ्‌० 
२१ +: 
श्र ० 
है रे आ्‌० 
र्छ आ० 
रण न 
रद कब 
७ नै 
श्द अआ० 
९ न 
झ्र० न 
534 छ 


ब्रह्मसूत्राणि | 


गु० 


झु०0 
गु० 
शु छ 


ब्न्ब्न्-्ऊ 


[अ० १ पा० १लू० १] 
प्रसंग, 
ब्रह्मलक्षणविचार. 
सर्वज्ञतामें प्रमाण- 
समनन्‍्वयविचार.- 
सांख्यमतखण्डन- 
सां० 
सां० 
सां० 
सां० 
सां० 
सां० 
पुच्छवाक्यविचार.- 
पु०ण * 
पु० 
पु० 
पु० 
पु० 
पु० 
पु० सूर्य 
नेत्रगतपुरुषबिचार. 
+ 8 
आकाशशब्दवि० 
प्राणशच्दवि ० 
ज्योतिःशच्दबि० 
अह्मछंदनिषेघ- 
गायज्रीज्रह्म ग्रहण. 


प्राणशव्दबिचार. 
प्रा० 
प्रा० 
प्रा० 


[अ० १ पा० १ सू०१] भाषादीकासहितानि । डर 


दोहा-जिसमें विषय पुनि संशय, पूर्वपक्ष तिमि गान ॥ 
उत्तर तथा प्रयोजन, अधीकरण तिस जान ॥ १॥ 


अर्थ-जिस सूज्रमें विषय १, संशय २, पूर्वपक्ष ३, उत्तरपक्ष ४, प्रयोजन ५, 
यह पंच कह्टे जाय॑ सो अधिकरणरूप सूत्र कहलाता है. तिससे भिन्न 
जो सूत्र सो गुणरूप कहलाता है. जिसमें संदेह होवे सो विषय कहलाता है. 
इस गंथम्मे सूत्रका अक्षरार्थ मात्र लिखेंगे, तिस अथके उपयोगी अधोत्‌ सूत्रोंका 
अक्षराथ जितनेंमें स्पष्ट होवे उतने विषयवाक्यादिकोंको लिखेंगे. सब अधिक- 
रणसूत्रोंके विषय संशय आदि पूर्वोक्त पांचोंको नहीं लिखेंगे और तिनको 
ऋमस भी नहीं लिखेंगे। 

अथ०-इस लोकके भोगोंसे जे और परलोकके भोगोंसे जे विरक्त हैं और मोक्षके 
लिये इच्छावाले हैं तिन अधिकारी पुरुषोंके लिये परमकृपालु मुनि व्यास भग- 
चानसे सर्व वेदांतोंका साररूप यह वेदांतशासत्र किया है, तहां यह अथम सूच्न है- 


अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ॥ १ ॥ 
अथ । अतः । ब्रह्मजिज्ञासा | 
ये सृत्रके पदच्छेद हैं. श्रह्मजिज्ञासा इस पदमें 'ब्रह्म, ज्ञा, सन ये तीन 
पद हैं. साधनचतुष्टयप्रासिके अनंतर 'अथ' पदका अर्थ है. “अतः यह पद 
हेतुका वाचक है. ब्रहा' पद नित्य शुद्ध बुर मुक्त पूण चेतनका वाचक है. 'ज्ञा 
यह पद ज्ञानमात्रका वाचक है. 'ज्ञा' पदर्मे अजहत्‌ लक्षणा' मानके विवरण 
भमतानुसारी 'जन' ज्ञा पदको अभेदज्ञानका वाचक मानें हैं. सा यह पद 
इच्छाका बाचक है. सा पदके विचारमें जहत्‌ लक्षणा मानें हैं. “सा” पदके 
आगे विवरणानुसारी कर्तव्य पदका अध्याहार करें हैं. कतेव्यपदसे निधम- 
विधिका अंगीकार करें हैं. और आचाय ओऔवाचस्पतिमतानुसारी कतें- 
व्यपदका अध्याहार नहीं करें हैं और विधि भी नहीं मानें हैं- 
सूत्रवाक्यार्थ आगे होवेगा । बुहदारण्यकके चतुर्थ अध्याय चतुर्थ आ्राह्मणमें- 
“न वा अरे सर्वेस्थ कासाय सर्च भिर्य सवति | 
आत्मनस्तु कामाय सच्चे प्रियं भवति ॥” 


2 
यह कहकर आगे यह वाक्य दर 2 रु 
“आत्मा घा झरे द्रष्टट्यः ओतव्यों सन्‍्तव्यों निद्ध्यासितव्यः 


इंति । यह सूत्नका विषयवाक्य है. झुत्यथे-हे मैत्रेची ! आत्मा दशनके 


9 त्द्मसृत्राणि [अ० १ पा०१ सृ० १] 


थोग्य है, अवणके योग्य है, मननके योग्य है, चिंतनके योग्य है. इति। इस 
बचनमे आत्माके साक्षातकारार्थ ज्ञानका साधन करके श्रवणका विधान किया 
है. सर्च उपनिषद्वाक्यनका अद्वितीय त्रह्ममें जो तात्पयनिश्चयअन्चुकूल 
युक्तिविचार सो श्रवण कहलाता है. सो युक्तिविचाररूप वेदांतशाखर आरंभ 
करने योग्य है वा नहीं यह सूत्रमें संदेह हैं, सर्वजगा पूर्वपक्ष और सिद्धांत- 
पक्षकी थुक्ति ये दो संशयरम बीज होवे हं. तहां यह पूर्वपक्ष है, कि जिसमे संदेह 
होवे सो विषय कहिये हैं, बह्ममे संदेह नहीं “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” जा 
वाक्यमें अह्मरुपसें ब्रह्म प्रसिद्ध है. और अहम जा प्रतीतिस जीवरूपकरके बह्म 
प्रसिद्ध है, यातें बरह्मको निश्चित होनेस ताको विपय कहिना संभवे नहीं. और 
ब्रह्मज्ञान प्राप्त होनेपर भी मुक्ति होवे नहीं अर्थात्‌ ज्ञान होनेपर भी संसार बना 
रहे है यांते शाखका कुछ प्रयोजन भी प्रतीत होता नहीं, यांते शाख॒का आरंभ 
करनेयोग्य नहीं- इस पूर्वपक्षमें यह सिद्धांत है कि 'अहम्‌ अहम” जा अतीतिस 
भेद भान होवे है, ओर “तत्वमसि” जा वाक्यसें अभेद भान होवे है, यांते 
संशय संभवे है. और प्रारब्धके भोगसें संसारकी प्रतीति संभवे ह यांते 
ज्ञान होनेपर अज्ञानकी निवृत्ति तथा आलजंदगम्राप्तिरप प्रयोजन भी संभवे है 
यांते शाख्बका आरंभ करना ही योग्य है. इति । उक्त श्रोतव्य श्रुतिके 
अनुसार सूत्रका यह वाक्‍्याथे सिद्ध हुआ कि चतुष्टयसाधनवान्‌ अधिकारीको 
करममफल अनित्य होनेसें ह्मज्ञानार्थ विचार कतैव्य है. इति। ज्ञानको मोक्ष- 
की साधनता और वेदांतका विचार्यत्व सिद्ध होवे है. तिसके अंगीकार कियेसें 
सूत्रका यह अर्थ सिद्ध हुआ कि कर्मफल अनित्य होनेसें अधिकारीको मोशक्ष- 
साधनरूप बह्मज्ञानार्थ वेदांतविचार कतेव्य है. इति। और मिश्र बाचरपतिके 
मतसें कमंफल अनित्य होनेसें चतुष्टयसाधनोंके अनंतर ब्ह्मज्ञानकी इच्छा 
होथे है. ज्ञान विचारसाध्य है, यांते विचारकतंव्यता सिद्ध होने है. इति। 
जे इस वेदांतविचारको अंगीकार नहीं करें तिनके मतमैं अपरसाधनसाध्य मुक्ति 
सूत्रका फल है. सिद्धांतमें विचारके संभवसें अह्मश्ञानसाध्य मुक्ति सूत्रका फल 
है. वा भंथका आरंभ और अनारंभ सिद्धांत और पूरपक्षका फल है ॥ १॥ 


अधघ०-प्रधमसूज्रमे ब्रह्मीमांसाका विधान किया है. सो सीमांसा रुक्षण- 
विचार, प्रमाणविचार, समन्वयविचार, अविरोधविचार, साधनविचार, व फल- 


विचारके भेदसें अनेक प्रकारकी है. तहां अक्मकी आधानता होनेसें प्रथम त्रह्मका 
लक्षण करें हैं । 


[अ० १पा० १ सू० ३] भाषाटी कासहितानि | ण्‌ 


जन्मायस्य यतः ॥ २ ॥ 


जन्म | आदि | अस्य | यतः । इति प०। 
इस सूत्रमें तत्‌ पदका अध्याहार करके इसका यह अर्थ होता है कि इस 
प्रपंचका जन्म, पालन, भंग, जिससे होवे है सो भह्म है. इति। 
“बत्तो चा इसानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति 
यत्‌ प्रयथान्ति अभिसंचिछान्ति तत्‌ विजिज्ञासख ततू्‌ ब्रह्म” 
यह श्रुति सूत्रका विपयवाक्य है। 
८४ 5७ ७ ओके ह॥ह कोड ८8७ 
. अथ्थ-जिस वबस्तुसे ये सबे भूत उपजें हैं, जिसमें स्थित हैं, जिसमें मृत हो- 
कर ग्रवेश करें हैं, तिसकी तुम जिज्ञासा करो, सोई बह्म है. इति। इस श्रुति- 
में जे जन्मादिक कहे हैं ते तह्मके लक्षण हैं, वा नहीं यह तहां संशय है! 
जन्मादिक प्रप॑चके घमम हैं, बह्मसे तिनका संबंध नहीं, यांते जन्मादिक बह्मका 
लक्षण नहीं यह पूर्षपक्ष है। तहां यह सिद्धांत है कि जे जन्मादिक कहे हैं ते 
श्रह्मके तटस्थ रूक्षण हैं, व सत्यादिक स्वरूपरक्षण हैं, यांते उक्त दोष संभवे नहीं. 
जो प्रथम अधिकरणका फल है सोई इस अधिकरणका फल है. जहां कर्ममें लक्षण 
प्राप्त होवे तहां प्रयोजन नहीं कहा जाय: “ब्रह्मजिज्ञासा” इस वाक्यमें कर्ममें 
पष्ठी है यांते प्रथम सूत्रका जो प्रयोजन है सोई इसका प्रयोजन है. इति॥२॥ 
अच०-पूर्व त्र्मको जगतका कारण कथन किया. है, सो कारणता सर्वज्ञता 
बिना संभवे नहीं यांते अह्ममें सर्वज्ञता सिद्ध होवे है. तिस अर्थात्‌ सिद्ध 
सर्वज्ञताको पर हेतु्से सिद्ध करें हैं । 


शास्रयोनिवात्‌ ॥ ३॥ 


शास्रयोनित्वात्‌ । इति प०। 

अर्थ-शासत्रपद वेदका वाचक है, योनि नाम कारणका है, वेदका जो योनि 
होये सो कहिये. वेदयोनि, अर्थात्‌ वेदका ईश्वर कता है, तो वेदका कताो होनेस भी 
नह्म सर्वज्ञ है. बृहदारण्यकोपनिपदि “ एतस्य' महतो भ्ूतस्थ निमश्वसित- 
मेवैलत्‌ यदरवेदी यज्वेंदः सामवेदों अथर्वाज्ञिसस इतिहासः पुराण 
कऊोको व्याख्यानान्यलुमानानि प्रसाणभतानि” यह श्रुति सूतरका विषय- 
वाक्य है. शुत्यथ-यह नित्यसिद्ध जो तह्म उसके निःखवाससे उत्पन्न ऋग्वेद, चजुर्वेद्‌, 
सामबेद, अथर्वबेद, आंगिरस, इतिहास, पुराण, शछोक, व्याख्यान अनुमान, ये * 


६ ऋसत्राणि [अ० १ था० १ सू० ४ ] 


प्रमाणभूत हैं. इति। बह्म वेदका कर्ता है था नहीं यह तहां फिरभी संशय है। “बाचा 
विरूपनित्यथा” इस अति वेदको नित्य सुना है. यांते ब्रह्म वेदका कर्ता नहीं, 
विरूप नाम हे देवा नित्य जो वाणी ताकर स्तुतिकी प्रेरणा कर. यह श्रुतिका अक्षराथ 
है. इति। तहां यह सिद्धांत है- “तस्मात्‌ यज्ञात्‌ सर्वह़्त ऋचः सामानि 
जज्ञिरे” इस श्रुतिम यज्ञपदसे त्रह्मका ग्रहण है, तासे बेदकी उत्पत्ति कही है. 
यांसे न्ह्म वेदका कती है। जो उक्त श्रुति बेदको नित्य कहे है सो अर्थवादरूप 
है, यासे वेद नित्य सिद्ध होवे नहीं. इति। सूत्रका दूसरा यह अर्थ है कि शास्त्र 
नाम वेद, थोनि नाम प्रमाण होवे जिसमें सो शाखयोनि कहलाता है।'ओऔपनि- 
घ॒द॑ पुरुष एच्छामि” इस अ्रुतिमें तरह्म उपनिषद्करके बेच भतीत होवे है । और 
“न अवेद्बित्‌ मजुते त॑ बृहन्तम” इस श्रुतिमं स्पष्ट ही अपरप्रमाणविप- 
यत्वका ब्ह्ममें निषेध भान होवे है. यांते अनुमानप्रमाणसिद्ध च्रह्म नहीं, किंतु 
वेदप्रमाणसिद्ध है. अछमान अज्ञकूछ तर्कमात्र हैं. इति ॥ सर्वज्ञवासिद्धि उक्त 
सूत्रमें सिद्धांतता फल है और सर्वेज्ताकी असिद्धि पूर्चपक्षका फल है. इति॥श॥। 

अच०-उपनिपदोंमें अधिकारीकी प्रवृत्ति होनी यह सिद्धांतमें उत्तर अ- 
घिकरणका फल है. अप्रवृत्ति पूलपक्षका फल है. सर्व बेदांत कर्मकतोदिकोंका 
बोधक है, वा निल शुद्ध चुद्ध मुक्त त्रक्षका वोधक है? यह तहां संदेह है कि, हम 
तो भरहण त्यागके योग्य नहीं और नित्यसिद्ध हैं. तांका चोधक वेदांतको मा- 
नेंगे तो निष्पयोजनत्व और सापेक्षत्व रूप दोष आस होवेगा, यांते उक्त दोपके 
निषेधार्थ वेदांतकों कर्मकर्ताका घोधक और देवताद्धारा कमंका वोधक सानना 
चाहिये. इस पूर्वपक्षमें भगवान्‌ सूत्रकार स्वसिद्धांत करें हैं-- 


तत्तु समन्वयात्‌ ॥ ४ ॥ 


तत्‌ । तु। समनन्‍्वयात्‌ इति। प० । 


अथे-तु: पद पूरपक्षनिषेधार्थक है. सम्यक जो होवे अन्वय सो कहिये 
समन्वय अर्थात्‌ सर्व वेदांतका अह्ममें तात्पर्य है. यांते “तत! नाम ऋह्म सर्व चे- 
दांतकरके प्रतिपाद्य है. कर्मकर्तादिक प्रतिपाद्य नहीं- नांई स्वरूपके 
ज्ञानसे अनर्थकी निद्तत्ति अनुभवसिद्ध है. और ब्ह्म रूपादिकसे रहित है. वे- 


दांत विना अपर अमाणका विषय नहीं. अपर प्रमाणका विषय होवे तो वेदांत- 


घचनको सापेक्षतारूप दोष होवे, अ्रह्म अपर प्रमाणका विषय नहीं यांते नि- 
* ध्ययोजनता और सापेक्षतारूप दोषकल्पना असंगत है. याते पटूलिंगनसे सबे 


[भ० १ पा० १ सू०४] भाषपाटीकासहितानि । ७ 


वेदांतका भह्ाममेंही तात्पय है---तथाहि--“सदेव सौम्पेदमञ्न आसीत” 
# एकमेवाडदितीयम्‌” यह छांदोग्यके पष्ठ प्रपाठकर्में कहा है. “आत्मा वा 
इद्सेक एवाग्न आसीत्‌ ” यह ऐतरेयके आरंभमें कहा है. “तदेतदू तअऋद्म 
अपूर्वमनपरमनन्तरमवाह्मम्‌ अयमात्सा प्रह्म सर्वानुः इत्यतुशासनम्‌” 
यह कृहदारण्यकके चतुर्थ अध्याय पंचम ब्राह्मणमें कहा है--“त्रह्मैच ड्द्स्‌ 
अमखूत पुरस्तात्‌ ब्रह्म पश्चात्‌ अह्म दृक्षिणतश्रोत्तेण अधश्व ऊर्घ्व 
च प्रसतस्‌ त्र्मेव इदू विश्वस्‌ इद॑ चरिछठम” यह छवितीयसुंडकसमासिमें 
कहा है। श्रु्यध-- 


हे सौम्य ! हे प्रियदशन ! जो यह प्रगट जगत्‌ है सो उत्पत्तिसें यूने सत्यस्तरूप 
जो इसका कारण तत्स्वरूप था। एक नाम सत्यसें भिन्न अपर कार्य रंचक नहीं 
था. जैसे मृत्तिकासें निमित्तकारण कुछाल भिन्न है तैसे सत्यसें कोई भिन्न होवे- 
गा, इस शंकाके निषेधार्थ अद्धितीय कहा है. इति | आत्मा नाम व्यापकका है 
इति । जो यह चराचर है, सो अह्मरूप है. सो ब्रह्म अपूर्व है. पूंष॑ कारण नहीं 
होवे जिसका तांको अपूर्व कहें हैं. अर्थात्‌ अकार्यरूप है. अपर नाम कार्यके वा- 
से जो न होवे सो अनपर कहिये हैं अर्थात्‌ अकारणरूप है. अनंतर पदनसे 
एक रसका ग्रहण है, वाह्य नाम अनात्माका है. सो नहीं होने जिसके सो अ- 
वाह्य अंगीकृत है. अर्थात्‌ अद्वितीयका भ्रहण है. अयंपद अपरोक्षताबोधक है. 
यह अपरोक्षं आत्मा अह्मरूप है. जो सवेका अजुभव करे सो सर्वाज॒भू्‌ कहि- 
ये । पुरस्तात्‌ नाम अज्ञानकारूमें अज्ञानीको अन्नह्मकी नाई भान होता था- 
सो यह सर्व अमृत नाम त्रह्मस्वरूप हैं. इति। जे कर्मकरतादिद्वारा वेदांतको 
कर्मबोधक कल हैं. पूषे तांका मत खंडन करके आगे जे उपासनावोधक बेदां- 
तको मानके मुक्ति मानें हैं तिनका मत खंडन करें हैं-“तत्‌ तु स- 
मन्वयात्‌.” इति ॥ बअह्ममें सवेका समन्वय है यांते तत्‌ ब्रह्म साक्षात्‌ वेदांत- 
करके भतिपाथ है. इति । मोक्ष उपासनाकरके साध्य नहीं- तथाहि--उपासनामें 
अनेक प्रकारकी न्यूनाधिकता है, यांते मोक्षमें भी न्‍्यूनाधिकता होवेगी. और 
अनित्यता सिद्ध होबेगी. कर्मके फठभोगकालसें शरीर अवश्य चाहिये, तिस 
बिना भोग होचे नहीं, याते सोक्षकालमें शरीर अवश्य सिद्ध होवेगा. किच “अ- 
झारीर॑ वा पसन्त न प्रियाभिये स्एशतः” यह छांदोग्यमें कहा है. “अचछ्य- 
रीर॑ शरीरेषु अनवस्थेषु अवस्थितम्‌। महान्तं वि्ु॒मात्सान॑ सत्वा 
घीरो न शोचति ” यह कठकी द्वितीया वहछीमें कहा है “ असं- 


८ ब्रक्नसृत्राणि | [अ० १ पा० १ सू० ४] 


मो हि अर्य पुरुष; ” यह जनकप्रति बृहदारण्यकके पछ अध्यायके द्वितीः 
य ब्राह्मणमें कहा है. उक्त बचनमें स्वाभाविक शरीररहित आत्मा भान होवे € 
यांते धर्मजन्य शरीररहित कहें ता संभवे नहीं. श्ुत्यथ--आत्मा शरीररहित 
है. तांको खुख दुःख रपशे नहीं करें हैं. मोक्ष तुम्हारे सतमें धर्मका फल है. 
सो प्रिय शच्दका अर्थ है. श्रुतिमें तांका निषेध किया है- यांते तांके मानेसे 
ख्ुतिकथित निषेध असंगत होवेगा. इति | वासतवमें स्थूलशरीरसें आत्मा 
रहित है. अनित्य शरीरमें अवस्थित नाम नित्य है, तिस महान्‌ विभु आत्माको 
जानके धीर पुरुष शोक नहीं करे हैं. इति । एक मूत पदार्थ दूसरे मूर्त पदा- 
थैसे संबंधवान्‌ होवे है. आत्मा परिषृण है. झूत पदार्थ नहीं, यांते मूर्तरूप 
स्थूछ सूक्ष्म किसी पदार्थसे भी संवंधवान्‌ नहीं, यांत्रे आत्मा अकती है. इति ॥ 
स्वाभाविक अशरीर मोक्षरूप भक्षविपे सुखदुःखस्पशके अभावकों यह श्रुति 
दिखावे है. “ अन्यन्ष ध्ोदन्यत्राधमादन्यात्रास्मात्कृताइक्ृतात्‌ अ- 
न्यन्न फ्र्ताच सव्याव यत्‌ तत्पदयसि तद्द इति ।” यह श्रुति कठकी 
द्वितीया वलीसें है। अथ-धर्मसें और घमफर सुखसें, अधर्मसें और अधर्मफल 
दु/खसें, कृत नाम कार्य, अकृत नाम कारणसें, भ्रूत नाम अतीतसें, भव्य नाम 
भावीसें, वर्तमानसें, अन्यत्न नाम अन्यत्‌ है, अथात्‌ इन सर्वर्स स्पशरहित हैं. 
इसप्रकारके जिस स्वरूपको तुम देखें हें, तिसको हमारे प्रति कहो. यह यम- 
राजके प्रति नचिकेताका वचन है. इति । किंच-जो मोक्षको कर्मनका फल 
मानेंगे तो यथा स्वर्गोदि अधिकारीको अहण योग्य नहीं तथा मोक्ष भी उपादेय 
नहीं सिद्ध होवेगा. और उत्तर श्रुतिवचनोंका वाघ होवेगा “ स थो हद थे त- 
त्परस ब्रह्म वेद अ्नव सचतलि ” यह वाक्य तृतीय छुंडकमे है। “'मिय्यते 
हृद्यअन्थिः छियन्ते स्चेसंशाया: । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्सिन दे 
पराचरे ” यह द्वितीयमुंडकवाक्य है | “ आनन्द त्ह्मणो विद्वान न बिसे- 
. त्ति कुतअन” यह तैत्तिरीयके नवमें अनुवाकम कहा है। “यसरिमिन स्चाणि 
भूतानि आत्मैवाभत्‌ विजानतः । त्तत्रन को मोह; कः झोकः एकत्वमनुप- 
इयतः” यह इंशाचास्पमें कहा है. “तत्‌ हैतत्‌ पहयन ऋषिवोसदेव: प्रति- 
चेदे अहं सलुरभर्च रयेश्” यह आरण्यक्म कहा है. शुतिअथ-जो जह्यको 
स्वस्वरूप जाने है, सो अक्षस्वरूप होवे है. पर जे हिरण्यगर्मादिक ते हैं अचर 
जिससे सो परावर कहिंये अथांत्‌ परसात्माका भहण है, तिस परमात्माके सा- 
श्ातकार कियेसें इस आत्मवेत्ताके हृदयकी ग्रंथि अर्थात्‌ चित्‌ जड़ अंथि 
निदूच होवे है. और सर्वसंशय विनाश होवे हैं. और जिन कर्मोंका फल 


[अ० १ पा० १ सू० 9 ] « भापाटीकासहितानि । ९ 


नहीं भोगा ते कर्म विनाश होवें हैं. इति । त्रह्मके स्वरूपानंदकों जानता हुआ 
किसीसे भी भयको प्राप्त होता नहीं. इति | जिस अवस्थामें आत्मवेत्ताको स्व 
भूत आत्मस्वरूपही होवे हैं तिस आत्मामें वा तत्कालमें एकत्व नाम अभेद- 
दर्गी पुरुषके शोकमोहादि रंसारका अभाव होवे है. इति। तत्पदका रुक्ष्य जो 
भह्म प्रत्यकुरूपसें स्थित सो 'अहस्‌ अस्थमि' इस प्रकार देखता हुआ ऋषि वाम- 
देव इस दशनसे अविद्यानाशद्वारा परब्रह्मको प्रतिपेदे/ नाम ग्राप्त हुआ है. 
तिस दर्शनमें स्थित हुए उसने में मल हों से सूर्य हों इत्यादि मंत्र कहे हैं. इति।उत्त 
सब घचस ज्ञानकालमंही मोक्षकों कहे हैं और कर्मोका फल कालांतरमें होवे 
है. इति। किंच “त्वं हि ना पिता योडसाकम आविद्याया। पर॑ पार॑ तार- 
यसि ” यह प्रश्षके पछ प्रश्नम कहा है. “ सो5ह भगवो सत्मवित्‌ ए- 
चास्मि न आत्मबित्‌ झछुतं॑ हि एव मे भगवदूदरोम्यः तराति शोकमसा- 
त्मवित्‌ सोडहं भगवः शोचासि ते भा भगवान्‌ शोकर्य पार॑ तार- 
यतु” यह छांदोग्यके ससम प्रपाठकके आरंभमे कहकर समाधषिमें यह कहा है-- 
४ तस्मै झादितकषायाथ तमसः पार॑ दशेयति भगवान्‌ सनत्कुमारः ” 
ये उक्त वचन ब्रह्मविद्याको अविद्यानिवृत्तिद्वारा मोक्षकारणता दिखाबें हैं. 
अविद्यानिवृत्ति ज्ञानबिना होवे नहीं यातें मुक्ति उपासनाकरके साध्य नहीं । 
श्रुतिअर्थ-भ्ारद्धाजादि पट ऋषि पिप्पछाद गुरुको वंदना करके कहें हैं कि आप 
हमारे पिता हो, विद्याकरके अजर अमर ब्रह्मरूप देहके जनक हो, याते अविद्या- 
रूप समुद्वसें पारम' नाम अपुनराजृत्तिरूप पारमें विद्यारूप नावरसे हमको प्रात 
करो. इति। औीनारदजीने सनत्कुमारसे कहा है कि हे भगवन्‌! मैंने/सर्वविद्या 
पढ़ी हैं सो में मंत्रवेत्ताही हों आत्मवेत्ता नहीं हों. मैंने तुम्हारे तुल्य जे/महात्मा हैं 
तिनसे सुना है कि आत्मवेत्ता शोकको तरे है. सो में अनात्मवेत्ता/होनेसे शोक 
करता हूँ यांते शोकवान्‌ सुझको शोकसागरसें पार करो. इस प्रकार नारदक- 
रके प्रेरित सनत्कुमारने शुद्ध चित्ततान्‌ नारदजीकों अविद्यासे पर परमात्मतत्त्व- 
का उपदेश किया है. इति।यद्यपि ब्रह्म चेद्‌०' इत्यादिक वाकयंनका कंस मतीत 
होये है यांते बरह्मको विधेय सानना चाहिये; तथापि ब्रह्म प्रयलसाध्य नहीं 
यांते विधेय नहीं- और अ्यको कर्म कहना भी संभवे नहीं. क्योंकि, अह्म ज्ञान- 
रूप क्रियाका कर्म है वा उपासनांरूप क्रियाका कर्म है? इन दोनोंही पक्षोंका 
श्रुत्ति निषेध करे है, यांते दोनोंही संभवें नहीं--तथाहि-- “ अन्यदेच तत्‌ 
विद्तात्‌ अथी आविद्ताद्धि ” ॥ यह केनके प्रथम खंडमें कहा है. इस- 
में ज्ञानरूप क्रियाके कर्मत्वका निषेध किया है. और तहांही--/घदाचा अन- 


१० बक्षयत्राणि ९ ([अ० १ पा० १ सू० 9 ] 


भ्युदित येन चागभ्युयतें। तदेव त्रद्य त्व॑ विद्धि नेद॑ यादिदसुपासते ” 
इस वाक्‍्यमें उपासना क्रियाके कमत्वका निषेध किया है. तत्‌ नाम ब्रह्म विदि 
त जो कार्य व अविदित जो कारण तिन दोनोंस अन्यत्‌ हूँ. जो ज्ञानका विषय 
होवे सो विदित कहिये. 'अथो” यह पद और “अधि' यह पद निश्चयवाचक है. 
इति। जो वाणीकरके नहीं कहा जाय, वाणी जिसकर कहे ह तिसको ते ब्रह्म जान, 
जे उपाधिविशिष्ट देवतादिक उपास्य हैं, तिनको ते त्र्म नहीं जान. इति । और 
उत्तरवचनसे भी अह्मको कर्म कहिना असंगत्त है। “ भस्पामतं तस्प मर्ते 
मत्त यस्य न चेद सः। अविज्ञा्तं विजानतां विज्ञातमबिजानतास”। 
यह केनके छ्वितीय खंडका वाक्य है. “थेन इदं सर्च विजानाति त॑ केन विंजा- 
नीयाम। विज्ञतारस्‌ अरे केन विजानीयाम” यह वाक्य चतुथ अध्यायके 
पंचम भाह्मणमें बृह दारण्यकरम कहा है. उक्त वाक्यनमें भी बह्मको ज्ञानका अधिपय 
कथन किया है. श्रुतिअ्थ-त्रह्म अविपय है ऐसा जिसको निश्चय है तिसको त्रह्म 
सम्यकू ज्ञात है और जिसको अह्म ज्ञानका विपय है ऐसा निश्चय है तिसको 
ब्रह्म अज्ञात है. इस अर्थका अर श्रुतिमें अनुवाद है. इति। अरे मै- 
श्रेयी ! जिस वस्तुकरके इस चराचरको जाने हैं तिसको किसकरके जानें, 
विज्ञाताकों किसकर जानें. इति। किंच मोक्ष स्वरूपसे अनादि- है. याते 
विधेय क्रियाकरके उत्पाद्य नहीं. गीतामें अविकार्य कहा हैं याते मोक्ष 
विकाये नहीं, नित्य प्राप्त है याते आप्य नहीं. निर्मुणस्वरूप है याते संस्काय- 
रूप नहीं। निरुणनि्दोषतासें यह वचन प्रमाण है। “एको देचः सर्चेभूतेषु 
गढ़) सर्वव्यापी सर्वेश््तान्तरात्मा | कर्माध्यक्ष! सर्वेध्षूताधिचासः सा- 
क्षी चेता केचलो निरमेणश्च” यह स्वेताश्वतरके पछ अध्यायमें कहा है. 
#सपथ्गात्‌ छुक्म्‌ अकायस्‌ अनणम्‌ अस्नाविर छुद्धम॒ अपापविडम 
ईैशावास्थमें कहा है। शुतिअथे--शिवादिज्नय मूर्ति नहीं किंतु एक है, जड़ नहीं 
किंतु प्रकाशस्वरूप है सर्वश्वतनमें मायाकरके यू नाम छिपाहुआ है, याते घ- 
तीत नहीं होता. सर्वे व्यापक है. तटस्थ नहीं किंतु सर्वके अनंत्तर आत्मास्वरूप 
है. सवेभूतनसें स्थित है तौभी क्रियाका कतो नहीं. किंतु कर्मका साक्षी है, 
सर्वेभूततका अधिवास नाम अधिष्ठान: है. सर्वकतीरूप जीवनका भी साक्षी है. 
चेता नाम चेतनस्वरूप है. ज्ञानादि ग॒णोंसे रहित है. केबल नाम दश्यसे रहित 
है. इति। सो आत्मा 'पर्यगात' नाम व्यापक है. शुक्र नाम दीसिसान्‌ है. अ- 
काय नाम िंगशरीरसे रहेत है. अन्नण नाम छिद्धरहित है. अस्माविर नाम 


[ अ० १ पा० १ सू० 9 ] भाषाटीकासहितानि | ११ 


नाड़ियोंसे रहित है. अबण अस्वाविर इन दो विशेषणोंसे स्थूलशरीरसें रहित॑ 
कथन किया है. झुद नास रागादि-शुणोंसे रहित है. अपापविद्ध नास धर्मो- 
धर्मसें रहित है. इति। पूर्व श्रुतिमें संस्कार्यरूप मोक्षका निषेध किया है, या- 
ते करतेव्य विधिका अंगरूप करके अह्मका उपदेश संभवे नहीं. इति ; बह् 
ओर आत्माके अभेद्बिषयक जो ज्ञान ताको स्वतंत्र सोक्षकी कारणता श्रुति 
दिखाबे है, याते विधिकी अपेक्षा नहीं. तथाहि--“आत्मसान॑ चेत्‌ विजानी- 
याद्यमस्मीति पूरुप। | क्रिमिच्छन कस्य कामाय दारीरमसुसंज्वरेत्‌” 
यह वाक्य बृहदारण्यकके चतुर्थ अध्याय, चतुर्थ त्राह्मणमें है. 


अथ--यह परमात्मा अहम आस्मि' इस प्रकार अपरोक्षरूपसें जो कोई जाने 
तो अपनेसे भिन्न किस फछकी इच्छा करता हुआ किसकी कासनाके अर्थ 
शरीरको तपावे. इति । यद्यपि शरीरकारूमें अशरीरत्वका अभाव है, याते मो- 
क्षकों धर्मजन्य कहिना संभवे है; तथापि सशरीरत्व मिथ्या है, याते स्वाभा- 
बिक अशरीरत्व है; याते मोक्ष धर्मजन्य नहीं. तथाहि श्रुति--/तद्यथा अहि- 
'निल्‍ल्नेयनी चल्मीके मृता प्रत्यस्ता शाथीत एवमेव हद शरीर॑ शेते 
अथ अयस अहरीरः अस्त: प्राणो त्र्मैव तेज एवेति” यह वृहदारण्यकके 
चतुर्थ अध्याय चतुर्थ त्राह्षणमें जनकके प्रति याज्ञवल्क्‍्यका वचन है। “सच्षु- 
रचछ्ारिव सकर्णोषकण इव सवागवागिंव ससना अमना इच सप्रा- 
णो5प्राण इच” यह अपर जगा भी कहा है 

अर्थ--जीवन्मुक्त पुरुष देहको जाने है तौभी पूब॑ंबत्‌ तिसका संसार रहे नहीं. 
इस अर्थमें श्रुति दृष्टांत कहे है. यथा--सर्पकी केंचली विलमें प्रत्यसता नाम 
फेंकी हुई सता नाम पूर्ववत्‌ आत्मरूपसे नहीं अहण करी हुई पड़ी रहे है, 
जैसे आत्मवेत्ताका शरीर पूर्ववत्‌ आत्मरूपसे नहीं ग्रहण किया हुआ स्थित 
रहे है. केंचहीके समान शरीरको कहकर सर्पतुल्यता आत्मवत्तामें अति 
दिखावे है--यथा उतारी त्वचाकों अहम ऐसे सर्प नहीं माने है, अथ नाम 
तथा जीवस्मुक्त भी देहकों में यह हूं ऐसे मानता नहीं, यांते आ- 
त्मंचेत्ता अशरीर कहलाता है. देहके अभिमानसे मृत्यु होवेंहे. ज्ञा- 
नीको देहामिमान नहीं याते अमृतरूप है. जीववत्‌ चेष्टा करेहे याते ज्ञा- 








१ अर्थात्‌ शरीर, उपाधिक्रत डुखसे डुःखी तथा शरीरतापसें तापबान नहीं होता. 


श्र त्रह्मृनत्नाणि । (अ० १ पा० १ सू० ५) 


नीको प्राण कहा है. अर्थात्‌ साक्षी है. सो अह्मरूप है. तेजः नाम ज्योतिः-- 
स्वरूप है. इस अ्रुतिमें स्थूलदेहको मिथ्या दिखाया है. इति। वास्तवर्स चश्षुरहित् 
है तौमी बाधित नेत्रादि अनवृत्तिसें नेत्रवान्‌ श्रतीत होये है. इसी प्रकार आगे 
भी जाना चाहिये. इस अ्रुतिमें लिंगदेहको मिथ्या दिखाया है, याते सर्च वेदां- 
तका साक्षात्‌ चह्ममैं तात्पर्य है, विधिद्वारा नहीं; यह सिद्ध हुआ ॥ ४॥ 

अव०-पूर्व चार सूत्रोंकरके झह्मको सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान्‌ जगतकारण वेदां- 
तप्रतिपाद्य कथन किया है. सो त्रह्म चेतन है वा अचेतन है यह तहां संदह है 
तहां यह सांख्यका पूर्वपक्ष है कि ब्रह्म तो कूटस्थ है यात्ते ज्ञान और क्रियाश- 
क्तिवान्‌ ब्रह्म नहीं याते सो जगतका कारण नहीं. और प्रधान त्रिगुणरूप है 
त्रिगुणरूप होनेसें तामें ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति संभवे है, याते प्रधान 
जगतका कारण है. सो प्रधान सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान्‌ है. तिसका सर्व वेदांत 
अनुवाद करें हैं. इस मतका भगवान्‌ सूत्रकार खंडन करें हैं-- 


श्र 
ईक्षतेनाशब्दम्‌ ॥ ५ ॥. 
इक्षतेः । न । अशब्दस्‌ । इति ॥ प० ॥ . 

अथे-'सांख्यपरिकल्पित॑ प्रधान जगत्कारणं न संभवति | अशब्दत्वात्‌ । 
अर्थात्‌ अवेदप्रामाणिकत्वात! । अवेदप्रामाणिकमें हेतु कहें हैं--सांख्यपरिक- 
ल्पित॑ अधानम्‌ अवेदप्रामाणिक॑ भवति। इंक्षतरेः अर्थात्‌ ईक्षित्त्वश्रवणात्‌” इति । 
“तदृक्षत बहुसस्‍्यां प्रजायेध !” यह कांदोग्यश्रुति इक्षित॒त्वमें अमाण है. ईश्षि- 
तृत्व इच्छा वा ज्ञानविशेष है. अधान जड़ है. जड़में इच्छादि संभवे नहीं, याते 
अधान वेदप्रामाणिक नहीं. वेदप्रमाणविना ताको जगतका कारण कहिना सं- 
भवे नहीं- इति। प्रधान उपासना इस अधिकरणके पूर्वपक्षमें फक है और 
अक्यात्माअभेदज्ञान सिद्धांतमें फल है. इति ॥ ५॥ 

अव०-ननु इच्छामात्रसें अह्मकको जगतका कारण मानें तौ प्रधानमें भी 
कारणता संभवे है. तथाहि--“तत्तेज ऐक्षत, ता आप ऐश्षन्त”-या श्रुतिनमें 
अ चेतनरूप जरू तेजमें इच्छा सुनी है याते जड़ प्रधानमें गौण इच्छा मानके 
प्रधानकों कारण सानना संभव है,इस शंकाका सूत्रकार समाधान करेंहें-- 


गोणश्रेन्नात्मशब्दात्‌ ॥ ६ ॥ 


गोणः । चेत्‌ । न । आत्मशब्दात्‌ ॥ इति प०॥ 
अथे-चेत्‌ नाम जो अघानमें गौण इच्छा मानें तौ संभने नहीं. तथाहि-- 


[ज० १ पा० १ सू० ६ ] भाषाटीकासहितानि । १३ 


छांदोग्यके पष्ठ प्रपाठक्में यह श्वेतकेतुप्रति उद्दालकका बचन है “ तदैक्ष- 
त बहु स्थां पजायेच” “तत्तेजोडखजत” “तत्तेज ऐश्षत बहुस्या प्रजा- 
येथ” “तद्पो5रूजत” “ता आप पऐक्षन्त बहुयः स्थाम प्रजायेमहि ता 
अज्नम्‌ अखजन्त” यह दूसरे खंडमें कहकर आगे ठ्तीय खंडमैं यह कहा है 
“सा इथं देवता ऐश्षत हन्ता5हम्‌ इसा; तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्स- 


नाअनुप्रविद्य नामरूपे व्याकरवाणि” इते ॥ 


हु अथ-“तदैक्षत' जा अ्रुतिसें पूर्व “सदेव सोम्पेद्मप्र आसीत्‌” यह वाक्य 
है. इसमें जो सत्‌ पदका वाच्य है सो 'तदैक्षत' या श्तिमें तत्पदसे अहण है. 
तिसमें में एकसें अनेकरूप होऊं यह इच्छा हुईं तिससे तेजको रचा तिस तेज़सें 
इच्छा हुई कि में एकसे अनेकरूप होऊं, तासे जलको रचा, तिससें इच्छा हुई 
कि में एकसें अनेक रूप होऊं, तब जलसे अन्नको रचा. इति। तिस देवताकी 
इच्छा करके अब अर्थात्‌ महाभूतउत्पत्तिअनंतर हम तीनों देवता अनेन.नाम 
पूवैसष्टिअजुभूत प्राणधृ्तिहेतुर्से जीवेनात्मना नाम तत्रूपसें प्रवेश करके 
देवताबोंकी उत्पत्तिके अंतर नामरूपको प्रगट करूं इति। इस श्रुतिमें आ- 
त्मा शब्द सुना है. जो पूर्वभूतत्रयकी उत्पत्तिसें अ्रधानका अहण होवे तो “'जीवे- 
नात्मना प्रविदरय॑ यह कथन असंगत होवेगा. आत्मा शब्द स्वरूपका वाचक है। 
चेतन जीव अचेतन प्रधानका आत्मा नहीं और ब्रह्ममें जीववाचक आत्मा- 
शब्दका प्रयोग संभवे है. और अंतमें “स य एबो5णिमैतदात्म्यम इृदं से 
तत्सत्य॑ स आत्मा तत्वमसि शेतक्केतों! या बाक्यमें श्वेतकेतु जीवका 
आत्मासें तादात्म्य उपदेश किया है, याते चेतनसे चेतनके अभेदकी शंका 
संचक नहीं । श्रुतिअथ-जो सत्य वस्तु हैं सो यह अणिमा नाम अछु 
है. एतत्‌ नाम यह चेतन होवे आत्मा जिसका सो ऐतदात्म्य कहिंये अथो- 
त्‌ जगतका ग्रहण है. इस स्व चराचरका आत्मा चेतनही है. सो आत्मा 
सत्य है अर्थात्‌ परमार्थस्वरूप है. सो सर्बका आत्मा है. हे श्वेतकेतु, तुम भी 
संसारी नहीं हो किंतु सोई सत्यपदका वाच्य भह्म तुम हो. इति। उक्त झतिमें 
आत्मा शब्दका ग्रहण किया है, याते तेज जलछकी नांई अधानमें गोण इच्छा 
संभवे नहीं. पूष जिस श्रुतिमें जलतेजविषे इच्छा कही है तहां तेज जलडप- 
हित परमात्मामें इच्छा अंगीकृत है. मुख्य तेजजलूमें इच्छा माननेसें चेतनसें 
सर्चेसष्टिकथन असंगत होवेगा. इति ॥ ६ ॥ 


१ सायाउपाधिकको सायाके वदसे पूर्वर्ष्टि अजुभूतत्व और स्मरण संभवे है. 


१४ ब्ह्मतृत्राणि | [अज० १ पा० १ सू० ७ ] 


अचब०-ननु यद्यपि आत्माशब्द मुख्यबृत्तिसें प्रधानका वाचक नहीं तथापि 
गोणबृत्तिसे अधानका वाचक साननेसे हानि नहीं, इस शंकामें कहें हैं-- 


तन्निष्ठस्थ मोक्षोपदेशात्‌ ॥ ७ ॥ 
ततनिष्ठस्थ । मोक्षोपदेशात्‌ ॥ इति ॥ प० ॥ 


अथ-तत्त्वमसि बाक्‍्यसें चेतन श्वेतकेतुको ब्रह्मनिषताका उपदेश करके 
यह उपदेश किया है। “ तस्थ तावदेव चिर॑ यावन्न विभोक्ष्ये अथ 
संपत्स्ये ” इति )! जो अचेतनकों सत्‌ शब्दका वाच्य भाने तो तत्त्यमसि 
वाक्यका यह तात्पर्य सिद्ध होवेगा--हे श्वेतकेतो, ते चेतन अचेतनस्व- 
रूप है इति। इसको सुनके 'अहम्‌ अचेतनोडस्मि! याविध चिंतन करता हुआ 
सोक्षसे पतित होता और अनर्थकों प्राप्त होता है. याते शासत्र उनमत्तमराप- 
मात्र सिद्ध होता है,सो अनिष्ट है; याते आत्मा शब्द चेतनका वाचक है, जड 
प्रधानका वाचक नहीं। श्ुतिअथे--आत्मवेत्ताको तहांपरयतही चिर है अर्थात्‌ 
देहादि अचुशृत्ति है, जहांतक प्रारव्ध कर्म शेंप है; 'अथ!' नाम पारव्धक्षयअनंतर 
संपत्स्पे नाम संपत्स्यते अर्थात्‌ विदेहमुक्त होवे है. इति॥ ७ ॥ 

अच्‌०-ननु स्थूलारुंधतीन्यायसे प्रधानके उपदेशद्वारा आत्माका उपदेश 
मानना चाहिये, इस शंकाका उत्तर कहें हैं. 


हेयत्वावचनाच ॥ ८ ॥ 


प० हेयलावचनात्‌ । च्‌ । इति प०। 


अथ०-स्थूलारंधतीन्‍्यायसे उपदेश तौ बने किंच्च अनात्मा प्रधानकों सतपद- 
का वाच्य सासके जो आत्मा है सो तें है, याविध उपदेश करके तिस ७पदेशके 
'अव्णंस अनात्मवेत्ता होकर तिस अनात्मा प्रधानमैं निछाबान्‌ नहीं होने यह 
भानके मुख्य जात्माके उपदेशकी इच्छासे शास्त्र अधानकों हेयत्वकरके कह- 
ता, सो अधानका निषेघक वचन कोई अतीत होवे नहीं यांतिप्रधानके उपदेशद्धा- 
रा भी आत्माका उपदेश संभवे नहीं और एकके विज्ञानसें सर्वके विज्ञानकी 
प्रतिज्ञाका विरोध होवेगा. तथाहि “उत्त तमादेशमप्राशष्यों येनाउश्चत्त शत्तं 
'भवत्ति अमते सतम्र अविज्ञातंविज्ञातम। कर्ष लु भगव! स आदेशो भवति 
शति। यथा सोस्थ एकेन रत्पिण्डेन सर्च सण्सय विज्ञातं स्पात्‌ 
वाचारम्भर्ण विकारो नासघेय॑ झत्तिका इति एव सत्यम्र्‌ हति” इस वाक्यमें 


([अ० १ या० १ सू० ९ ] भाषादीकासहितानि । १५ 


एकके विज्ञानस सर्वके विज्ञानकी प्रतिज्ञा करी है. प्रधानके ज्ञानसैं सर्वविकारों- 
का व सुनाका ज्ञान संभवे नहीं। श्षुतिअर्थ-हे श्वेतकेतो ! जा बस्तुके शाखसें 
श्रवण कियेस असुना भी सुना जाय, जिसको तक्कंसे मनन कियेसें जो नहीं सनन 
किया सो मनन होवे, जिसके जानेसे जो नहीं जाना सो जाना जाय, सो आ- 
देश नाम शासत्रगम्य वस्तुका उपदेश अपाध्यः नास पूछा था. यह पिताके वाक्यका 
अथ है। हे सगवन्‌! एक वस्तुके सनेस सर्वके श्रवणका उपदेश कैसे होवे है, अपरके 
ज्ञानसं अपरका ज्ञान होवे नहीं यह स्वेतकेतुके चचनका अर्थ है।पिताका उत्तर- 
हे सोस्य ! यथा एक मृत्तिकापिंडके ज्ञानस मृत्तिकाके सर्व विकार अर्थात्‌ का- 
ये ज्ञात होवे हैं. यद्यपि मृत्तिकांपिंडका ज्ञान हुए भी ततकार्यका ज्ञान होना 
संभवे नहीं, तथापि जो विकार है अर्थात्‌ काय है सो वाचारंभण है अर्थात्‌ 
वाक्यावलंवन मात्र है, वासवमें वाणीसे भिन्न नहीं- 'नामधघेयम्र यह तहां हेतु है. 
नामधेय कहिये नाममात्र है अर्थात्‌ अर्थसें रहित हैं. यद्यपि घटका मृत्तिकासें 
अभेद मानेसे घटनाश हुए मृत्तिकाविनाश होना चाहिये तथापिं घट 
मृत्तिका्स भिन्न नहीं किंतु तास अभिन्न है. और मृत्तिका घटसें भिन्न 
है यांत दोष नहीं. उक्त अथही श्रुतिम “मृत्तिका इत्येच सत्यम्‌” या वाक्यसें 
कहा है. इति ॥ ८ ॥ 

अव०--सदेव' इस वाक्यम जो सतपद है ताका वाच्य प्रधान नहीं यह 
पुनः सूचसे सिद्ध करेहें--- ९ 3 

खाप्ययात्‌ ॥ ९ ॥ 


खाप्ययात्‌ । इति ॥ प्‌० ॥ 
अथै०-स्व्र! नाम आत्मामें 'अप्ययात्‌ः नाम रूय सुना है, सो लूय॒स्थान आत्मा 
सतशब्दका वाच्य है; जो म्रधानकों सतूपदकां वाच्य मानें तो चेतन अचेत- 
नमें लूय होये है. जाविध विरोध सिद्ध होबेगा। 'ततन्न खमपीतों अवति' यह 
श्रुति आत्माम रूयको दिखावे है । अर्थ-तत्र नाम सुष्ठप्तिकालमें सत्र नास॑ 
आत्मामें अपीतो नाम रूय होवे है. यह अुतिका अर्थ है। यांते सत्पदंका 
वाच्य चेतनही जगतका कारण है. हति ॥ ६ ॥ 


गतिसामान्यात्‌ ॥ १० ॥ 


गतिसामान्यात्‌ ॥ इति । प०॥ 
अधथ-सर्व वेदांतमें चेतनविपें कारणत्वप्रतीति तुल्य होवेहै. कह चेतन का- 


१६ अद्यसत्राणि । [अ० १ पा० १ सू० ११] 


रण कहूँ- अचेतन कारण'जाविध विरोध प्रतीत होवे नहीं, किंतु सर्व वेदांतमें 
चर रु सं 

चेतनही कारण अतीत होवे है.-त्थाहि-/एत्तस्मात्‌ू आत्मन आकाहाः सं- 

॥+ अप 9०५ जे पृथि [० थे 

झतः आकाशात्‌ वायु) वायोरप्रि। अग्नेराप। अज््यः प्रथिवी शथिव्या 

आओषधयथः ओषधीस्पोड्नम्‌ अन्नाद्वेतः रेतसः पुरुष: स वा एप घुरुषो5- 

न्ररसमथः” यह तैत्तरीयकी अ्न्मानंद्वल्लीमें लिखा है. “आत्मन एप प्राणो 

जायते” यह प्रश्नके तृतीय प्रश्नमें कहा है. इति । आत्मापदर्स चेतनका 

् 
ग्रहण है. प्राणपद हिरण्यग्रभंका वाचक है. इति ॥ १०॥ 
किंच । ; 


श्रुतत्वाच ॥ ११ ॥ 


श्रुतत्लात्‌ /च । इति। प०॥ 

अथे-अपर अ्रुतिमें भी स्वेज्ञ ईश्वरको कारण सुना है. तथाहि-“थेनाश्वर्त 
निद्यमिद्‌ हि सर्व ज्ञ। कालकालो शुणी स्वाविद्य/” | “न तस्य कश्चित्‌ 
पतिरस्ति छोके न चेशिता नेव च तस्य लिक्षम्‌। स कारण करणा- 
धविपांधिपों न चास्य कश्वित्‌ जंनिता न चाधिपः” इति । यह स्वेताम्थ- 
तरके षष्ठ अध्यायमैं कहा है। श्रुतिअथे-सर्वज्ञ है, कारका भी काल है, गु- 
णंवान्‌ है. जिसकरके यह सववे आइत है, जो स्वेको जाने है, तिसका इस छोकमें 
कोई पति नहीं और ईशिता भी कोई नहीं, ताका लिंग भी नहीं, सो सर्वज्ञ 
सबका कारण है. और करण ये इंद्वियां तिनका अधिपति नाम स्वामी भी जो जीव 
तिसका भी अधिपति नाम परम ईश्वर है, इसका कोई जनिता नहीं, अधिप 
नाम हिरण्यगर्भका भी प्रेरक है. तांका प्रेरक कोई नहीं. इति। उक्त वा- 
क्य्नस भी जंहांही जंगतका कारण निश्चित है. प्रधान वा अपर कोई अचेतन 
कारण नहीं. इति. सिद्धम ॥ ११ ॥ 

अथ०-ननु पूर्व चार सूच्रोंकरके सर्वज्ञ सर्वेशक्तिमान्‌ जरह्म म्तिपादन किया 
है. उत्तरसूत्रोंसे क्या प्रतिपाद्य है! या शंकासें कहेहें कि निर्विशेष मह्मका स्वरुपसें 
तो उपदेश संभवे नहीं, किंतु: किंचित्‌ उपाधिडपहितरूपसें उपदेश संभवे है. 
तहां किस वाक्यमें उपाधि अपेक्षित है, किस वाक्यमें नहीं अपेक्षित. जाविध 
अभिवाषा हुएसें तिन वाक्यनके विचारार्थ उत्तरसूचरसंदर्भ है. सर्विशेषरूपसें 
और निर्विशेषरूपसें न्ह्म दो भ्रकारका सुना है. तथाहि--“यत्र हि द्बैतमिच 
'भवाति तद्तिर इतर॑ पश्यति तद्तिर इत्तरं जिघति तद्तिर इतर॑ रसयते 
तद्तिर इंतरम्‌ अभिवद्ति तद्तिर इत्तरं झ्णोत्ति तदितिर इतर मलु॒ते 


[ज०.१ पा० १ सू० ११] भाषाटीकासहितानि । १७ 


तदि्तिर इतरं स्एशति तद्तिर इतर विजानाति” यह सविशेष वाक्य 
कहकर आगे यह निर्विशेष कहा है । “यत्र वा अस्य सर्वमात्मैवाफूल 
तत्केन क॑ पदयेत्‌ तत्केन क॑ जिघेत्‌ तत्केन कम अभिवदेत्‌ तत्केन क॑ 
अ्णुयात्‌ तत्केन के मन्‍्वीत तत्केन क॑ रसयेत्‌ तत्केन के स्शशेत्‌ तत्केन 
के विजानीयात्‌ येन इदं सर्व विजानाति ते केन विजानीयात्‌ विज्ञा- 
तारम्‌ अरे केन विजानीयात” इति ॥ यह निर्विशेष वाक्य है. यह प्रसंग 
बृहदारण्यकके चतुर्थाध्याय पंचम ब्राह्मणमें है. छांदोग्यमें सी कहा है। 
“यो चै क्रूमा तत सुख नाल्‍पे सुखमस्ति फ्मैच खु्ख भ्रूमा त्वेच वि- 
जिज्ञासितव्य इति अमान भगयों विजिज्ञास इति” यह कह कर 
आगे यह कहा है. “थत्र नान्यत्‌ पद्यति नानन्‍्यत्‌ अुणोति नान्यत्‌ 
विजानाति स भूमा । अथ यत्ञ अन्यत्‌ पद्यति अन्यत्‌ श्वणोत्ति (अ- 
न्यत्‌ विजानाति तदल्‍प॑ यो वे भूमा तद्रूतं अध यदल्पं तन्मत्ष स 
अगव! कस्सिन प्रतिष्ठत इति खे सहिम्नि यदि वा न महिस्नि इति” 
इस झक्त वाक्यमेंमी निर्विशेष और सविशेष उभय वाक्य प्रतीत होवे हैं. उक्त 
प्रसंग छांदोग्यके सप्तम प्रपाठक चतुर्चिश खंडमें सनत्कुमा रका नारदप्रति उप- 
देश है. श्वेताभ्वतरके षछ्ठ अध्यायमें भी कहा है. “निष्कर्ल निष्क्रिय शान्त॑ 
निरवर्य निरञ्ञनम्‌ । अम्ठतस्प परे सेतुं दग्धेन्धनमिवानल; | यदा च- 
सेचदाकारं वेछसिष्यन्ति सानवाः ॥ तदा देवसविज्ञाय दुःखस्पान्तो 
मविष्यति” इति ॥ इसमें भी निर्विशेष वाक्य अतीत होने है. “स 
शघ नेति नेति आत्मा अशद्यो न हि ग़लह्मयते अज्षीर्यों नहि शीर्यते 
असझेो नहि सज्ते” यह ब्ृहदारण्यकके पछ्ठ अ० द्वितीय आाह्मणमें 
जनकप्रति याज्ञवल्क्यवचन है. यह भी निर्विशेष वाक्य है. श्रुतिअर्थ- 
जिस अविद्याअवस्थामैं सी तुच्छ द्वैत सत्यकी नांई भान होवेहे, तिस अच- 
स्थामें इतर नाम संसारी इतर नाम आपनेसें भिन्न वस्तुको देखेहै- जो विद्या 
अवस्थार्में इस आत्मवेत्ताको सर्व कर्तादिक आत्मासें भिन्न असत्य भान होवे 
है ता अवस्थामैं किसकारणकरके किस विषयको कौन कता देखे. जिस कर 
इस सर्वको जाने है तिंसको किसकरके जाने. अरे मैत्रेयी ! विज्ञाताकों किस- 
करके जाने. इति । नारदपति सनत्कुमार कहे हैं. जो भूमा है सो खुख है- 
अल्पमैं खुख नहीं. भ्रूमाही जाननेयोग्य है, नारद्वचन-हे भगवन्‌ : भू- 
भाको कहो. सनत्कुमारवचन-जिस अवस्थामें आपनेसे भिन्न वस्तुको देखे 
सुने जाने नहीं सो,भ्ूमा है. जिस अवस्थामें अपरको देखे सुने जाने हैं. सो 
ब्रह्म० दे 


१८ बह्मसूत्राणि । [अ० १ या० १ सू०१२] 


अद्प है अर्थात्‌ परिच्छिन्न है. जो भूमा है सो अम्ृतस्वरूप है. जो अल्प है सो 
विनाशी है. नार० वच०-हे भगवन! सो भूमा किसमें स्थित है. सन० चच०- 
हे नारद! सो यदि प्रतिष्ठाकी इच्छा करे तौ स्वमहिमामें अथात्‌ स्वस्वरूपमैं स्थित 
है. वा यदि नहीं इच्छा करे तौ नहीं. इति। इष्टिआादि अगोचर निरतिशय महत्व- 
युक्त जो परमात्मा सो भूमा अंगीकृत है. इति। जो निरंश है, फ्रियारहित है, 
जो परिणामरहित है, निरब्च नाम रागादिकोंसे रहित है, धर्मादिकोंसें रहित 
है, निरंजन नाम जड़संबंधसें रहित है, अमृतस्वरूप है, संसारसागरका सेतु 
है अथात्‌ बुद्धिवृत्तिम स्थित हुआ साधन है. काछ दाह हुए यथा अश्निशांत 
होबे है तथा सो वृत्तिज्ञान नाश होवे है. उक्त विशेषणवान्‌ तिस देवको जाने 
विना दु/खका नाश तौ होबेगा. जो चमबत्‌ आकाशको पुरुष बोर लेवेंगे- 
इति। सो यह आत्मा नेति नेति' इस निषेघधकी अवधि है. अर्थात्‌ सर्वे 
निषेधका अधिष्ठान है. इसप्रकारसें जहां सगुणवाक्यविचार है, तहां उपासना 
अंगीकार है; जहां गुण सुने भी गुण अंगीकार नहीं सो वाक्य ज्ञेय ब्रह्मका 
घोधक है. इसप्रकारके निर्णयार्थ उत्तरसूत्रोंका संदर्म है. आनंदमयरूपसे 
जीवकी उपासना पूर्वपक्षमें उत्तरसूत्रका फल है. सिद्धांतमें निर्युण चल्मकी 
प्रमिति फल है. तैत्तिरीयके द्वितीयाध्यायमें यह वाक्य है. “तस्मात्‌ वा 
एतस्मात्‌ अज्नरसमयात्‌ अन्योडन्तर आत्मा प्राणमयः । तस्मात्‌ वा 
एतस्मात्‌ प्राणमयात्‌ अन्योडन्तर आत्मा मनोमयः। तस्मात्‌ वा 
एतस्मात्‌ सनोसयात्‌ अन्योडन्तर आत्मा विज्ञानमय! । तस्मात्‌ वा 
एतस्मात:विज्ञानमधात्‌ अन्धोडन्तर आत्मा आनन्दमय; | तस्य 'प्रि- 
यमेव शिरः मोदो द्क्षिणः पक्ष) प्रमोद उत्तर: पक्ष! आनन्द आत्मा 
ब्रह्म पुच्छ प्रतिष्ठा” इति ॥ श्ुतिअर्थ-तस्मात्‌ नाम मंज्नसें एतस्मात्‌ नाम 
मंत्रसे आाह्मणसें विज्ञानमयसें अन्य नाम अपर अंतर नाम सूक्ष्म आनंदमय 
आत्मा है. प्रियवृत्ति शिर है, मोदवृत्ति दक्षिण पक्ष है, प्रमोदवृत्ति उत्तर पक्ष है, 
आनंद आत्मा नाम शरीरसध्यभाग है, ब्रह्म पुच्छ है, प्रतिष्ठा नाम आसरा 
है. इति॥ उक्त वाक्‍्यमें यह संदेह है कि आनंदमयपद्सें सत्‌ चित्‌ आनंद्रूप 
ब्रह्मका अहण है वा अन्नमयादिविकारबान्‌ जीवका भहण है? इति। तहां 
यह पूर्वपक्ष है कि अज्लमयादिक पदोंमें मयद्‌ विकाराथमें है और प्रिय मोद- 


प्रमोदादि अवयव तांके कहे हैं यांते आनंदमय जीब है, त्रह्म नहीं- इति। 
उत्त पूर्वपक्षका समाधान करें हैं--- 


आनन्दमयोष्म्यासात्‌ ॥ १२॥ 


[अ० १ पा०१ सू० १३] भाषाटीकासहितानि । १७ 


आनन्दमयः । अभ्यासात्‌ । इति प० | 

थे-आनंदसय शब्दका अनेक श्रुतिनमें त्रह्मविषे अभ्यास सुना है, यातें 
तहां आनंद्सयपदसे परमात्माका ग्रहण हे. जीव अंगीकृत नहीं है, तथाहि 
रसो वे सः रस हि एवाय रूड्ध्वा आनन्दी भवाति | को हि एव 
अन्यात्‌ क। आण्यात्‌ यदेष आकाश आनन्दों न स्थात्‌ एप हि एच 
आनन्द्यति”। यह तेत्तिरीयकी बत्रह्मानंद्वल्लीमें कहा है. तहांही आगे पुनः 
कहा हे सा एपा आनन्द्स्य मीमांसा भवति । एतम्‌ आनन्द्मयमा- 
त्मानम्‌ उपसंक्रासाति । आनन्द त्रह्मणों विदछ्यान न विभेति कुतश्चन 
इति | आनंनन्‍दो ब्रह्म इति व्यजानात” ॥ यह भ्म॒वलीमें कहा है. इति। 
उक्त वाक्यनसें आन॑द्सयका वहु अभ्यास सुना है. यद्यपि उक्त वचननमें 
आनंदपदका अभ्यास है, आनंदमय पदका नहीं; तथापि वबसन्‍ले वसन्‍्ते 
ज्योतिषा' यजेत इस वाक्यमें यथा ज्योतिषपदसें ज्योतिष्टोमका ग्रहण है, 
तैसे आनंदपदसे आनंदमयका भहण है. श्रुतिअर्थ-रस नाम सार अर्थात्‌ आ 
नंदका नाम है. जो पूर्वकारण कहा है सो आनंदरूप हैं. उक्त रसको पायके 
ही जीव आनंदवान्‌ होवेहे. जो यह आकाश अर्थात्‌ बह्म आनंद्ररूप नहीं 
होवे अधथात्‌ प्रेरत्त नहीं होवे तो कौन अन्यात्‌ नाम जीचे और कौन श्रा- 
ण्यात्‌ नाम प्राणचेष्टा करे. यह बल्मानंदही सबको आनंदवान करे है. यह 
ब्रक्मानंदकी सीमांसा नाम विचार है. जो पुरुपमें है, जो आदित्यमें है, सो एक 
है, इसप्रकार जो जाने है, सो अज्नमय आत्मास छऊेकर आनेदमय आत्मातक 
स्को उपसंक्तामति नाम इनमें आत्मबुद्धिको छोड़ देता है. नह्मानदको 
विद्वान्‌ नाम जानताहुआ किसीसे भयको प्रास होता नहीं. अतः बह्मकों आ- 
नंदस्वरूप जाने. इति। उक्त आनंदमयपदके अभ्याससं आनंदमय परसात्मा ह, 


जीव नहीं. इति॥ १० ॥ 
५ शठ ० पा #० सी चेन्न ग्राचर्याद 
विकारशब्दज्ञात चन्न ह्‌॥१३॥ 
विफारशब्दात्‌ । न । इति । चेत । न । ग्राडर्यात्‌ । इति प० 
अथ-ननु-मयट्‌ प्रत्ययका विकाराथमें विधान ह यातें आनंदमय ब्रह्म 
नहीं आनंदका जो होवे विकार सो आनंदमय अंगीकार है. बरह्मको आजं- 


दका विकार कहिना संभव नहीं, इति चेत्‌ नाम यह शंका कर ते संभव नहीं- 
तथाहि असंगमें सघद॒का प्राचुर्व अर्थम विधान है; विकारम॑ विधान नहीं; यातें 


उक्त शंका संभवे नहीं. इति॥ १३४ ॥ 


२० बद्ययन्नाणि ( अ० १ पा० १६० १७] 


तद्लेतुब्यपदेशाच् ॥ १४ ॥ 
तत-हेतुच्यपदेशात्‌ । च । इति प०। 


अथे-आनन्दं हि एवं रूव््या आनन्दी सवति' इस श्रुतिम बह्मको 
आनंदका हेतु कहा है. जो दूसरेको आनंद करे सो प्रचुरआनंद अंगीकृत है. 
यातें मय प्राछुयार्थक है, विकारार्थक नहीं. इति ॥ १४॥ 

अच०-आनंदमय परमात्मा है, इसमें अपर हेतु कहें हँ-- 


मान्त्वर्णिकमेव च गीयते॥ १५॥ 


मानलवणिकय। एवं। च। गीयते । इति प० । 
अथे-तैत्तिरीय त्हानंद्वछीके आरंभमें यह मंत्र है। “ब्रह्मविदामोति 
परम्‌। सर्व्य ज्ञानमनन्तं ब्रह्म । यो वेद निहित॑ गुहायां परमे व्योमन्‌। 
सो5श्षुते सवोन्‌ कासान्‌ संह त्रह्मणा विपश्चित” इति। उक्त मंत्रम जो 
ज्ञेयकरके कथन किया है ब्रह्म सो मांत्रवर्णिक अंगीकृत है. सोई मह्म “अ- 
न्योउन्तर आत्मा आनन्द्मयः गीयतले” इस ब्राह्मण गीयते नाम कहा हैं. 


मंत्र और आह्मणका एकही अथ होवे है, यांते आनंदमय परमात्मा है, जीव 
नहीं. इति ॥ १५॥ 


नेतरोड्लुपपत्तेः ॥ १६ ॥ 
५... ने। इतरः। अन॒पपत्तेः । इति प०। 
अर्थ-सोडकासयत बहुस्यां प्रजायेय हांति । स तपोड्तप्यत । स 
तपस्तस्वा हृदू सबम्‌ अखजत। यदिद किंच । तत्खण्ठा तदेवालतुप्रावि- 
शत्‌। तब॒नु भ्रविद्य सच त्यच्ामवत' यह तैत्तिरीयकी त्रद्मानंदचही- 
गत वाक्य हैं। इस उक्त चावयर सृष्टिकी कारणता सुनी है, आनंदमयसे जीव 
अंगीकार कियेसें जीव३ उत्त कारणता नहीं बनेगी; अतएवं अज्ुपपत्ते/ नाम ' 
कारणता नहीं बननेसे ही ईग्वररू इतर जो जीव सो आनंदमय नहीं, इति १६ 
मेदव्यपदेशाच् ॥ १७॥ 
« ,  । भेदृव्यपदेशात्‌ । च। इति प०। 
अर्थ-रस हि! जा श्रुतिमं आनंदमयको रुभनेयोग्य कहा है, जीवको रु- 


अनेवाला कहा है, यातें जीवका आन॑दमयसे भेद कथन करणेसें आर्नद्मय 
जीव नहीं. इति ॥ १७॥ हे 


. १ इढ्िमें, २ खह-एक काल्‍मे, जह्मणा अप्रर्पश कालमें, अह्मणा-बहायसरूपसे. 





[ज० १ पा०१ लू० १९] भाषारीकासहितानि | - २१ 


कामाच नानुमानापेक्षा ॥ १८ 0 


कामात्‌। च। न्‌। अनुमानापेक्षा । इति प०। 
अर्थ-आनंदमयके असंगमें 'सोडकामयत” यह कामना सुनी है, यातें 
अनुमानगम्य जो प्रधान सो भी आनंदमय अंगीकार नहीं. इति ॥ १८ ॥ 


अस्मिन्नस्य च तययोगं शास्ति ॥ १९॥ 


अस्मिन्‌ । अस्य | च। तदयोग॑ । शास्ति । इति । प० ॥ 

अधथे-अस्मिन, नाम आनंदमय आत्मामें प्रबुझुजीवकी ततयोगनाम तत्‌- 
स्वरुपमुक्तिको शात्र कहे है। तथाहि-- “यदा हि एचं एब एतस्मिन्‌ अ- 
हृश्ये अनात्म्ये अनिरुक्ते अनिलयने अभर्य प्रतिष्ठां विन्दते अथ सः 
अभय गतो 'मव॒ते | यदा हि एबेष एतस्मिन्‌ उद्रसन्तरं कुरुते अथ 
तस्य 'भय॑ भवति” यह ज्रह्मनंदव्छीके सप्तम अनुवाकमें कहा है. इसका 
यह अर्थ है कि अहद्य अनात्म्य अनिरुक्त अनिल्‍लूयन' ये चार पद ब्रह्मके 
वोधक हें, स्थूलद॒इयसें तादात्म्यरहितकों अदृश्यपदसें ग्रहण किया है; आ- 
त्मापदसे इंद्रियोंका अहण है, तिनसें तादात्म्यरहितका अनात््यपदसें अँगी- . 
कार है; निरुक्तपदस सूक्ष्मभ्ृतनका अहण है, तिनसें तादात्म्यरहितका अनिरु- 
क्तपदसें अहण है; सर्वके रूयस्थानका नाम निरूयन है, तासें रहितका नाम अ- 
निरूयन है. इस अदृश्य अनात्म्य अनिरुक्त अनिल्‍ूयन स्वरूप अक्यविषे अभे- 
दज्ञानकालूमें अभयप्रतिष्ठाको आत्मवेत्ता प्राप्त होवे है. तदनंतर अभयको प्राप्त 
होवे है. चदा इस आनंदमय अहाममें उदर नाम अल्पभी अंतर नाम भेदको 
देखे है तदा तिसको भय होवे है. इति। उत्तविधसें आनंद्सय पद जीव वा 
भ्रधानका घाचक .नहीं, यांतें आनंदमय तहां परमात्मा अंगीकृत है. इति सि- 
रम्‌ । यह एकदेशीका सत है। भगवान भाष्यकारका यह सिद्धांत है कि 
एकदेशीके सतमें यह दोष है, जैसे पूव उक्त शुतिवचननमें आनंदपद है आ- 
नंदमय पद नहीं, यातें एकदेशीको आनंदपदकी आनंदमयमें रक्षणा माननी 
होवेगी. और मयद॒को प्राचुयार्थक अंगीकार कियेसें त्रह्ममें छब दुःखप्रसंग सिद्ध 
हुएसें आनंद्मयपदकी अल्पत्वनिद्तत्तिमें रक्षणा मानके ताकों अह्मवादी मा- 
नना होवेगा, और “हम पुरछ॑ प्रतिष्ठा” जा वाक्‍्यमें जो ब्रह्मपद ताकी 
अवयबसें लक्षणा माननी होवेगी. और मुखका त्याग और प्रायः पाठका त्याय 
इतने दोष एकदेशीके मतमें हैं. और स्वमतमें “जह्म पुरुछ”? जा वाक्यमें जो 


१ यथा अभय होवे तथा श्रतिष्ठा नाम आत्मभावको आप्त होवे हैं. 


श्र श्रद्मसृत्राणि [(अ० १ पा०१ सू० १६९] 


पुच्छपद ताका जो अवयबप्राय पाठ ताका त्याग सात्र दोष है। “ब्रह्म पुच्छ 
अतिष्ठा” इस वाक्यमें आनंद्मयका अवयवरूप भह्म हे वा स्वप्रधान ब्रद्मका 
ग्रहण है. यह तहां संशय है. एकदेशीके मतमें जो प्रयोजन कहा था सोई भाष्य- 
कारके मतसें अंगीकार है। पुच्छपद तहां अवयवका वाचक है. यह प्ूर्वपक्षम 
अंगीकार है। सिद्धांतमें 'आनन्द्सयोड्स्यासात' इस सूत्रका यह अथ है कि 
आनंदमयपदसें “ब्रह्म पुच्छे! इस वाक्‍्यमें जो अरह्मपद सो अंगीकार है. तिस 
ब्रह्मपदका श्रुतिमें बहु अभ्यास सुना है. याते त्रह्मपद स्वप्रधान ब्रह्मचाचक है. 
“असन्नेच स भमवति असद त्रह्मेति चेत्‌ वेद अस्ति अ्ह्मेति चेत्‌ वेद 

सनन्‍तसेन॑ ततो विदु/” यह अत्मानन्द्व्लीम वाक्य है. इसमें अह्मपदका अ- 
भ्यास सुना है, यातें अह्मपद स्वप्रधान अह्मवोधक हैं; अवयववोधक नहीं. 
न्रह्म असत्‌ है इसप्रकार जो जाने हैं सो आप असत्‌ होवे है अर्थात्‌ अपुरु 
पार्थसंबंधी होवे है. बरक्ष है इसप्रकार जो जाने है ताको सत्सख्॒रूप जाने हैं. 
अर्थात्‌ तिस अखित्वज्ञानसे सो बह्मवेत्ता अपर पुरुषोंको जाननेयोग्य होवे हैं 
इति | यह अ्रुतिअक्षरा्थ है. इति । 


“विकारशब्दात्‌ न इति चेत्‌ न प्राचुयोत' इसका यह अर्थ. है--विका- 
रशव्दात्‌ नाम. अवयववाचक. पुच्छशब्दसे ब्रह्मपद्का सामानाधिकरण्य है; 
अर्थात्‌ उमय पद एक अर्थवाचक है; यातें श्रह्मपद स्वप्रधान ब्रह्मका घाचक 
नहीं. इति चेत्‌ नाम उक्त शंका करें तौ संभवे नहीं. तथाहि-सूत्रमें जो प्राचु- 
येपद्‌ है सो अवयवप्राय प्रयोग है. आनंदवाहुल्यताबाचक नहीं, यातें अह्मपद 
अवयववाचक नहीं, अवयवप्राय पाठसें ही अवयवसिद्धि संभवे है. यातें बह्म- 
पद्‌ अवयववाचक नहीं किंतु अह्म पुच्छकी नांई पुच्छ है, अर्थात्‌ सर्वका अ- 
धिष्ठान है. अतिष्ठा नाम आधार है. यह अर्थ अंगीकार है. इति | “ततहेतुब्य- 
पदेशात्‌ व” इस सून्रका यह अर्थ है कि तत्‌नाम बह्मको सर्वका कारण कथन 
किया हैं, यातें भी पुच्छपद आधारका रक्षक है. इति। “मान्त्रवर्णिकमेव 
च गीयते” इसका यह अर्थ है कि जो मंत्रमें बर्म कहा है सोई ब्राह्मणमैं कहा 
है यातें पुच्छवाक्‍्यमें जह्यही अंगीकार है. इति ॥ “न इतरः अनुपपत्ते:” 
इसका अथे-पुच्छवाक्यमें बह्मही क्रथन किया है, इतर' नाम जीव नहीं कहा- 
, जो बहाको अवयब सानें तौ अवयव भी आनंदमयको कहा चाहिये, तिसके अं- 
: गीकार कियेसे उत्तरवाक्य “अजुपपत्ते/ नाम नहीं बनेगा, यातें जह्मपदसे. स्वप्र- 

धान जअह्मका भहण है, पुष्छ अवयवका अहण नहीं. इति ॥ “भेदच्यपदेशातं 


९ अथै-यह ३ पतिबिंषित 
च्वॉ इस सूजका अथे-यह आनंदसय जीव प्रतिविंघित ब्ह्मानंदको पायके आ- 


[अ० १ पा० १ सू०१९] भायवाटीकासहितानि । श्३्‌ 


नंद होवे है, जाविध भेदके कथनसें पुच्छवचनमें जह्मही अंगीकार है. इति। 
'कामात्‌ चन अलुमानापेक्षा' इसका अथे-कामपदसें आनंदका ग्रहण 
हे. सो आनंद बह्मरूप है, यातें आनंदमयको भी अह्मत्वकी अपेक्षा होवेगी; 
अथात्‌ आनंदमयभी बह्म सिद्ध होवेगा, सो अंगीकार नहीं क्योंकि तिसको ब्रह्म 
अंगीकार कियेसें विकारा्थक मयट्का विरोध होवेगा. 'आनंदसथराव्दः ज्- 
हवाचकः, आनंदराव्दत्वात, आनंदो तरह्म इति आनंद्राज्दवत्‌ । यह 
अनुमानका आकार है. इति | 'अस्मिन्‌ अस्थ च तदूयोर्ग शास्ति! इसका 
अथ-पुच्छवाक्यमें कहा जो चह्म अस्मिन्‌ नाम इस चह्ममें प्रबुद्ध आनंद्मय 
जीवकी “घतत्‌योग नाम तत्स्वरूपप्राप्तिरूप मुक्तिको शास्त्र कहे है, यातें पुच्छ- 
वाक्यमें ब्रह्म स्वप्रधान निर्विशेष ज्ञेय है. इति सिद्धम्‌ ॥ १९ ॥ 


अच०-उत्तर सूत्रमें सपुणउपासनाका आरंभ करे हैं. पूर्वपक्षमें और सिद्धांत- 
में पादसमाप्तिपर्यत उपासना फल है। छा दो ग्यमें ततीयअछ॒वाकम सुना है ।अ- 
थ थ एपोडन्तर आदित्ये हिरण्मयः पुरुषों दृइयते हिरण्यइमशु! हिर- 
प्यकेश$ आप्रणखात्‌ स्वेएव खुबणे। । तस्थ यथा कप्यासं पुण्डरीकमे- 
चमक्षिणी तस्य उद्ति नास, स एप सर्वेश्यः पाप्भभ्यः उद्ति उदे- 
ति हद थे सर्वेस्यः पाप्मभ्यो थ एवं चेद्‌ ।” यह कहकर आगे यह कहा है। 
“अथ य एषो5न्तरक्षिणि पुरुषों दृश्यते सैव ऋऋ तत्साम तत्‌ डक्थ॑ 
तत्‌ यज्ठः तत्‌ ब्रह्म तस्य एतस्थ तदेव रूप यत्‌ अरुष्य रूपम्र इति। 


अथै-उपासनाका आरंभ अथपदका अर्थ है. जो यह शाख्रप्रसिद्धिसें 
सूर्यमंडलूमैं पुरुष दीखै है सो ज्योतिःस्वरूप है, श्मश्रु तांके ज्योतिरूप हैं, 
केशभी ज्योतिरूप हैं, नखपर्यत ज्योतिरूप है, कपिका आस नास पुच्छभाग 
तेजस्त्री है तततुल्य जो पुंडरीक ततूतुल्य इस देवताके नेत्र हैं. तिसका 
डउद्ति नाम है सो यह सर्व पापनसे रहित उदय होवे है. जो उपा- 
सक तांको उत्तविधिसें जाने है सोभी सर्वपापनसें रहित होवे है. शा जो 
यह नेत्नॉमें पुरुष दिसे है सोई ऋकछ है, सोई साम है, सोई उक्थ है, सोई यज्ु 
है, सोई जह्य है, इसका सोई रूप है, जो उसका है. इति। उक्त वाक्यमें 
जो पुरुष कहा है सो विद्याकर्मोंके बरूसें उक्त तेजयुक्त कोई संसारी है वा 
नित्यसिद्ध परमेश्वर है? यह तहां संदेह है। तहां यह पूर्वपक्ष है कि अुति- 
ने जे हिरण्यर्मश्चु आदिक रूप कथन किये हैं ते नित्नसिद्ध परमेश्वरके संभवें 
नहीं यातें सो पुरुष कोई संसारी है. इति। तहां सूत्रकार स्वसिद्धांत कहे हैं-- 


२४' .  अह्यसूत्राणि । ( अ० शपा० १ सू० २१] 


अन्तस्तद्मोंपदेशात्‌ ॥ २० ॥ 


अन्तः । ततधमोंपदेशात्‌ । इति प० । 


अथे-नित्यसिद्ध परमेश्वरके सर्वे पापराहित्यादि जे का तिन धर्मनका 
उक्त वाक्यमैं उपदेश किया है, यातें जो सूर्यमें और नेत्नोंमें पुरुष सुना है सो 
परमेग्थर है; संसारी नहीं. उक्त धर्म परसेम्वरमें संभवे हैं, संसारीमें संभवें नहीं, 


इति॥ २० ॥ गा हे 
भमदव्यपदशाबान्य। ॥ २१ ॥ . 


भेदव्यपदेशात्‌ । च्‌ । अन्यः | इति | पूँ० । 


अथे-सूयेशरीरका अभिमानी जो जीव तासें परमात्माका भेद कहा 
है यातें खूथ और नेत्रोंके अंतर जो पुरुष कहा है सो आदित्यशरीराभिमानी 
जीवसें अन्य नाम भिन्न है। तथाहि-“यथ आदिले तिषछठन आदिलद्यात्‌ 
अन्तरों यम्र आदितो न चेद्‌ यस्य आदिवत्यः झारीर॑ य आदिव्यमन्तरों 
यमयति एव ते आत्सा अन्तयोमी अम्ठतः” इत्यादिक श्रुतिनमैं आदि- 
च्यादिकोंसें तिनका अंतयोसी भिन्न प्रसिद्ध प्रतीत होने है. श्रुत्तिअर्थ-जो 
सूर्यमें स्थित हुआ सूर्यके अंतर है, जिसको सूर्य नहीं जाने है, सूर्य जिसका शरीर 
है, जो सूर्यको अंतर प्रेरणा करे है, सो तुम्हारा आत्मा अंतयोसी अमृतरूप है. 
ड्ति | यह चाक्य बृहृदारण्यकके ठततीय अध्यायमें है. इति ॥ २१॥ 


अच०-पुनः छांदोग्यमैं ठतीयप्रपाठकके अष्टमर्खंडमें यह प्रसंग है/कि 
शालावत्य बाह्मणने जैबालि राजासें पूंछा था कि सामकी कौन गति है? ने 
कहा स्वर है. स्तररकी कौन गति है? उसने कहा प्राण है. प्राणणी कौन : 
है! उसने कहा अज्न. अन्नकी कौन गति है? उसने कहा जरू, जरूकी 
गति है? उसने कहा यह छोक । तब उसने कहा इस लोककी कौन गति है! 
तिसका उत्तर है-“आकाश इति ह उबाच सचबोणि हवा इ' 
सखतानि आकाशादेव समुत्पचन्ते आाकाझो प्त्यस्त॑ यान्ति आका 
हि एवं एस्यो ज्यायान्‌ आकाहझाः परायणः” इति ॥ ह 


0 
अरथ-शालावल्यने जब दाल्म्पसे इस छोककी गति पूंछा तब उसने उत्तर ' 
नहीं दिया. जैबलि नाम राजाने उत्तर दिया कि, सर्वका गति नाम अधिक्करण 
आकाश है. सर्वेभृत आकाशसे उपजे हैं, आकाशमें रूय होवे हैं... इन 'सर्वेसें 






[अ० १ पा० १ सू० २२] भावाटीकासहितानि । सर्प 


आकाश श्रेष्ठ हे. आकाश ही सर्वका स्थान है. इति। उक्त विपयवाक्यमें यह 
संदेह हैं कि आकाशशच्दसे भूताकाशका अहण है वा अह्मका ग्रहण है? 
इति । आकाश वायुकी उत्पत्ति कही है यांते आकाशशद्दसें तहां भूताका- 


5] 


शका अहण है, यह पूर्वपक्ष हैं. तहां यह सूत्रकारका समाधान है-- 


आकाशस्तलिज्ञत्‌ ॥ २२ ॥ 
आकाशः । ततलिज्ञत्‌ । इति प०। 


अथ-तत्‌ नाम ब्रह्मके जे महाभूतरचनादिक हछिंग हैं ते उक्तवाक्यमें प्र- 
तीत होवेंह यातें आकाशपदसे तहां त्रह्मका अंगीकार है. जहां आकाशझसे वा- 
युकी उत्पत्ति कही है तहां आकाशउपहित चेतनसें वायुका जन्म अंगीकृत 
हैं, केवल आकाशसे वायुका जन्म मानेसें चेतनकारणवोधक श्रुतिसें विरोध 
होवेगा, और आकाझसे सर्वभूतनकी उत्पत्तिका कथनभी असंगत होवेगा- 


इत्ति ॥ २२ ॥ ग 


अच०-छांदोग्यमें आकाशवाक्यके अनंतर यह प्रसंग है, कि चाक्रायण नाम 
कोई कुरुक्षेत्रवासी ऋषि था; सो कुरुक्षेत्रमें दुर्भिक्ष हुयेसे अपर देशमें चला 
गया और जायाको भी साथ छेगया. एक ग्राममें जाकर रहा. तहां हस्तिवान्‌ 
हस्तीको कुल्माप (घुघुरी) खिलाता था और आपभी हस्तीके साथ खाता था, 
तिससे ऋषिने भिक्षा मांगी. तब उस हस्तिवानने ताको उच्छिष्ट' अन्न दिया, 
फिर हस्तिवान्‌ उच्छिष्ट जल देने लगा तौं ऋषिने नहीं लिया, तब हसतिवानने 
केहा कि अन्न तो उच्छिष्ट छिया, जल नहीं लेते? तव ऋषिने कहा कि अज्न 
हमको मिलता नहीं जल जहां तहां वहुत सिलेहे. यह कह अन्न खाकर कुछ 
शेप रहा सो भार्थाकों दिया, उसने छेकर धरछोंड़ा. दूसरे दिन उस उच्छिष्ट 
अन्नको भारयासें छेकर खाया; खाकर उस आममें यज्ञ होता था तहां चढा- 
गया. तहां जाकर प्रस्तोताको कहा कि हे भ्रस्तोतः ! जा देवताकी तू स्तुति करे 
है तांको बिना जानेंसें हमारे आगे स्तुति करेगा तौ तेरा शिर गिरपड़ेगा. तब 
यजमानने कहा भगवन्‌ ! आप कौन हैं ? तवउसने कहा कि में चाक्रायण उषस्ति 
हों। अर्थात्‌ जितना धन और ब्राह्मणोंको दिया था उतना धन उनको देकर 
यज्ञकत्ती किया. फिर चाक्रायणने भ्रस्तोताको कहा कि जिस देवताकी स्तुति 
करे है, उस देवताको जाने है! प्रसोताने भीत होकर पूंछा सो देवता कौन है? , 
तब चाक्तायणने यह वाक्य उपदेश किया। “भाण इति होवाच सर्वाणि 


अहम, '४ 


, २६ बल्मयूत्नाणि । [अ० १ पा० १ सू० २३] 


ह वा इसानि भूतानि प्राणादेव अभिसंविदन्ति प्राणम्‌ अभ्युजिहते 
सा एवा देवता” हति ॥ अथ-जा देवताकी तुम स्वुति करते हो, सो 
प्राण है- इसीसें सर्व भूत अभ्युज्जिहते-नाम उपजें हं. इसीमें छय होवे हैं. सो 
यह देवता हैं. इति । “प्राणस्थ प्राण: ” इत्यादिक वाक्यनमें प्राणशब्द 
ब्रह्मका वाचक प्रतीत होवेहे और प्राणयद वायुका वाचक है यह मसिद्ध है. 
यातें ग्राणशव्दसं उक्तवाक्यमें ऋल्मको यहण किया चाहिये वा बायुकी अहण 
किया चाहिये? यह विषयवाक्यमैं संशय संभवे है. प्रसिद्धिके चछसे प्राणपद- 
करके वायुको पूर्वपक्षमं म्हण कियेपर यह उत्तरका सूत्र हैंः-- 


अत एव प्राण: ॥ २३ ॥ 
अतः । एवं । प्राणः | इति प०। 
अथै-अतः नाम उत्पत्तिआदिक लिंगनसे प्राणशब्दकरके चाक्रायणने न्न- 
हका उपदेश किया है, वायुका नहीं. वायुसें स्वेभूतनकी उत्पत्ति आदिक सं- 
भवे नहीं, यातें जह्ममें चाक्रायणका तात्पये है. इति ॥ २३ ॥ 
अच०-छां दोग्यके ठृतीय प्रषाठकर्में यह वाक्य है। “गायज्ञी या इरद 
सर्वेयूतं यादिदं किंच बाण वे गायज्ञी बाण वा इद॑ं सर्वस्‌” इस वा- 
क्यमें गायत्नीको सवेरूप कहकर आगे भूत १ पृथिवी २ शरीर ३ हृदय ४ 
यह गायत्रीके चार पाद कहे हैं. आगे यह वाक्य है। “तावानस्प महिमा 
ततो ज्यायांश्व पूरुषः | पादोडस्थ सवा पफ़्तानि जिपाद्स्प अमूत॑ 
दिवि” इति। इससे आगे प्राणादि पंचवायुवोंको स्वरगछोकके द्वारपार कह 
कर यह कहा है--/ अथ यदतः परो दिवो ज्योतिरदीप्यते चिम्वतः। 
तत्‌ चत्‌ इृद्स्‌ अन्तः पुरुष ज्योति: तस्य एवा दृष्टि! ” इति। 
अथ-यह स्व चराचर भूत गायत्री छंद्खरूप हैं, वाक्य गायत्री है, यह स. 
चैभूत वाक्यरूप हैं. जितने चतुष्पद हैं उत्तना विभूतिविस्तार है. तावत्‌ इ- 
सकी संहिसा है. इससे पुरुष उत्तम है। सर्वश्ूत इसका एक पाद हैं. तीन पाद 


दिवि नाम स्वप्रकाश आत्मामें स्थित हैं।अथ नाम गायत्रीउपाधिक बह्म 


उपासनासें अनंतर जो अतः नाम स्वर्गछोकके ऊपर दिव नाम प्रकाशमान है 


सोई पुरुषके अंतर ज्योति है. इति। इस ज्योतिवाक्यमें ज्योतिपदसे सू्यौ- 

दिक ज्योतिका झहण है, वा ब्रह्मका अहण है? यह संदेह है. पूर्वपक्षमें छोक- 

प्रसिद्धिस और स्वंर्गके ऊपर है जा मर्यादा श्रवणसैं भौतिक ज्योतिके अंगी- 
... कार कियेसें यह समाधान है।-- 


[अज० १ पा० १ सू० २७०] आपाटीकासहितानि । २७ 


 ज्योतिश्वरणामिधानात्‌ ॥ २४ ॥ 


ज्योतिश्वरणाभिधानात्‌ । इति । प० । 
अध--- पादो<स्थ ! जा उक्तवाक्यमें चरणविधान किये हैं, यातें ज्योतिपदसे 
उत्तरवाक्यम ब्रह्म अंगीकृत हैं. भोतिक तेजका अंगीकार नहीं. इति॥ २४ ॥ 


उन्दोमिधानान्नेति चेन्न तथा चेतो<रपणनि- 
गदात्तथाहि दशनम्‌ ॥ २५ ॥ 


उन्दोमिधानात्‌। न । इति। चेत्‌।न । तथा। चेतोर्पणनिगदात्‌। 
तथाहि । दर्शनम्‌ । इति प० । 

अथे--नह्ु पूर्ववाक्यके आरंभमें गायत्री छंदको उपास्य करके विधान किया 
है, यातें उत्तरवाक्यमें ज्योतिपदसें ब्रह्मका अहण संभवचे नहीं; यह जैका करें तो 
समाधान श्रवण करके तथा नाम छंदद्धारा गायन्नीगत चह्ममें चित्तके अर्पंण नाम 
समाधानका आरंभवाक्यमें “निगदात्‌' नास विधान किया है, यातें शंका संभवे 
नहीं 'तथाहि दुशेनम्‌” नाम अपर श्रुतिमेंभी उपाधिद्धारा उपासना देखी है 
थातें आरंभवाक्यमें गायत्रीपदस बह्मका अंगीकार हैं, छंद महण नहीं. इति॥२५॥ 


भूतादिपादव्यपदशापपत्तश्ववस् ॥ २६ ॥ 


भूतादिपाद्व्यपदेशोपपत्तेः । च। एवम्‌ । इति प०। 
अथे-भूत, पृथिवी, शरीर, हृदय यह ४ चार पाद गायत्रीके कहे हैं; इनका' 
जो ज्यपर्देश है सो त्रह्मविपे 'उपपत्तेः” नास संभवेहे यातें आरंभवाक्यमें एवं 
नाम बह्माही अंगीकृत है. छंदका ग्रहण नहीं है, यातें जो बह्म गायत्रीवाक्यमें 
कहा है सोई ज्योतिवाक्यमें अंगीकृत है. इति ॥ २६ ॥ 


उपदेशभेदान्नेंति चेन्नोमयस्मिन्नप्यविरोधात्‌ ॥ २७ ॥ 
उपदेशभेदात्‌ । न । इति। चेत्‌।न । उमयस्मिन्‌ । अपि | 


अविरोधात्‌ । इति प०। 
अर्थ-नल्ु 'पादो5्स्प ” इस वाक्यमें स्वर्कको आधार कहा है “यदतः 


२८ -. ब्रह्मसूत्नाणि। [अ० १ पा० १ सू० २५] 


परम ! इस वाक्यमें स्वर्गको अवधि करके कहा है यातें इक्त उपदेशके भेदसे 
ज्योतिवाक्यमें गायत्नीउपाधिक अह्मको मानना संभवे नहीं. या. शंकाका यह 
उत्तर है कि उमयास्मिन नाम उसय वाक्यनमें अह्मग्रत्यभिज्ञा होवे है; यातें 
अह्मप्रत्यभिज्ञाका अविरोध होनेसें ज्योतिपद्‌ ब्रह्मका वाचक है. भौतिक तेजका 
वाचक नहीं. इति ॥ २७ ॥ 


अवब०-कौषीतकि त्राक्मणमें गाथा है कि कोई प्रतदेन राजा था सो किसी 
कालमें इंद्के गहमें गया था. ताको इंद्वने कहा वर मांग. प्रतदेनने कहा जो मलु- 
ष्यको अतिहित हो सो कहो. तदा इंद्रने यह उपदेश किया | “४ प्राणोडस्मि 
पज्चात्मा ते साम्‌ आयुरखतस्‌ शति उपास्ख ” इति | यावत्‌ प्राण रहे है 
तावत्‌ आयु होवे है यांते वाक्यमें आयुरूप कहा है. इस वाक्यमें प्राणशब्द 
इंद्रका वाचक है, वा वायुका वाचक है, वा जीवका वाचक है, वा परमा- 
त्माका वाचक है? यह संशय है. और प्राणशब्द असिद्धवायुका वाचक है, यातें 
प्राणपदसे वायुका झहण है; यह पूर्वपक्ष है. तहां सूत्रकार स्वसिद्धांत कहे हैं।-- 


आणस्तथानुगमात्‌ ॥ २८ ॥ 
प्राणः। तथा । अनुगमात्‌ | इति प०। 


अथे-यथा अपर अनेक अ्रुतिनमैं प्राणशब्द ब्रह्मबोधक है तथा उत्तवाक्यमें 
भी अशन॒गमात्‌ नाम प्राणपद अरह्मबोधक प्रतीत होवेंहे यांतें इंद्रके वाक्यमैं 
प्राणपद्से बरह्मका उपदेश है, बायुका नहीं. तथाहि--इंद्रवाक्यका विचार कियेसें 
प्रतीत होवेहे कि राजाने कहा था जो अतिहित है सो कहो, सो आणवायुको अति- 
हित कहना संभवे नहीं. और अंतमें कहा है कि जो अधिकारी हमको अह्मरूप- 
सें अजुभव करेंद्ै ताकी मोक्षमें कोई प्रतिबंध करे नहीं. यातें भी म्राणपद तहां 
अह्मबोधक है, वायुवोधक नहीं. इति ॥ २८ ॥ | हे 


न वुरात्मोपदेशादिति चेदघ्यात्मसबन्धमूमा 
ह्स्मिच ॥ २९॥ 


न । वकुः । आम्मोपदेशात्‌ । इति । चेत्‌। अध्यामसम्बन्धभूमा । 
हि। अस्मिन्‌ । इति । प०। । 


३ यवर 2, ह 
अथ-वाक्यवक्ता जो इंद्र तिसने स्व आत्माका उपदेश किया है; यातें प्रा- 


[ अ० १ पा० १ सू० ३१] भाषाटीकासहितानि । 3९ 


णपदसे न्रह्मका महण संभवे नहीं. इस शैकाका आधे सूत्नसें उत्तर कहे हें 
कापीतकिमें जिस अध्यायमें यह गाथा है तहां अध्यात्मसंबंध नाम परमात्मा- 
संबंधका भूमा नाम वाहल्यतास छाभ होवेहै. यातें इंद्रवाक्यमें प्राणसें अह्मका 
उपदेश है. वक्ता आत्माका उपदेश नहीं. इति ॥ २९ ॥ 


अवत०-नछु वक्ता इंद्रने आत्माका उपदेश केसे किया हैं? या शंकाका 
उत्तर सूत्रकार कहे हेंः-- - 


शाखदष्टया तृपदेशों वामदेववत्‌॥ ३० ॥ 
शाख्रहृश्वा । तु । उपदेशः । वामदेववत्‌ । इति । प० । 


अधथे०-हमको तू जान यह जो इंद्रका उपदेश है सो शास्त्रदष्टिसें है यह 
जानना चाहिये- यथा वामदेवने शाख्रइश्टिसें कहा है कि 'में मद हों, मैं सूर्य 
हों? इति । तथा इंद्रने भी शास्त्रदश्टिसें कहा है. इति ॥ ३० ॥ 


जीवमुख्यप्राणलिज्ञान्नेति चेन्नोपासानैविध्या- 
दाश्रितत्वादिह तद्योगात्‌ ॥ ३१ ॥ 


जीवसुख्यप्राणलिड्भात्‌ | न । इति। चेत्‌ न । उपासत्रिविध्यांत । 
आश्रितत्वात्‌ । इह । ततयोगात्‌ । इति प०। 
अध-नलु पूर्व जो कहा है कि वक्ता आत्माका उपदेश नहीं सो सत्य है, 
तथापि सो वाक्य ब्रह्मगोधकभी नहीं किंतु जीवलिंगसें और मुख्यप्राणके लिं- 
* गसे जीवका और मुख्य प्राणका बोधक है. हमको जान जा इंद्रकथनसे था- 
क्यबविशिष्ट जीव अतीत होबे है. प्राणोंसे शरीर चेष्टा करे है. सो प्राणका लिंग 
है; यातें तहां जीववाक्य, मुख्यमाणवाक्य, अरह्मवाक्य जाविध वाक्यमभेदसें वा- 
क्यत्रयका ग्रहण हैं; केवक अह्मवाक्य अंगीकार नहीं. इति । इस शैकाका यह 
उत्तर अ्रवण करके इंद्रके उपदेशमें जो त्रय वाक्य मानेंगे तौ उपासा नाम .छपा- 
सना भी त्रयप्रकारकी सिद्ध होवेगी, सो इष्ट नहीं, यातें इंद्रके वाक्यका स- 
म्यकू विचार कियेसें ब्रह्मयोधक एक वाक्य सिद्ध होय है. वाक्यभेदे मानना 
असंगत है. और अपर वाक्यनमें भी जअह्मालिंगनके बढसें प्राणशब्दकी 
वृत्तिके अह्ममें 'आश्रितत्वात्‌” नाम अंगीकार किया है, यातें 'इह” नास:ईद्रवा- 
क्यमें भी तत्‌ नाम अतिहितादिक बह्मके लिंग कहे हैं, तिन लिंगनके योग नाम 


३० ब्ह्मसूत्राणि । [अ० १ पा० १ सू० ३१] 


संबंधसे अ्रह्मकाही इंद्रवाक्यमैं उपदेश है. जीवका वा मुख्यमाणका उपदेश 
नहीं। “ न प्राणेन नापानेन मत्यों जीवति कश्चन । इतरेण तु जी- 
चति यस्सिन एतौ उपाधरितोौ” इत्यादिक वाक्यनमें आणके व्यापारको 
ईश्वराधीन कथन किया हैं, यातें सो वाक्य अह्मका चोधक है. प्राणवोधक 
नहीं. उक्त श्रुति कठकी पंचमी वल्लीमं है. इति ॥ ३१ ॥ 


इति सून्नभावप्रकाशिकाभाषाटीकायां प्रथमाध्यायस्य प्रथमः पादुः समाप्त: ॥ १ ॥ 


अथ हदितीयपादप्रारम्भः । 


इस पादके दो अधिक तीस सूत्र हैं; तिनमें सप्त अधिकरण हैं, पचीस 
शुणरूप हैं. तथाहि;--- 


सुनत्नसंख्या। अधिकरण। गुण प्रसंग, 
१ आ० + मनोमयउपास्यविचार- 
२ न शु० मनो० * 
डर + गु० सनो० 
४ न. गु० मनो० 
छ न शु० मनो० 
द्ृ न गु० सनो० 
] न शु० सनो० 
4 रन शु० मनो० 
3 अ० के अत्ताविचार- 
५१० रच गु० आ० 
5१ अ० न शुहाप्रविषविचार- 
श्र न शु० जु० 
श्द अ० रन नेत्रगतका विचार. 
हे पे गु० ने० 
श्ण न गु० ने० 
श्ध्‌ हि झु० ने० 
2७ ने शु० ने० 
श्८ अ० हु 


अन्तर्यामिविचार. 


(ज० १ पा० २ सू० १] भाषाटीकासहितानि | ३१ 


५१९ ्न- शु० आअ० 
२० न गु० आ० 

२१ अ० न अदृश्यत्वादिगुणवान्‌ूबि० 
श्र न शु० अ० 

श्दे न गु० आ्‌० 

रश्छ आ० रन वैश्वानरविचार- 

श्ण्‌ +- शु० चै० 

श्दृ +- गु० बैं० 

र्७ न गु० चे० 

श्ट + गु० चै० 

२९ न शु० वेश्वानरस्थानविचार. 
छ्न्० रन सु० बै० 

ड््र रन शु० बै० 

श्र + गु० चैं० इति 

इ्७ः छः श्ण 


अवत्रणिका-जिन बाक्यनमें ब्रह्मके स्पष्ट लिंग प्रतीत होवेहेँ ते वाक्य 
सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान्‌ जगतकारण बह्मके वोधक हैं यह अर्थ प्रथम पादमें कहा 
हैं और जिन घाक्यनमैं ब्रह्मके अस्पष्ट छिंग हैं तिन वाक्यनको दूसरे तीसरे 
पादकरके ब्रह्मनोधक सिद्ध करें हैं. तहां भी इस पादमें उपास्यवोधक वाक्य- 
नका विचार है. तीसरे पादमैं ज्ञेयवोधक वाक्यनका सूत्रकार विचार करेंगे। 


छांदोग्यके ठतीय प्रपाठकमं यह वाक्य है । सर्च खल्विद्‌ त्रह्म तजलान' 
इति शान्त 'डपासीत' “मनोम॑यः पराणशरीरो भारूपः सत्यसंकल्पः 
आकाशोत्सा सैवेकमो सर्वकामः सँवेगन्ध! सवेरसः। एप य आत्मा- 
' स्तहृदय एतत्‌ ब्रह्म एतेमितः प्रेत्व अभिसंभवितास्मीति” इति। 


अथे-यह चराचर जगत्‌ ऋक्वस्वरूप है यामें संदेह नहीं. तहां हेतु कहे 
हैं. तजजलानिति | तज्ज | तछ । तदन । जाविध श्रुतिपदच्छेद है. तासें जो 
उपजे सो तज्ज कहिये है, तामें जो लूय होवे सो तह कहिये है, तामें जो 
|, चेष्टा करे सो तदन  कहिये है- अर्थात्‌ तज्ज तक तदन जा त्रय पदनसे सं- 
१ मनःप्रायः. २ आकाश इवब आत्मा यस्थ्र. ३ जगत्‌ सर्व कर्म भस्प इति. ४ सर्वे यन्‍्धा अस्म- 
७ आत्मानम्‌. 


इ२ : . बद्यसूत्राणि। [अ० १ पा6 १ सू०३ ] 


सारकी उत्पत्ति रूय पालनका भ्रहण है. ते त्रय ऋहासें होवे हैं यातें सर्व जगत्‌ 
स्वकारण बह्मरूप है. सर्वको ब्रह्मरूप होनेसें द्वेषादिकोंसे रहित शात हुआ 
उपासना करे. किसकी उपासना करे जा अभिलाषासें कहा है 'मनोमयः 
प्राणदारीरः” इत्यादि. एण नाम उक्तविशेषणवान्‌ हमारा आत्मा हंद- 
यके अंतर है, यही बह्म है, इसको यह शरीर छोड़के हम प्राप्त होवेंगे. इति। 
इस उक्त चाक्यमें मनोमयत्वादिगुणवान्‌ उपास्य जीव है वा परमात्मा है! 
यह संदेह है । 'द्वियो हि असूते। पुरुषः सवाह्माभ्यन्तरों झजः। 
अप्राणो झमनाः झुश्नो आक्षरात्‌ परतः पर!” जा द्वितीय मुँडकमें ब- 
हमको मनआदिकोंसें रहित कथन किया हैं यातें पूर्ववाक्यमैं जीव उपास्य कहा 
है जा पूर्वपक्षका सूत्रकार भगवान्‌ समाधान करे हैंः-- 


सर्वत्र प्रसिदोपदेशात्‌ ॥ १ ॥ 
सर्वत्र । प्रसिदोपदेशात्‌ | इति । प०। 


अथे-सर्वत्र नाम सर्व वेदांतवचनमें जगत्‌कारणत्वरूपसें प्रसिद्ध जो 
ब्रह्म तिसका ही “सर्वे खल॒ हद ब्रह्म” इत्यादिक वाक्यनमें उपदेश है, यातें 
मनोमयत्वसें जीवका उपदेश नहीं; अरु ब्रह्म स्वेस्वरूप है यातें ते सनोमय- 
त्वादि गुण तांमें संभवे हैं, अतणव विरोध नहीं. इति ॥ १ ॥ फकिंच--- 


रा | 
विवक्षितग॒णोपपत्तेश्व ॥ २ ॥ 
ग कर ० 
- विवश्चितगुणोपपत्तेः । च। इति । प० । 
अथ--उपासनामैं विवक्षित नाम अंगीकार जे भारूपत्व सत्यसंकव्पत्वादि 
गुण ते ऋह्मविषेही उपपत्तेः नाम संभवे हैं, जीवमें नहीं । और “त्वे स्त्री त्व॑ 
पुमानसि त्वं कुमार उत था छुमारी त्वं जीणों दण्डेन चंचासि त्वें 
जातों भवसि विश्वतोशुखः” जा ब्वेताश्वतरके चतुर्थ अध्यायमैं जीव- 


घर्म बह्मविषे दिखाये हैं, यातें मनोमयत्वादिशुणवान्‌ उपास्य ब्रह्म अंगीकार 
हैं, जीव नहीं. इति ॥ २॥. 


.े अलुपपत्तेस्तु न शारीरः॥ ३॥ 
:- - - आनुपपत्तेः । तु। न। शारीरः । इति । प०। 
अथे-सत्यसंकल्पादि गुण जीवमैं अज्लुपपत्ते; नाम संभवे नहीं, यातें मनो- 


[ज० १ पा० २ सू० ७] भाषाटीकासहितानि ! श्३ 


मयत्वादिगुणवान्‌ अह्मका तहां अंगीकार है. शारीर नाम जीवका अंगीकार 
नहीं. इति॥ ३२ ॥ किंच । 
> म...प 
कमकतृव्यपदशाच ॥ ४ ॥ 
। की ९ 
कर्मकतृव्यपदेशात्‌। च । इति । प०। 
अथे-पूर्व॑सूच्रका “न शारीरः” इतना पाठ इस सूत्रमें मिलायके सू- 

2 अथ है। एतम्‌ इतः प्रेत्व अभिसंभविता अस्मि” जा उक्त 
श्रुतिमें 'एतं! जापदसें मनोमयत्वादियुणवान्‌ उपास्थको कर्म किया है 'अ- 
मिसंभवितास्थमि' जा वाक्यमें उपासकको करता कहा है. एक जीवको कर्म 
और कर्ता कहिना संभवे नहीं, यांते कर्मकर्ताभेदकथनसें भी मनोमयत्वादि- 
शुणवान्‌ जीव उपास्य नहीं किंतु अह्म है. इति ॥ ४ ॥ किंच--- 


शब्दविशेषात्‌॥ ५ ॥ 


शब्दविशेषात्‌ | इति । प० | 
“अन्तर आत्मनि पुरुषो' हिरण्यमयः” जा श्रुतिमैं सप्तस्यंत आत्मप- 
दसें जीवका ग्रहण है. प्रथमांत पुरुषपदसे परमात्माका अहण है. तैसे मनोमय- 
त्वादिगुणविशिष्ट परमात्माकें विधायक प्रथमांत मनोमयादिपद हैं, याते तहां 


परमात्माका अंगीकार है. जीवका नहीं. इति ॥ ५॥ 
० ०. है च्ो यांते (१ 
अथ०-नछु तुम्हारे मतमें जीवश्ह्मका अभेद है यांते कर्मकतोभेदकथन 


असंगत है; जा शंकाका उत्तर कहे हैं-- 
स्प्तेश्व ॥६॥ 
स्वृतेः। च । इति | प० । 
पै-/ईश्वरः सर्वभ्ुतानां' हृद्देशेज्लेन तिछ्ठतति” जा स्मृतिमें जीवका 
ईचबरसे दलित पद कहा की पाते करमंफतोमेद्कामरेस संभवे है. इति ॥ ६॥ 
अमंकोौकस्लात्तदव्यपदेशाच नेते चेन्न निचाय्य- 
लवादिव व्योमवच्च ॥७॥ 
अर्भकौकस्वात । ततव्यपदेशात्‌ ।च।न। इति। चेत्‌ । न । 
निचाय्यलात । एवम्‌ । व्योमवत्‌ | च। इति प० । 
अदा» ५ 


३9 ब्रह्मसत्रनाणि । [अ० १पा० रसू० ८ ] 


अथ-ननु अमंकपद अत्पवाची ओकरूपद स्थानवाचक है. अल्प स्थान 
होवे जिसका सो अर्भकौकस्‌ कहिये है, अथांत्‌ अल्प जो हृदयस्थान तामें ह- 
दयपरिसाणवान परमात्माकों उपास्थ कहिना संभवे नहीं- ओर “अणीयान” 
इत्यादि बाक्यमें ततव्यपदेशात्‌ नाम उपास्यको सूक्ष्म कहा है यांते आराष्र- 
मात्र जीव उपास्य है परमात्सा नहीं; जा शंकाका आधे सूत्नसें समाधान करेह. 
कि अल्पस्थानत्व-सूक्ष्मत्वादिगुणविशिष्ट परमात्मा ही पूववाक्यमें निचाय्य 
नाम उपास्यकरके विधान किया है. यथा सर्वेकोकाधीश परमात्मा ओऔरीराम- 
चंद्रको अयोध्याधीश कहे हैं और यथा शाल्ञ्राममें विष्णुदुद्धि कही है तथा 
उपासनार्थ अव्पस्थानमैं परमात्माको उपास्य कहिना संभवे है, और यथा 
आकाश सर्वगत है तथापि सूचीआदिक छेद्से अल्पस्थान और सूक्ष्म कहिये 
है तथा व्यापक त्रहको कहिना भी संभवे है. यांते तहां ब्रह्म उपास्य है, जीव 
नहीं. इति ॥ ७॥७ 


सम्भोगप्राप्तिरिति चेन्न वेंशेष्यात्‌ ॥ ८॥ 
सम्भोगप्राप्तिः । इति। चेत्‌ । न । वैशेष्यात्‌ | इति प०। 

अथ-नज्ठु परमात्माको आकाशवत्‌ व्यापक मानेसें जीवकी नाई सुखदुः- 
खका अन्ुभवरूप जो भोग तांकी प्राप्ति इश्वरको भी होनी चाहिये; जा शंका 
करें तौ विशेषतारूप हेतुसे संभवे नहीं. क्योंकि जीव तो धर्माधर्मका कर्ता है, जो 
कर्ता होवे है सो भोक्ता होवे है; यांते धर्मांधमके फरूरूप सुखदुःखका अनुभव- 
रूप भोग जीवको संभवे है. परमात्मा जीवसे विलक्षण है; यांते जीवसे परमा- 
त्मामें अत्यंत विशेषता है. यांते पूर्ववाक्यमें परमात्मा उपास्य है जीव नहीं. इति। 
पूवे अधिकरणमें पूर्वपक्ष उत्तरपंक्ष उसयमें उपासना फर है. आगेके अधि- 

करणमें पूर्वंपक्षमें उपासनाफरल है. सिद्धांतमैं जह्मचोध फल है ॥ ८ 0 
अच०-कठकी द्वितीया वल्लीमें यह वाक्य है। “न जायते सियते वा वि- 
पश्चित्‌ नाय॑ कृतश्रिन्न चश्तव कब्वित्‌। अजो नित्य! शाम्वतोड्य पुराणों 
न हन्यते हन्धमाने शरीरे॥ हन्ता चेत्‌ मन्धते हन्तु हतस्त्‌ सन्‍्यते 
हतम। डी तौ न बिजानीतो नाय॑ हन्ति न हन्यते ॥ अणोर णीयान्म- 
ह्तो कक स्प्र जन्तोनिहितो शुहायाम्‌ । तमऋतुं पश्यति वीत- 
शोको,/घातठुः भंसोंदान्महिमानमात्मनः ॥ न अशान्तसानसो' वापि 
प्र्ञाननेनसाशुयादू'। यरप अद्य च क्षत्न व उसे भवत जोदनः। रत्यु- 
थेस्पोपसेचन क इंत्था बेद यत्र सः” इति. इस अंतके मंत्रमं यह कहा है;- 


जि० १ पा5 रे सू० १० ] भाषादीकासहितानि । श्ष 


कि जातिसे प्रसिद्ध जे म्राह्मण क्षत्रिय ते उसय जा परमात्माके अन्नकी नाँई 
ओदन हू और सृत्यु जांका उपसेचन है अर्थात्‌ ओदनके ऊपर श्ञाक है; तांको 
कौन जाने है ! सो जाने है जो अज्ञानसाधनवान्‌ है, इति | इस उत्तवाक्‍यमें 
कोई अत्ता अर्थात्‌ सर्वका सक्षक प्रतीत होवे है, सो जीब है वा अप्नि है, वा 
परमात्मा है, यह तहां संदेह है. पूर्वपक्षमें अ्विआदिकका अंगीकार कियेसें 
यह सूत्रकारका सिद्धांत है-- 


अत्ता चराचरप्रहणात्‌ ॥ ९ ॥ 


अत्ता । चराचरग्रहणात्‌ । इति प० । 
अच-अतिमें ब्राह्मण क्षत्रिय सर्वचराचरका उपलक्षण हैं तिस' सर्व स्था- 
घरजंगमका भक्षक सुना है; यातें तहां अत्ता नाम भक्षक जो कहा है सो पर- 
मेश्वर कहा है, जीवादिक नहीं. परमेम्वरविना अपरको सर्वभक्षकत्व संभवे 
नहीं. इति ॥ ९ ॥ किंच--- | 


प्रकरणाच ॥ १० ॥ 


प्रकरणात्‌ । च। इति प०। 

अधथे-'न' जायते' यह पूर्वप्रकरण परमात्माका है यातें सर्वअत्ता परमात्मा 
है,जीवादि नहीं. इति। कठश्रुतिबचनोंका यह अक्षरार्थ है--“ न जायते * 
इनसे पूर्व ऑकारउपाधिक आत्माका स्वरूप कहा है. “न जायते! इसकरके उपा- 
घिरहित आत्माका स्वरूप कहे हैं. अनित्यवस्तु अनेक विकारवान्‌ होवे है. तांमें 
. उत्पत्ति, नाश यह आदिअंतके विकार हैं, तांका आत्मामें * न जायते म्रियते 
वा विपश्चित! यह वाक्य निषेध करे है. विपश्चित्‌ नाम मेधावी अर्थात्‌ अछुप्तचै- 
तन्यस्वभाव आत्मा जन्मे और मरे नहीं; किंच अयम्‌ (यह) आत्मा कुतश्रित्‌ 
नाम किसी कारंणसें न, ब्चूव नाम उपजा नहीं और इस आत्मासँ कश्चित्‌ 
नाम कोईमी उपजा नहीं; यातें आत्मा अज और नित्य है. ' शाश्वत ? 
नाम अपक्षयरहित है. यातें पुराण है अथात्‌ वृद्धिरहित है. जन्मादिक धर्म 
देहके हैं आत्माके नहीं; यातें शरीरके हन्यमाने नाम विनाश हुए न हल्यते 
नाम आत्माका विनाश होवे नहीं. जो उक्तस्वरूप आत्माकों देहमात्रमें आ- 
स्मईंशिवान्‌ हँता मारनेका चिंतन करे और अपर कोई मत हुए माने ते उभयही 
स्वआंत्माको जानें ' नहीं. आत्मा विकाररहित है. याते किसीको मारे नहीं 
'और किसीसे मरे नहीं, आत्माको इस प्रकार जाने. आत्मा अणुसे अशु है, 


श्द् ब्रह्मसृत्नाणि ( अ० १ पा० शसू० ११] 


महानसे महान्‌ है, सर्च जीवोंके हृद्यमें स्थित है, ताको अक्नरतु नाम अकाम 
अर्थात्‌ विषयअमिलापारहित देखे हैं याते घातुः नाम इन्द्रियोंके पुसादसें 
आत्माकी महिमा नाम उक्त विकाररहित स्वरूपको अकाम पुरुष देखे हं, ताते 
अन॑तर शोकरहित होवे हैं. अशांत मनवान्‌ तांको देखे नहीं किंतु चक्मज्ञानसे 
इस आत्माको प्राप होवे है. जिस आत्माके तराह्मण और क्षत्रिय ओदन हें, झुत्यु 
जांका उपसेचन है अथीत्‌ शाक है, सो आत्मा यत्र नाम जा स्वमहिसामें 
कत्तें है; ततस्वरूप आत्माको इत्था नाम इत्थम्‌ अथोत्‌ पूर्वउक्तलाधनवान्‌ 
अधिकारीकी नाई कः नाम साधनरहित कौन वेद नाम जाने हैं? अथीत्‌ सा- 
घनरहित कोई नहीं जाने है. इति,॥ १० ॥ 
अव०-उत्त ख्ुतिके जागे कठ्वहीमें यह श्रुति है। “ऋत॑ पिवन्‍्तो खुकू- 
तस्य छोके ग॒हां प्रविष्ठी परमे पराडें। छायातपौ ज्रह्मविदों चद॒न्ति 
पञ्चान्नयों थे च ज्िणाचिकेता:” इति। इसका यह अर्थ है कि प्रामृ प्राप्य गंतृ 
गंतव्यके विवेचनके अर्थ इनमें दो आत्मा अंगीकार किये हैं. सुकृत्‌ नाम कमे- 
का ऋतम्‌ नॉम अवश्य भोक्तव्य जो फल तांको पीतेहुए छोक नाम देहमें 
जो बुद्धिरूप गुफा तांमें प्रवेशवान्‌ है, यद्यपि फलभोक्ता एक है तथापि तत्‌- 
संबंधस उमय भोक्ता कहे हैं. पर जो बह्म तांका जो अर्घ नाम 
स्थान सो पराध्य कहिये है अथोत्‌ हृद्यका नाम है, तिस परम नास उत्तम 
हृदयमैं जो आकाशरूप गुफा तांमे प्रविष्टी नाम ते उसे श्वेश कर स्थित हैं. 
छायातपौ नाम ते के छाया धूप परस्पर विरोधी हैं तथा करता अकतो- 
रूपसे परस्पर विरोधी हैं: उक्त विधिसे तिनको बह्मवेत्ता कहे हैं, और पंचाप्नि- 
उपासक कहे हैं. जे अभि स्थापन करें तिनको त्रिणाचिकेता कहे हैं. तेभी ति- 
घंको “ज्क्त विधिसें कहे हैं. इति। ड्क्त वाक्यमें दो भोक्ता कहे हैं ते बुद्धि 
और जीव हैं या जीव और परमात्मा हैं ? यह तहां संदेह है । परमात्माको 
भोक्ता कहिना और तांका गुफामें प्रवेश कहिना संभवे नहीं; यांते जीव और 
बुद्धिका तहां भरहण है. जा शंकाका उत्तर कहे हैं-- 


ण॒हां प्रविष्टावात्मानो हि तदर्शनात्‌ ॥ ११ ॥ 
' गुहाम्‌ । प्रविण्टे । आत्मानौं । हि । ततद॒शनात्‌ । इति प० । 


अर्थ-आत्मानौ नाम जीव जौर परमात्मा उसे ही आत्माशच्दके वाच्य हैं 
यातें गुफामैं प्रवेशबाल जीव और परमात्मा है, जीव और बुद्धि नहीं. ड्से 
कर्मफलभोक्ता सुने हैं, तांमें एक आत्मा है यातें दूसरामी आत्मा सानना 


(अ० १ पा०१ सू० १२] भाषाटीकासहितानि | ३७ 


चाहिये, तदशनात्‌ नाम यह अर्थ लोकमें देखा है। यथा “अस्य गो! द्वि- 
तीय! अन्वेष्टच्य// जा कथन कियेसें दूसरी गौही अन्‍्वेष्व्य है. 
मनुष्य अन्वेध्व्य नहीं. तथा प्रसंगमें भी चेतनत्व सामान्यसें जीव परमात्मा 
उभयका अहण है. इति ॥ ११ ॥ किंच-- 


६००१ 
विशेषणाच् ॥ १२॥ 
विशेषणात्‌ । च्‌ । इति प० । 
अथ-ततीय छुंडकके आरंभमें यह वाक्य है। “हा छुपणों सयुजा स- 
खाया समान वृक्ष परिषखजाते । तयोरन्य! पिप्पल खाद्षक्ति अन- 
क्षन अन्योडभिचाकशीति । समाने दृक्षे पुरुषों निमभ्नोडनीदाया 
शोचाति मुठ्ममानः। जुछ यदा पश्याति अन्यमीशम्‌ अस्य महिसमानमिति 
चीतशोक/” इति ॥ अथे-दो पक्षी आपसमें सखा एक वृक्षमें स्थित हैं, तिन्रमें 
एक फलको खाता है दूसरा नहीं खाता हुआ प्रकाशे है। समानवृक्षमें नि 
मभ्न जो जीव सो अविद्याकरके सोहको प्राप्त हुआ निरंतर शोक करे है. 
यदा ध्यानयोग्य विंवरूप ईश्वरको स्वआत्माकरके जाने है तदा परमा- 
त्माके स्वरूपकों प्राप' होवे है-और बवीतशोक होवे है) इस झुंडकवचनमें 
परमात्माका मंतव्य विशेषण सान होवेहे और जीवका मंद्विशेषण भान हो- 
बेहे. परमात्माका गंतव्य विशेषण भान होवे है, जीवका गंदविशेषण भान हो- 
बेहै. यातें कठ्वाक्यमैं गुहाविये प्रवेशवान्‌ जीव और परमात्मा है बुद्धि और 
जीव नहीं. इति ॥ १२॥ 
. अब०-छांदोग्यके चतुर्थ प्रपाठकर्में यह कहा है कि कोई उपकोशलर ब्रा- 
हाण सत्यकाम ब्राह्मणका शिष्य था, सो सत्यकाम उसको अप्रियोंकी सेवारमें 
छोडकर देशांतरमैं चलागया. तांकी सेवासें अभ्नियोंने प्रसन्न होकर यह उपदेश 
किया । “प्राणों न्नक्म क॑ त्हा खं ब्रह्म इति? आगे यह उप्रकोशछका प्रश्न 
है। “से होचाच विजानासि अहं यत्‌ प्राणा ब्रह्म कं चतु खंचन 
विजञानामि इति” । आगे यह अग्नियोंने उत्तर कहा है। “ते होछुः यबा- 
वे क॑ तदेच ख॑ यदेव ख॑ तदेव कम्‌ इ॒ति | प्राणं च ह अस्मे त्दाकाईं 
चोचुः इाति” इनके आगे और उपदेश किया है, अंतर्में यह कहा है--“ति ह 
ऊचु। उपकोशलक एपा सोम्य ते अस्मत्‌विद्या आत्मविद्या च आचा- 
थैस्तु ते गति चक्ता इति” इनका यह तात्पर्य है कि हे उपकोशछ ! प्राण 
१ अभ्िविद्या, २ “आणो ब्रह्म क॑ तरहम ख॑ त्रह्म इति” - 





८ ह ब्रद्मसून्राणि [अ० १ पा० २ सू० १५] 


ब्रह्म है, क॑ अहम है, खे ब्रह्म है. इति | उपकोशलने कहा जो प्राण ब्रह्म है सो 
मैं जानता हूँ, क॑ और ख॑ को नहीं जानता हूँ. इति। अश्नियोने कहा जो क॑ हैं 
सोई ख॑ है, जो खं है सोई क॑ है। भ्राणणो और आकाशको उपकोशर प्रति 
कहा इति। अंत अप्नियोंने कहा कि हे सोम्य ! उपकोशल ! तुमको अस्मत- 
विद्या और आत्मविद्या कही है और आचार्य तुम्हारे प्रति गतिको कहेगा 
इति | जब आचाये आया तव उसने यह उपदेश किया है कि । “४ थ एपो- 
उक्षिणि पुरुषो द॒इयते एप आत्मा इति होवाच एतत्‌ अम्बतम्‌ अभयम्‌ 
शएतत्‌ ज्रह्म इति” अथ--जो थह पुरुष नेत्रोंमें शाख्रहश्िसिं दिसे है, 

यह आत्मा है. यह अमृत अभयरूप है; यही बभह्म है. इस विपयवाक्यम जो 
: है सो परमात्मा है वा पतिविंवादिक हैं? दृह्यते कथनसे नेन्नस्थानवान्‌ प्रतीत 
होवे है, किंतु व्यापकका नेत्रस्थान कहिना संभवे नहीं, यह पूर्यपक्ष है; इसका 
सूत्रकार समाधान करे हैं-- 


अन्तर उपपत्तेः ॥ १६॥ 
अन्तरः । उपपत्तेः । इति प०। 
अथ-उक्तवाक्यमें आत्मत्व अमृतत्व अभयत्वादिक जे गुण कहे हैं ते 
परमात्मामैं ही उपपत्तेः नाम संभवे हैं अपर में नहीं यातें नेन्नोंक अन्तगत जो 
पुरुष कहा है सो परमात्मा है, जीव नहीं. इति । पूर्वपक्षमें उक्त अधिकरणका 
प्रतिबिंवउपासना फल है, सिद्धांतमें तह्मरपासना फल है. इति ॥ १६ ॥ 


स्थानादिव्यपदेशाच ॥ १४ ॥ 

, स्थानादिव्यपदेशात्‌ । च । इति । प० ॥ 

अथे-“यश्वक्षुषि तिषछठन, चक्षुषोडन्तरों ये चछुने चेद्‌ थस्प चछुः 
छारीरे या चकछ्ु! अन्तरो ययति एच त आत्मा अन्तयोमी अख्ूतः 
इत्यादिक वाक्यनसें बृहदारण्यकके षछ् अध्यायमें नेत्रादि स्थान परसेश्वरके 
प्रसिद्ध प्रतीत होवे हैं. आदिपदसें हिरण्यर्मश्रु आदिका भ्रहण है. तिससे रूपवत्व 
.भी उपासनाके अथी प्रतीत होवे है; यांतें परमात्माके अल्प स्थानादिकोंका क- 
थन करणेसें नेज्रोंमं उपास्य पुरुष परमात्मा है, जीव नहीं. ॥ १४ ॥ किंच:-- 


सुखविशिष्टामिधानादेव च॥ १५॥ 
सुखविशिष्टाभिधानात्‌ । एव ।च । इति प०। «., 
अयै-प्रथम्त अप्लियोंने उपदेश किया तो उपकोशलने कहा क॑ खंकों “हमे 


[अ० १.पा० २ सू०१७] भाषाटीकासहितानि । १९ 


नहीं जाने हैं; पुनः अश्नियोंने कंखंका अभेदकरके उपदेश किया. कंपद विषय- 
जन्य खुखका वाचक है, खंपद आकाशका वाचक है, यांते परस्पर भेदके प्रास 
हुएसे कंखेंके अभेदका उपदेश किया है। यातें सुखविशिष्टके अभिधानसेंभी 
: नेन्नोंमें उपास्थ परमात्मा ही अंगीकृत है, जीवादिक नहीं. इति ॥ १५ ॥ किंच। 


श्रुतोपनिषत्कगट्यमिधानाच ॥ १६ ॥ 


श्रुतोपनिषत्तगग्भिधानात्‌ । च्‌ । इति प०। 
अथ-श्रुत नाम श्रवण किया होवे ब्रह्मविद्या जिसने सो श्रुतोपनिषत्क 
कहिये है, ताकी जो गति नाम अश्निमार्ग तिस मार्गका तहां विधान किया है 
यातें नेत्रोंमें जांका उपदेश किया है सो परमात्मा है, प्रतिबिंबादिक नहीं. जो. 
मार्ग बह्मउपासकका कहा है, सोई मार्ग नेत्रगत उपासकका कहा है. इति 
तात्पयम्‌ ॥ १६ ॥ किंच-- 


अनंवस्थितेरंसम्मवाच नेतरः ॥ १७॥ 


अनवस्थितेः। असम्भवात्‌ । च । न । इतरः । प०। . 
अ्थ-नेत्रोंमें जो उपास्य पुरुष कहा है सो इतर नाम छायापुरुष नहीं. जो 
तांको छायारूप मानेंगे तौ नेत्नोंमें छायाका संपादक जो विंबरूप पुरुष तिस 
उपासक पुरुषका अनवस्थान होवेगा; उपासकको उपास्यरूप माना है यांते 
डपासकका अभाव सिद्ध होवेगा. वा प्राज्ञका सुसिमें अनवस्थान नाम अवि- 
थमानता सिद्ध होवेगी. इति तात्पर्यम्‌। और अमृतत्वादि गुण छायामें संभवेंभी 

: नहीं, यातें भी नेत्रोंमें उपास्म पुरुष परमात्मा है. इति सिद्धमू ॥ १७॥ 


अच०-बृहृदारण्यकके पंचम अध्यायमें यह वाक्य हैं। “य इस च लोक 
पर॑ च लोक॑ सर्वाणि च भूतानि यो5न्तरो' यमयति। तम्‌ अन्तयामिर्ण 
ब्रूहि इंति। यः एथिव्यां तिष्ठन्‌ शथिष्या अन्तरों ये एथिवी न वेद 
यस्य एथिवी झारीरं यः शथिवीमन्तरों थमयाते एथते आत्मा अ- 
, न्तयीमी अस्तः)। योउ्प्छु० । योउ्म्नौ० | योन्तरिक्षे० । यो वायौ०। 
यो दिविभय आदिल्ये०। यो दिख्छु ० यश्रन्द्रतारके ० । थ आकाशे०। यस्त- 
मसि०। यस्तेजसि० य; सर्वेघु०। यः घाणे० यो वाचिण यश्वक्षुषि०| यः 
ओजे० । थो सनसि०। यस्त्वाचिण। यो विज्ञानेण यो रेतसि लिछन्‌ रेत- 
सोइन्तरो य॑ रेतो न वेद्‌ यस्प रेत: झआरीरं यो रेतोडन्तरों यम्यति 


छ्० ब्रह्मसूत्राणि । [अ० १ पा० २सू० १८] 


शव ते आत्मा अन्तयोमी अखतः। अदृछो द्ृष्ठा अक्षतः ओता अमतो 
झनन्‍्ता अविज्ञातों विज्ञाता नाउन्योड्तोडस्ति दृष्टा नान्योडतोड्स्ति 
आओतए7 नान्यीउतो5स्ति सनन्‍्ता नत्न्योडत्तोडस्ति विज्ञाता एप त आत्मा 
अन्तयोौभी अस्त | अतोइन्यदात ततो ह उद्दालक आरूणि; उपर 
रास इति * - 
अथे-उद्दालकने याज्ञवस्क्यसें हा था कि इसछोक परलोकमें जो सर्च 
भूतनको अँत्तर स्थित होय प्रेरणा करे है सो कहो. याज्वल्क्यने कहा जो पएथि- 
वीमेँ स्थित हुआ पृथिवीके अंतर है, जांको प्थिवी नहीं जाने है,जांका एथिची 
शरीर हैं, जो पृथिवीके अंतर प्रेरणा करे है, सो तुम्हारा आत्मा है. सो अंतयोमी 
«है. सो अमृत है. इसी प्रकार जलादिकोंसें भी रेतपयत जानना चाहिये. जो रेत- 
सको अंतर प्रेरे हैसो तुम्हारा आत्मा है, अमृतरूप है.सोई द्वष्टा है, ओता है, 
मंता है, विज्ञाता है, तांस अल्य कोई द्रष्टा नहीं, श्रोता नहीं, मंता नहीं, विज्ञाता 
नहीं. यह तुम्हारा आत्मा भंतर्यामी अमृतरूप है, इससें अन्यत्‌ आते. है. यह 
सुनकर उद्दालक उपरामको प्राप्त हुए. इति। तहांही आगे विदग्धके अक्षमें यह 
वाक्य है। “एथिवी एवं यस्य आयतनम्‌ अप्रिलोक! भनो ज्योति: यो 
दै ते पुरुष विद्यात्‌ स्ेस्य आत्मन! परायर्ण स वे वेदिता स्पात्‌ इत्ति” 


अथे-प्रथिबी आयतन नाम जाका शरीर है, अधि जांके छोक नाम नेत्र 
है, मन ज्योति है,तिस पुरुषको जो जाने है सो वेदिता अथोत्‌ पण्डित होवे है. 
इति। तहां यह संदेह है कि उक्त वाक्यमैं जो अंतयामी कहा है सो कोई देवता 
है वा कोई योगी है वा परमात्मा है! इति। तहां यह पूर्चपक्ष है. विद्ग्धप- 
क्षमें शरीर श्रवण हुआ है यातें देवता वा योगी अन्तयोमी है, परमात्मा अश- 
रीर होनेके कारण अंतर्यामी नहीं. इस पूर्वपक्षमें यह सूत्रकारका उत्तर है-- 


अन्तयोम्यधिदेवादिषु तदमंव्यपदेशात्‌ ॥ १८ ॥ 
अन्तयौम्यभिदेवादिषु । ततधर्मव्यपदेशात्‌ इति प०। 


अथे-पूर्वविपयवाक्यमें तत्‌ नाम परमात्माके जे घ्म ते व्यपदेश नाम कथन 
किये हैं यातें अंतयोसी अधिदेबादिक वाक्यनमें सुना जो अंतयोमी सो परसा- 
व्माहीहै,योगी वा देवता नहीं. क्योंकि सर्च॑अंतर्यामित्व अम्तत्व जात्मत्वादि जे घर्म 
ते परम त्माके ही असाधारण घम हैं, अपरके नहीं, यथपि शरीरबिना प्रेरकता 


[अ० | पां० है सूं० २० ] भाषाटीकासहितानि । 9१ 


_संभवे नहीं तथापि नियम्य शरीरसे ही तांको निय॑तृत्व संभवे है; थातें परमा- 
त्माही अंतर्यामी है, अपर कोई नहीं. इति ॥ १८ ॥ * 
_ अवतरणिक्ता--प्रधान अंतर्यामी नहीं यह कहे हैं। 


(्‌ः 
न च स्मार्तमतडर्मामिलापात्‌॥ १९ ॥ 
न। च। स्मातंम्‌ । अतद्धर्माभिलापात्‌ । इति प०।. 

अधै-ततपदसे प्रधानका अहण हैं, नहीं जो होवे तत्‌ सो अतत्‌ कहिये है 
अर्थात्‌ परमात्माका भहण है, तिसके जे धर्म द्ृशदिक तिन धर्मनका अमि- 
छाप नाम कथन किया है यातें समा नाम सांख्यस्मृतिकल्पित जो प्रधान सो 
अंतर्यामी शब्दका वाच्य नहीं. इति ॥ १९॥ 

अव०-योगी भी नहीं यह कहे हैं-- 


शारीरश्रोमयेषपि हि भेदेनेनमधीयते ॥ २० ॥ 


शारीरः। च। उभये। अपि । हि। भेदेन। एनम्‌। अधीयते। इति। प० 

अशै--योगीमी अंतर्यामी नहीं यह निषेध पूर्वले सूत्सें नकारकों लेकर है, 
तहां हेतु कहे हैं कि उसमये नाम उभय शाखामें एनम्‌ नाम परमात्माको भेदेन नाम' 
भिन्न करके अधीयते नाम शाखावान्‌ ब्राह्मण कहे हें । एक तो “यो विज्ञाने 
तिष्ठन्‌ विज्ञानमन्तरों यमयाति ” यह वाक्य पूर्व कह दिया है। दूसरा यह 
है-..यश्वात्मनि तिछन आत्मानमन्तरों यमयति इति ” उभयवाक्य- 
नमैं नियम्यनियंत्रूपसे जीवपरमात्माका भेद कथन किया है; यातें अंतर्यामी 
अधिदेवादिवाक्यनमैं अंतर्यामी परमात्माही कहा है, जीवादिक नहीं. इति ॥२०॥ 

अव०-मझुंडकके आरंभम यह कहा है कि सर्वदेवनसें प्रथम विश्वका करता 
ब्रह्मा हुआ. तांका ज्येष्ठ पुत्र अथवा था. तिस पुत्रके प्रति ब्ह्माने बह्मविद्याका 
उपदेश किया था. सो विद्या अथर्वाने अंगिराकों कही; अंगिराने भारद्वाज अ- 
थांत्‌ भरद्वाजगोत्रवान्‌ सत्यवहके प्रति उपदेश किया और भारद्वाजने अगि- 
राको पर और अपर विद्या दिया. तब शौनक ऋषिने अंगिराको विधियें 
आंघ होकर पूंछा--/“कस्मिन्‌ छु भगवो विज्ञाते सवेमिद्‌ विज्ञार्त भव- 
ति हाति ” अंगिराने कहा कि दो विद्या जाननेयोग्य- हैं, एक पर है एक 
अपर है. ऋगवबेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्वबेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, 
छंद, ज्योतिष, यह अपर विद्या है. आगे थ्रह पर विद्या कही है “अथ परा 

न्नह्म. ६ 


हरे तद्ययूत्राणि । [अ० १ पा० २ शू० २१) 


घया तद्क्षरम्‌ अधिगम्यते। यत्‌ तत्‌ अद्ेश्यम्‌ अग्राय्मम्‌ अगोचम्‌ अ- 
चर्णमचशुःओज तदपाणिपाद निर्ल विस सबंगत खुसक्ष्म तदव्य्य 
यत्‌ भ्रूतयोरनिं परिषश्यन्ति घीराः ? । ॒ 
अथ--अपरविद्यास अनंतर जिस विद्याकरके तिस अक्षरको जाने हूं सो 
विद्या परा नाम सर्वसे उत्तम फलवती है. सो अक्षर वर्णरूप नहीं, ज्ञान और 
कर्म इंद्रियोंका विषय नहीं, अगोत्र नाम चंशरहित है अबणे नाम जातिसे 
रहित है. अचछ्षश्रोत्र नाम आंख, कान आदि ज्ञानेन्द्रियोंस रहित हैं, 
हस्तपादोंस रहित है. नित्य विभु है. सर्वेगत नाम सर्वकल्पनाका अधिष्ठान 
है. अतिसूक्ष्म है. नाशरहित है. जो सर्वशभूतवका योनि नाम कारण है. जा 
उक्त स्वरुपको जिस विद्याकरके घीर पुरुष देखें हैं; सो विद्या सर्चसे उत्तम 
है. उक्त घाक्यके आगे यह वाक्य है। “था स्ेज्ञ। सर्वेवि्स्थ ज्ञानमर्य 
लपः । तस्मात्‌ एतत्‌ ब्रह्म नास रूपमत्त च जायते इति” बह्मपंदका 
अर्थ हिरण्यगर्भ है. आगे द्वितीय झुंडकमें यह कहा है कि---“ द्व्यों हि अ- 
पूतेः पुरुष: सवाह्याभ्यन्तरो छजः। अप्राणो छमनाः शुओ हि अक्ष- 
रात्‌ परत! परः | एतस्मात्‌ जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च। ख॑ँ 
वायुज्योतिरापः एथिवी विश्वस्य धारिणी इति ” दिव्य नाम स्वय॑प्रका- 
शका है, अमू नाम निरवयवका है; वाह्य नाम कार्यका हैं, आभ्यंतर साम का- 
रणका है, तिसका अधिष्ठान होनेसें सवाह्माभ्यंतर कहा है. अज नाम कूटर्थका है. 
अक्षरपदसे शक्तिका अहण है तासें परे है. इति। उक्त वाक्‍्यके आगे यह वाक्य 
है। “ अग्रिस्ेंद्ो चछुषी चन्द्रसुयों दिदाः ओजे चाग विध्वताश चेदा। । . 
चायु! पराणो हृदय विश्वस्‌ अस्प पत्यां शथिवी ह्ोष सर्वेस्रतान्तरात्मा 
इति ” विदृता) नाम विस्तारवान्‌ वेद जाकी वाणी है, पृथिवी जाके पाद हैं, 
उक्त अँगोवाछा जाका शरीर है सो सर्बके अंतर है. सर्वका आत्मा है. इति | 
प्रथम श्रुतिमें अद्श्यत्वादि ग्रुण कहे हैं, तत्गुणवान्‌ सर्वका कारण प्रधान है- 


वा जीव है वा परमात्मा है! यह तहां संशय है. पूर्वपक्षमं प्रधानके गुण अंगी- 
कार कियेसें यह सिद्धांत है-- 


अच्श्यवादिशणको धमोंक्तेः ॥ २१ ॥ 
अहृश्यलादिग्ुणकः । धर्मोक्तेः | इति प० ॥ २१॥ 


७ अथेः 5 प धर्मनको हि ३ 
-ईश्वरके धर्मनको भूतनके कारणमैं कथन किया है यांते अहृश्यत्वादि- 
गुणवान्‌ भूतनका योनि परमात्मा है, प्रधानादिक नहीं। “थः स्ेज्ञ!” जा 


[अ० १ पा० १ सू० २३१] भापाटीकासहितानि | 8३ 


उक्त श्रुतिमें सर्वज्ञता आदिक भूतनके कारणमें कहे हैं यांते प्रथम वाक्यमैं 
परमात्माका थ्रहण है, प्रधानादिकका नहीं. इति ॥ २१ ॥ 


विशेषणमेदव्यपदेशाभ्यां च नेतरो ॥ २२ ॥ 
विशेषणभेद्व्यपदेशाभ्याम्‌ । च । न | इतरों | इति प० । 


अथ-पूर्ववाकंयम दिव्यत्वादिक विशेषण कहे हैं और शक्तिसें परमात्माका 
भेदभसी कहा है यांते विशेषणोंस और भेदकथनसे अदृश्यत्वादिगुणवान्‌ 
परमात्माका तहां अंगीकार है, तांसे इतर जे जीव और अधान ते अदृश्यत्वा- 
दिगुणवान्‌ नहीं. इति ॥ श* ॥ 


किंच--- 
० 
रूपपिन्यासाच ॥ २३ ॥ 
| रूपोपन्यासात्‌ । च । इति प०। 

अथ-पूच “अश्निसूद्धा ' जा वाक्यमें सबबंकायरूप शरीरका उपन्यास किया 
है, यांते तहां भ्रृूतनका जो योनि कहा है सो परमात्मा है, अ्रधानादिक नहीं, 

इस सूत्र भी निषेध पूव्े सकारसें है, इति ॥ २३ ॥ 
अच०-छाँदोग्यमं यह प्रसंग है कि आचीनशाल, सत्ययज्ञ, इंद्रयुश्न, जन, 
बुडिक, जा पंच ऋषियोंने मिलके विचार किया कि आत्मा कोन है? और ऋह्म 
कोन है? सो उन्होंने विचारा कि उद्दालक वेश्वानर आत्माकी उपासना करे है 
तहां चलें, फिर मिलकर उद्दाछकके पास गये- उद्दाऊकने विचारा कि हमसे य- 
थावत्‌ नहीं कहा जायगा यांते अपरके पास छेजावें, अतएव उद्दालकने कहा कि 
केकेयनाम राजा वैश्वानर आत्माका चिंतन करे है सो चलो उसके पास चलें, 
तब उद्दाऊकसहित वे ऋषि राजाके पास गये ओर राजासें कहा कि जिस चे- 
ख्वानरका चिंतन करो हो सो हमको कहो» तब प्रथम राजाने कहा कि तुम सब 
किस बैश्वानरकी उपासना करो हो? तो प्राचीनशालने कहा हम स्वगेरूप आत्माकी 
डपासना करे हैं. सत्ययज्ञने कहा आदित्य वेश्वानर है. इंद्रचुश्नने वायुको कहा- 
जनने आकाशको कहा, घुडिलने जरूकों कहा, उद्दालकने प्रथिवीकों 
बेश्वानर कहा, उक्त पट्ककी निंदा कर राजाने यह उपदेश किया कि । “यस्तु 
एतसेच॑ प्रादेशमाजम अभिविसानम्‌ आत्मानं वेश्वानरम उपासते 
स सर्वेषु छोकेसु सर्वेषु भतेषु सर्वेष्ु  आत्मस अजन्नम्‌ अत्ति इति” 
थै--जो उपासक इस आदेशसात्र अभिविमान वैश्वाजर आत्माक्ी उपा- 


9४ ब्रह्मतन्नाणि । [अ० १ पा० १ सू० २६] 


सला करे है सो उपासक सर्वडोकनमें, सर्वभूतनमें, सर्व आत्मामें अन्नको खाते 
है। सर्व विश्वको जानता है यांते वैश्वानरका नाम अभिविमान है. छोकपदर्स 
भोगभूमिका ग्रहण है, आत्मापदर्स भोक्ता चेतनका अहण ह. इति | आगे यह 
कहा है कि तिस वैश्वानरका स्त्रगे शिर है, चक्ष सूथ ह, वायु प्राण ह, आकाश 
भध्यभाग है, जरू बस है, पृथिवी पाद हैं, बेदी उर है, वहिं छोम हैं, गाहेपत्व 

हृदय, अन्वाहार्य मन है. आहवनीय मुख है. इति | उक्त वाक्‍्यमें यह संद्ह है 
कि चैश्वानरपद्‌ जठराभिका या सामान्य अप्रिका या अश्निज्वरीरवान्‌ देवता- 
का या परमात्माका वाचक है, और वेश्वानरपदस तहां किसका अहण हे? पू्वे- 


पक्षसें असिद्धिके चलूस जाठरादि अहण कियेसें यह भगवान्‌ सून्कारका सं“ 
समाधान है*-- 


वैश्वानरः साधारणशब्दविशेषात्‌ ॥ २४ ॥ 
वैश्वानरः | साधारणशब्दविशेषात्‌ । इति प०। 
-साधारण शच्दोंसें कुछ विशेष है यात॑ वम्धानरशव्दर्स तहां परमात्माका 
भ्रहण है जाठरादिकका ग्रहण नहीं. तथाहि जाठर १, सामान्य २, देवता रे, जा 
बैश्वानर शब्द साधारण है अर्थात्‌ जा त्रयका घाचक है और आत्मा शवद्‌ 
जीव परमात्मा उभयमें साधारण है अथात्‌ उभयका वाचक है तिल दोनो शब्द- 
नको साधारण तिनके वाचक हुयेभी परमात्मवो धकत्व विशेष प्रत्तीत होवे है थाते 
वैश्वानर परमात्मा है. ताको परमात्मा सानेंगे तो उक्त अंग बनेंगे, जो जठराश़ि 
मानेंगे तो उक्त अंग नहीं घनेंगे; यातें वैश्वानर परमात्माही है. इति ॥ २७ ॥ 


किंच+-- 
स्मयमाणमनुमानं स्यथादिति ॥ २५॥ 


सर्येमाणम । अनुमानम्‌ । स्थात्‌ । इति इति प०। 
अधथ-वैश्वानरपदसे परमात्माका अंगीकार कियेसें स्मर्यमाण नास स्मृति- 
उक्त जो अनुमानलिंग सो सिद्ध होवेगा. 'जाका अग्नि मुख है, स्वर्ग शिर है, 


आकाश नाभि है, चरण हैं, सूर नेत्र हैं, दिशा ओज हैं, तिसके प्रति चंदना 
हो! इस स्मृतिका है सूर है; यातें स्मृतिसें वैश्वानरकथनसें ततमूल 
अुत्िमें सोई मानना चाहिये. इति ॥ २५ ॥ 


शब्दादिभ्योडन्तःप्रतिष्ठानाच नेति चेन्न तथादृष्टचुप- 
देशादसम्भवात्युरुपमपि चेनमधीयते ॥ २६ ॥ 


[ अथ० १ पा० २ सू० २८ ] भाषाटीकासहितानि । श्षू 


शब्दादिभ्यः । अन्तश्रतिष्ठानात्‌ । च। न। इति। चेत्‌ । न। तथा। 
इृश्युपदेशात्‌ । असम्भवात्‌। जप । अपि। च। एनग्‌। अधीयते । 
प्‌०। 

अथ-नह चेश्वानरशब्द जठराप्मिमें रूह है और गाहपत्वअप्निको हृदय 
कहा है इत्यादि अश्निकल्पनाका आदिपदसे अहण है. किंच अंतःप्रतिष्ठानात्‌ 
नाम “पुरुष अन्तः प्रतिष्ठित चेद” इत्यादिक वाक्यनसें अंतःस्थित सुना 
हैं यातें वेश्वानर परमात्मा नहीं किंतु जठराप्ति है, जा शंकाका आधे सूचसे स- 
साधान करें हैं. तथा नाम जठराशिरूप्स परमात्माकी दृष्टि नाम उपासनाका 
उपदेश किया है, जठरामिका नहीं. जो जठ्राप्रिकोही मुख्य वैश्वानर मानेंगे 
तो सूर्यादिक अंगनका जररापिमें असंभव पूव कहिदिया है यातें मुख्य जठ- 
राप्ति नहीं और इस वैश्वानरको कोई आचार्य पुरुषशब्द्से भी कहे हैं यातें 
वेश्वानर परमात्मा है, जठराष्यादिक नहीं. इति ॥ २६ ॥ 


अतएव न देवता भूत॑ च॥ २७॥ 
अतः । एवं । न | देवता । भूतम्‌ । च। इति प०। 
अथै-अतः नाम पूर्व कहे जे हेतु तिनसें देवतास्तररूप और भूतस्वरूप 
अग्नि वैश्वानर नहीं, भूतस्वरूप जो अभि सो .वैश्वानरका सुख कहा है; यातें 
उसीको वैश्वानर कहिना संभवे नहीं. ओर देवतास्वरूप जो अभि सो शेखरा- 
धीन है यातें तांके भी सूर्यादिक अंग संभवें नहीं; यातें सपेरूप जो परमात्मा 
सो वैश्वानर है. जठराइ्यादिक नहीं | २७ ॥ 


क्षादप्यविरोध॑ जैमिनि 
सा :॥ २८॥ 
..साक्षात्‌ । अपि। अधिरोधम्‌ । जैमिनिः । इति प०। 

अधथ-पूर्व जठरास्युपाधिक ब्रह्म उपास्य सिद्ध किया है वा जठ्रामि- 
प्रतीक भह्य उपास्य कहा है. किंतु, जैमिनि आचार्य साक्षात्‌ नाम प्रतीकोपाधिक- 
व्पनाविनाही परसात्साकी उपासनाके अंगीकार कियेसें विरोधका जमभाव मा- 
नेहें। वैश्वानरको जह्म सिद्ध हुए वैश्वानरपद्को और अपिपदको कैसे अह्मका 
वाचक मानना उचित है. तथाहि- विश्वश्वायं नरञ्व विश्वानरः विश्व होवे 
सोई सर सो कहिये विश्वानर अर्थात्‌ सर्वस्वरूप होनेसें जह्मका नाम विश्वानर 
है, वा *विश्वेषां नर! विश्वानरः ' अथांत्‌ सबेका कारण होनेसे बहाका नाम 





- प * नरे संशायास्‌। ६ ३१ १२९ ? इति सूज्ेण दीघेता । 


9६ ब्रह्मसूत्राणि । [अ० १ पा० २ सू० ३२ ) 


विश्वानरहै, वा (विश्वे नरा नियम्धा अस्प हाति विश्वानरः ! अथोत्‌ सर्बका 
ईश्वर होनेसे ब्रह्मका नाम विश्वानर है. विश्वानरः एव वैश्वानर१ इस प्रकार 
बैश्वानरपद अहमका वाचक है. सर्वसें जो आगे होवे सो अग्नि कहिंये है. इति। 
यातें बैश्वानर परमात्मा उपाधिविना उपास्य अंगीकृत है. इति ॥ २८ ॥ 


अमभिव्यक्तेरियाश्मर थ्यः ॥ २९ ॥ 
अभिव्यक्तेः । इति । आश्मरथ्यः । इति पृ०। 
यचपि वैश्वानरकों परमात्मा मानेसे तांको आदेशमात्र कहिना संभवे नहीं, 
तथापि उपासकोंके अनुद्यहार्थ व्यापक परमसात्माभी हृदयादिस्थानविपे प्रादेश- 


परिमाणत्वरूपसें अगट होवे है; यातें प्रादेशमात्र कहिना संभवे है, यह आइमरथ्य 
आचाय माने हैं. इति ॥ २९॥ 


अतु॒स्मतेबोदरि! ॥ ३० ॥ 
अनुस्मतेः । बादरिः । इति प०। 
अध-आदेशमात्र जो हृदयपक्म तिसमें स्थित जो मन तिसकरके ध्यान 


करणेसें वैश्वानरको प्रादेशमात्र कहा है, इस प्रकार वादरि आचार्य मानेहें. यथा 
प्रस्थपरिमित तंडुछ प्रस्थ कहिये हैं. इति ॥ ३० ॥ 


सम्पत्तेरिति जैमिनिस्तथाहि दरशयति ॥ ३१ ॥ 
सम्पत्तेः । इति । जैमिनिः । तथाहि । दशयति । इति प०। 
अथ-शिरसे चिबुकतक प्रादेशमात्रमें वैश्वानरको उपास्य कहा है, यातें 
- परमेश्वरको प्रादेशमात्रत्व सिद्ध है; तिस प्रादेशमात्रकी संपत्ति नाम सिद्धिसें 
प्रादेशमात्रवोधक श्रुति सफर है. इसप्रकार जेमिनि आचार्य माने हैं. तथा हि 


४ भादेशमाच्मिह देवता: रुविद्ता' इत्यादि” अपर अ्रुतिभी वैश्वानरको 
आदेशसाज्नकी प्राप्ति दशेयति नाम दिखाये है. इति ॥ ३१ ॥ 


आमनन्ति चेनमस्मिन्‌ ॥ ३२॥ 
आमनन्ति । च। एनम्‌ । अस्मिन्‌ । इति प०। 
ह जा ९-३३३ ३ एनम्‌ नाम परसेश्वरकों अस्मिन नाम प्रादेशपरिणास- 
कह आकर यातें प्रादेशमातवोधक झऋुति सफल है. ज्ूघाणोंकी जो संधि है 
सो स्तर ओर ब्रह्मलोककी संधि है, जाबिध मानके सन्‌ और पाणोंके स- 


[ अ० १ पा० ३ सू० १] भाषाटीकासदहितानि । 9७, 


थ्यमैं वैश्वानरका ध्यान करे यह अंगीकार किया है; यातें वैश्वानर परमात्मा 
है. इति सिद्धमू ॥ ३२॥ 


इति सूत्रभावश्रकाशिकासाषादीकायां प्रथमाध्यायस्य द्वितीयः पादः समाप्त: ॥ १ || 


अथ तृतीयपादप्रारम्भः । 


इस पादके तीन अधिक चालीस सूत्र हैं, तिनमें त्रयोदश अधिकरण हें 
तीस गुणरूप हें. 


तथाहि-- 
सूत्रसंख्था । अधिकरण । गुण प्रसद्ध- 
५ आ० ने आयतनबिचार- 
२ ने शु० आ० 
4; न गु० . आ० 
छठ ++ गु० आ० 
3 न गु० आ० 
्ट्‌ न गु० आ० 
७ न॑- गु० आ० 
< अ० न भूमाविचार- 
ढ्‌ न गु० भू० 
१७० आ० न अक्षरविचार- 
१५ न- शु० आ० 
श्र नः शु० ० 
श्द्‌ आ० + ध्यातव्यविचार, 
श्छ आ० + दहरविचार- 
श्ष न गु० ०८ 
श्द्‌ नः झु० दु० - 
श्छ न गु० द्व० 
श्८ न शु० द० 
१९ न शु० ढ्‌० 
२० रन शु० द्० 


३८ अक्मसज्ाणि । [अ० १ पा० ३ सू० १] 





२१ न झु० हर वेजोबिचार 
श्ु्‌ अ० न जोबिचार. 
श्श्‌ न शु० जे० 
श्छ अ० नः अद्जुष्टमात्रविचार. 
श्ण्‌ +ः शु० आ० 
श्दृ अ० + देवताविद्याधिका० 
श्७ न शु० दे ७० 
7 भ८ट न शु० दे० 
२९ न गशु० दे० 
चर ने शु० दे ० 
5-34 ने शु० दे० 
हर नै शु० दे० 
ह्ड्श्‌ ने शु० दे्‌ ० 
534 अ +ः शूद्रविद्याधिकारविचार- 
कर्ण न गु० झू० 
शक नै गु० श० 
ड््७ न झु० जू० 
श्८ न गु० शू० 
डरे अआ० न प्राणविचार. 
98 अ० +ः ज्योतिर्विचार. 
ड१ ञ० ध् आकाशविचार. 
हि आ० ने वाक्यसमूहविचार- 
डरे + गु० चा० 
हर श्इृ ड्० 


५, अच०-पूर्वले पादमें त्रेलोक्यस्वरूप वैश्वानर परमात्मा है यह अर्थ कहा 
है; तांको तैोक्यस्वरूप सानेसें तांका आसरा अपर कोई होवेगा जा शांकासें 
भगवान्‌ सूत्रकार उत्तरसूच्रका आरंभ करें हें:-तहां पूर्वपक्षमं प्रधानादिकोंकी 
उपासना फल है, सिद्धांतमें अह्मज्ञान फल है, अथर्वण उपनिषद्‌ द्वितीय 
मुंडकमें अना हैं, कि- “प्रणवों धन्तुः शारे हि आत्मा अहम तल- 
शपडच्चते । अप्रमत्तेन वेडव्यं शारत्रत्‌ तन्‍्मयो भवेत ॥ यस्मिन 


[ज० १ पा०३१सू० २] भांपाटीकासहितानि | 9९ 


रे हे प्थिवी' हर आते लक 
यो शथिवी' चान्तरिक्षम्‌ ओत सनः सह प्राणैश सचें: । तमेचैक॑ 
रस बा 
जानथ झात्मानम्‌ अन्या वाचों विम्ुश्चथ अस्ृतस्थ एप सेतु) इति ” 
अधथ-ऑंकार 3 आत्मा ्े श्ड ५० अप 
आकार धल्ुप है, आत्मा शर है, बह्म लक्ष्य है, शो अप्रमत्तकरके बेधने 
योग्य है; सो वैधकरके शरकी नांई रक्ष्यरूप होवे। जांमें स्वर्ग प्थिवी अंतरिक्ष 
यह ओत नाम कल्पित हैं और मनसहित सर्व इंद्रियांभी कस्पित हैं, तिस एक 
आत्माको तुम अधिकारी जानो. अपर वाचाका त्याग करो. यह जमृतकाः 
तु हूं अर्थात्‌ कायंसहित अविद्याकी निदृत्तिर्प अम्ृतका सेतु नाम साधन 
ञ्े ५ रु कोई होबहै: डे 2, 
है. इति। उक्तवाक्‍्यमें ओतकथनसें कोई आयतन प्रतीत ५; सो प्रधान है 
आर ्े ब्कः ५. संदेह पूर्वपक्षमें अंगी. 
था चाय है वा जीव है वा भक्म है यह तहां संदेह है. पूर्वपक्षमं प्रधानादि अंगी- 
कार कियेस यह सिद्धांत है।-- 


युभ्वायायतनं खशब्दात्‌॥ १॥ 
युभ्वाद्यायतनम्‌ । खशब्दात्‌ । इति पृ० । 
अथ-तहां विषयवाक्यमें आत्माशब्द सुना है सो आत्माशव्द स्वनाम अ- 
हक्का बाचक है, यातें स्वर्ग भू आदिकोंका आयतन नाम आसरा ब्रह्म है. 
प्रधानादिक नहीं. इति॥ १॥ 


मुक्तोपस॒प्यव्यपदेशाच ॥ २॥ 
मुक्तोपसूप्यव्यपदेशात्‌ । च । इति प०। 

अथ-सुक्तपुरुषको जो उपसरृप्य नाम प्राप्तियोग्य सो उत्तरवाक्यमें कहा 
है; यातें सर्वका आयतन ब्रह्म है, अपर नहीं. इति। तथाहि पूर्वश्रुतिके आगे 
सुंडकमें यह वाक्य है। “मिद्यते हृद्यग्रान्थिः छिच्यन्ते स्वेरसंदाया।। 
क्षीयन्ते चास्य क्मोणि तस्मिन्‌ दृष्टे परावरे हति॥ यथा नथयः स्यन्द्- 
भानाः समुद्रे अस्त ग़च्छन्ति नासरूपे विहाय तथा विद्वान नासरू- 
पात्‌ विम्चुक्त; परात्परं पुरुषम्‌ उपैति दिव्यस्‌ इति”” 

अथ-हृदयग्रंथिपदसे मिथ्या ज्ञान रागद्वेषपादिका अहण है. यथा सर्व 
नदी सत्र नाम रूपको त्यागकर समुद्रको प्राप्त होयके समुद्ररूप होकर स्थित 
होबे हैं तथा आत्मवेत्तामी अविद्या्सें रहितहुआ अविद्यार्से परे जो परिपूर्ण 
अखंड एक रस भह्म तिसको स्वस्वरूपकरके आप्त होवे है. इति। इस उत्त 
अ्रुतिमैं मुक्तको प्राप्य जह्म कहा है यातें पूर्ववाक्यमें जो आयतन कहा है सो 


ब्रह्म है, अपर नहीं, इति ॥ २ ॥ किंचः--- 
नह ० ७ 


७० श्रेद्यवृत्नाणि । [अ० १ पा० शसू०७] 


नानतुमानमतत्छब्दात्‌॥ ३॥ 
न । अनुमानम | अततशब्दात्‌ | इति प०। 
अभै-अजुमानपदसे अलुमानगम्य प्रधानका अहण है; तांका घोधक जो 
शब्द सो ततशब्द अंगीकार है, नहीं जो होवे भ्रधानवोधक शब्द सो अततशब्द , 
अंगीकार है; अर्थात्‌ प्रधानवोधक शब्द कोई सुना नहीं यातें प्रधान चुभ्‌ 
आदिकोंका आसरा नहीं. इसीप्रकार वायुबोधक शब्दके न झुनेजानेसे ही वायु 
भी आसरा नहीं. इति ॥ ३ ॥ किंच-- 
प्राणरुच ॥ ४ ॥ 
प्राणभृत््‌ | च। इति प०। 
अधै-प्राणभत्‌ नाम प्राणघारी जो जीव सोभी आयतन नहीं. यद्यपि प्र- 
, थम विषयवाक्यमें आत्मशब्द सुना है सो जीववाचक है, तथापि जीवको 
सर्वज्ञतवा और सर्चका आयतनत्व संभवे नहीं; यातें आत्मापद तहां जीवका 
बाचक नहीं. यह निषेध पूर्वले सूतरसें नकारको महण करके है ॥ ४ ॥ किंचः-- 
भेदव्यपदेशात्‌ ॥ ५॥ 
भेदव्यपदेशात्‌ । इति प० । 
अधै-तू अधिकारी तिस एकको जान, जा कथनसे तहां ज्ञाता शेयरुपसें 
सेद कथन किया है; यांते भी प्राणघारी जीव आयतन नहीं, किंतु शेच त्रह्म 
आजयतन है. इति ॥ ५ ॥ किच--- 
अकरणान्च ॥ ६ हे 


हि प्रकरणात्‌ । च्‌। इति प०। 

: आर्थ-किसके जानेसें यह सबे जाना जाय है यह प्रथम झुंडकके भारंभमें 
कहा है; सो जीवके शानसें सवेका ज्ञान सेभवे नहीं यातें प्रकरणसैंभी प्राण- 
घारी आयतन नहीं है. इति ॥ ६॥ किंचः--- 


स्थियदनाभ्यां च॥ ७॥ 


.. _खिलदनाभ्यार । च्‌ । इति प०। 
अये-छंडकके आरंभमें तीसरा यह वाक्य है--“ दवा खुपणों सयुज्ञा स- 
खाया समान दृक्ष॑ परिषखजाते | तयोरन्यः पिप्प्॑ खाबत्ति अनश्ष- 


[अ० १ पा० ३ सू० ८] भाषाटीकासहितानि । ७१ 


चन्यो अभिचाकशीति इति” इस अतिमं जीवको भोक्ता कहा है, ईश्वरको 
अभोक्ता कहा है; यातें स्थिति नाम भोगविना ईश्वरको स्थित होनेंसें ओर अदन 
नाम जीवको भोक्ता होनेसें प्राणघारी जीव आयतन नहीं. इति ॥ ७॥ 


अव०-छादोग्यके सप्तम प्रपाठकके आर॑भमें यह प्रसंग है कि नारदने सन- 
त्कुमारकी कहा कि हे भगवन्‌ ! अध्ययन करावो. सनत्कुमारने कहा जो तुम , 
जानते हो सो कहो, तांसें आगे हम कहेंगे. नारदने कहा कि हे भगवन्‌ ! में ऋ- 
शेदादिविद्या जानता हूं, सो में मंत्रवेत्ताही हू, आत्मवेत्ता नहीं. और हमने 
सुना है “तराति शोकमात्मवित” हे सगवन्‌ ! सो में शोकको प्राप्त हों ! 
हमको शोकसे पार करो- सनत्कुमारने कहा कि ये जे ऋगादिकविद्या तुमने 
अध्ययन किया है सो यह नाम है. नामही ब्रह्म है. तांकी उपासना करो- नार- 
० ञ् कोई चर ० 
दने कहा नामसे भी कोई बड़ा है? सनत्कुमारने कहा वाक्य नामसे उत्तम हें. 
इसपग्रकार वाक्यके आगे मन, मनके आगे संकल्प, तांसें आगे चित्त, तांसें 
ध्यान, तांसें विज्ञान, तांसें चल, तांसें अन्न, तांसें जल, तांसें तेज, तांसें आकाश, 
तांसें समर, तांसें आशा, तांसें आगे प्राणको बह्मरूपकरके उपास्य विधान किया है। 
“ब्राणो वा आशाया सूयान्‌ यथा वा अरा नामौ समपिता एचस- 
स्मिन प्राणे सर्वे समार्पितम्‌ इति” इससे आगे नारदके प्रश्न विनाहीं सनत्कुमा- 
रने सत्यका उपदेश किया, सत्यमें जिज्ञासा हुई तो विज्ञानको कहा, विज्ञानमें 
२034 तो सतिको कहा, मंतिमें अभिलाषा हुई तो अ्रद्धाका उपदेश 
किया, तांमें जिज्ञासा हुई तौ निछाका उपदेश किया, निडठामैं जिज्ञासा हुएसें 
कृतिका उपदेश किया- कैतिसें जिज्ञासा हुई तों खुखका उपदेश किया. सुखमें 
जिज्ञासा हुएसें आगे यह उपदेश किया है--“यो वे भ्रूमा तत्‌ खु्ख नाल्पे 
झुखमस्ति भूमैव खुखं भूमा तु एव विजिज्ञासितव्यः हति” नारदने 
'कहा हे भगवंन्‌ ! भूमाको आप कहो? तब सनत्कुमारने यह उपदेश किया+-- 
“शत्न न अन्यत्पएयति न अन्यत्‌ झणोति नान्यत्‌ विजानाति स 
. श्रूमा” इति । सर्वव्यवहाररहित पूर्ण वस्तुका नाम भूमा है. इति। सो भाण 
है वा परमात्मा है यह उक्त वाक्‍्यमें संदेह है. भूमास पूर्व प्रांणोंका उपदेश 
. है, यातें प्राणोंका उपदेश है यह पूर्वपक्ष है. तहां यह सूत्रकारका उत्तर हैः-- 


भूमा सम्प्रसादादध्युपदेशात्‌ ॥ ८॥ 
___ भूमा। सम्पसादात्‌ | अश्युपदेशाद | इति पृ०। | अध्युपदेशात्‌ । इति प०। 


__ 4 सनन। २ गुरुसेवादिमें। ३ इंहियसंयममे । ह 


णज्र्‌ बद्मसूत्नाणि [अ० १ पा० ३ सू० ९] 


अथे०-सम्यक्‌. सुखी होवे जीव जांमें सो संग्रसाद कहिये है, अथाव्‌ स॒पु- 
घिका नाम है. ता अवस्थामें पाणचेष्टा चनी रहे ४ यांतें संप्सादपदस सूत्रमें 
प्राणोंका अंगीकार है, तांसे अधि नाम आगे अ्ुतिमें भूमाका उपदेश किया है; 
यांते भूमाईच्दसे तहां परमात्मा अंगीकार है, प्राण अंगीकार नहीं. प्राणउपदे- 
शर्से शोकनिदृत्ति संभवे नहीं, इत्यादिक हेतु प्राणोंके निषेधर्म अंगीकार हैं, 
इति ॥ «८ ॥ 


धर्मोपपत्तेश्व ॥ ९॥ 
धर्मोपपत्तेः । च । इति प्‌० | 


अर्थ-जा अवस्थामें अपरको देखे सुने जाने नहीं? इत्यादिक कहे जे धर्म 
ते परमात्मामैं उपपत्तेः नाम संभवे हैं अपरमें नहीं; यातें परमात्माही भूमा ज्ञेय 
है, ग्राण नहीं. इति ॥ ९ ॥ 


चृहदारण्यक पंचम अध्याय अष्टम च्राह्मणमैं यह प्रसंग है कि गारगीने याज्षव- 
पूंछा था कि जो स्र्गके ऊपर है, जो पृथिवीके नीचे है, स्वर्ग प्रथिवी जिसके 
अंतर है और जे भूत भावी वर्तमान हें ते सर्व किसमें ओतप्रोत हैं? याज्वल्क्यने 
कहा आकाशमें ओतग्रोत हैं. गार्गीने कहा आकाश किसमें ओतप्रोत है! तब 
याज्ञत्॒लक्यने यह उपदेश कियाः-- “सहोवाचैतद्ठै तदक्षर॑ गार्मि त्राह्मणा 
अभिवद्न्ति । अस्थूलस्‌ अनण्वहुखम्‌ अदीघेमछो हितमस्लेहमच्छाय- 
मतसोड्वायु अनाका शर्म असइसरसमगन्धसचकछ्ुष्कप्‌ अओचसवाग- 
मनोंडतेजस्कम्‌ अपाणिझुखसमाजस्‌ अनन्तरमबाह्॑ न तदक्षाति किंचन 
न तदक्षाति कश्चन । एतस्थ॒ वा अक्षरस्थ प्रदासने गारगि सर्यांचन्द्रमसों 
बिध्वतों तिष्ठत एतस्थ वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि द्याचाएथिव्यौ 
विध्वत्ते तिछत्तः । थो वा एतदक्षरं भार्मि अविदित्वा अस्मात्‌ छोकात्‌ 
ति स कृपणोध्य य एतदक्षर॑_गाणि विद्खा अस्मात्‌ छोकात्‌ 
प्रति स्‌ ब्राह्मण; । तता एतदक्षरं गागि अहफ्े द्रष्ट अश्चत्ते ओत 
अमत्त मन्तू अविज्ञातं विज्ञात्‌ नान्यत्‌ अत्तोडस्ति द्रष्टः नान्यत्‌ 
अतो5स्ति ओतू नान्यत्‌ अतोडस्ति सन्‍्तू नान्यत्‌ अतोडस्ति विज्ञात 
एतस्मिन्‌ नु खछ अक्षरे गागि आकाश ओतख पोतश्व इत्ति! 
अुतिअथ-हे गार्मि ! जो तुमने पूंछा है कि आकाश किससें ओत प्रोत 
है? इति। सो यह अक्षर है यह ब्राह्मण कहे हैं अर्थात्‌ नाशरहित. अक्षरको 


[अ० १ पा० ३ सू०११] भाषाटीकासहितानि । ६३ 


ब्रह्मवेत्ता कहे हैं. सो अक्षर कौन है ? जिसको ब्राह्मण कहे हैं जा शंकासे कहे हैं, 
सो अक्षर स्थूछ अणु हस्त दीर्घ नहीं. अर्थात्‌ चतुश्परिमाणधर्मवान्‌ ड- 
ब्यसें भिन्न है. छोहित, स्तेह, छाया, तम, वायु, आकाश, रूप नहीं; असंग है. 
रस, गंध, नेत्र, ओज, वाकू, मन, तेज, प्राण, मुख, मात्रारूप नहीं. मात्रापदसे मान 
मेयका निषेध अंगीकार है. सो अंतर नहीं, वाह्य नहीं, सो किसीको भक्षण 
नहीं करे है, तांको कोई भक्षण नहीं करे है. हे गागें! इस अक्षरक्षी प्रशासनामैं 
सूर्य चंद्रमा स्थित हुए देशकालके नियमसें वर्ते हैं और स्वर्ग प्रथिवी आदिक 
जिसकी आज्ञामें स्थित हैं. जो इस अक्षरकों नहीं जानके गमन करे है सो 
कृपण है. जो जानके गमन करे है सो ब्राह्मण है. हे गार्गें! सो अक्षर अद्ृष्ट है 
अर्थात्‌ अविषय होनेसें अपरकरके अद्ृट्ट है और स्वयं स्का द्रष्ट है अर्थात्‌ 
द्रष्टा है तथा अपरकरके अश्चुत है, स्वर्य सवेका श्रोता है. सनका अविषय हो' 
नेसें अपरकरके अमत है, आप मंता है. बुद्धिका अविषय होनेसें अविज्ञात है, 
आप विज्ञानरूप होनेसें विज्ञाता है. इस अक्षरसें दशनक्रियाका कर्ता अपर 
नहीं. तिस अक्षरमें हे गार्गिं! आकाश ओत प्रोत है. इति । यह श्रुतिका अर्थ है. 

उक्त प्राह्मणमैं अक्षर पदसें अक्षर वर्णरूप अंगीक्ृतत है, वा ब्रह्म अंगीकृत 
है यह संदेह है. अक्षर पद वर्णोका वाचक पअसिद्ध है यांतें वणोंका अहण 
है, यह पूवपक्ष है. न क्षरति इति अक्षरम्‌” जा थोगबृत्तिको मानके सूत्रका- 
रका यह ससाधान हैः-- 


अक्षरमम्बरान्तइतः ॥ १३० ॥ 
अक्षरम्‌ । अम्बरान्तभतेः | इति प०। 
अथ-भूमिसें लेकर अंबर नाम आकाश अन्त नाम पर्यत सर्व_कार्यको 
बह्य घृतेः नाम धारण करे है यांतें अक्षरपदसे तहां अहाका अंगीकार है, अक्षर 
नहीं. उक्त प्रसंग सर्वका धारक अह्म प्रसिद्ध प्रतीत होवे है यांतें अक्षर अह्मही 
है. इति ॥ १० ॥ 
सा च प्रशासनात्‌ ॥ ११ ॥ 
सा | च। प्रशासनात्‌ । इति प०।_ 
अथे-पूर्ववाकयमैं कहा है कि हे गागें! अक्षरकी प्रशासनामैं धारण किये हुए 
सूर्यचंद्रादिक स्थित हैं. इति । अरशासन नाम आज्ञाका है, आज्ञा चेतनका 
है, अचेतनका नहीं यातें सो नाम घारणा प्रमेश्वरका घम है अपर अचेतनका 
चर्म नहीं, यांतें अक्षर तहां नक्म अंगीकृत है, म्रधानादिक नहीं- इति ॥ ११ ॥ 


५2 ब्रद्मत॒त्नाणि [ अ० १ पा० रे सू० श्र] 
किंच-- 
अन्यमावव्याह्त्तेश्व ॥ १२ ॥ 
अन्यमावव्यावत्तेः । च्‌ । इति प०। 


अभै-अन्य जे प्रधानादिक तिनके जे भाव नाम धर्म ते अन्यभावपद्स 
अंगीकृत हैं, तिन धर्मनसें जे व्याइत्त नाम भिन्न धमम ते उक्त ऋुतिमें सुने हू 
यातें अक्षरपदका वाच्य परमात्मा है, तिसकाही प्रशासना कर्म है। “अदृष्े 
द्रष्ठ अश्रुतत ओत” इत्यादिक धर्मनका सूत्रके व्यावृत्तियद्स अहण हैं और अ- 
पर द्रष्टाका तहां निषेध किया है यातें अक्षर अह्मही ज्ञेय है. पूर्वले अधिकर- 
' णक्का पूर्वपक्षमँ ऑकारकी उपासना फरू हैं, सिद्धांतमें शरह्मतोध फल हैः 
इति ॥ १२॥ 


अब ०-अथर्वणकी घ्रश्षउपनिषद्के पंचम प्रश्षमें पिप्पछाद शुरुसें सत्यका- 
भने पूंछा था कि हे भगवन्‌! मनुष्यनमैं जो मरणपर्थत उँन्कारका ध्यान करे हैं 
सो उपासक तिस उन्‍्कारसें किस छोकका जय करे हैं. पिप्पछादने यह उपदेश 
किया कि जो एकमात्र डेंग्कारका ध्यान करे है तांको ऋक मनुष्यलोकर्में प्राप्त 
करें हैं, द्विमान्न अें“कारका ध्यान करे तौ सो यज्भुद्धारा सोमलोकमें जावे है. तहांसे 
तांकी पुनरावृत्ति होवे है. यह कहकर आगे यह उपदेश किया है कि “थः घुन- 
रेते ज्ञिसात्रेणेव # इति एत्तेनेव अक्षरेण परपुरुषम्‌ अभिध्यायीत स॑ 
तेजासि सूर्ये सम्पन्न) । यथा पादोदरः त्वचा विनिस्ेच्यते एवं ह वे स 
पाप्सना विनिमतेक्त;ः सामभिः उन्नीयते अद्यलोक स एतस्मात जीव- 
'धनात्‌ परात पर पुरिदार्य पुरुषम हेक्षते” इति । 


: अधे०-जो उपासक त्रिमान्न डँँकार अक्षरकरके परपुरुषका ध्यान करे है 
सो तेजरूप सूर्यमे प्राप्त होकर यथा सर्प त्वचासें रहित होवे है तथा सो पापनसें 
रहित होबे है. तांको सास न्रह्मछोकको प्राप्त करे हैं. सो उपासक जीवघन नाम 
आद्यछोकर्से परे जो परमात्मो पुरुष तिसको साक्षातकार करे है. सर्वजीबोंका 
अभिमानी जो हिरण्यगर्भ तांका अह्मकोक आधार है, यांते जह्मजोकका नाम 
जीवघन है, सर्व शरीरोंमें जो रहे सो पुरिशय कहिये है. इति । उक्त वाक्‍्यमैं 
-अन्‍्कारसे जो ध्यान करणेयोग्य कह है सो परबह्य है वा अपर अहम हे यद 


तहां संदेह है पूर्वपक्षमें अपर शध्यातव्य अंगीकार कियेसें यह भगवान सूत्र 
कारने सिद्धांत किया हैः--- 


[अ० १ पां०३ सू० १३ ] भाषादीकासहितानि । घ्ण 


ईक्षतिकर्भव्यपदेशात्सः॥ १३ ॥ 
इक्षतिकरमव्यपदेशात्‌ । सः । इति प०। 


अथ-पूर्ववाक्यमें ईक्षति पदका अर्थ जो ज्ञान तांका कर्म पुरुषको कहा 
है यांते सः नाम ध्यानयोग्य तहां परबह्म अंगीकृत है, अपर नहीं- 
इति । पूर्वपक्षमें कार्य अक्षयपासना फल है, सिद्धांतमैं परअद्यउपासना फल 
है. इति ॥ १३॥ 


_अच०-उत्तर अधिकरणका आकाशादिडपासना पूर्वपक्षमें फल है. सिद्धां- 
तमें ततद्घारा नह्मतोध फल है. छादोग्यके अष्टम प्रपाठकके आरंभमें यह श्रुति 
है। “अथ यदिद्म अस्मिन ब्रह्मपुरे दृहरे एुण्डरीकं बेइम दहरोडस्मिन्‌ 
अन्तराकाशः तस्सिन यदन्‍्तः तदन्वेष्ब्य तछाव विजिज्ञासितब्यम्‌ 
इति। त॑ चेत्‌ ब्यूय। यदिदम्‌ अस्मिन्‌ ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीक वेइस 
दहरो5स्सिन अन्तराकादाः कि तदक् विद्यते यत्‌ अन्वेष्टव्य चदाव 
विजिज्ञासितव्यस्‌ इति । सबूयात्‌ थावान्‌ वा अथमाकाशः तावात 
एषोडन्तहैंद्य आकाश उसे अस्मिन द्यावाए्थिवी अन्तरेव समा- 
हिते इति ।” 

अध-यह जो ब्ह्मपुर नाम शरीर इसमें दहर नास सूक्ष्म हृंदयरूप कमल 
है, तिसके अंतर सूक्ष्म आकाश है, सो जिज्ञासाके योग्य है. जो गुरुको 
शिष्य कहें कि प्रथम तौ हृदय सूक्ष्म है तांमें जो आकाश सो भी सृक्ष्म है सो 
क्या वस्तु हैं जांकी जिज्ञासा करे? तो गुरु उनसे यह कहे कि जेता यह्‌ आकाश 
है उतनाही हृदयके अंतर आकाश है, तांम स्वगे और पृथ्चिबी स्थित हैं. इति 
इससे आगे यह कहा है--“एघ आत्मा अपहतपाप्मा चिजरा। "विर्त्यु- 
विश्ञोकोी' विजिघत्सोडपिपास! सत्यकामः सत्यसझ्चुल्पः ” इति | उक्त 
वाक्‍्यमें जो हृदयके अंतर सूक्ष्म आकाश कहा है; सो भ्रूताकाश है वा तह है 
यह तहां संदेह है. प्रसिद्धेसि आकाशपदकों भ्रूताकाशका वाचक पता 
अंगीकार कियेसे यह सिद्धांतसूत्र हैं: 


दहर उत्तरेम्यः ॥ १४ ॥ 
दहरः । उत्तरेम्यः ! इति प० । 
अै-उच्तर नाम आगे जे हेतु कहे हैं विनसें दहराकाशझब्दसे तहां पर- 


4० 


ण्द्ू बद्यवत्नाणि | [ अ० १पा० रेयू० १६] 


मात्मा उपास्य है, भूताकाश नहीं, दहराकाशको सुनकर जो शिष्योंका प्रश्न 
तांके उत्तरमें उपसान उपमेय भाव सुना है, और तिसको सर्वका आश्रय कहा 
है और अजर अमरादिक तांके विशेषण कहे हैं वे धर्म भूताकाशम संभव नहीं 
यातें उक्त अनेक हेतुनस दहराकाश परमात्मा है, भूताकाश नहीं. इति ॥१४॥ 


गतिशब्दाभ्यां तथाहि दृष्टं लिठ च ॥१५॥ 
गतिशव्दास्याम्‌ । तथाहि । दृश्य । लिड्ुम्‌ । च । इति प०। 


अथे-दहरवाक्यके आगे द्तीयखंडमें यह कहा ह--पिधापि हिरण्य- 
निर्धि निहितम्‌ अक्षेत्रज्ञा । उपरि उपरि संचरन्तो न विन्देयुः एचमेच 
इस सचोः प्रजा; अहरहरगंच्छन्तः एस अछालोक न चिन्दन्ति 
अन्तेन हि पत्यूढा/” इति श्रुतिअर्थ-यथा भूमिम गाड़ाहुया जो धन 
तिस धनस्थानको जे नहीं जाने हैं ते तिसके ऊपर तो फिरते रहे हैं परंतु तिसको 
जानें नहीं, तथा यह सबे प्रजा दिन दिनमें त्रद्मविषे गमन करे हैं परंतु अश्ञान- 
करके आच्छादित हुए संते इस अह्मकोकको नहीं जाने हैं. इति । इस वाक्यम 
परमात्माका वोधक जो अरह्मणोक शब्द और जीवनका जो दिनदिलनमें ब्रह्ममें 
गसस अथीत्‌ लय ते दोनो सूत्रके शब्द और गतिसें गृहीत हैं. गतिपदसें ठयका 
प्रहण है, शब्द शददसें ऋद्मझोक इस शच्दका धहण है. तिन दोनोसें दहराकाश 
बह्म सिश्वय होवे है। तथाहि-दृष्टण्‌ नाम दिनदिनमें जो जीवोंका रुय सो 
अपर श्रुतिमें देखा है। 'सता सोम्ध तदा सम्पन्नो 'सचति' यह श्रुति 
लय कहे है. अ्ह्मलोकमें दिनदिनमें गसन संभवे नहीं) यांतें अह्मकोकपदमें 
ब्रह्मण; छोकः ज्च्यकोक/ यह ससास संभवे नहीं. किंतु अ्रछ्ेव लोकः 
अद्यलोक/ यह कर्मघारय समास अंगीकृत है. इस अभेदसमाससें दिनदिनमें 
जो गमन सो लिंग साम प्रमाण है. सो अभेद अथको प्रगट करे है. इति॥१५॥ 


किच+--- 

: पृरतेश्व महिश्नोज्स्यास्मिचुपलब्घेः ॥ १६ ॥ 
घृतेः। च। महिस्नः । अस्य । अस्मिव्‌ । उपलब्धेः | इति प०। 
अथे-उतक्त ल्यवोधक वाक्यके हे यह कहा है---+य जात्मा स सेतु- 


विधवतिरेषां लोकानाम” इति। इसमें सबका घृत्तेः नाम घारकत्व सुना है; 
यातें धारकत्व हेतुसेभी दहराकाश परमात्माही है. यह जो धारणरूप सहिमा 


[ अ० १ पा० ३ सू० १८ ] भाषाटीकासहितानि । ण्छ 


सो परमात्मामे अपर श्रुतिकरके उपलब्धेः नाम प्रतीत होवे है। “एप सर्वेश्वर 
एप ऋता धेपाति! एप भ्रतपालः एप सेतु इति” यह आत्मा वर्णाश्रमके 
असंकरका सेतु नाम हेतु है. विधृति. नाम धारक है। इति श्रुतितात्पर्यम्‌॥१५॥ 


प्रसिद्ेश्य ॥ १७॥ 
प्रसिद्धेःभ । च । इति प० ॥ 


अरथ-दहराकाश शब्दभी परमात्माम ही मसिद्ध है, भूताकाशमम नहीं. पूर्व 
जो उपमान उपमेय भाव कहा है सो मसिद्धिमें कारण है. इति ॥ १७ ॥ 


इतरपरामर्शा त्स इति चेन्नासम्भवात्‌ ॥ १८॥ 


इतरपरामर्शात्‌ । सः । इति । चेत्‌ । न । असम्भवात््‌ | इति प०। 
अधे-ननु दहरवाक्यके आगे यह वाक्य हैः--“अथ य एप सम्पसादो5- 
स्मात्‌ छारीरात्सछत्थाय पर॑ ज्योतिरुपसंपय्य खेन रूपेणामिनिष्पयते 
एप आत्मा इति होवाच एतद्स्ट्तम भयमेतत्‌ त्रह्म इति तस्य ह वा एतंस्थ 
प्रह्मणो नाम सत्यभिति” इति। इस वाक्यमें इतर 'नाम जीवका परामर्श 
है; यातें सः नाम जीवही दहराकाश है, परमात्मा नहीं; यह शंका करें तो जीवमें 
आकाशउपमा अपहतपाप्मत्वादिक धर्मोके असंभव्से असंगत है. इति। 
श्रुतिअथ-परं॑ नाम उत्कृष्ट ज्योतिः नाम प्रकाशसख्वरूप जो आदित्य 
ताको उपसंपद्य नाम प्राप्त होकर अथोत्‌ आदित्यउपरक्षित देवयानमार्गको 
प्राप्त होकर स्वेन नाम स्वउपासनाका फलरूप जो सूर्य तद॒विशिष्टरूपसें अ- 
भिनिष्पद्यते अर्थात्‌ अह्मछोकको प्राप्त होवे है, सो उत्तम पुरुष है. इति॥ १८॥ 
अच०-शाखउपदेशसें स्रसंवेध्ताकों आपादन करके आगे सप्तम खं- 
डमें यह बह्माका वाक्य है--“य आत्मा5पहतपाप्मा विजरो विस्त- 
स्यु्विशोकोडविजिधत्सोडपिपासः , सल्यकामः सत्यसहूल्पः . सोडन्चे- 
शब्यः स विजिज्ञासितव्यः स सवोध्थ छोकान्‌ आमोति सबोइ्श्व का- 
मान थः तम्‌ आत्मानम्‌ जक्ु॑विद्य विजानाति इति ह प्रजापति: उचाच” 
इति। इस वाक्यको सुनके इंद्र और विरोचन प्रजापतिके समीप गये. तिन्‍्होंने 
तहां द्वार्लिशत्‌ वर्ष बरह्मचर्य किया. जह्माने कहा किसकी इच्छावान्‌ होके स्थित 
हो? थे बोले आपके वाक्यको खुनके आत्माकी इच्छासें स्थित हैं. तब तिनको 


५ शात्रउपदेश्स जो खरसंचेबताको आपादन करे. 
ब्रह्म, ८ 


८ ब्रह्मसत्राणि । [ज० १ पा० हे सू०१८] 


ब्रह्माने यह उपदेश कियाः--“य एपोउश्लिणि पुरुषों दृदयत एप जात्मा 
इंति होवाच एत्तत्‌ अम्रतमभयम्‌ एतत्‌ ब्रह्म इति” इस वाक्यको खुनके वे 
छायाको आत्मा निश्चय कर चलेगये- विरोचन तो नहीं फिर कर गया आर इंद्र 
उक्त आत्मामें दोष मानके पुन+ अह्माजीके पास गया. भह्माजीने कहा द्वात्रिं- 
शत्‌ वर्ष तप कर. जब तप कर चुका तब यह उपदेश किया+--“य 
एप खभे महीयमानअरति एप आत्मा इति होवाच एतद्मस््तममयम 
एतद्‌ ब्रह्म इति” इसमें भी इंद्रने दोष कहे, तब बह्माने कहा कि द्वार्जिशत्‌ 
वर्ष तप कर. जब तप करचुके तव यह उपदेश कियाः--तद्त्न एतत्‌ रुप्तः 
समस्त: सम्पसन्नः रंवर्भ न विजानाति एप आत्मा इति होचाच एतद- 
शतमभथम्‌ एतत्‌ ब्रह्म इति” इसमें सी इंद्रने दोप कहे. तब बह्माजीने 
कहा पांच वर्ष अह्मचये कर. जब एकशैत वर्ष अरह्मचयें हुआ तव यह उपदेश 
किया।--अशरीर चाव सस्‍्तं न प्रियाप्रिये स्शशतः ॥ अदरीरो बायुः 
अरश्न॑ विद्युत्‌ स्‍तनायिलुः अच्वरीराणि एतानि तग्था एतानि अछु- 
रमादाकाशात्‌ समझुत्थाय पर ज्योतिरुपसम्पय खेन खेन रूपेण अभि- 
निष्पच्मन्ते । एवमेव एप सम्प्रसादोषस्मात्‌ शरीरात्‌ ससुत्थाय पर 
ज्योतिरुपसम्पद्य खेन रूपेणाभिनिष्पयते सः उत्तमः पुरुषः” इति | 
अशरीर जो वायु अथीत्‌ अविद्यमान शिरकरादिवान्‌ जो शरीर तद्दान्‌ जो वायु 
और अश्य विद्यत्‌ सनयित्वु यह उक्त विधिसें शरीररहित हुए वर्षादि प्रयो- 
जनसिद्धिके अर्थ स्वगेलोकसंबंधी आकाशसें उठके सूर्यसंचंधी अभितापको 
प्राप्त होकर तिस तापसें भिन्न भिन्न भावकों प्राप्त हुए स्वस्वरूपसें स्थित होवे 
हैं. अथोत्‌ वायु पवत ज्योति ता गर्जित अशनिरुपसें स्थित होवे हैं. इति। 
“स्वेन रूपेण अभिनिष्पद्य परं ज्यीतिरुपसम्पद्मते” जाविध आतिमें सं- 
बंध अंगीकृत है॥ अविद्याका कार्य जो अहंकारादि अनर्थ तासेँ तादाल्य 
अभिसानसे जो मन्न असतके समान तांका तांसें जो विचेक सो 'समुत्याय 
पदका अर्थ है. “परम! जा पदसे अ्मरूप ज्योतिको प्राप्तिके योग्य कहा है. 'अहं 
अह्मास्ति' जाविध बृत्तिरूप साक्षात्कार अभिनिष्पद्मते! जा पदसे अंगीकृत है. 
डु पसम्पद्य' जापदसे मह्साक्षात्कार कर केवलानंदलह्मरूपसे अवस्थान अंगीकृत 
है. इति ॥ इस उक्त बह्माके 00323 जो सम्प्रसाद पद सो जीवका वाचक है- 
कर है दहराकोश जीव अंगीकार किया चाहिये, यह शंका मानके समाधान 


. 4 ल्रीआदिकोंकरके पूज्यमान जनेकबिध सप्रमोगका अत रहे - ६ खप्रभोगेका अहुमव करे है. २ जकर एके सन ता, 
क्योंकि पहले तीन वार वत्तिस २ वर्ष तथा अबकी झ है. २ अधात्‌ एकोत्तर शत (१०१). 


चौथी वार पांच वर्ष ब्ह्मचये धारण करना 
इससे सव मिलाके १०१ बर्य होते हैं. हे अं 


[अ० १ पा० ३ तू० २१] भापाटीकासहितानि । ण९्‌ः 


; ५ अत कं 
उत्तराचेदाविभ्ूतस्वरूपस्तु ॥ १९ ॥ 
रा ६ भूतस्वरू 
उत्तरात्‌ । चेत्‌ | आविभूतस्वरूपः । तु । इति प० । 
अथ-उत्तरात्‌ नाम नेन्रामिमानी हु स्वप्ताभिमानी सुप॒ध्यभिमानी जीवका 
संप्रसाद शब्द्स अह्माने उपदेश किया है, यातें दहराकाश जीव है, परसात्मा 
नहीं; यह शंका क्र तो सत्य हैं; तथापि तहां जो सम्प्रसादपदसें जीव कहा 
है सो जीवत्वरूपस जीव अंगीकार नहीं, किंठु आविर्भूत नाम पापादिकोंसे 
रहित जो जीवका स्वरूप सो संप्रसादपदस्े बह्माके घाक्यसें अंगीकृत है. सो 
पापादिकॉर्स रहित जो स्वरूप सो ब्रह्मस्वरूप है, सोई जीवका घासवस्तररूप है. 
जीवत्व वास्तवस्वरूप नहीं, यातें दहराकाश परमात्मा है; जीच नहीं. इति॥१५९॥ 


अन्यार्थश्र परामर्शः ॥ २० ॥ 


अन्यार्थः | च्‌ | परामर्शः । इति प० । 
अग-अह्वाके धाक्यमें जो जीवका परामर्श है सो जीवार्थ नहीं, किंतु अंतर्म 
जो ज्योति कहा है तिस परमात्माके अर्थ परामर्श है. तहां जीवको प्राप्त होने- 
थोग्य परमात्मा है यह उपदेश किया है. सो उपदेश जीवके परामशैविना 
संभवे नहीं, यातें संप्रसादपदसे जीवका परामश है. इति॥ २०॥ 
५ 45 
अस्पश्रृतेरिते चेत्तदुक्तम ॥ २१ ॥ 
अय्यश्रुतेः । इति। चेत्‌ । तत्‌ । उक्तम्‌ । इतिं प०। 
अथै-आकाशको श्रतिमैं अल्प श्रुत्ेः नाम सुना है थातें सो परमात्मा नहीं, 
यह शंका करें तौ इसका समाधान अभेक०'(ज० १२१७) जा सूत्रमें उक्तम्‌ नाम 
कह दिया है, तहां दहराकाश परमात्मा उपास्य है, जीव नहीं. इति सिद्धम्‌ २१ 
अच०-द्वितीय छुंडकमें यह वाक्य हैः--+न तत्न सू्ों भाति न चन्द्र- 
तारक॑ नेभा विद्युतो भान्ति कृतोड्यमश्नि।। तमेव मान्तभनु 'भाति 
से तस्प भासा सर्विसिद॑ विभाति” इंति। अर्थ-यथा घटादिकोंमें 
सूर्यआछोकादिक भासकत्वरूपसें भासमान हैं तथा तत्र नाम ब्रह्ममें भासक- 
त्वरूपसें सूयोदिक भासमान नहीं, और अप अश्नि किस हेतुसे प्रकाशेगी. यथा 


सूर्यादिकोंकरके प्रकाइय घटादिक सूर्यादिकोंके प्रकाशक नहीं, तैसे अद्मकरके 
प्रकाइय सू्यादिकिभी ब्रह्मके प्रकाशक नहीं. नज्ु-गुरुके गसन कियेसें जो -शि- 


809 बह्मसृत्राणि । [ अ० १ पा० ३ सू० २३ ] 


ध्यका पाछे गसन है सो सनिष्ठ गमनकृत है तथा 'तसमेव 'भागन्तमनुमाति 
सर्वे जा वाक्‍्यमें तिसके भानपाछे जो भान कहा है सो सूर्योदिकोंका जो 
स्वनिष्ठ भान तिसकरके ही संभवे है. जा शंकाका तस्य जा वाक्यसे समा- 
धान करें हैं. यथा अयःपिंडकी जो दाहक्रिया सो अधभिनिठठ हैं तथा सूयोदि- 
कोंका भान अह्मनिष्ठ है, भिन्न नहीं. इति॥ २१ ॥ 

अवब०-इस उक्त वाक्यमें जो सर्वका भासक कहा है सो तेजविशेष है वा 
बह्म है जा संदेह हुए छोकमें तेजको प्रकाशकता पसिद्ध है, यातें तेजनिशेष 
है; जा पूर्वपक्षमें यह सूत्रकारका सिद्धांत है।--- 


अनुकृतेसस्य च ॥ २२॥ 


अनुकृतेः | तस्थ । च। इति प०। 
अथे-अनुभाति सर्वेम्र” जा वाक्यमैं स्वयंप्रकाशरूपसें भासमान चेतनके 
पीछे सर्वे शूयांदि भासमान होवे हैं यह कहा है, सो सूत्रगत अनुकृतिपदका 
अथे है; यातें ते भान्तम जा वाक्‍्यमें प्रमात्माका अंगीकार है, तेजका नहीं. 
और तस्य नाम “तस्य भासएँ जा वाक्यमेंभी चेतननिछ सर्वभासकत्व कहा है, 
तेजको सबेका भासक कहिना संभवे नहीं; यांते उक्त विषयवाक्यसें सर्वका जो 
प्रकाशक कहा है सो त्रह्म है, तेज नहीं. इति ॥ २२ ॥ 


अपि च स्मर्यते ॥ २३॥ 
अपि । च। स्मय॑ते । इति प०। 


-न तत्‌ भासयते खूथों न शाशाह्नो न पावकः' यह गीतामैं भी 
' उत्ते अर्थही भगवानने स्मरण किया है; यातें अपरकरके अप्रकाश्य सर्वका 
पकाशक तहां प्रमेश्वरही शेय है, तेज नहीं. इति। तेजकी उपासना पूर्वपक्षमें 
फल है, सिद्धांतमें निर्विशेष त्रह्मज्ञान फल है. इति ॥ २३ ॥ 
अब०-उत्तरसूत्रका पूर्वपक्षम भेदसिद्धि फल है, सिद्धांतमैं अभेदः फल है। 
कठकी चतुर्थ वल्लीमें यह वाक्य है। मनसा एव इृद्म्‌ आसब्ध नेह नानास्ति 
किख्वन । खत्योः स झत्युं गच्छति य इह नानेव पशयति । अज्लुष्ठमात्रः 
पुरुषो सध्य आात्मनि तिछति। ईशानो भ््तमव्यस्य न ततो विजुग्॒प्सते 
५ इह नाम अह्ममें अणुंमात्रमी नाना नही हैं. जो अविद्यावान्‌ इह नाम अनानारुप अहम उपर 


नाना देखे है, सो मरणसें मरण आप्त होने है। अंगुठमात्र हृदयगत अंतेःकरणउपाधिक देहमैं स्थित है. 
जो कालत्रयका ईैशिता है, तांको जो जाने है वह ज्ञानानंतर आत्माको गुप्त करणेकी इच्छा नहीं. करे है । 


[अ० १ पा० ३ सू० २६५ ] भापाटीकासहितानि। ६१ 


इति”। अंगुष्टमात्र पुरुष देहके मध्य हृदयरूप पद्ममैं स्थित हे. यह उत्तवाक्यमें 
कहा है. तहां अंगु्ठमात्रवाक्य जीवका बोधक है वा ब्रह्मनोधक है, जा संदेह 
हुएस अगुप्ठमात्र परिसाण ब्रह्मका तो संभवे नहीं, यातें उक्तवाक्य जीववबोः 
धक ह जा पृथपक्ष हुएसे यह सिद्धांत है 


शब्दादेव प्रमितः ॥ २४॥ 
शब्दात्‌ | एवं । प्रमितः | इति प०। 


अथे- शब्दात्‌ नाम उक्तवाक्यमें ईशान शब्द है तांसे प्रत्यकू अभिन्न परमा- 
त्मा अंगुछ्वाक्यकरके प्रतिपाद्य है, यह अर्थ प्रमितः नाम निश्चित है. यद्यपि 
अंगुएपरिमाण जीवका लिंग है, तथापि जहां श्रुतिका लिंगस विरोध होवे तहां 
श्रुति बलवान होवे है. प्रसंग ईशान यह श्रुति है, अंग्रुछमात्र यह जीवका 
लिंग है; यथातें ईशान यह वलवान्‌ है. त्वंपदका वाच्य जो जीव तांका अनुवाद 
करके अद्यात्माकों अभेदका वोधक अंगुछ्वाक्य है. इति तात्पर्यम्‌ ॥ २४ ॥ 


अचब०-वासवस जीवका स्वरूप व्यापक माना है, यांते तांको अंगुछ्ठमात्रत्व 
केंसे है? जा शकासे कहे हँ+-- 


हथपेक्षा तु मनुष्याधिकारत्वात्‌ ॥ २५॥ 
हृदि । अपेक्षा । तु । मनुष्याधिकारत्वात्‌ । इति प० 


अधे-तु पद इकानिपेधार्थक है. वासवसें व्यापक जो परमात्मा सो जीव- 
रूपको प्राप्त हैं, यातें अंगुछपरिमाण जो हृदय तत्‌ अपेक्षा नाम तत्‌ अवच्छिन्न- 
रूपस तांको अंगुएमात्र कहिना संभवे है. यद्यपि गजादिक शरीरॉमें हृदयके 
अंगुछपरिमाणका नियम संभवे नहीं, यांते जीवका अंग्रुएमात्र नियम केसे 
होवेगा, तथापि शाखत्रमें मनुष्यका अधिकार है, गजादिकोंका नहीं. मन॒ुष्यनका 
हुदय अंगुछठमान्र है, यांते हृदयकी दृष्टिसें जीवको अंगरुछमात्र कहिना संभवे 
है. इति ॥ २० ॥ 

अच०-बहदारण्यकके चतुर्थ त्राह्मणमें यह वाक्य हं*--“अछा वा इृदसभ 
आसीत तदात्मानम्‌ एव अवेत्‌ अहं ब्रह्मास्मि इति। तस्मात्तत्‌ सेम स- 
चत्‌ तद्यो यो देवानां प्रत्यतुध्यत स एव तदभवत्‌ तथा ऋषीणा तथा 

१ तत्‌ । अह्म । आत्मानं नित्यह्गूरूप | अवेत्‌ विदितवत ॥ ४ 


दर :  ब्रह्मसूत्नाणि | [अ० १ पा० ३ सू० २७ ] 


सनुष्याणां तद्भैतत्पएइयन ऋषिवामदेवः प्तिपेदे अहँ मनुरभव£ 
स्व सूर्यश्रेति। तत्‌ इदम्‌ अपि एतहिं य एवं वेद अहे ज्रह्मास्सि इति 
सइद्‌श मवति। तस्य ह न देवाश्व नाभ्रूलत्या इेदते। आत्मा हि एपा£€ 
स भवति” हति। उक्त वाक्यमैं कहा है कि देवनके मध्यमें मजुष्यनके 
मध्यमैं ऋषिनके मध्यमैं जिसने अह्मको जाना है सो तत्रूप हुआ है. इति । 
तहां यह संदेह है कि देवनका त्ह्मविद्यामें अधिकार है? वा नहीं. इति । 
पूवेशाखमें मनुष्यनका अधिकार माना है यातें देवनका विद्यामें अधिकार 
नहीं यह पूर्वपक्ष है, तहां यह भगवान्‌ सूच्रकारका सिद्धांत हैः-- 


तहुपर्यपि बादरायणः सम्भवादिति॥ २६॥ 

तदुपरि । अपि । बादरायणः। सम्भवात्‌ । इति प०। 
अथ-तत्‌ नाम मनुष्यनके उपरि नाम ऊपर जे.-देवता तिनका भी बह्म- 
विद्या अधिकार है यह वादरायण आचार्य माने हैं. अर्थित्व सासथ्योदिक 


जे अधिकारके कारण हैं, ते देवनमें भी हैं, यातें देवनका विद्यामें अधिकार 
संभवे है. इति ॥ २६॥ 


हे ९८ 

विरोधः कर्मणीति चेन्नानेकप्रतिपत्तेदर्शनात्‌ ॥ २७॥ : 
विरोधः । कर्मणि | इति । चेत्‌ । न। अनेकमप्र- 

तिपत्तेः्। दशनात्‌ । इति प०। 
अ्थै-नशु-विश्वह बिना विद्यामें अधिकार संभवे नहीं, यातें देवनका विध्रह 
माना चाहिये. तांके अंगीकार कियेसे यथा कर्मकतो कमोंके समीप हुआ कर्मोपर 
डपकारक होवे है तथा देवतानको भी कर्मके समीप होकर कर्मों उपकारक 
हुआ चाहिये, सो उपकारकत्व एकशरीरका एककालमैं अनेक कर्मनविषे 
संभवे नहीं यातें देवनको विभ्रहवान्‌ मानेसें कमेनमें उतक्तविधिसें विरोध सिद्ध 
होवेगा, इति चेत्‌ नाम यदि यह शंका करें तो अनेक अतिपत्तिके दर्शनसें 
संभवे नहीं. एक देवताको अनेक शरीरकी प्रतिपत्ति नाम प्राप्ति एककालमें 
दशनात्‌ नाम अ्रुतिमें देखी है, यातें उक्त दोष संभवे नहीं, इति । अथवा 
यथा एक महात्माको अनेक जीव एक कालमें वंदना करे हैं तथा एक देवताके 
अर्थ अनेक जीव एक कारूमें अनेक कर्म करे हैं यातें देवतानके उपकारकत्वमैं 

रंचक विरोध नहीं. इति ॥ २७ ॥ 

4 तत अक्षय एतत्‌ आत्मान परयवू अतिपेदे अतिपक्वानू . 





[अ० १ पा० ३ सू० ३० ] भाषाटीकासहितानि । धर३्‌ 


शब्द इति चेन्नातः प्रभवाञलक्षाल॒मानाभ्याम्‌ ॥२८ा। 
शब्दे । इति | चेत्‌ । न । अतः । प्रभवात्‌ । प्रलक्षानु- 
भानाभ्याम्‌ । इति प० । 

अथे-नज॒-यद्यपि कर्मनमैं विरोध नहीं तथापि शब्द नाम बेदमें विरोध है, 
वैदिक शब्द नित्य हैं देवताविग्रह अनित्य हैं यांते शब्दका अर्थ्से जो नित्य- 
संचंध ताके असंभव शब्दसें विरोध होवेगा जा शंकाका यह समाधान है कि दे- 
बतानिए नित्य मा तांका वाचक वैदिक झज्द है. अतः नाम नित्य 
आकृतिवाचक बेदम देवादिग्रपंचका प्रभव नाम उत्पत्ति सुनी है सो प्रत्यक्ष नाम 
अरुतिस अनुमान नाम स्मृतिसं उक्त अरथही निश्चित है; यातें वेदिकशब्दोंको 
नित्य आकृतिका वाचक होनेसें शब्दम भी विरोध नहीं. इति ॥ २८ ॥ 


न्कोज 
अत एवं च निल्लम्‌ ॥ २९॥ 
अतः । एवं । च | निय्लम्‌ । इति प०। 
अथ-नित्य सा 293० आक्ृति सो शब्दका अर्थ है. अतः नाम तिस नित्य आक्ृ- 
तिरूप शब्दार्थसें वेदनिष्ठ भी नित्यत्व सिद्ध होवे है. तथाहि अनुमानम्‌-वेदः 
अवान्तरप्रल्यावस्थायी जगदूहेतुत्वात्‌ ईः्वरवत्‌” इति ॥ २९॥ 
समाननामरूपलाचादत्तावप्यविरोधो 
दर्शनात्स्टतेश्व ॥ ३० ॥ 
समाननामरूपत्ात्‌ । च। आशतो | अपि । अ- 
विरोधः । दर्शनात्‌ । स्ट॒तेः । च्‌ । इति प०। 
अधथै-ननु-नित्य आकृति पदार्थ अंगीकार किये भी अठ्यमें स्वआक्ृतिक 
व्यक्तिके नाश हुएसे पुनः सोई आक्ृतिक व्यक्ति उपजे है जा अर्थका साधक प्रमाण 
* कोई नहीं, याते नित्यानित्य संबंध विरोध दूर होवे नहीं;जा शंकाका उत्तर कहे हैं कि 
उत्पत्ति और प्रछ्यकी आवृत्ति हुए भी शच्दमें विरोध नहीं. प्रछकय और उत्पत्तिमें 
समान नाम रूप होवे हैं. अरूयमें जगतका निरन्वय नाश होवे तो जगत्‌ विरक्षण 
होवे. निरन्वय नाश होवे नहीं किंतु अन्चय नाश होवे है अथात्‌ संस्काररूपसें अ- 
विद्या जगत्‌ स्थित रहे है. यथा जजुभवर्म भावनारूप संस्कार रहे हैं, यथा मृत्तिका- 
मैं घटके संस्कार रहे हैं, यथा सष॒सिमें सर्वंके संस्कार रहे हैं तथा प्रठयमें सर्वके 
संस्कार रहे हैं यांते उत्पत्तिपठयमें समान नाम रूप होवे है । “अस्थिस्प्राण 


६४ ब्रह्मसूत्नाणि । [ज० १ पा० ३ सू० २३ ] 


शएकथधा भवति तदा एने वाकु सर्वेर्नामाभिः सहाउप्येति चल्ः सर्वे 
रूप! सहाप्येति ओज सर्वे! शाज्दे! सहाप्येति मनः सर्वेध्यानै 
सहाप्येति स यदा प्रतिवुध्यते यथाउग्रेज्वछतः सवा दिशो विस्फु- 
लिज्ला विप्रतिष्ठरन एचमेव एतस्मात्‌ आत्मनः सर्वे प्राणा चथायतन 
'विपतिछ्ठन्ते प्राणेश्थो देवा देवेस्यों लोका' यह श्रुति दिन दिनमें 
उत्पत्ति प्रढय कहे है. इनमें यथा समान नाम रूप होवे हैं तथा पूर्वकल्पप्रपंचके 
समानही नाम रूप उत्तर प्रपंचका होवे है; यातें पूवआकृृतिक व्यक्तिके अंगीकारसे 
शब्दमें र॑ंचक विरोध नहीं. श्रुतिमें प्राणपद परमात्माका चाचक है. एकधापदर्स 
अंभेदग्महण है, सर्वप्राणपद्से वादयादिकका श्रहण है. देवपद अग्नि आदिकोंका 
बाचक है, छोकपद विषयवाचक है. इति ॥ स्मृतेः नाम “सूर्योचन्द्रमसौ 
घाता यथापू्वभकल्पथत” इत्यादि श्रुति स्वृतिसे भी समानही नामरूप 
निश्चित है. इति ॥ ३० ॥ 


मध्वादिष्वसम्मवादनधिकारं जेमिनिः ॥ ३१ ॥ 

मध्वादिषु । असम्भवात्‌। अनधिकारम्‌ । जेमिनिः । इति प० । 
थे-“असौ वा आदित्यों देवमधु” जा श्रुतिमें सूयेको देवमधु कहा 

है अर्थात्‌ देवनको मधुरूपसें सूर्थकी उपासनाका विधान किया है, तहां सूर्यको 
देवनमें मानके एकही सूयको उपास्थ उपासक और प्राप्य प्रापक्त कहिना 
संभवे नहीं, यातें यथा सघुआदिक उपासनामें देवनका अधिकार नहीं, तथा 
अह्मविद्यामेंभी देवनका अधिकार नहीं. तहां यह अनुमान हैः--बह्मविद्यार्म 
देवनका अधिकार नहीं, विद्या होनेसें, मधुआदि विद्यावत्‌” इति | यह जैमिनि . 
आचार्य माने हैं. इति ॥ ३१॥ 


ज्योतिषि भावाच ॥ ३२ ॥ 
ज्योतिषि । भावात्‌ । च । इति प० 
अथे-चले जाते जे ज्योतिर्मेंडल प्रतीत होवे हैं तिनको छोकमें सूयोदिक 
देवता वाचक शब्दोंस कहे हैं, ते मंडल मृत्तिकावत्‌ अचेतन हैं, विग्रहसे रहित 
हैं, यातें देवनका चह्मविद्यामें अधिकार नहीं; यह जैमिनि आचार्य माने हैं. इति। 
साव तु बादरायणांजसत हि ॥ ३३ ॥ 
भावम्‌ । तु । बादरायणः । अस्ति । हि । इति पृ०। 

अधथ-तु पद पूर्वपक्षनिषेधार्थक है, देवनका अह्मविद्यामैं 'भावस्‌! नाम अधि: 


[अ० १ पा० ३ सू० ३४ ] भाषादीकासहितानि ) ६५ 


कारित्व अस्ति नाम है. यह बादरायणाचाय माने हैं. यद्यपि देवताका देवताउ- 
पासनामें अधिकार नहीं तथापि निर्गुण बरह्मविद्यामें अधिकार है. और सूचा- 
दिक शब्द केवछ ज्योतिर्वाचक नहीं किंतु ततअभिमानी देवतावाचक हैं. 
सूथ पुरुष हुआ था इंद्र मेप हुआ था इत्यादि गाथासें सामर्थ्यभी अतीत होवे 
है, यातें देवतावोंका विद्यामें अधिकार है. इति ॥ १३ ॥ ! 

अच०-शूद्रजातिका बह्मविद्यामें अधिकार है यह उत्तरसूत्रके पूर्वपक्षमें फल है, 
सिद्धांतमें अधिकारका अभाव फल है. छांदोग्यके चतुर्थ प्रपाठकम्में एक गाथा 
है कि कोई जानश्रुति राजा था बह बहुग्रणोंकरके युक्त था, तिसके गुणोंकरके 
संतोषित देव ऋषि हँसोंके रूप धारकर भीष्मकालमैं मंद्रपर सोयेहुए राजाके 
ऊपरसे पंक्ति बांध कर आये, तहां आकर पाछेका हंस आगेके हंसको' चोला 
हे भद्राक्ष ! इस जानश्रुति राजाके स्रगलोकपर्यत विद्यमान तेजको तें नहीं 
देखे है, अर्थात्‌ इसके ऊपरसें नहीं चला चाहिये. इस' वचनको सुनके आगेका 
हंस वोछा कि यह राजा क्या रैकके तुल्य है? यह वाक्य सुनकर राजाने विचारा कि 
रक्त कोई ब्ह्मचेत्ता है तांके समीप जाना चाहिये, जा विचारके तांकी खबर मँंगा- 
यके तहां गौरथादिक लेजाकर कहा ! हे रैक्क | इनको ग्रहण करके हमको उप- 
देश करो. इस बचनको सुनके रैक्तने यह वाक्य कहा कि--“अह हारेत्वा 
शद्र ! तबैच गोभिरस्तु इति” इसमें अह पद कोपयुक्त शब्दवाची है. हे 
शूद्व! हारेत्वा नाम हारयुक्त जो रथ सो गोसहित तुम्हारे लियेही हो. इति । इसमें 
यह संदेह है कि अह्मविद्यामें शूद्रक्ा अधिकार है वा नहीं. इति ! आत्माअर्थी 
शूद्रभी है यातें देवनका यथा विद्यामें अधिकार है तथा झूद्रकाभी त्रह्मविद्यार्म 
अधिकार है. और जानश्रुतिको रैक्कने झूद्गसंबोधन देकर पाछे उपदेश किया है; 
यातें शुद्धका विद्यामं अधिकार है- इस पूर्वपक्षमें यह उत्तरका सूत्र हैः-- 


शुगस्य तदनादरश्रवणात्तदाद्रवणात्सूच्यते हि ॥३४॥ 


शुक्ू । अस्थ। तत-अनादस्श्रवणात्‌। तत॑-आदहरवणात्‌ । सूच्यते । 
हि। इति प०॥ . 


5 
अथै-अस्य नाम इस जानअश्रुतिको तत नाम हंसके अनादरअवणसे जो 
शुक्‌ नाम शोक उपजा था, सो शोक रेकने स्वसवेज्ञताके प्रगंट करनेके लिये 
झूद्गपदसे खच्यते नाम सूचन किया है- तत्‌ नाम शोकके जाद्रवणात्‌ नाम 
[ त्रत्‌ नाम शोकके आद्रवणात्‌ नास 


0 2 न लय नननट कि“ 
१ वा तदा अख्ब॒णात्‌ नाम राजाको रैकके समीप आप्त होनेसे । 
ब्रह्म० $ 


ध््ध ब्ह्मसृत्राणि [अ० १ पा० इसू० शा] 


जानश्रुतिको प्राप्त होनेसे योगवृत्तिकरके शूद्धपद क्षत्रियवाचक है; यांते शद्गरका 
ब्रह्मविद्यामें अधिकार नहीं. इति ॥ ३४ ॥ 


किंच+--- $ 
क्षत्रियलगतेश्रीत्तरत्र चेत्रथेन लि्वात्‌ ॥ ३२५ ॥ 
क्षत्रियलगतेः | च । उत्तरत्र । चेत्ररथेन । लिज्ात्‌ । इति प० | 


अध-रैक्षके उपदेशके आगे प्राणविद्या है. उत्तरत्र नाम ता आणबिद्यार्मे 
अभिप्रतारिनाम चैत्ररथ प्रसिद्ध क्षत्रिके साथ सहचार सुना है. बाहुल्यता ' 
करके सहचार एकजातिवानोंका होवे है. लिंगात्‌ नाम तिस सहचाररूप छिंग- 
सें जानश्रुतिमें क्षत्रियत्व गति नाम अवगति अथांत्‌ निश्चय होवे है, यांतेभी 
जानश्रुति मुख्य शूद्ध नहीं. तहां प्राणविद्यामें यह कहा है कि शौनक कापेय 
और अभिप्रतारि काक्षसेनि यह दोनो भोजनस्थानमें गये तब एक अह्चारीने 
उनसे भिक्षा मांगी. इति ॥ तहां शुनकका पुत्र शौनक ब्राह्मण, कक्षसेनका पुत्र 
अभिप्रतारि राजा था। “एतेन वे चित्रर्थ कापेया अयाजयन” जा 
अ्ुतिमं कपि गोत्रवानको चित्ररथ क्षत्रियका पुरोहित कहा है, यांते कपिगो- 
न्रवान्‌ चित्ररथके पुरोहितसे संयोग होनेकरके अभिप्रतारिमैं चैत्ररथत्व सिद्ध 
होवे है. यद्यपि अभिप्रतारिमें तिसके योगसे चैत्ररथत्व सिद्ध होवे है, क्षत्रियत्व 
सिद्ध होवे नहीं, तथापि “तस्मात्‌ चैचरथिनॉम एकः क्षत्रपतिरजायत 
जा अ्रतिसें क्षत्रियत्व सिद्ध होवे है. तस्मात्‌ नाम चित्ररथसें चैत्ररथ नामक एक 
क्षत्रियोंका पति उपजा. इति ॥ २७५॥ . 


संस्कारपरामर्शात्तंदभावाभिलापाच ॥ ३६ ॥ 


संस्कारपरामर्शात्‌ । तदभावाभिछापात्‌ । च्‌ । इति प० । 


अथे-जा जा स्थानमैं विद्याका उपदेश है ता ता स्थानमें उपनयनादि 
संस्कारोंका परामशी होवे है, यांतेभी झद्भजातिका विद्यामँ अधिकार नहीं। ननु- 
शुद्धके भी उपनयनादिक कस्पेसें हानि नहीं, जा शंकासें कहे हें--“न शूद्गे पा- 
तक॑ किश्वित्‌ न च संस्कारमहेति। शूद्रथ्नतुर्थों चण एकजातिः” इत्या- 
दिक बचनोमे तत्‌ नाम उपनयनादि संस्कारोंका जमाव अभिलापात्‌ नाम 
कथन किया है यांते संस्कारकल्पना संसवे नहीं । भक्ष्यअभक्ष्यविभागके 
अभावसें शुद्धमें पातक होवे नहीं. इति ॥ ३६ ॥ 


[भ० १ पा० ३ सू०३८] भाषादीकासहितानि | ६७ 


तदमभावनिर्धारणे च प्रदत्ते! ॥ ३७ ॥ 


तदभावनिधोरणे । च।। प्रवृत्तेः | इति । प० | 


अध-छांदोग्यके चतुर्थ प्रपाठकर्में यह कहा है कि सत्यकास एक ब्राह्मण 
था उसने पिताके मरे पीछे मातासें पूछा, हम बह्मचर्य करेंगे, हमारा गोत्र 
क्या है ? उसने कहा हमको खबर नहीं, हमारा नाम जबाछा है. सत्यकाम तु- 
सहारा नाम है. सत्यकामने गोतमके पास जाकर कहा हे भगवन्‌ ! आपके पास 
ब्रह्मचरय करेंगे. तव गौतमने यह वाक्य कहा कि ““किंगोत्रों नु सोम्पासीति 
इति” गौतमने कहा तुम्हारा गोत्र क्या है ? उसने कहा हमने मातासें पूंछा था 
सो उसने कहा योवनमें बहुव्यवहारमें हमारा चित रहिता था इसलिये 
तुम्हारे पिताकों में जानती नहीं, जवाला मेरा नाम है, सत्यकाम तुम्हारा नाम 
है? सो मैं सत्यकाम जाबाल हूँ. तब गोतमने यह कहा कि “नैतत्‌ अन्नाह्मणो 
विवक्तुमहति समिर्ध सोम्थ आहरोप त्वा नेष्ये न सत्यादगाः 
इति” गौतमने उसको सत्यभापणसें ज्राह्मण निश्चय किया, तब उपनयनादि 
किये. सो सूत्रका यह अक्षरार्थ है कि सत्यकाममें तत्‌ नाम श्द्धत्वके अभा- 
बको निर्धारण नाम निश्चयकरके उपदेशमें गौतमकी प्रवृत्तेः नाम अबूत्ति हुई थी 
यांते झूद्जातिका विद्यामें अधिकार नहीं. इति ॥ ३७॥ 


श्रवणाध्ययनार्थप्रतिषेधात्स्तेश्व ॥ ३८ ॥ 


अवणाध्ययनाथप्रतिषेघात्‌ । स्टतेः । च । इति प०। 
अभ-स्मृतिमें साक्षात्‌ वेदअवणका वेदाध्ययनका अजुष्ठानरूप अर्थका 
पे डे. कि वेदपूर्वक बिद्यार्मे 

शुद्धको निषेध छिखा है यातें भी वेदपूर्वक विद्यामें शुद्धका अधिकार नहीं. 
इति ॥ #८ ॥ 

अव०-कठकी पंचमवंलीके आरंभमैं यह कहा है--“ऊध्व॑स्ूलोडवाक- 
झआाख एपोउश्वत्थ। सनातन; | तदेव झुक तद ब्रह्म तदेवासतमुच्यते । 
तस्मिन छोकाः श्लिताः सर्वे तंदु नाल्ेति कश्वन ॥ यदिदं किंच जग- 
त्सर्च प्राण एजति निःखतम्‌। महद भर्य वजखब्यतं य एतदिदुरग्दतास्ते 
मवन्ति ॥ भयादस्पाउश्रिस्तपति भयाक्तपति सथेः मयादिन्द्रथ वायुश्र 


१ तत्‌ नाम बह्को कोईभी जन न अद्ेत्ति नाम तासें अन्यत्वको प्राप्त होवे नहीं किंतु सुघुप्तिमें ततरूपता- 
को जाग्रतस्वप्तमें ततसंबंधको प्राप्त होगे है. जयवका मूल कोई नहीं या शंकासें यह संत्न अछत्त होते है. 





ष्८ ब्रह्मसूत्नाणि [अ० १ पा० ३. सू० 9१] 


सत्युधोचाति पश्चम! इति” ॥ उक्त वाक्‍्यमें यह सबे जगत्‌ प्राणोंको निश्चित 
हुए चेष्टा करे है, प्राणोंसें उपजे है; सो प्राण महान्‌ है, तासें से अभिआदिक 
भय करे हैं, यातें सयरूप है. भयका कारण होनेसें चज़्रूप है, तिसको जे जा- 
ने हैं ते अमृतरूप होवे हैं. इति ॥ इस वाक्‍्यमें जो प्राण कहा है सो वायु है वा बह्म 
है यह संदेह है. पूर्वपक्षम प्रसिद्धिसे घायु अंगीकार कियेसें यह उत्तरका सूत्र हैः- 


कृम्पनात्‌ ॥ ३९ ॥ 
अशथ-कम्पनात्‌ नाम जगतकी जो जीवनादि चेष्टा तांका प्राण कारण है 
यातें उक्त बाक्यमें प्राणपद घह्मका चोधक है, प्राणवायुका वोधक नहीं. 
#प्रेणस्प प्राण” इत्यादिक अनेक वाक्यनमें प्राणशब्द ब्रह्मका वोधक 
देखा है और पूर्ववाक्यमें मयहेतु भी सुना है, यातें ऋह्महीका तहां अंगीकार है, 
वायुका नहीं, इति ॥ २९ ॥ 


8 ४ ूँए 
ज्योतिदंशनात्‌ ॥ ४० ॥ 
ज्योतिः । दर्शनात्‌ । इति प० । 
अथ-“परं ज्योतिरुपसम्पय जा छांदोग्यवाक्यमैं ज्योति कथन किया 
है. सो ज्योति सूर्यादिकोंका तेज है वा बह्म है जा संशयसे पूर्वपक्षमें तेज अं- 
गीकार कियेसे यह सिद्धांत है कि आरंभमें हम सर्वपापरहित अमृत अजर 
अभयरूप कथन किया है यातें उक्तधर्मनके दर्शनसें ज्योति तहां ब्रह्म अंगी- . 
कृत है. तेजका अंगीकार नहीं. पूर्वपक्षमें सू्यंडपासना फल है, सिद्धांतमें अह्म- 
बोध फल है. इत्ति ॥ ४० ॥ 
अच०-ज्योतिवाक्यके आगे यह वाक्य हैः--“आकाहझो' वे ना स नासरूप- 
योनिवेहित्ता ते यदन्‍्तरा तद्‌ ब्रह्म तद्स्॒त स आत्मा इति” एक नाम प- 
दका असिद्ध अर्थ है. यह आकाशही नासरूपका निवेहिता है. अर्थात्‌ नामरूप आ- 
काशके अंतर हैं; सो चह्म है, सो आत्मा है, सो अमृत है. इति। इस उत्त बचनमें 
भ्ूताकाशका ग्रहण है वा परमात्मा अंगीकृत है जा संदेहंसें पूर्वपक्षमें भूताकाश 
अंगीकार कियेसें यह सिद्धांतसूत्र हैः-- 


आकाशो४्थान्तरखादिव्यपंदेशात्‌ ॥ ४१ ॥ 


« आकाशः | अधान्तरत्वादिव्यपदेशात्‌ । इति प०। 
अथ-आकाशको उक्त विषयवाक्यसें नामरुपसें भिन्न कहा है, भूताकाशको 
नामरूपसे सिन्न कहिना संभवे नहीं; यांते तहां आकाशशब्द्से परमात्माका 


[ज० १ पा०३ सू० 9३ ] भाषाटीकासहितानि । ६० 


अंगीकार है, भ्रूताकाशका नहीं. पूर्वपक्षमें अह्मउपासनासें ऋममुक्ति फल है. 
सिद्धांतमें अह्मवोधसें साक्षात्‌मुक्ति फल है. इति ॥ ४१ ॥ 

अव०-उत्तरसूत्रका पूर्वपक्षमें कमंकताकी उपासना फल है, सिद्धांतमैं प्रत्यकू- 
ब्रह्म अभेदवोध फल है. बृहदारण्यकके पष्ठ अध्यायके चतुर्थ ब्राह्मणमें थे 
वाक्य हैं;--“स वा एव सहानज आत्मायोज्यं विज्ञानमयः ग्राणेषु यए्‌- 
षोउन्तहंद्ये आकाश: तस्मिन रोते सवस्य वच्ची स्वेस्य इंशानः सवे- 
स्पाधिपतिः स न साधुना कभेणा स्ूयाज्नों एवासाधुना कनीयान्‌ एप 
सर्वेश्वरः एब भूताधिपतिः एव भूतपाल एष सेतुर्विधरण एवा लोकानामस्‌ 
अखम्भेदाय” इति। ये वाक्य जीवके वोधक हैं वा जीवका अनुवाद करके 
बह्कके वोधक हैं जा संदेह हुएसें उक्त वाक्यनमें संसारीवोधक पद हैं बअह्मवो- * 
घक पद नहीं, यांते जीवके वोधक हैं जा पूर्वपक्षमें यह उत्तरका सूत्र हैः-- 


सुषुष्युत्कान्योमेंदेन ॥ ४२ ॥ 

सुष॒स्य॒त्कान्योः । भेदेन । इति प० | 
अर्थ-सुष्॒धिकालमें और उत्कांतिकालमैँ जीवसें भिन्न कर ईश्वरको उत्त- 
, वाक्यनमैं कहा है, यांते उक्त वाक्य जीवका अलुवाद नहीं करें हें किंतु विज्ञान- 
मय सुषुसिअवस्थावान्‌ जीवका अनुवाद करके बल्लाभेदके बोधक हैं. इति॥ ४२॥ 


पद्यादिशब्देमभ्यः ॥ ४३ ॥ 
पद्यादिशब्देभ्यः | इति प० | 
अथ-उच्तवाक्यमैं पतिआदिक पद असंसारिबोधक भान होवे हैं, यांते अ- 
संसारी जीवके उक्तवाक्य बोधक हैं. सो, जीवका असंसारिस्वरूप परमात्मास्त- 
रूप है, यांते उक्तवाक्य परमात्मावोधक हैं. इति ॥ ४३ ॥ 
इति सूज्नसावार्थमकाशिकाभाषादीकायां अथमाध्यायस्य तृतीयः पादः समाप्त: || ३ ॥ 





अथ चतुर्थपादप्रारम्भः । 
इस पादसैं अष्टाविंशति सूत्र हैं. तिनमें आठ अधिकरण हें- विंश गुण हैं 
तथाहि-- 
सूत्रसंख्या। अधिकरण। गुण - « ' मसज्ञ-: 


2 आ० - न के अव्यक्तंका विचार- 


के के ढक के के भी के मे 


० 


नी 
ग। 
न + 4 


श्६ अआअ० 


पं 
८ण् 
न के न 
| हि ने क॑ की ने 4 न पे 4 





द्ध 


गु० 
गु० 
गु० 
शु० 
ञ्ु 6 
ग्ु 6 
ने 

जु 6 
गु 6 
शु० 
ञ्ु ७ 


या 





२० 


[अ० १पा० 9 सू० १] 


० 

अआअ० 

अआ० 

आ० 

आ० 

अआण० 
अजाविचार. . 
आ० 

आ० 
पश्चजनविचार- 
प्‌० 

प्‌० 
कारणवाक्यविचार- 
का० 
वेदितव्यविचार 
बे० 

चे० 
द्ृष्टव्यविचार« 
द्र्क 

द्र्० 

द्र छ 
निमित्तोपादानविचार- 


नि० 
मि० 
नि० 
नि० 
सर्चमतनिषेध- 
इ्ति 


अव०-प्रथमपादमें सब वेदांतका अह्ममें समन्वय सिद्ध किया है, छ्वितीय- 
पादमें अस्पष्ट लिंगयुक्त जे उपास्थ जह्वोधक वाक्य तिनका विचार किया 


[अ० १ पा०9 सू० १] भाषाटीकासंहितोनि । ७१ 


है, हतीयपादमें अस्पष्टलिंगयुक्त जे ज्ञेय बह्मवोधक वाक्य तिनका विचार 
किया है. कहूँ कह वाक्यनमेैं प्रधानवोधक पद प्रतीत होवे हें यांते प्रधानको' 
अशब्द कहिना संभवे नहीं, जा शंकासें तिन पदनको अपर अर्थवोधकताके 
प्रतिपादनार्थ इस पादका आरंभ है। पूंब सर्व जगतका कारण जो ब्रह्म सो 
सर्व वेदांतकरके प्रतिपा् है प्रधान प्रतिपाथ नहीं जा अर्थ सिद्ध किया है, 
तहां यथा ब्रह्मको अंगीकार किया है तथा प्रधानकोभी जगतकारण मानके 
बेदांतकरके प्रतिपाद्य मानना संभवे है. किसी कव्पमें अ्रह्मको किसी कल्पमें प्र- 
धानको कारण मानेसें हानि नहीं, जा शंकासें उत्तरसूत्रका आरंभ है. तहां 
पूर्व पक्षमें ज्मविषे वेदांतससमन्वयकी असिद्धि फल है. सिद्धांतमें समन्वय नियम- 
सिद्धि फल है. कठकी तृतीयवलीमें यह वाक्य हैं;--“आत्मानं रथिन॑ विडि 
दारीरं रथमेव च | बुद्धि तु सारथि विदि मनः प्रश्रहमेव च | इन्द्रियाणि 
हयानाहुविषयांस्तेषु गोचरान्‌ । आस्मेन्द्रियमनोयुक्ते भोक्तेत्याहुमे- 
नीषिण: ॥ यस्त्वविज्ञानवान, भचत्ययुक्तेन मनसा सदा। तस्येन्द्रि- 
याण्यवच्यानि दुष्टराभ्वा हव सारधेः ॥ यरतु विज्ञानवान्‌ भवति युक्तेन 
भनसा सदा । तस्पेन्द्रियाणि चहयानि सद्स्वा इच सारथे!॥ यसतु अवि- 
ज्ञानवान्‌ भवतद्यमनस्कः सदाउ्लछ्ुचि! । न स तत्पद्माशोति संसार 
चाधिगच्छति ॥ यस्‍्तु' विज्ञानवान्‌ भवति समनसस्‍्कः सदा झछुचिः। 
स तु तत्पद्मामोति यस्मात्‌ ऋयो न जायते ॥ विज्ञानसारथियेस्तु 
भनःप्रग्नहवात्षर: । सोडध्चनः पारमाप्तोति तदू विष्णों: परम पदम ॥ 
इन्द्रियेम्थः परा हाथी अर्थेन्यश्र पर॑ मनः। सनसस्तु परा बुद्धिवुद्धेरात्मा 
सहान्‌ परः॥ महतः परमव्यक्तमब्यक्तात पुरुष: परः। पुरुषान्न पर 
- किंचित्‌ सा काष्ठा सा परा गति: ॥ एप सर्वेषु खतेजु गढात्मा न 00% 
चाते। हृशयते त्वव्यया बुद्धा खूक्मया खक््मद्शिमिः” इति। 


होनेसें प्रधान है यांते आत्माको रथका स्वामी जान । 
शरीर भोगका स्थान है यांते इसको रथ जान। बुद्धि विवेक अविवेकरूप ढृ- 
त्तिसें शरीरद्वारा भोक्ताको सुख डुश्खमें जोड़े हैँ यांते बुद्धिको सारथि कप 
विवेकाविधेकयुक्त मनसे इईद्वियोंकी विषयोंमें प्रदृत्ति और तहांसे न्‍ निबृत्ति होवे 
है यांते मनको प्रथ्रह नाम वागडोरके समान जान । वश हुप इंद्रिय 
सुक्तिके मार्ममें प्रास करे हैं, अबश इंद्रिय अनर्थकों मास करे हैं; यांते इंदि- 
योंको अश्वनके समान जान। यथा अश्व मार्गको देखकर चले है तथा इंद्वियरूप 


्‌ ० प 
अथ-आत्मा भोक्ता होने 


जर्‌ अद्यसूत्नाणि | [अ० १ पा० 9 सू० ११] 


घोडेभी विषयोंको देखके चले हैं यांते विषयोंको मार्गकें समान जान । इंद्रिय- 
मनकरके युक्त आत्माकों बुद्धिमान्‌ भोक्ता कहे हैं। जो अयुक्त मनकरके 
सदा अविज्ञानवान है तांकी ईइंद्वियां बशमें नहीं, यथा दुष्ट अश्व सार- 
थिके वश नहीं रहें हें. जो युक्त मनकरके सदा विज्ञानवान्‌ है तांकी इंद्विया- 
बरामें हैं, यथा शिक्षित अश्व सारथिके वशमें होवे हैं. जो अमनस्क, अश्ञचि, 
अविज्ञानवान्‌ है सो परपदको नहीं प्राप्त होवे है; किंतु संसारको प्राप्त होवे है. 

जो सदा समनस्क है, शुचि है, विज्ञानवान्‌ है, सो तिस पदको आप्त होवे है 
जासें पुनः जन्म नहीं होवे है. जो विज्ञानसारथिवान्‌ है, मनः्प्रमहवान्‌ है सो 
संसारमागके पारको प्राप्त होने हैं. सो विष्णुका परमपद है. इति ॥ उत्त वाक्य- 
नसें अजितेन्द्रियको संसारप्रापि कहकर जितेन्द्रिय पुरुषको विष्णुके परप- 
दकी आध्ति कही है. सो संसारमागंसें परे विष्णुका परपद कौन है ? जा संदे- 

हसे कहे हैं. इंद्रियोंसें अथ नाम विषय परे हैं. सर्व इंद्रियोंसे परे हैं. श्रुतिमें विष- 
योँसें इंद्रिय परे अंगीकृत हैं; यातें सनको इंद्रियाँसें परे कहा है. निश्चयरूप 
बुद्धि मनसे परे है. पूष जो रथीकरके आत्मा कहा है सो सर्चका स्वामी भोक्ता 
बुद्धिसें परे है, सो आत्मा महान्‌ है. तिस महान आत्मासें अव्यक्त परे है. अव्यक्तसें 
परे पुरुष है. तांसे परे रेचक नहीं. सो अवधि है. सोई पर गति है. यह आत्मा 
सर्वभूतनसें छपाहुआ है, प्रतीत होवे नहीं. सूक्ष्मदर्शी पुरुष सूक्ष्म बुद्धिकरके 
इसको जाने हैं. इति ॥ उक्त वाक्‍्यमें अव्यक्तपदसें प्रधालका अंगीकार है वा 
रथरूप शरीरका अंगीकार है जा तहां संदेह हें. सांख्यमतमें महत अ- 
व्यक्त । पुरुष । जा त्रय पद त्रय तत्वके वाचक माने हैं; यातें अव्यक्तपदसे तहां 
प्रधान अंगीकृत है, यह पूर्वपक्ष है. इसका आधे सूचसे अनुवाद करके आधे 

सूत्रसे भगवान्‌ सूत्कार समाधान करे हैंः--- 


आह्ञुमानिकमप्येकेषामिति चेन्न शरीररूपकविन्यस्त- 
ग्हीतेदशयति च ॥ १॥ 
आलनुमानिकम्‌ | अपि । एकेषास | इति। चेत्‌ । न। शरीररूपक- 
विन्यस्तमृहीतेः । दर्शयति । च | इति प०। 


अथ- एकेषास्‌ नाम काठकोंकी शाखामें अव्यक्तपदका वाच्य प्रधान है यातें 
आलुमानिक नाम अलुसानसिद्ध जो प्रधान तांको सांख्यमतानुसारी अब्यक्त- 
पदका चाच्य साने हैं यातें प्रधानको अशव्द कट्दिना संसवे नहीं, इति चेत्‌ 


[अज० १ पा० 9 सू० 9 ] भाषादीकासहितानि | छ३्‌ 


नाम यह शंका करें तो संभवे नहीं. तथाहि आर॑सवाक्यमैं शरीरकी रूपकवि- 
न्यर्ति नास रथरूपकल्पनाका अहण किया हैं यातें अव्यक्तपदसें शरीर अंगीकृत 
है, व शरीरका रूपकविन्यास कहा है तांका गहीतेः नाम अव्यक्तपदसें अहण 
- है, और पूबे उत्तर विचारसें शरीरकोही अव्यक्त पदकरके बोधवाक्य दर्शयति 
नाम दिखावे है, यातें प्रधान अव्यक्तपदका वाच्य नहीं. इति॥ १॥ 

अच०--नजु-शरीर तो व्यक्तपदका वाच्य है, यांते तांको अव्यक्त पदका 
वाच्य कहना संभवे नहीं; जा शंकासें कहे हैं।--- 


सूक्ष्मं तु तदहेतवात्‌ ॥ २॥ 
सूक्ष्म । तु । तदहत्वात्‌ । इति प०। 


अथै-तुपद शंकानिषेधार्थक है, तत्‌ नाम अव्यक्त पदके अहई नाम योग्य 
सूक्ष्म भूत हैं यांते स्थूलशरीरके आरंभक जे सूक्ष्म भूत तिनको अतव्यक्तपदसें 
श्रुति कहे है वा तदमिमानी हिरण्यगर्भ अंगीकृत है, यथा ' गोनिः श्रीणीत 
सत्सरम्‌ ! इस वाक्यमें गोपदसें गोविकार जो पयस ताका अहण है, तथा 
तहां श्रुतिमँ कारणवाचक अव्यक्तपदसें तत्कार्य शरीरका अहण है। दुग्धकरके 
सोमको मिलाबे यह वाक्यका अर्थ है. इति ॥ २॥ है 

अचव०--नलु-सिद्धांतमैं जे सूक्ष्म श्रत माने हैं तेही सांख्यमतमें प्रधान 
प्रतीत होवे हैं, तांसें भिन्न कोई प्रधान पदार्थ अतीत होवे नहीं; यांते प्रधान- 
कारणवाद सिद्ध होवे है; जा शंकासें कहे हेंः-- 

तदघीनलादर्थवत्‌ ॥ ३॥ 
तदधीनलात्‌ । अर्थवत्‌ | इति प०। 

अभथ-अधान जो पदार्थ माना है तांको हम तत्‌ नाम इंश्वरके अधीन 
माने हैं यातें अधानकारणवाद सिद्ध होते नहीं. सो ईश्वरभी शक्तिविना 
कार्य करणेमैं समर्थ नहीं किंतु शक्तिको आश्रय करकेही कार्य करे है यातें 
अच्यक्तपदका वाच्य अर्थवत्‌ है, अनर्थक नहीं. इति॥ ३ ॥ 


किंच+--- 
न्लेयववावचनाच ॥ ४ ॥ 


ज्ञेयावचनात्‌ (च । इतिप०। | 
अधै-सांख्यमतमैं प्रकृतिपुरुषके विवेकज्ञानसें झक्ति मानी है यातें तांके सतर्में 


अहय, १० 


७9 . बअहमसूत्राणि | [अञज० ६ पा० 9 सू० ६ ] 


मोक्षार्थ प्रधान ज्ञेय सिद्ध होवे है,प्रसंगमें कठ विपे प्रधानको ज्ञेय कहनेवाला वाक्य 
प्रतीत होवे नहीं किंतु प्रसंगमें अव्यक्त पद मात्र सुना है, यातें प्रधानको ज्ञेय 
कहनेधाले वचनका अभाव होनेसेंसी अव्यक्तपदका वाच्य प्रधान नहीं. इति ॥४॥ 


वदतीति चेन्न प्राज्षो हि प्रकरणात्‌॥ ५॥ 
वदति । इति। चेत्‌ । न । प्राज्ः । हि । अकरणात्‌ । इति । प०। 


अथ-कठमैं पूर्वोक्त वाक्यके आगे यह वाक्य हैं।--अच्ञाचद्सरपद्ी मरूप- 
भव्ययं तथाउरस नित्यमगन्धवच यत्‌ | अनागनन्त महतः परे धुव 
निचाय्य त॑ रत्युख्रखात्पसुच्यते इति? इसका यह अर्थ हैं कि सदा जो 
शब्दादिकोंसे रहित है तिसको निचाय्य नाम जानके मृत्युके मुखसें छूटे हैं, 
इति ॥ यह वाक्य प्रधानको वदति नाम ज्षेय कहे है यातें प्रधानको ज्ेय करके 
कोई वाक्य कहे नहीं यह कथन असंगत है, जा इंकाका यह उत्तर हे कि 
“पुरुषसें परे रंचक नहीं सोई गति है” इत्यादिक बचनोंकरके आत्माका तहां 
प्रकरण प्रतीत होवे है; यातें उक्तश्रुतिमें निचाय्य नाम ज्षेयरुपसें प्राज्ञ आत्साका 
उपदेश है, प्रधानका नहीं. इति ॥ ५ ॥ 

किंच+-- 


अयाणामेव चैवसुपन्यासः प्रश्नश्च ॥ ६ ॥ 

त्रयाणाश। एवं। च। एयस्‌। उपन्यासः । प्रश्न:। च। इति। प०। 

अथे-कठमैं अस्नि, जीव, परमात्मा जा त्रयका एवम्‌ नाम॑ वक्तव्यताकरके 
उपन्यास नाम ग्रहण है. त्रयविषेही तहां प्रश्न है यातेंसी प्रधान अव्यक्त पदका 
बाच्य नहीं और ज्ञेय नहीं। यह त्रय प्रश्न हैं-- “से त्वमर्ति खगेसध्येषि 
झत्यो प्रन्राहि त॑ श्द्घानायथ मणछम्‌ यह अश्निविषे प्रश्ष है । “छोकादि- 
सन्ि तझुवाच तस्मे” इत्यादि तहां. उत्तर है। “याँ इये पेते विचिकित्सा 
पलुष्घे अस्ति इस्रेके नाथम्‌ अस्ति इति चैके एतत्‌ विद्याम्‌ अन॒ुशिष्ठ; ” 
यह जीवविषे प्रश्न है। “योनि्सन्ये प्रपच्मन्ते शरीरत्वाय देहिन! । स्था- 
णुमन्ये अनुसंयन्ति यथाकमे यथाश्रुतम्” यह उत्तर है। “ अन्यत् 

१ सो तें यम खगेसाधन अभिको जाने है. दे रुत्यो! तांको मम भ्रद्धावान्‌ प्रति कहो। २ सर्वे्ञोकनका 
आदि जो अभि विराद्खरूप तोको नचिकेता अति कह्दा ।: ३ मनुष्यके रुत्युहुए देहसे भिन्न आत्मा है. यह 
फोई कहे हैं कोई नहीं कह्दे हैं यह जो संदेह है ततनिद्डत्तिका उपायरूप विद्याको तुम्दारे उपदेश करके जाहूं, 


सो कद्दो £ यह तीसरा बर वाकी है। ४ कोई अरविदयावान, शुक्र जीवन्‍्मुक्त हुए शरीरमहणार्थ योनिमैं 
अवेश करे हैं, अल्यंत्त भंधम हथावरयोविको परदे हैं, कमेउपासनाके अनुसार | - 





दर 


[अज० १ पा० ४ सू० ८] भाषादीकासहितानि । छ्ण 


घर्मोदन्‍्यत्राधर्मादन्यञ्ञास्मात्‌ कृताकृतात्‌ । अन्यत्न भ्रूताच 'सव्याय 
यत्तत्‌ पहयसि तत्‌ वद” यह परमात्माविषे प्रश्न है। “ न जायते सियते 
वा विपश्ित्‌” इत्यादि उत्तर है. प्रधानविषे उत्तर प्रश्न प्रतीत होवे नहीं; 
यात प्रधान अव्यक्तपदका वाच्य नहीं. इति ॥ ६ ॥ 


"७ 
की जामपाओ 


सहहच ॥ ७॥ ॥ 

अथे-यथा । “विद अहम एत॑ पुरुष महान्तम” इत्यादि बेदमें सुना जो 
महत्पद तिसको सांख्यमतवाले महत्तत्त्वका वाचक नहीं माने हैं, तथा वैदिक 
अव्यक्त पदभी प्रधानका वाचक नहीं; किंतु शरीरका वोधक है. इति ॥ ७॥ 

अव०-स्वेताश्वतरके चतुर्थ अध्यायमें यह श्रुति हैः--/अजामेकां लो- 
हितशुकृूकष्णां बढ़ी! प्रजा; रुजमानां सरूपाः। अजों झोको जुबमा- 
णोष्छचुशेते जहालनां छुक्तमोगामजोडन्यः” इति । अथ-जन्मर- 
हित सत्व रज तम गुणरूप सब प्रजा कारण प्रकृति एक है, एक अजन्‍्मा 
पुरुष ता प्रकृतिको सेवन करताहुआ सो रहा है. अंपर अजस्मा तांसें भो- 
गनको भोगकर तांको त्याग देता है. इति । इस वाक्यमें जो अजा पद 
है तांसें प्रधान अंगीकृत है वा तेज अप अजन्नरूप अबांतर प्रकृति अंगीकृत 
है यह संदेह है. “न जायते इति अजा” या योगदृत्तिसे सांख्यमतमें अधान 
अंगीकार कियेसें यह सूत्रकारका सिद्धांत हैः-- 


चमसवदविशेषात्‌ ॥ ८ ॥ 
चमसवत्‌ । अविशेषात्‌ | इति प०। 


अगधै-उक्तवाक्यमें कोई असाधारण लिंग प्रधानका प्रतीत होवे नहीं, न 
जायते इति अजा” यह जो थोगबृत्तिसें अजात्वरूप लिंग है तांसें प्रधानभिन्न 
पदार्थका म्हणभी संभवे है. यथा-“अवाऋ बिरः चमस ऊध्वैदुन्न/ इस 
वाक्यसें यह चमस है जाविध निश्चय होवे नहीं नीचे जांका मुख है, ऊपर बुन्न 
है, सो चमसपात्र है? जा योगवृत्तिसें चमसका इदंताकरके निश्चय होवे नहीं; 
लथा योगवृत्तिसें चससवत्‌ अविशेषात्‌ नाम प्रधानभिन्नका गरहणभी तुल्य होवे 
है, यातें अजापदसें नियमकरके प्रधानको अहण करना .संभवे नहीं.. इति ॥८॥ 


७ अद्मयसत्नाणि । [अ० १ पा० 9 सू० १० ] 


ज्योतिरुपक्रमा तु वथा ह्यपधीयत एके ॥९॥ 


ज्योतिरुपक्रमा । तु । तथा। हि। अधीयते। एके | इति प० । 

अधे-ज्योति नाम तेज होवे उपक्रम नाम आरंभमें जिनके ते ज्योतिउप- 
क्रम कहिये हैं अर्थात्‌ तेज जल भूमिका अहण है. तिन त्रयका अजापदसें 
अहण हैं. यथा अजामंत्रमें लोहित झुक कृष्ण रूप प्रकृति कही है । एके नाम 
छांदोग्यवान्‌ तथाहि अधीयते नाम तेजजल्अन्नको प्रसंगमें छाकर त्ेजजल- 
अन्नका छोहित शुक्ल कृष्णरूप कहे हैं यातें अजासें त्रयको ग्रहण करे हैं अथवा 
अनिवेचनीय मायाका अजापदसें अहण है. इति ॥ ९ ॥ 


अच०-ननु छाग आदिकोंमें यथा अजात्वजात्याधारत्व है तथा तेजजलूभू- 
मिमें अजात्वजातिका आधारत्व नहीं, यातें तेज जल भूमि रूप प्रकृतिमें अजा 
पद रूढ़ नहीं और तेजजलूभूमि उपजे हैं यातें योगदत्तिसें भी अजापद तिनका 
बाचक नहीं जा शंकाका उत्तर कहे हैंः--- 


कल्पनोपदेशाच मध्वादिवदविरोधः ॥ १० 0 


कत्पनोपंदेशात्‌ । च । मध्वादिवत्‌ । अविरोधः । इति प०। 

अथे-“असौ वाव आदिलो देवमधुः” इस वाक्यमें यथा मधुस भिन्न 
जो आदित्य तांका मधुरूपसें उपदेश हैं, आदिपदसें यथा वाचाकी धघेलुरूपसें 
डपासना करे जा वाक्यमें धेडमिन्न जो बाचा तांका घेजुरूपसें उपदेश है तथा 
छोकप्रसिद्ध अजामैं जो भोगत्याग तततुल्यतारूप कल्पनासें तेजजलभूमिका 
अजात्व उपदेश संभवे है, विरोध नहीं. यातें प्रधान अशब्द है. इति सिद्धस॥१०॥ 


अच०-बृह दा रण्यकके पष्ठ अध्याय चतुर्थ ब्राह्मणमें यह प्रसंग हैः--“स हि 
सर्वेस्य कतो” यह कहकर आगे यह कहा हेः--“यदैतमलशुपद्याति आत्मानं 
देवमखसा। ईशान प्र्तभष्यस्थ न ततो विजुश॒ुप्सते ॥ यस्मादवीक़्‌ से- 
वत्सरो5्होभिः परिवतेते। तद्देवा ज्योत्तिषां ज्योतिरायुहोंपास तेडस्ट्त- 
म्‌॥ यस्मिन पश्च पश्चजना आकाइहाशओ् भपतिछित; । तमेव सन्‍ये झआात्मान 
विद्वान ऋ्रश्मार्ुतो5खतम। भाणस्प प्राणखुत चछुषश्चक्षुरुत ओचस्प ओज 
मनसो सनो ये विद॒ः।तें निविक्युज्ञेह्म पुराणमम्यम्‌॥ सनसैयानुद्गरष्टव्य 
नेह नानास्ति किल्वन । र॒त्योः स झत्युसाशोति य इह नानेव पदयाति ॥ 
एकथा एवालुद्रछव्यस्त्‌ एतद्प्रमय॑ धुवम्त। विरजः पर जाकाशात्‌ अज 


[ज० १ पा० 9 सू० “१० ] भाषादीकासहितानि । ७ 


आत्मा महान शुवः ॥ तसेव धीरो विज्ञाय प्ज्ञां कुर्वीत ब्राह्मण: । ना- 
शुध्यायाद बहून्‌ राव्दान्‌ वाचों विग्छापन< हि तत्‌ इति!॥ 
अथ-उक्त प्रसंगमें यह कहा है कि दिनोंकरके वर्ष जांके नीचे बरतें हे सो 
देव ज्योतियोंका ज्योति हैं. जामें पंच पंचलन और एक आकाश स्थित है 
तांको हम आत्मा साने हें. प्राणके प्राणको, चुके चक्षुको, शत्रके ओत्रको, मनके 
मनको जो जाने है अर्थात्‌ चेष्टाका प्रदाता है. इसप्रकार जे त्वंपदके रक्ष्यको 
जाने हैं ते अछ॒स बह्मको जाने हैं. उक्तवाक्यमें यह संदेह है कि “पश्च पश्चजना? 
इतने वाक्यकरके पंचविंशति तत्त्वको ग्रहण किया चाहिये, वा प्राणादि पंचको 
भहण किया चाहिये. तहां यह पूर्वपक्ष है कि पश्च पश्च जना' जा वाक्यमें जो प्रथम 
पंच पद है सो पंचतत्त्वतरोधक है, पंचजनपद पुरुषचोधक है, यातें पंचविंशति तत्त्व 
सिद्ध होवे हैं. ते तत्व कौन हैं? जा अभिलाषा हुएसें सांख्यस्मृतिमें कहे जे पंच- 
विंशति तत्त्व ते उक्तवाक्यमें ग्रहीत हैं; यातें प्रधान अशव्द नहीं इति। स्वेश्च- 
तिअथे--यदा गुरुके मुखसें भ्रूतभावीके स्वामी प्रकाशरूप आत्माको साक्षात्त्‌ 
देखे हैं तदा सर्वके स्वामीसें आत्माके विशेषकरके गुप्त करणेकी इच्छा नहीं 
करे है, भेददर्शीके उक्त इच्छा होवे है, आत्मदर्शीके नहीं. आत्मवेत्ताको किसीसें 
भय नहीं, यातें छिपनेकी तांको इच्छा नहीं, किंच जिस ईंशानसें स्वअवयवरूप 
दिनरातयुक्त वर्षरूप काल नीचे है तांकरके तिसका परिच्छेद नहीं होवे. सो 
आदित्यादिक ज्योतिपदार्थोका भी ज्योति है, तिसकी देवता आयु अमृतरूपसें 
उपासना करे हैं. किंच जा अह्ममें पंचजन गंध्देवादि पंचही संख्यावान्‌ और 
अव्याकृतरूप आकाश स्थित हैं तिस आत्माको अह्मरूप हम माने हैं. आत्माको 
तांसें भिन्न नहीं जाने हें, अम्ृतरूप ब्रह्ममैं, किंच तिसके प्रकाशर्से प्राण चेष्टा 
करें हैं यातें सो भ्राणोंका आण है, नेत्रोंका नेत्र है, ओत्रोंका श्रोत्रहै, मनका मन 
है, जे इस प्रकार जाने हैं ते अग्रिम पुराणब्ह्मको जाने हैं, सो जह्म झुद्ध मनकर 
जाननेयोग्य है, तिस दशनविषयरूप चह्मविषे नाना रंचक नहीं. जो नानारहि- 
तमें नाना आरोप करे है सो अविद्याकरके झृत्युसें म॒त्युको प्राप्त होवे है, यातें 
विज्ञानघन एकरसरूपसें जाननेयोग्य है. सो अह्म अप्रमेय है, नित्य है, घमो- 
धर्मादिरूप मरसें रहित है, सर्बसें पर है, अव्याकृतरूप आकाशस्से भी उपजे 
नहीं और अनाशी है; तिस आत्माको उपदेशर्से ओर शाखसे घीमान्‌ ब्राह्मण 
जानके उपदिष्ट विषयमैं प्रज्ञाको वनाबे. वहु शब्दोंका चिंतन नहीं करे, बहु- 
शब्दोंका अभिध्यान ग्लानिश्रमके देनेवाा है. इति ॥-उक्त पूर्वपक्षका 


समाधान करे हेंः-- . 


छ्ट : - ब्हमयृत्नाणि। [ अ० १ पा० ४ सू० १३] 


न संख्योपसंग्रहादपि नानामावादतिरिकाब ॥ ११॥ 
_न। संख्योपसंग्रहयत्‌ । अपि । नानाभावात्‌ । अतिरेकात । 


च्‌। इति प०। । 
अथ-उत्त बाक्यसें पंचरविंशति संख्याका संग्रह होवे है. तिस पंचविंशति 
संख्याके संग्॒हसें सांख्यस्मृतिकरके प्रसिद्ध पंचविंशति तत्त्वोंके यहणस भी 
प्रधानकों अशच्द्त्वका निषेध संभवे नहीं। तथाहि-पंच पंचत्वमें जो साधारण 
इतर पंचकसे व्यावत्त धर्म तांके अभावका नानापदसें अरहण है; यातें एक पंच- 
आपस अन्य पंचकसें व्यावृत्त धर्मवत्वका नानाभाव नास अभाव है यातें 
नानाभाष होनेसे 'पश्च पग्बजना' जा वाक्‍्यसे पंच पंचकका अहण संभवे 
नहीं और पंचविंशतिसंख्यासें अतिरेकात्‌ नाम आत्मा और आकाश अधिक 
सुने हैं यातें सपवि्ञाति संख्या सिद्ध होवे है, पंचविंशति नहीं. इति। तिस 
मंत्रकां यह अक्षरार्थ है कि 'पंचजन! यह पद पुरुषमें रूढ़ है यह कोशमें लिखा 
« दूसरा पंचपद्‌ प॑चसंख्याका बाचक है. दोनों पदोंका पंच पुरुष हैं! यह अर्थ 
सिद्ध होवे है। ज्योति, प्राण, चक्षु, भोत्र, मन यह पंच पुरुपसंबंधी होनेसे 
पुरुषकरके अहण किये हैं. पंच तो ये और एक अविद्यारूप आकाश जामें ये पद्‌ 
स्थित हैं, तांको हम आत्मा जाने हैं- इति ॥ ११ ॥ 
उक्त अर्थको सूत्रकार प्रगट करे हैं।--- 


!णादयों वाक्यशेषात्‌ ॥ १२॥ 


प्राणादयः । वाक्यशेषात्‌ । इति प०। 
अथ-वाक्यशेपात्‌ नाम “पघराणस्थ प्राण जा वाक्यमें प्राणॉँका भाण 
कहा है, यातें इस वाक्यशेपसें पंचजनवाक्यमें प्राण, चक्षु, शओोत्र, अच्न, मन 
जा पंचका घहण है. इति ॥ १२ ॥ 


अब०-ननु उक्तवाक्यर्ें अन्न नहीं थहण किया. यांते पंचपदसे पंचकों 
अहण करणा संभवे नहीं, जा शंकासें कहे हैं:--- 


ज्योतिषेकेषामसत्यन्ने ॥ १३ 0 
ज्योतिषा । एकेषास । असति । अन्ने । इति प०। 


अथे-जा शाखामें अन्नका ग्रहण नहीं किया तोहां ज्योतिकरके 
पृण किया चाहिये. इति ॥ १शया 2 


“व क्ृृगादिक पंचकोंमे, "3.3" 





चल 


( ज० ६ पा० 9 सू० १० ] भाषाटीकासहितानि । ७९; 


* अव०-समन्वयकी सिद्धि असिद्धि दोनों. पक्षनमें उत्तर अधिकरणका फर्ूं 
है। जगतकारणबोधक वाक्य बह्ममें प्रमाण हैं वा नहीं यह तहां संदेह है- 
/एत्तच्मात्‌ आत्मन आकाझः सम्भ्ूतः” जा वाक्यमें प्रथम आकाश कहा 
है। “तत्तेजोड्छजत” जामें प्रथम तेज कहा है। एतस्मात्‌ जायते प्राणों 
मनः सर्वेन्द्रियाणि” जामें अक्रमक उत्पत्ति कही है. कह सतसें उत्पत्ति कहूँ 
असत्‌से उत्पत्ति कही है; जा उक्तविधिसें परस्पर वाक्यनका विरोध है, यांते 
सर्वका ऋ्रह्ममें समन्वय कहना संभवे नहीं, यह पूर्चपक्ष है. ' तहां यह सूचका- 


' रका समाधान है।--- 


कारणलेन चाकाशादिषु यथाव्यपदिष्टीक्ते! ॥ १४ ॥ 


कारणलेन । च ॥ आकाशादिषु । यथाव्यपदिशेक्तेः । इति प०। 
अथे-आकाशादिकोंमें यथा एकशाखाविपे 'सदेव” जा श्रुतिकरके जैसा 
स्वरूप ईश्वर कारणकरके व्यपदिष्ट नाम कहा है, तेसा स्वरूपही ईश्वर 'सत्य॑०! 
जा अपर बेदांतमें कारण “त्ते” नाम कहा है; यांते त्रह्मकारणत्वमें विरोध 
नहीं. इति ॥ १४ ॥ हि है ॥ 


समाकर्षात्‌ ॥ १५॥ 

. अधे-जो प्रथम “सदेव सोस्पेद्सश्न आसीत्‌” यह कहकर आगेः-- 
५अखत्‌ वा इृदस्‌ अग्ने आसीत्‌” यह कहा है इस वाक्यमेंभी पूर्वछे सतका 
आकर्षण है; अर्थात्‌ असतपदसें नाम रूप व्यक्तिसें रहित जह्म अंगीकार किया 
है, शल्य अंगीकार नहीं. उक्त विधही अपर वाक्यनमें व्यवस्था हैं; यांते कार- 
णत्वंबोधक्क वाक्यनमैं विरोध नहीं- इति ॥ १५ ॥ | 

 अव०-कौषीतकि ब्राह्मणमैं चाठाकिका अजातशच्ु्स संवाद लिखा हैः--- 
बांछाकिने अजातशब्ुकी कहा कि हम तुम्हारे अति अह्मउपदेश करे हैं । तिसने. 
कहां कहो | तिसने उपदेश किया कि जो आंदित्यमैं पुरुष है तांकी उपांसनो 
करे. हैं. १ जो चंद्रमें पुरुष है तांकी उपासना करे हैं २ जो विद्युतमें है ३.जो 
स्तनयित्लमैं है ४ जो बायुमें है ५ जो आकाशमें है ६ जो अभि हे७ जो जंलमैं 
है ८ जो आदर्श है ९ तिस पुरुषकी उपासना करे हें; जो छायापुरुष है १० 
जो प्रतिश्ुत्‌ कायामैं पुरुष है ११ शब्द जामें लय होंवे है १४ जोंकर सुस्त स्वम्ा- 
कर बिचरे है १३ तिस पुरुषकी उपासना करे हैं जो शारीर युरुष है १४ जो द- 
क्षिण नेत्रमें पुरुष है १५ जो सब्य नेत्रसें पुरुष है, तांकी हम उपासना करे हैं; यह 


८० च्रह्मसूत्राणि । [अ० १ पा० ४ सू० १५] 


पोडश १६ ब्रह्म वाढाकिने राजाप्रति कहे. अजातशझुने सर्वमँ ततततउपदेश- 
कालमें दोष दिखाकर अंत कहा हम ब्नह्मको कहेंगे, यह मिथ्याही भाषण कि- 
या, यह कहकर आगे यह उपदेश किया हैः।---“स होवाच यो वै चालाक एते- 
वां पुरुषार्णा कर्ता थस्य बैतत्‌ कम स वै वेदितव्य/ इति” । तव बाला- 
कि समित्पाणि होकर राजाको प्राप्त हुआ. तब राजा वाढ्किकों हाथ पकड़के 
सुप्तपुरुषके पास छेगया. अजातशजचुने सुप्तको बुलाया तो नहीं बोरा, तब 
प्राणोंको अभोक्ता निश्चय किया, तत्‌अनंतर यछिसें स्पशे किया तब सो उठा, 
तब आणादिकोंसं जीवको भिन्न निश्चय किया. तत्‌अनंतर जीवसे भिन्नमें बाला- 
किके आगे यह त्रय प्रश्ष किये---क एव एतत्‌ बालाके पुरुषोड्णयिष्ट । 
एतत्‌ अभ्त्‌। कुत एतत्‌ आागात्‌ इति प्रथम प्रश्ष अधिकरणमें है । द्विती- 
य प्रश्न सवनमें है अथात्‌ एकरूप होकर किस अधिकरणमें सोया था इति । 
ठ॒तीय प्रश्न अपादानमैं अथोत्‌ सोकर किससे उठे है इति। बाढाकिने इनका 
उत्तर नहीं दिया, तब अजातशब्नुने यह कहा--“अस्मिन पभाणे एच एकघा 
०] सर्वेनीमभि ७ बह कि 
अवति तदेन वाक्‌ । सहाप्थेति | चक्षु। स्ेंः रूपेः सहा- 
प्योति । ओज॑ सर्वे! शब्दे! सहाप्येति। मन! सर्वेध्योनिेः सहाप्येति। 
स यदा भतिवुध्यते यथापश्रेज्वेलतः सबो दिल्यो विस्फूलिज्ञा विपतलि- 
छेरन एवमेव एतस्मादात्मनः प्राणा यथायतनं पविप्रतिष्ठन्ते भा- 
णेभ्यों देवा देवेभ्यो छोका:? | हति इस वाक्यकरके शयनभवनका आधार 
और उत्थानका अपादान प्राणशब्दके वाच्य परमात्माकी कहा है. इति। पूर्च 
, जो अजातशच्ुुने वाक्योपदेश किया है तांका यह अर्थ है कि हे बालाके ! 
जे पोडश ऋह्म तुमने कहे हैं तिन सर्वका जो कर्ता है, जांका यह कर्म है, सो 
जाननेयोग्य है. इति । इस वाक्यमें जो जाननेयोग्य कहा है सो भाण है था 
जीव है वा परमात्मा है जा संदेहसें यह पूर्तपक्ष है। चछनरूप कर्म आणोंका 
है यांते प्राणवायु तहां अंगीकृत है. इति । तहां यह सूत्रकारका समाधान हैः-- 
१ अजातशछुने कद्दा जो आदिल्यमें पुरुष है सो सव भूवनका मस्तक है, मह्म नहीं. जो चंद्रमें है सो 
चार विध अन्नका कारण है वा खरूप है। जो विकृतमें है सो तेजका कारण है । जो मेघमैं है सो शब्दका 
कारण वा खरूप है। जो गगनमें है सो क्रियारहित है। जो वायुमें है सो ऐश्वर्यवान है। जो अमिमें है 
सो विविध सहनशीछ है | जो जलमैं दे सो नामकारण है। अथ जो जादर्शम है सो सदश है | जो छाया- 


रूप है सो द्वितीय है। जो दिज्ञामें है सो अछु है। जो शब्दपुरुष है सो रुत्यु है। जो खप्रद्ृ्टा है सो यम- 


राज है। जो शरीरमैं है सो अजापति है। जो दक्षिणनेत्रमैं है सो वाचाका कारण है। जो वामनेत्रमैं है सो 
विक्ृतका खरूप हें हे 





[अ० १ पाू० ७ सू० १८] भाषाटीकासहितानि । ८१ 


जगद्ााचित्वात्‌ ॥ १६ ॥ 
जगद्वाचित्वात्‌ । इति प०। 
अर्थ-'क्रियते इति कम जा च्युत्पत्तिसें कमपद्‌ जगतका 'वाचित्वात 
नाम वाचक है यातें अजातशच्ुवाक्यमें जो वेदितव्य कहा है सो परमात्मा 
है प्राणादिक नहीं, आणोंको सर्व उक्त पुरुषनका कतो कहिना संभवे नहीं 
किंतु सबका कतो परमात्मा है. इति॥ १६ ॥ 


जीवसुख्यप्राणलिक्ञन्नेति चेत्तद्‌ व्याख्यातम्‌॥ १७॥ 
जीवशुख्यप्राणलिड्रात्‌ । न का । चेत्‌ | तत्‌ । व्याख्यातम्‌ । 
इति प्‌०। 

अथै-अजातशज्ञुके वाक्यमें जीवलिंग और मुख्य प्राणलिंग प्रतीत होवे हैं 


यातें उक्तवाक्य अद्मयवोधक नहीं यह शंका करें; तो प्रतदेनअधिकरणमें तत्‌ 
व्याख्यातम्‌! नाम जीवमुख्यग्राणलिंगको ब्रह्मवोधक सिद्ध किया है. इति ॥१७॥ 


अन्या्े तु जेमिनिः प्रश्नव्याख्यानाभ्यामपि 
चैवमेके ॥ १८ ॥ 


अन्यार्थम्‌ । तु । जैमिनिः । प्रश्नव्याख्यानाभ्याम्‌। अपि। च। 
एवम्‌ । एके । इति प०। 
0 -जैमिनि &. ४ जे 

अथः आचार्य अजातशझ्ञ॒वाक्यमैं जीवके परामशको अन्याथ नाम 
बह्यवोधार्थ माने हैं यातें सो वाक्य ब्रह्मबोधक है प्राणादिकोंका वोधक नहीं- 
तहां प्रश्न, व्याख्यान यह दो हेतु हैं. प्रक्ष नाम अजातशन्चुका जो अधिकरण, 
भवन, अपादानमें प्रक्ष और व्याख्यान नाम तिन ज्रय प्रश्ननका जो उत्तर तां 
सर्वका कर्ता परमात्मा वेदितज्य करके कहा है, और एके नाम वाजसनेयि 
अर्थात्‌ बृहदारण्यकशाखावान सी एवम्‌ नाम जीवप्राणोंसे भिन्न परमा- 
त्माको माने हें. इति ॥ १८ ॥ 

अच०-बहदारण्यकके चतुर्थ अध्यायमैं यह मैत्रेयीप्रति याज्वल्क्यवाक्य है 
“न वा अरे पत्युः कामाथ पतिः प्रियो भवति आत्मनस्तु कामाय 
पातिः अियो भवति | न॒ वा अरे सर्वस्यथ कासाय सर्वे प्रियं भवति 


आत्सनस्तु कासाय सर्च प्रिय भचाति | इति” इस चाक्यपयत पुत्र पश्ु- 
जआ्ह्म ० १4 


८र्‌ त्रह्मसूत्राणि [ [अ० १ पा० 9» सू०२१॥) 


वित्तादि सर्व प्रपंचको आत्मार्थ प्रिय कहा है, यातें अनन्य अर्थत्वरूप निरुपाधि- 
प्रियत्व आत्मामैं सिद्ध किया, तिस निरुपाधिप्रियत्वसें आनंदरूप आत्माको 
ज्ञातव्यकर उत्तरवाक्यनें कहा हैं+- “आत्मा' बारे दृछज्य/ः ओत्तव्यों 

न्‍्तव्यो निद्ध्यासितव्यों सैज्रेयि आत्मनो चा अरे दृशनेन अवणेन 
सत्या विज्ञानेन इदं॑ सर्व विद्तमस्‌ इति” इस बाक्यम द्रष्टव्यादिरूपसे 
जीवका उपदेश है, वा परमात्माका उपदेश है यह तहां संदेह ह आरंभम 
भोक्ता जीवका उपदेश है यातें जीवका द्वष्टव्यरूपस उपदेश है यह पृव॑पक्ष हैं 
तहां यह सूत्रकारका सिद्धांत हैंः--- 


वाक्यान्वयात्‌ ॥ १९ ॥ 


वाक्यान्वयात्‌ । इति प०। 
अथे-उपक्रमादिकोंसें वाक्य नाम “आत्सा द्वष्टब्यः/ जा वाक्यका 
ब्रक्षमें अन्चय नाम समन्वय सिद्ध होवेहे यातें उक्त वाक्यमें द्रष्टव्यकरके पर- 
मात्माका उपदेश किया है जीवका नहीं. मोक्षइच्छावान्‌ मैत्रेयीको जीवका 
उपदेश तौ वनता जो जीवके ज्ञानसें मोक्ष होती, जीवके ज्ञानसें मोक्ष संभवे 
नहीं यातें ताम्रति जीवउपदेश सेभवे नहीं. इति ॥ १९॥ ' 


प्रतिन्ञासिडेलिड्माश्मरथ्यः ॥ २० ॥ 
प्रतिज्ञासिद्धे) । लिड्रस । आश्मरथ्यः । इति प०। 
अथ-जीव कार्य है ब्रह्म कारण हैं यातें जीवब्रह्मका भेद अभेद. है. 
अत्यंत भेद मानेसें एकके विज्ञानकी प्रतिज्ञा संभवे नहीं, तिस प्रतिज्ञाकी 
सिद्धिके अर्थ अभेद अंशको अंगीकार करके वाक्यके आरंभमें मोक्ता जीवका 
लिंग है, यह आश्मरथ्य आचार्य माने हैं इति ॥ २० ॥ 


अब०-जीवको काये कहिना और भेदसहित असेद कहिना संभवे नहीं 
यह मानके अपर उत्तर कहे हैं।--- 


| ॥0 पे ६ कर की के 
उत्कमिष्यत एवंभावादियोडलकोमिः ॥ २१ ॥ 
उत्कमिष्यतः । एवंभावात्‌ । इति । ओडलोमिः । इति प०। 
अथे-संसारकारूमें जीवका बहासें अत्येत भेद है। बह्मका आत्मारूपसें 
साक्षातकार हुएसें का्यकारणसंघातसें जीव रहित होवे है । 'उत्करमिष्यतः 
नास संघातरहित जीवका 'एवंसायात्‌! नाम परसात्मासें अभ्ेद होते है यातें 


[जज £ पा० 9 सृ० २३१ भापाटीकाराहितानि | ८३ 


भविष्यत्‌ अभेदको मानके बाक्यके आरंभमें जीवका लिंग है, यह औड़लोमि डुलोमि 
आचाय साने हूं, इति ॥ २१ ॥ 


सूत्रकार स्वसिद्धांत कहे हंः--- 


अवस्थितेरिति काशकृत्खः ॥ २२ ॥ 
अवश्थितेः । इति । काशकृत्खः । इति प० | 


अथू-अविद्याकल्पित भेदस त्रह्मही जीवरूपसें स्थित है यातें जीवका 
आरंभम ग्रहण है, इस प्रकार काशकृत्स्त आचाये माने हें, यातें मेत्रेयीवाक्यका 
परन्रह्ममं तात्पय है. इति ॥ २२ ॥ 


अव०-/जन्माअस्य यतः जा अधिकरणमें अह्मको जगतका कारण 
कहा सो आगे तांका विचार करे हें कि ब्रह्म जगतका निमित्तमात्र कारण है वा 
उपादानभी है यह तहां संशय है। “बहु स्पा्ा! इत्यादिक वचनोंकरके सबबे- 
दांतमें इच्छापू्वंक कतो सुना है, यातें कुलालवत्‌ ऋह्म निमित्तमात्र कारण है, 
जा पूर्मपक्षमं भगवान्‌ सूत्रकारका यह उत्तर हैः-- 


प्रकृतिश्व प्रतिन्ञादष्टान्तानुपरोधात्‌ ॥ २३ ॥ 
प्रकृतिः । च । पितिज्ञादष्टान्तानुपरोधात्‌ । इति प०। 


अथ-अकृति नाम उपादानकारण जगतका ब्रह्म है, चकारसे निर्मिचकार- 
णभी सूत्रकारको त्रह्मही अंगीकृत है, तहां यह हेतु है+-- “थेनाअतं श्र्॒त 
मवति अमत॑ सतम्‌ अविज्ञातं विज्ञातम्‌ | यथा सोम्ध एकेब म्त्पिण्डेन 
सर्च सखुणसय चपिज्ञात स्थात्‌ वाचारस्सर्ण विकारों नासधेयं सत्तिका 
इति एव सत्यस्‌ इति” इस वाक्यमें एकके ज्ञानसें सबके ज्ञानकी प्रतिज्ञा 
करी है और तहां दृष्टांत कहा है; सो प्रतिज्ञा ब्रह्मको उपादान मानेबिना 
नहीं बनेगी, और दृष्टांतमी नहीं बनेगा, निमित्तकारणके ज्ञानसें सर्वकार्यका 
ज्ञान होवे नहीं, उपादान उपादेयका अभेद होवे है यातें उपादानके ज्ञानसें 
सर्चका ज्ञान संभवे है, जो निमित्तको उपादानसें भिन्न मानेंगे तो उक्त प्रतिज्ञा 
दृष्टात दोनोंही उपरोध साम पीडित अर्थात्‌ अनथक होवेंगे; यातें प्रतिज्ञा दृष्टांत 
दोनोंको अनुपरोध नाम अनर्थकत्वनिवृत््यथ अतिज्ञा दृष्ठांत अजुसारतासें 
अरह्मही उपादान है, भह्मही निर्मित्त कारण है. इति ॥ रद ॥ 


८९ ब्ह्ममृत्राणि [ अ० १ पा० 9 सू० २६] 
फिंच--- 
अभिध्यानोपदेशान्व ॥ २४७ ॥ 
अभिष्यानोपदेशात्‌ । च | इति प०। 
किसी पुस्तकमें “असभिध्योपदेशात” यहमी पाठ हू । 
अथ्-सोडकासयत' इस वाक्यमें ध्यानउपदेशर्स ब्रह्म कर्ता प्रतीत 


होवे है और बहु स्पास! जा ध्यानड्पदेशस ब्रह्म उपादान प्रतीत होवे है, यांते 
आत्माही कर्ता और उपादान है. इति ॥ २४ ॥ 


साक्षांचीभयात्नानात्‌ ॥ २५॥ 
साक्षात्‌ । च्‌ | उभयाम्रानात्‌ । इति प्‌०। 


अथ-“सवॉणि हवा इमानि मतानि आकाशादेव सपृत्पयन्ते 
इस वाक्‍्यमें आकाशपदसे अह्मको मरहण करके तासे साक्षात्‌ उत्पत्ति प्रछढय 
दोनोंही आश्लानात्‌ नाम कहे हैं यातें अच्मही उपादान हैं, जिस कार्यकी जाते 


उत्पत्ति प्रछय होवे ता कार्यका सो उपादान होवे है, यथा घटमसृत्तिकादिक हें 
इति ॥ २५ ॥ 


आत्मकझृतेः परिणामात्‌ ॥ २६॥ 
आत्मकृतेः । परिणामात्‌ | इति प्‌०। 


अथ-लछोकमें जो प्रयलवान्‌ होबे है तांको कर्ता कहे हैं, यथा-कुछालादिक 
हैं । प्धलका जो विषय होवे सो उपादान देखा है, यथा सृत्तिकादि हैं । “तत्‌ 
आत्सान खबम्‌ अकुरुत” जा वाक्यमें ब्रह्मको भी प्रयल्लवान्‌ और प्रयलका 
विषय सुना है, स्वपदसे प्रयलवान्‌ अतीत होवे है और आत्मा पदसें प्रथलका 
विषय प्रतीत होवे है यातें श्रह्मही उपादान है, बह्मही निमित्त हैं । आत्मासंबंधी 
जो होवे कृति नाम प्रयक्ष सो जात्मकृति कहिये हैं, यद्यपि आत्मा कतो हो- 
नेसे पूर्व सिद्ध है यातें ताँमें मरयलविषयत्व संभवे नहीं, तथापि परिणामसे सेभ- 

है. परिणामपदसें विवतेका अहण है; जो विवतेरूप होबे है सो पूर्वसिद्धसी 
साध्य होबे है यातें पूचेसिद्धभी आत्माको कृतिविषयत्व संभवे है, यातें ब्रह्म 
असिन्न निर्मित्त उपादान कारण है. इति ॥ २६ ॥ 


जि० २ पा० १सू० १] भाषाटीकासहितानि । ८५ 


७ ने 45. 280 
योनिश्र हि गीयते॥ २७॥ 
योनिः। च । हिं। गीयते । इति प०। 
अर्थ-/ यत्‌ भध्रूतयोनि प्रपहघन्ति धीरा!” ॥ “ कर्तारमीशं पुरुष 
ब्रह्मधोनिम्‌ इत्यादिक श्षुतिनरमं जो कारणबाचक योनिपद तासे योनि नाम 


कारण गीयते नाम कहा हैं; यातें उपादान और निमित्तकारण ब्रह्मही है» 
इते ॥ र७॥ 


एतेन सर्वे व्याख्याता व्याख्याताः ॥ २८ ॥ 
एतेन । सर्वे । व्याख्याताः। व्याख्याताः । इति प०। 


अथ-ईक्षतेनादाजदम! इस अधिकारणसें छेकर योनिश्र हि गीयते! 
जा सूत्रपर्यत अद्व्दत्वादिक अनेक हेतुर्से प्रधानकारणवादको खंडन किया है, 
एतेन नाम प्रधानकारणवादखंडनसेंही व्याख्याताः नाम अणुआदिक पक्षभी 
खंडित हुए जानने चाहिये. यातें सर्च वेदांवका सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान्‌ परिपूर्ण 
सच्चिदानंद तच्रह्मविपे समन्वय हैं. और “व्याख्याता व्याख्याता:” इस पदका 
उच्चारणभी अध्यायकी समाप्तिको द्योतित करता है. इति सिद्धम्‌ ॥ २८ ॥ 
इति सूत्रभावार्थप्रकाशिकाभाषादीकायां प्रथमाध्यायस्य चतुर्थः पादः समाप्त; ४ 


अथ दितीयाध्यायप्रारम्भः । 


3००००००००----नटि>>>ज टेट 2252 


दोहा-सिमरण तर्क विरोध हर, परमत दुष्ट प्रबोध । 
भूत जीव वपु बचनका, इनमें हरें विरोध ॥ १॥ 


पूरे अध्यायमें सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान्‌ जगत्‌कारण बह्मविषे सर्ववेदांतका ता- 
त्पये सिद्ध किया है. इस अध्यायके प्रथमपादमें सांख्यादि स्पतिसे ओर तांकी 
तकॉसे स्वपक्षके विरोधका परिहार करे हैं, दूसरे पादसें सर्व मतनकी दुष्टता 
प्रतिपादन करेंगे, ततीयपादमें अर्द्धसें पंचमहाभ्रूतवोधक अ्रुतिवचनका जो 
परस्परबिरोध तिसका परिहार करेंगे, अर्ूसें जीव नित्यानित्यत्वचोघक अ्रति- 
वचनोंके विरोधका निषेध करेंगे, चतुर्थ पादमें लिंगशरीरबोधक वाक्यनके 
विरोधका परिहार करेंगे. इतने अथोंके निमिच् इस अध्यायका आरंभ हैं. 








८५ 


ब्रद्मसृत्नाणि 


(अ० २ पा० १ सू० १] 


तहा अथमपादमें सप्त अधिक तीस ३७ सूत्र हैं. तहां अधिकरण त्रयोद्श 


हैं १३, शुण २४ हैं 


तथाहि-- 


सूत्रसंख्या | अधिकरण । गुण । 


नौ > 0 #0 
१22 ६४:%7 ४४ ४ ४:४४ 5०७७ ढक, वद का 0० ७ 


४ ४ 20 (४ 
249 72 28% $ 2 ० 


के के अंक ककक कक हे है कुकककनक कक + पक 


री 
झु० 
चेः 
ने 
शु ० 
शु० 
ग्यु 2 
शु 2 
शु [८ 
गु० 
गु० 
ते 
न 
न 
ञञु 6 
यु 6 
बु० 
ग्यु छ 
शु० 


गु० 


वः 
शुठ 
गु० 
न 
शु 9 
नै 
शझु० 


प्रसद्भ- 


सांख्यस्मृति अप्रामाणिक है- 
सा० 

योगस्मृति अप्रामाणिक है- 
ब्रह्मकारणखण्डनपृत्रेपक्ष- 
पूछ 
चेतनकारणसिद्धान्त, 
चे० | 
पूर्वपक्ष- 

सिद्धान्त- 

सांख्यमृततुल्यदोप. 

सि०तकखण्डन- 

परमाणुवादखण्डन- 

भोक्तादिव्यवस्था- 

कार्यकारणअसेदविधान« 

का० 

का० 

का० 

क्ता० 

का० 

का० 

पूर्वपक्ष- 

सिंद्धान्त- 

सि० 

ब्रह्मकारणसिद्धि. 

ञ्न्० 


पल 


([ज० २ पा० १ सू० १] 





८ ५ न 
रद न 
० आ० 
३५ न 
हेंरश , आ० 
श्र न 
श्छ अआ० 
झ्ज्‌ ्ः 
श्प् हि 
ह््छ आ० 

श्द्‌ 


भाषादीकासहितानि । 


शु 6 
शु | 
न 
जु० 
्नः 
जु० 
ने 
गु ०] 
गु० 
जी 


श्छ् 


इस पादका यह प्रथम सूत्र है। 


स्मृत्यनवकाश॒दोषप्रसड़ इति चेन्नान्यस्पत्य- 
नवकाशदोषग्रसज्ञात्‌ ॥ १ ॥ 


स्वृत्यनवकाशादोषप्रसड्भ* । इति । चेत्‌ । न । अन्य- 
स्मृत्यनवकाशादोपप्रसड्रात्‌ । इति । प०। 


अथे-पूर्व अध्यायमैं जो बह्मविषे सर्व वेदांतका तात्पय कहा है तिसका 
सांख्यादिस्मृतिसें विरोध है वा नहीं यह इस अधिकरणमें संदेह है। तहां यह 
पूर्व पक्ष है कि कपिछादि ऋषि सर्वज्ञ हुए हैं-“ऋषि प्रखूत कपिल यस्तमग्रे ज्ञा- 
नैबिसति जायसानअ् पदयेत” यह ्वेताश्वतर श्रुति कपिल्मुनिके अम्रतिहत 
जशानको दिखाबै है, यातें तत्रचित सांख्यस्मृति प्रामाणिक है, अक्षको कारण 
अंगीकार कियेसें महान्‌ कपिलक्ृत प्रधानकारणवादबोधक स्मृतिको अन- 
बकाशरूप दोषकी प्रसंग नाम प्राप्ति होवंगी, अनवकाश नाम प्रधानवो धक _श्रुतिके 
अभावसें स्मृतिभी प्रधानवोधक नहीं सिद्ध होवेगी, यातें तत्‌ अर्थका अभाव 
सिद्ध होवेगा. इति । इसका अर्द्धसूत्रसं समाधान करे हैं. यथा ब्रह्मको कारण 
मानेसें प्रधानको कारणवोधक स्मृतिमें दोष है तथा प्रधानको कारण अंगीकार 
कियेसे अन्य. स्मृतिको अनवकाशरूप दोपकी प्रापि होवेगी । “ अहं सर्वेस्य 


८७ 


सिद्धान्त. 
सांख्यमतदोपष. 
ब्रह्मकारणसिद्धि. 
पू्वेपक्ष. 

सि० 

सि० 
वैषम्यादिदोषनिपेध- 
संसारअनादि.- 
सक 
कारणत्वादिसिद्धि. 
इति' 


८८ ब्ह्मसूत्राणि । [अ० श॒पा० १ सू० 9 ] 


जगतः प्रभचः प्रलूयस्तथा ! इत्यादिक स्प्रतिनमें चेतनको कारण स्मरण किया 
है यातें प्रधानको कारण माननेसें उत्तस्मृतिनमें 2 आस होवेगा, यातें परस्पर 
दोनों स्मृतिनका विरोध हुएसें जो स्मृति श्ुतिसें अविरुद्ध ह सो प्रामाणिक हैं, 
जो विरुद्ध है सो अप्रामाणिक. है. सांख्यस्मृतिका मूल श्ुतिसे मिले नहीं यांते 
सो अप्रामाणिक है, यांते समन्‍्वयका तांसें विरोध नहीं. और म्वेताश्व॒तर झ्षुति- 
वाक्य अपर कपिलका बोधक है, सांख्यस्मृतिकर्ता कपिकका वोधक नहीं. इति॥१॥ 
उत्तरहेतुर्सेंभी सांख्यस्मृतिमं अनवकाशही है यह सूत्रकार कहे हैं।-- 
ह.«. अलककी, ८ कर 
इतरषा चानुपलब्धः ॥ २ 
कप कप 
इतरेषाम्‌ । च । अनुपलब्धेः । इति प० । 
अथे-सांख्यस्मृतिसें प्रसिद्ध जे इतर नाम प्रधानसें भिन्न महत्तत्व आदिक 


पदार्थ तिनकी छोकमें और वेदमें अज्॒परूज्धि नाम प्रतीति होथे नहीं, यातें 
भी सांख्यस्मृति अग्रामाणिक है. इति ॥ २॥ 


एतेन योगाः प्रत्युक्ताः ५ ३॥ 
एतेन । योगाः । प्रत्युक्ताः । इति प० । 
अधे-योगमें इश्धर अंगीकार है सांखुयमैं नहीं इतना योगमें सांख्यसें वि- 
शेष है, अपर प्रधानादि सबे अक्तिया दोनों मतनमें तुल्य हैं, यातें एतेन नाम 
कपिलमतके खंडनसें पतंजलिका योगमार्गभी पत्युक्ताः नाम असंगत कहदिया 
जाना चाहिये. जो अंश योगमें श्रुतिअजञसारी है सो प्रामाणिक है, अपर सां- 
ख्यतुल्य अपामाणिक है. इति तात्पर्यम ॥ ३॥ 
आगे थुक्तिविरोध परिहार करे हैं।-- 


न विलक्षणलादस्य तथालं च शब्दात्‌ ॥ ४ ॥ 
न । विलक्षणलात्‌ । अस्य | तथात्वम्‌ । च्‌ | शब्दात्‌ | इति प०। 


अथे- आकाशादिक न चेतनकार्य द्व्यत्वात्‌ घटवत्‌ ! इस तर्कसें समन्‍वयका 
विरोध है वा नहीं जा संदेहसें पूर्वपक्षमं यह सूत्रका अर्थ है। 'अस्य” नाम जगत्‌को 
चेतनसें विलक्षण होनेसें चेतन जगत्‌का कारण नहीं. चेतन ब्रह्म झुद्ध है, जगत्‌ 
अचेतन अश्ुद्ध है इत्यादि विकक्षणता है. जो जासें विलक्षण होवे है सो तांका 
कार्य होवे नहीं यथा तंतुर्स विरक्षण घट तंतुका कार्य नहीं, ब्रह्मकी जगतसें त- 


[अ० २ पा० १ सू० ५] भाषाटीकासहितानि । ८९ 


धात्व नाम विलक्षणता शब्दात्‌ नाम श्रुतिसें निश्चित है. तथाहि “विज्ञान चा- 
विज्ञानं चाभवत' इत्यादिक अ्रुतिसें विलक्षणता निश्चित है, यातें ज्ह्म जग- 
तका कारण नहीं. इति | इस अध्यायमें समन्वयविरोध पूर्वपक्षका फल है, 
अविरोध सिद्धांत फल है. इति ॥ ४ ॥ सिद्धांत-ननु बृहदारण्यकश्रुति 
ते हि इसे पाणा अहंश्रेयसे विचद्साना स्द्त्नचीत्‌ ता आपोउ्श्युवन! 
इत्यादि श्रुतिसें जगतकोभी चेतन सुना है यातें चेतनको कारण कहिना 
संभवे है, जा शंकासे पूर्वपक्षी कहे हैं:-- 


अभिमानिव्यपरदेशस्तु विशेषानंगतिभ्याम ॥ ५॥ 
अभिमानिव्यपदेशः । तु । विशेषानुगतिभ्याम्‌। इति प०। 


अथ-उत्त शंकानिषेध तु पदका अर्थ है. उक्त श्रुतिसें जगतमें चेतनताका 
अंगीकार नहीं किंतु अभिमानी नाम नेत्रादिकोंके अभिमसानी जे देवता तहां 
व्यपदेश नाम कथन है, इंद्रिय मृत्तिकादिसात्र, अहण नहीं. विशेष और अबु- 
गति यह दो तहां हेतु हैं. “ अधथातो निःश्रेयसादानम्‌ एता ह वै देवता 
अहंस्ेयसे विवद्माना अस्मात्‌ शरीरात्‌ उच्चऋमसुः तद्दा प्राणात्‌ 
शुष्क दारुफ़ूत शिष्ये” जा कौषीतकिश्रुतिमें इंद्रियोंको देवता शब्दसे 
अहण किया है, सो देवतापद सूत्रोक्त विशेषपद्स अहण किया है । श्लुत्तिअर्थ- 
उक्त उपासना अन॑तरका बाचक अथपद है, अपरफल इच्छानिमित्त अतःपदका 
अर्थ है, निश्रेयस जो मोक्षविशेष तहुणविशिष्ट आणोंका आदान' नाम 
झहण करे हैं. देवताशव्दके वाच्य जे वाक्यादिक ते सबेही “अहेश्रेयंसे! नाम 
भहंवादसें आत्माकी जो अधिकता तदर्थ विवाद करते हुए अ्जापतिकों 
प्राप्त होकर बोले हमारेमें श्रेण कौन है? प्रजापतिने कहा जिसके निकरनेसे 
शरीर शवसमान होवे सो उत्तम है. सर्व इंद्रियनसें शरीर शवसमान नहीं 
हुआ, और पाणके निकलनेसें अमंगरूरूप शिष्ये नाम शयन करता हुआ इति। 
और “अपिवाग फ्त्वा खुख॑ प्राविशत्‌। चायुः प्राणों भूत्वा नासिके 
प्राविशत्‌ । आदित्यः चह्लुमत्वा अक्षिणी प्राविशत्‌।द्शिः ओजं 
जूत्वा कर्णों प्राविशन जा श्रुतिमैं देवनकी प्रवेशरूप अनुगति सुना है, यातें 
विशेष, अज्॒गति जा दोनो हेतुओंसे जगत्‌ चेतनरूप नहीं, किंतु बिलक्षण है यातें 
ब्रह्म जगत्‌का कारण नहीं। उक्त श्रुति ऐत्तरेणके दितीय खंडमें है. 'इति ॥५॥ 

ब्रह्मा, १२ 


७० : अह्मसूत्राणि । [ज० २ पा० १ सू० ८ ] 
सिद्धान्तसूत्र । 
दृश्यते तु ॥६॥ 
हृश्यते । तु । इति प०। 
अथ-पूर्वपक्षका निपेध तु पदका अर्थ है, शान ुरुपसें तासें विलक्षण 
नखलोमादि उपजे हैं. और अचेतनगोसयादिकोंस तास विलक्षण वृश्चिकादि 
उपजे हैं, यातें चेतनसें विलक्षण जगतका न्रह्म उपादान नहीं यह कल्पना अ- 
संगत है. जो कायकारणको अत्य॑त तुल्य अंगीकार करें ता तिनका कार्यकार- 
णभाव नहीं बनेगा, यातें किसी अंझमें तुल्यता कही चाहिये सो जगत्‌ 


स्फूरणतादि रूपसें विद्यमान है. जा उक्त विधिसें द॒दयते नाम लोकसें घिल- 
हु हम ५ अब ९ 8. 2. पा [पे न 
क्षणोंका कार्यकारणभाव देखा है, यातें शंका असंगत है. इति ॥ ६ ॥ 


सदिति «| कर 
असदिति चेन्न प्रतिषिधमात्रपरखात्‌ ॥ ७ ॥ 

असत्‌ । इति । चेत्‌। न । प्रतिपेधमात्रपरलात्‌ । इति प्‌० | 

अध-नामादिकोंसें रहित चेतनको नामादिवान्‌ जगतका कारण अंग्रीकार 
कियेसें उत्पत्तिस पूच जगत्‌ असत्‌ सिद्ध होवेगा, इति चेत्‌ नाम यह शंका 
करें तो संभवे नहीं. तथाहि असत्‌ होवेगा यह जो प्रतिनिषेध नाम जगतका 
निषेध है सो निषेधमात्र है; ताका निपेध्य कोई भान होवे नहीं, कार्यकी 
'सत्ता कारणसें भिन्न रंचक नहीं, किंतु कारण अह्मही जगताकार है, यातें ऋरह्म- 


का जगत्‌ उत्पत्तिसें पूर्व सत्यस्वरूप था असत्‌ नहीं, यातें निषेध संभवे नहीं 
इति॥ ७ ॥ 


पूर्वेपक्ष । 
| हल न 
_ अपीतों तदअसझ्ञदसमजञ्ञसम्‌ ॥ ८ ॥ 
अपीतो । तद्वत्‌ । प्रसज्ञात्‌। असमझसम्‌ । इति प० । 
के अथे-यथा शाकादिकोंमें छीन हुआ हिंगु स्वगंधादिक धर्मनसें शाकादि- 
कोंको दूषित करे है तथा अपीतो नाम प्रलूयकाल्‍ूसें जड़तादिक धर्मचान्‌ ज- 
शत्‌ अह्ममें लीन होकर स्वधर्मनसें भह्मको दूषित करेगा, यातें तदूबत्‌ नाम 
कार्यवत्‌ कारणरूप शह्ममैंभी जड़तादिक धर्म प्राप्त होवेंगे, ते तुमको इृष्ट 


आय चेतन जरह्म जगतका उपादान है यह असमख़स नाम असमीचीन 
है. इति ॥ < ॥- ४ ॥$ हद 


[अ० २ पा० १ सू० ११] भाषाटीकासहितानि | २९१ 
* सिद्धान्तसूत्र । 


नतुदृष्टान्तभावात्‌ ॥ ९ ॥ 
न | तु। दृष्टान्तभावात्‌ । इति प०। 


अथे-यथा घटादि कार्य मृत्तिकादि कारणमें छीन हो मृत्तिकादिकोंको 
स्वधर्मनसें दोषवान करें नहीं. और यथा स्वप्त जायत्‌ स्वृधसनसें कारणरूप 
आत्माको दोपषबान्‌ करे नहीं तथा उत्पत्तिआदिक धर्मवान्‌ जगत्‌ स्वघर्म 
जडतादिकोंसें कारणको दोषवान्‌ करें नहीं. दृ्छान्लभावात”ः नाम उक्त 
दृष्टांतवत्‌ इस अर्थमें अनेक दृष्टांत विद्यमान हैं, यातें पूर्व जो असमझस 
कथन किया था सो न तु नाम असंगत है. इति ॥ ९ ॥ 


खपक्षदोषाद्ध ॥ १०॥ 
खपक्षदोषात्‌ । च | इति प०। 
अधे-जगत्‌ व त्रह्म परस्पर विरक्षण हैं यातें तिनका कार्यकारणभाव संभवे 
नहीं. उत्पत्तिसें पूच जगत्‌ असत्‌ सिद्ध होवेगा, इत्यादिक जे दोष सांख्यने 
कल्पना किये थे ते दोष स्वनाम सांख्यपक्षमेंसी तुल्यही हैं, शब्दादिकोंसे 
रहित जो अधान तासें शब्दादिवान्‌ही बिलक्षण जगतकी उत्पत्ति मानेसें 
तुल्यता प्सिद्धही है. इति ॥ १० ॥ 


तक्काप्रतिष्ठानादप्यन्यथानुमेयमिति चेदेवमप्यवि- 
मोक्षप्रसड्अः ॥ ११॥ 


त्कप्रतिषनात्‌। अपि। अन्यथा। अनुमेयम्‌। इति। चेत्‌। एवम्‌। 
अपि । अविमोक्षप्रसद्भः । इति प०। 

अधथ-केवल तर्क अप्रतिछित नाम अपर तर्कसें बाधित होवेहे यातें समन्‍्वयका 
तर्कसें विरोध नहीं. यह “तकौप्रतिष्ठानादूपि! इतने सूत्रभागका अर्थ है. 
“अन्यथाजुमेयम्‌ इति चेततं इतना भाग आगे पूर्षपक्ष है. इसका यह अर्थ है. 
नलु-यद्यपि तर्कपर तक किये- तक अप्रतिछ्ठित होवे है तथापि- अन्यथा नाम. 
प्रतिष्ठित जो तर्क तासें समन्‍वयविरोध अचुमेय है अथात्‌ ताकर विरोध जाना 
जाय है. इति। इसका यह समाधान है, एवम्‌ अपि नाम अहामिन्न पदार्थोमें , 


९्र्‌ ब्रह्मसूत्राणि । [अ० २ पा० १ सू० १३] 


तर्कको प्रतिष्ठित हुएभी छिंगादिकोंसें रहित अरह्मविषे वेदविरोधी तर्क अप्रति- 
छित है, जो वेदविरोधी तर्क अंगीकार करेंगे तो “अविमोक्षप्रसड४ नाम 
तर्ककर्ताका संसारसें मोक्ष नहीं होवेगा, यातें वेदविरोधी तर्कको अम्रामाणिक 
होनेंसें तासें समन्‍वयका विरोध नहीं. इति ॥ ११॥ 


' एतेन शिष्टापरिग्रहय अपि व्याख्याताः ॥ १२॥ 
एतेन । शिष्टापरिग्रहाः । अपि । व्याख्याताः । इति प्‌०। 


5 2 पी 0] 


अरथ-बह्ाय न जगत उपादानम्‌। विभुत्वात्‌। व्योमबत्‌ । इस बेशेषिक अनु 
मानसें ब्रह्मकारणवोधक समनन्‍्वयका विरोध है वा नहीं यह इस अधिकरणमं 
संदेह है. पूर्वपक्षमं विरोध मानके परमाणुको कारण अंगीकार कियेसे सि- 
उांतमें यह अर्थ है कि मजुआदिकोंने सत्कायंबाद अंशमें प्रधानकारणवाद 
अंगीकार किया है, एत्तेन नाम तिस प्रधानकारणवादके खंडनप्रकारसे मनु- 
आदिक शिष्टोंकरके अपरिग्रह नाम किसी अंशमेंभी नहीं अहण किया जो 
परमाणुकारणवाद सोभी खंडन कियाही जाना चाहिये. तर्क घेदसे बाधित है. 
इति तात्पर्यम्‌ ॥ १५॥ 


भोक्ल्रापत्तेरविभागश्रेत्स्याह्कोकवृत्‌ ॥ १३ ॥ 


भोक्लापत्तेः । अविभागः । चेत्‌ । स्थात्‌ । 
लोकवत्‌ । इति प०। 


अथ-अद्वितीय बहासे उत्पत्तिचक्ता समन्वयका अलक्षादि प्रमाणोंसें विरोध 
है वा नहीं यह इसमें संदेह है. ननु-अद्वितीय ब्रह्मको जगतका उपादान 
मानेसें भोक्ताकों भोग्यरूपकी और भोग्यको भोक्तारूपकी आपत्ति नाम 
प्राप्ति होवेगी, से प्रपंचको अह्मरूप होनेसें उक्त दोष होवेगा, यातें पत्यक्ष 
प्रमाणसिद्ध जो विभाग नाम भेद सो नहीं सिद्ध होवेगा; यातें समन्वयका 
प्रत्मयक्षसें विरोध है, इति चेत्‌ नाम यह शंका करें तो संभवे नहीं. यथा मृत्ति- 
कारुूपसें अभिन्न जे घटशराबादिक तिनका परस्पर भेद प्रसिद्ध है और एक 
रंज्जुके कार्य जे दंडसर्पधारादिक तिनका परस्पर भेद है तथा भोक्तादिक 
प्रपंचका भेद 'स्थात्‌' नाम है. कल्पित भेद अंगीकार- है यातें मत्यक्षसे 
विरोध नहीं. इति ( श्श ॥ के काका 5 


[ अ० र पा० १ सू०.१६ ] भाषाटीकासहितानि । दे 


अब ०---जगत्‌ अनिवेचनीय अंगीकृत है यातें भह्मसें सिज्ञ ताकी सचा 
नहीं; यह अथ विस्तारसें सूत्रकार सिद्ध करे हैं । 


तदनन्यलमारम्भणशब्दादिभ्यः ॥ १४ ॥ 
तदनन्यवम्‌ । आरम्भणशब्दादिम्यः । इति । प० 


अथ-संदेह इसमें पूवंचत्‌ जानाचाहिये- तत्‌ नाम अह्मसें प्रपंचको अन- 
न्यत्व है अथांत बह्मसत्तासें भिन्न सत्तारहित है. “आरम्भमणशबव्दादिभ्य 
यह तहां हेतु हैं । यथा सोम्ध एकेन खत्पिण्डेन सर्वे झण्सयं विज्ञात् 
स्यात्‌ वाचारम्मणं विकारो नामधेय॑ खत्तिका हति एवं सत्यम जा छां- 
दोग्यश्रुतिम घधटादिक कार्यको नाममात्र अंगीकार किया है, नामभिन्न कार्य नहीं 
कहा यातें मृत्तिकामात्रही कायका वास्तवस्वरूप है, तिसके ज्ञात हुए घटादिक 
ज्ञात होवे हैं, यातें कार्य मिथ्या है कारण सत्य है यह अथ यथा दृष्टांतमें सिद्ध 
है तथा दा्टातमेंमी बहाममिन्न प्रपेचकी सत्ता नहीं यह अंगीकार है. आदिपदमें 
* ब््मेवेदं सर्वम  इत्यादिक वचनोंका अहण है. इति ॥ १४ ॥ 

तहां अपरहेतु कह्दे हैं+-- 


भावाचोपलब्धेः ॥ १५ ॥ 
भावात्‌ । च। उपलब्धेः | इति प०। 
अथे-केवक अश्रुतिसैंही कार्यक्रारणका अभेद नहीं किंतु प्रत्यक्षवपलब्धि- 
काभी भाव नाम सद्भाव है, यातेंभी कार्यकारणका अभेद है. तंतु्सें मित्र 


पटकी प्रत्यक्ष उपलब्धि होवे नहीं किंतु स॑ंयोगवान्‌ तंतुही “पट है पट है! इस 
व्यवहारका विषय होवे है, यातें कारणसें काये अभिन्न है. इति॥ १५॥ 


सत्त्वाचावरस्य ॥ १६ ॥ 
सत्तात । च। अवरस्यथ। इति प०। 


अर्थ-उत्पत्तिसें पूवे अवरस्थ नाम कायका कारणसे अभिन्न सत्व अथात्‌ 
विद्यमानत्व 'सदेव' इत्यादि अ॒तिसें सुना है, यातें उत्पत्तिसे अनंतरभी कारणसें 
अभिन्न सिद्ध होवे है. जो उत्पत्तिसें पूर्व प्रपंचको ऋह्मरूप नहीं मानें तो यथा 
सिकतारूपमें अविद्यमान तेल सिकतासें उपजे नहीं तथा बसें प्रपंचभी नहीं 
डपजेगा. इति ॥ १६ ॥ 


९३ ब्रक्मसूत्राणि । [ ज० २ पा० ९ सू० १० ] 


असदठ ० प ००७ + अप 

व्यपदेशान्नेति चेन्न धर्मान्तरेण वाक्यशेषात्‌ १७ 

असद्व्यपदेशात्‌ । न । इति । चेत्‌ । न । 

धर्मास्तरेण । वाक्यशेषात्‌ । इति प०। 

अधे-ननर॒ छांदोग्यके तृत्तीयप्रपाठक्में अखबा इृदमग्रे आसीत्‌' इस 
वाक्यमें उत्पत्तिसें पूर्व असद्व्यपदेश नाम कार्यकों असत्‌ कथन किया है यातें 
कार्यको कारणरूपता संभवे नहीं, इति चेत्‌ नाम उक्त शंका करें तो संभवे नहीं. 
श्रुतिमं जो असत्‌ कथन है सो अत्यंत असत्‌ अभिप्रायसें नहीं किंतु प्रगट घर्मसे 
: अंतर नाम अपर जो अप्रगट धर्म तासें असत्‌ कथन किया है. उक्तवाक्यके 
आगे 'तत्सदासीत' यह वाक्य है. इस वाक्यशेपसे उक्त अर्थही निश्चित है- 


जो पूर्ववाक्यमें अत्यंत असत्‌ अहण करेंगे तो वाक्यशेपका वाघ होवेगा, यातें 
कारणसे कार्य भिन्न नहीं, इति॥ १७॥  * 


युक्तेः शब्दान्तराच् ॥ १८ ॥ 
युक्तेः | शब्दान्तरात्‌ । च | इति प०। 

अधे-युक्तिसें और शब्दान्तरसेंभी कार्ययो कारणरूपता और उत्पत्तिसें 
पूरे विद्यमानता अवश्य सिद्ध होवे है. 'घढो जायते” जा प्रतीतिसें घट स्वउत्प- 
त्तिका कता भान होबे है. जो उत्पत्तिसें पूर्व घटकों अत्यंत असत्‌ मानेंगे तो 
उत्पत्तिका कतो नहीं सिद्ध होवेगा, यातें कारणरूप सतही घट उत्पत्तिका 
कतो है यह युक्तिशब्दसें अहण है. 'सदेव सोम्येद्सअ् आसीत! यह छांदोग्य- 
वाक्य शब्दांतरसें अहण किया है; इसमें जो सतपद है तासेंसी कार्यकारणका 
अमेद निश्चित है. इति॥ १८ ॥ 


पटवचा्च ॥ १९॥ 
। पटवत्‌ । च्‌। इति प०॥ 
अथे-“मृत्तिका व घट भिन्न भिन्न हैं, विरक्षण प्रतीतिका विषय होनेसें, घट 
पटकी नाई जा अजुमानमें व्यभिचार दिखातें हैं. यथा संवेष्टित और प्रसारित 


पट विलक्षण प्रतीतिका विषय है तौसी ताका भेद नहीं तथा मत्तिका, और 
घटकाभी भेद नहीं. इति || १९६॥ . 


[ अ० २.पा० १ सू० २२ ] भाषादीकासहितानि । ढ्ण्‌ 


की 
यथा च प्राणांद ॥ २० ॥ 
यथा । च। प्राणादि । इति प०। 
अथ-यथा प्राणायामादिकोंसें निरुद्ध किये हुए प्राण प्राणापानादि जीवन- 
मात्र कार्यको्‌ सिद्ध करे हैं ओर नहीं निरुद्ध किये हुए आकुंचन प्रसारणादि 
कार्येको करे हैं, उक्त क्रियाके भेद्से प्राणोंका भेद सिद्ध होवे नहीं, यातेंभी 
कार्यकारणका अभेद॒ही है, इति ॥ २० | 
पूर्वपक्षसूत्र । 

«० | 4 | ॥ अधि प |] 
इतरव्यपदशाडताकरणादंदाष प्रसाक्ते! ॥ २१ ॥ 
इतरव्यपदेशात्‌ । हिताकरणादिदोषप्रसक्तिः । इति प० । 

अधे-जीवामिन्न अह्मउपादानवोधक समन्वय इस़ अधिकारणका विषय 
,है। जो जीव अभिन्न ब्रह्म उपादान है तौ जो जीवको अनिष्ट है सो नहीं रचा 
चाहिये, इस तर्कसें समन्‍्वयका विरोध है वा नहीं यह इसमें संदेह है. पूर्वपक्षमें यह 
अक्षरार्थ है-इतरस्य नाम जीवको “तत्त्वमसि' आदिक वाक्यनसें श्रह्मरूपकथन 
किया है. यातें भह्मको जगतकरता मानेसें जीवभी कता सिद्ध होवे है, ताके सिद्ध 
हुएसे हितका अकरण और आदिपदसें अहितका करणरूप दोषनकी प्रसक्ति 
नाम प्राप्ति होवेगी. अहित जे जरामरणादिरूप दोष तिनकी प्राप्ति होवेगी 

'थातें जीवाभिन्न ब्रह्म अनिष्टप्रपंचका कर्ता नहीं. इति ॥ २१ ॥ 

सिद्धान्तसूत्र । 
| ९ । 2 
आंधक ठु भदानदशात्‌॥ २२॥ 
अधिकम्‌ । तु । भेदनिर्देशात्‌ । इति प०। 

अथ-तु पूर्वपक्षनिषेधार्थ है. आत्मा वा अरे द्रष्टठव्य/ | - सता सोम्य 
तदा सम्पन्नों भवरति' इत्यादिक अ्रुतिमें भेदका निर्देश नाम उपदेश किया है 
यातें अधिकम्‌ नाम जीवसे अपरः सर्वज्ञ सवेशक्तिसान्‌ नह्म है सो जगत्का 
कर्ता और उपादान है यह हमको अंगीकार है, यातें हित अकरणादि दोषकी 
प्राप्ति नहीं. नित्य अह्मको कोईभी रंचक हिताहित नहीं, कब्पित भेदसें सर्च 


संभवे है. इति ॥ २२ ॥ ह॒ े श े0 
अच०-नजु एक अह्मयको जगवका कारण अंगीकार कियेसें कार्यकी विखि- 


श्नता नहीं सिद्ध होवेगी, जा शकाका उत्तर कहे. हैं?-- 


डर 


“8६ , !। "” ज़ह्सूज्राणि। . [अ०२ पा० १ सू० २५ ) 


[ #> 

अश्मादिवच्च तदलुपपत्तिः ॥ २३ ॥ 

अश्मादिवत्‌ । च्‌ । तदनुपपत्तिः । इति प०। 
अध-यथा एक प्थिवीजन्य जे अइ्म नाम पाषाण तिनकी वज्ध, बैदूय, ईद्वनी 
'छादि भेदसें विचित्रता है तथा एक अह्यके अनेक कार्योकी स्वरुप्रसें विचि 
श्रता संभवे है. नवु-एक बह्मके आश्रित जे काये तिनमें धर्मविचित्रता केसे 
है ? और अरथक्रियाविचित्रता कैसे है? जा शंकानिषेधके अर्थ सूत्रमें आदिपद 
अहण किया है. यथा एक पृथिवीके आश्रित जे वीज तिनमैं बहुविध पत्र पुष्प 
फर गंध रसादि विचित्रता है, यथा एक अन्ञमें केश नखादि विचित्र अथ 


क्रियाकारित्व है तथा असंगमेंभी संभवे है, यातें 'तद्न्लुपपत्ति! नाम उक्त 
दोषनकी प्राप्ति नहीं. इति || २र ॥ 


उपसंहारदर्शनान्नेति चेत क्षीरवद्धि ॥ २४॥ 


उपसंहारदर्शनात्‌ । न । इति । चेत्‌ । क्षीरवत्‌ । हि । इति प० । 
अथ-सहायता विना बह्मसें उत्पत्ति कहनेवाछा समन्वय इस अधिकर- 
णका विषय है. सहायतारहित होनेसें त्रह्म जगतका उपादान और कतो नहीं 
इस युक्तिसें ता समन्वयका विरोध है वा नहीं यह तहां संदेह है. तहां यह 
आधे सूत्रसें पूथपक्ष है. छोकमें का जो कुलाल तिसको दंडचक्रादिकोंकी उप- 
संहार अथात्‌ सहायता देखी है और मृत्तिकारूप उपादानको स्वभिन्न कुछा- 
रूकी सहायता देखी है, अह्म सहायतासें रहित है यातें अहम जगत्‌का उपादान 
और कता नहीं इस पूर्वपक्षका उत्तर कहे हैं. यथा छोकमें क्षीर नाम दुग्ध 
बाह्यसाधन विनाही दघिरूप परिणामको प्राप्त होवे है तथा अह्मसी अपरकी 
सहायता चाहे नहीं, यद्यपि क्षीरको उष्णताकी अपेक्षा है त्थापि उष्णता दधि 
होनेमें जो शीघ्रता तत्‌माजमें निमित्त है. इति। और श्वेत्ताश्वतरके षष्ठ अध्या- 
यमें यह कहा हे-'न तस्य कार्य करणं च चविद्यते । न समश्याधिकश्व 
दृदयते ) पराध्स्य शक्तिविविधेच अयते खामावचिकी ज्ञानंबल- 
क्रिया च! | यह वाक्यभी अह्मको सहायताका निषेध करे है. इति ॥ २४ ॥ 


देवादिवदपि लोके ॥ २५ ॥ 
देवादिवत्‌ । अपि । छोके । इति प्‌०। 


जे हि | दिक्किं हे देवादिक 
अथ-लोके नाम इतिहासादिकोंमें यथा पितर ऋषि देवादिक चेतन स्वत- 


[अ०२ पा० १ सू० २८] भाषाटीकासहितानि । ९्छ 


स्सिद्धसामर्थ्यवान्‌ वाह्यसाधनबिना संकल्पमात्र्सें अनेक प्रकारके कार्यका 
भान होथवे है तथा ब्रह्मभी 0 आओ कार्यकर्ता है. इति ॥ श८ ॥ 
पक्षसूत्र । 


कत्खप्रसक्तिनिरयवलशब्दकोपो वा॥ २६ ॥ 
ऊत्खप्रसक्तिः । निरवयवत्वशब्दकोपः । वा । इति प०। 


अथे-अह्ा निरवयबव है, नानाप्रकारका परिणाम सावयवका होवे है. इस 
युक्तिसें समन्‍वयका विरोध है वा नहीं यह इसमें संदेह है. पूर्वपक्षमें यह अथे 
हे कि ब्रह्म सावयब है वा निरवयव है? निरवयव मानके कार्याकार परिणामी 
भानेंगे तो कृत्स नाम समम ब्रह्मको कायोकार परिणामकी प्रसक्तिः नाम 
प्राप्ति होवेगी; यातें कायेसें अतिरिक्त जह्म नहीं रहेगा. जो सावयवको कार्य- 
रूपसें परिणामी मानेंगे तो “निष्कर्ल निष्कियं दान्तं निरवर्य निरक्ञनमः 
जा खेताम्वतर श्रुतिरूप शझव्दका कोप होवेगा. दोनों पक्षनमें अनित्यत्वप्रसंग 
होवेगा. इति ॥ १८ ॥ 

सिद्धान्तसूच । 


श्ुतेस्तु शब्दमूलवात्‌ ॥ २७॥ 
श्र॒ुतेः । तु । शब्दमूलत्वात्‌ । इति प०। 
अथे-तु पूर्वपक्षको असंगतवोधन करे है. यथा ब्रह्मको जगतका उपादान खुना 
है तथा “ताचानस्थ महिसा ततो ज्यायांश् पुरुष: इत्यादिक बचनोंमें 
कार्यसें अधिकभी ब्क्मका स्वरूप सुना है यातें सर्व अह्मको परिणामप्रासिरूप 
दोष नहीं. नज्नु पाछे जो युक्ति कही थी तासें झुति बाधित है, यातें 
कार्यसें अधिक त्रह्मका सत्व झ्रुति कैसे वोधन करेगी ? जा शैकासें कहे हें:- 
अह्मको शब्दमूलत्वात्‌ नाम केवछ शब्दप्रामाणिक होनेसें शब्दअनुसार कार्य 
उपादानत्व और काये अतिरिक्त सत्व यह दोनों अह्ममें संभवे हें, विरोध 
नहीं. इति ॥ २७ ॥ 


आत्मनि चैव॑ विचित्राश्व हि ॥ २८॥ 
आत्मनि | च | एवम्‌ । विचित्राः । च | हि। इति प्‌० । 
अथै-एवं नाम यथा बह्ममैं विवतेरूप विचित्र नाम अनेकप्रकारका कार्य 


उपजे है तथा न ततन्न रथा न रथयोगा न पन्धानों भवलन्ति अथ रथाव्‌ 
ज्ह्म० १३ हि 


९८ ह बह्मसूत्राणि [अज० २ पा० १ सू० ३१] 


रथयोगान्पथः झजते' इत्यादिक श्रुतिनमें स्वमद्रशा निरवयव आत्मनि नाम 
जीवमैं विचित्र सृष्टि सुना है, यथा स्वमप्रपंचसे स्वमसाक्षीमं दोप नहीं तथा 
विधर्तेरूप कार्य उपादानत्वसे चह्ममैंभी कृत्स्पप्रसक्ति आदिक दोष नहीं- इति 
रहस्यम्‌. इति। उक्त श्ुत्ति दृददारण्यकके पष्ठ प्र० तृतीय ब्राह्मणमें ह॥ २८ ॥ 


खपक्षदोषाच ॥ २९ ॥ 
खपकश्षदोपात्‌ | च । इति प्‌०। 

अथे-सांख्यसतमैंभी निरवयव अधानको. जगत्‌का उपादान अंगीकार 
किया है यातें स्वनाम सांख्यमतमेंभी कृत्स्प्रसक्तिआदिक सर्च दोप छुल्य हें 
और परमाणुवादमें परमाणु दोनोंके संयोगसे ह्यशुकादि सृष्टि मानी हैं सो 
संयोग परमाणुके एकदेशमें है वा सर्वजगा है. संयोगीके सर्वदेशर्ें तो संयोग 
लोकमें कोई देखा नहीं, एकदेशमें मानेसें सावयवत्व विना एकदेशका संयोग 
संभवे नहीं. सावयव मानेसे निरवयव कथन असंगत होवेगा. इत्यादि दोष 
स्वपक्ष नाम न्‍्यायपक्षमेंसी तुल्यही हैं. चह्मवादमें दोष रंचक नहीं, यातें पर- 
मात्माही सबेका उपादान है. इति ॥ २९ ॥ 


हक. "अं 
सर्वोपिता च तहशेनात्‌ ॥ ३० ॥ 
सर्वोपेता । च । तद-दर्शनात्‌ । इति प० । 

अर्थ-मायाशक्तिसान्‌ बह्म जगतका कारण है, यह पूर्व कहा; सो अहम 
शरीररहित है. शरीरविना मायाकथन असंगत है. इस युक्तिसें पूर्व उक्तका 
विरोध है वा नहीं यह तहां संदेह है. पूर्वपक्षमें विरोध अंगीकार कियेसे यह 
सिद्धांत है. परदेवता सर्वडपेता नाम स्वेशक्तिमान्‌ है तत्‌ नाम सर्वशक्तिमत्व- 
दरशशनात्‌ नाम श्रुतिमं देखा है । तथाहि--“स्ेकमसो स्वेकाम; सर्वगन्धः 
सर्चेरसः” यह छांदोग्यतृतीयप्रपा ठकगत श्रुति सर्वशक्तिमत्व ऋह्ममें दिखावे है 
इति। श्वुतिअर्थे-सवे जगत्‌ कर्म होवे जिसका सो सर्चकर्म-कहिये अर्थात्‌ 

सर्वको रचे है. इसीतरह आगे जानना चाहिये. इति ॥ ३० ॥ 


विकरणलान्नेति चेत्तदक्तम्‌ ॥ ३१ ॥ 
विकरणलात्‌ । न । इति । चेत्‌ । तत्‌ । उक्तम्‌ । इति प०। 


अथे-सर्वशक्तियुक्त जे देवतादिक ते नेत्रादिकरणवानही विचित्नकार्यके 
_कता देखे हैं और अह्मको 'अचछुष्कमओज्रम! जा अआुतिमें विकरणत्वात्‌ 


जि०२ पा० १ सू० ३४ ] भाषाटीकासहितानि । ६९, 


नाम करणोंसें रहित सुना है, यातें ब्रह्म जगत्कर्ता नहीं, इति चेत्‌ नाम यह 
शंका करें तौ इसका जो उत्तर है तत्‌ नाम सो उक्त नास पूर्च कह दिया है. 
इति ॥ ३१॥ 

पूर्वपक्ष । 


न प्रयोजनवत्त्तात्‌ ॥ १२ ॥ 
| न । प्रयोजनवत्वात्‌ । इति प०। 
अथे-सर्वकामनासें रहित ब्रह्मको जो समन्वय उपादान कहे है सो इस' 
अधिकरणका विपय है. अह्म फलसें बिना जगतको रचे नहीं, अश्ञांतचेतन 
होनेसे । इस तर्कसें तिस समनन्‍वयका विरोध है वा नहीं, यह तहां संदेह है. 
पूर्वपक्षमें यह अथ है--ब्रह्म नित्यद्प्त है यातें प्रयोजनसें रहित है. बुद्धिमान- 
की भवृत्ति श्रयोजनविना होवे नहीं. यातें प्रयोजनवच्त्वात्‌ नाम प्रवृत्तिको 
प्रयोजनवान होनेसें ब्रह्म जगतकर्ता नहीं । इति ॥ ३२ ॥ 
सिद्धान्तसूत्र । 


लोकवत्तु लीलाकेवल्यम्‌ ॥ ३३ ॥ 
लोकवत्‌ । तु । छीलाकैवल्यम्‌ | इति प०। 
आअर्थ-तु पद शंकानिषेध अर्थ है, यथा लोकमें राजाकी फलबिनाही केवल 
लीलारूप अनेक प्रकारकी प्रदृत्ति देखी है और यथा प्राणोंका व्यापार 
स्वाभाविक है तथा ब्रह्मकी भी विचित्र कार्यरचना लछीलाकैवल्यम्‌ नाम केचक 
लीलामान्न है. फल अभिवकापासे नहीं. और किसी प्रकार राजाकी लीलामें फल- 
कल्पना संभवे है परंतु नित्यतृस्त अतह्मकी छीलछामात्रही है. इति ॥ ३१ ॥ 


वेषम्यनैर्ण्येन सापेक्षब्ात्तथाहि दर्शयतिं ॥ ३४ ॥. 
वैषम्यनैरण्येन । सापेक्षतात्‌ । तथाहि । दर्शयति । इति प०। 


अथै-निरवयच ब्रह्मसें उत्पत्ति कहनेवाछा समन्वय इसका विषय है. जो 
विषमदृष्टिकर्ता होने है सो सावद्य होवे है. इस तकंसें तिस समन्‍वयका विरोध 
है वा नहीं? यह इसमें संदेह है तहां यह पूर्वपक्ष हैः--अह्म प्राणिकर्मनिमित्तसें 
जगतकता है वा तिससें विनाही कर्ता है. कर्मनिमित्तसें कर्ता मानें तो बह्मको 
अनीश्वर हुआ चाहिये. कर्मनिमिच्त बिना कतो मानें तो वैषम्य और नैश्ल॑ण्य 
दोष होवेंगे. तथाहि अनेक कीटपतंगादि योनिको अत्यंत दुखी उत्पन्न करना, 


१०० बह्मसूत्राणि । [अ० २पा० £ सू० रे५ ] 


अनेक मनुष्यादिजीवकों साधारण दुभ्खी सुखी उत्पन्न करना, अनेक देवादि 
जीवॉंको अत्यंत सुखी उत्पन्न करना, यह वैषस्यदोष है और सववेसहार- 
कर्ता होना, यह नेश्वृण्य दोष है. तिन दोषनसें ब्रह्म सावद्य सिद्ध होचेगा. यातें 
निरवद्य ईश्वर जगत्कता नहीं. इति । उक्त शंकाका यह समाधान हैः--पूर्व जे 
दोष कहे हैं ते “ न ” नाम असंगत हैं. सापेक्षत्वात्‌ नाम इश्वरमें कतोपना 
प्राणिकमनिमिचसे अंगीकृत है, यातें दोष नहीं- उक्त दोष कर्मनि्मित्तविना 
कर्ता मानेसें होवे हैं. और कर्मनिमित्तसें जो अनीश्धरतादोष कहा -था सोभी 
असंगत है. भत्यसेवाके अनुसार फलदाता राजाको अराजापना छोकमैं- देंखा 
नहीं तथा ईश्वरमैं अनीश्वरता होवे नहीं, अनेक वीज भूमिमें पड़े रहे हैं, मेघ- 
विना अंकुर उपजे नहीं तथा ईश्वरविना कर्मफल उपजे नहीं । तथाहि दरशयति 
नाम अति स्मृति ईश्वरको प्राणिकर्मनिमिचसे जगत्का कतो कहे है. तथाहिः- 
“ूघ हि एच साधु कम कारयति त॑ यमेम्यो छोकेस्य उन्निनीषते एब उ 
एच असाधु कम कारयति त॑ थमेम्यो लोकेभ्यो5धो निनीषते ॥ पुण्यो 
चै पुण्येन कमणा भवति पाप) पापेन! यह कौधीतकिश्रुति कर्मनिमित्तसें 
इश्वरको कर्ता कहे है. श्वुतिअथे-जिसको इस छोकसें ऊपर प्राप्त करनेकी इच्छा 
करे है ताको पूर्वजन्मकृत खुकृतके वशसें शुभ कर्म करावे है और जिसको नीचे 
आधघ करनेकी इच्छा करे है-ताको अश्युभ करावे है. पुण्यसें सुखी होवे है पाप- 
सें दुखी होवे है. इति | * ये यथा मां प्रपद्मन्ते तांस्तथैव मजाम्यहम ! 
इत्यादिक स्मृतिभी कर्मनिमित्तसें ही ईम्वरको कर्ता कहे है. इति ॥ ३४ ॥ 


न कर्माविभागादिति चेन्नाउ्नादिखात्‌ ॥ ३५॥ 


न-। कमे । अविभागात्‌ । इति । चेत । न । . 
अनादितवात्‌ । इति पृ०। 


, अथे-“एकमेवाद्धितीयम्र! इस छांदोग्यश्रुतिसें उत्पत्तिसें पूर्व अविभागात्‌ 
नाम अभेद निश्चय होवे है. यातें तदा न कर्म! कहिये कर्मोका अभाव था, 
यातें जगतकर्तामें कर्मनिमित्तविना विषम दृष्टि संभवे है, जा शंकाका यह 
उत्तर हंः--ससार वीजअंकुरबत्‌ अनादि है, यातें उक्त शंकां असंगत है. पूचे 
किये जे धमाधर्म ते अत्यंत नाश होवें नहीं. इति ॥ ३५ ॥ 

अव०“-नज्ु संसार अनादि केसे है? जा शंकासें कहे हें:-- . 


[अ० २ पा० १ सू० ३७] भाषाटीकासहितानि । १०१ 


उपपयते चाप्युपलम्यते च ॥ ३६ ॥ 
उपपयते । च । अपि । उपलम्यते । च । इति प०। 


अधथ-संसारमें अनादित्व उपपच्यते नाम संभवे है. अनादि नहीं मानें तौ 
अकस्मात्‌ सृष्टि अंगीकार कियेसें मुक्तकोभी पुनः संसार होवेगा. और श्रुत्ति- 
स्मृति संसार अनादि उपलब्यते नाम प्रतीत होवे है । 'धाता यथापू्वे- 
मकल्‍ल्पयत' यह श्रुति और 'न रूपमस्पेह तथोंपछम्यते नान्‍तो न चादिने 
च संपतिष्ठा' यह भगवद्धाक्य संसारकों अनादि कहे है. इति ॥ ३६॥ 


सर्वधरमोपप्तेश्व ॥ ३७ ॥ 
स्वैधर्मोपपत्ते। च । इति प०। 


अर्थ-जो समन्वय निर्गुण अह्मको जयत्का का कहे है ताका जो निगुण 
है सो उपादान नहीं” जा तर्कसें विरोध है वा नहीं? जा संदेहसें पूर्वपक्षमें 
विरोध मानके यह उत्तरपक्ष हैः--जगत्कारणत्व सर्वेज्ञव्वादिक जे कारणके 
सर्व धर्म ते पूष उक्त प्रकारसैं ब्रह्ममैं उपपत्तेः लाम बने हें यांते अह्महदी जगत्‌का 
कारण है, यातें यह शास्त्र निर्दोष है. इस निर्दोष शाखसें बह्ममैं जो सर्व वेदांतका 
समन्वय ताका स्मृति और युक्तिसें विरोध रंचक नहीं. इति सिद्धस ॥ रे७ ॥ 
इति सूत्रभावप्रकाशिकाभाषाटीकायां द्वितीयाध्यायस्य प्रथमः पादः समराप्तः ॥ 


अथ दितीयपादप्रारम्मः । 


पूर्व समल्वयमैं परकल्पित दोषनका निरास करके अब अधिकारीकी अद्डै- 
तशाख्में निस्संदेह प्रवृत्तिअर्थ सूत्रकार परमतदूषणप्रधान इस पादका आरंभ 
करे हैं. सांख्यमतमें कहे जे पदार्थ तामें अ्रद्धाके निषेधार्थ भ्रथम सांख्यमत- 
खंडन करे हैं। पूर्व तो बेदांत प्रधानका बोधक नहीं, यह सिद्ध किया है. इस 
. पादमैं प्रधानसाधक युक्तिको खंडन करे हैं याते पुनरुक्तिदोष नहीं. इस 
पादके पंच .अधिक चालीस सूत्र हैं. तिनमें ८ अधिकरण हैं, २७ गुण 
हैं. तथाहिः-- न 
सूत्रसंख्या । अधिकरण । गुण । प्रसद्ध 
१ आअ० +- सांख्यखण्डन. 
3 कं गु० सा० 


श्०््‌ ब्क्षसत्राणि [ अ० र पा० श१सू० २४] 


डक हम शु० सा० 
छ न गु० सा० 
ष्‌ हि गु० सा० 
द्‌ हम शु० सा० 
छ न शु० सा० 
८ न गु० सा० 
९ न शु० सा० 
१० न झु० सा० 
१३ आ० न वैशेषिकमतखण्डनसिद्धान्त. 
श्र अ० न वैशेषिकमतखण्डन- 
श्इ न शु० बै० 
श्४ न गु० चै० 
५५ न गु० दे 6 
श्द् + गु० चे० 
१७ + शु० चे० 
श्द आ० न बुद्धमुनिवाह्ममतखण्डन- 
१९ नै शुक् बु० 
२० न गु० बु० 
२२ चुंड गु० बु० 
नर हि गु० बु० 
श्र + शु७ ' चु० 
 घश्छ न शु० बु० 
गपः नै झु० बु० 
/र७छ जे गु० बु० 
. रद ञ० * न बुद्धमुनि आन्तरमतखण्डन. 
९ नै शु० बु० 
० न शु० हर हट हि बु० 
के >चैंड शसु०क, - «.. बु७ 
्र्‌ के 


झु० बु० 


[अ०२पा० २सू०१] आवाटीकासहितानि | १०३ 





हर आअ० + जैनमतखण्डन. 
श््छ सच शु० जै० 
श्५ न गु० ज्ै० 
श्द नः शु० ज्ञै० 
्‌्७ आ० न केवलनिमित्तकारणखण्डन, 
ड््८ न- शु० के० 
३९ चैे शु० के० 
छ० के शु० के० 
छ्शर्‌ नै गु० के० 
छ२ अ० रन भागवतमतखण्डन« 
छ्शे ने शु० भा० 
छ्ए न शु० भा० 
५ न शु० भा० 
० दा ३७ श्ति 


रचनालुपपत्तेश्व नानुमानम्‌ ॥ १ ॥ 
रचनाजुपपत्तेः । च। न ! अनुमानस्‌ । इति प०। 


अथ-परमतयुक्तिविरोघसें समन्‍्वयकी असिद्धि पूर्वपक्षमें फल है और 
परमतकी युक्तिके अविरोधसें समन्वयसिद्धि सिद्धांत फल है. यह पाद- 
समापचिपर्यत जाना चाहिये । अचेतन भ्रधान जगत॒का उपादान है, यह 
सांख्यसिद्धांत इस अधिकरणका विंषय है. जामें संदेह होवे सो विषय कहि-: 
ये है. सो सिद्धांत प्रमाणमूल है वा भ्ांतिमूल है, यह तहां संदेह है. तहां 
. यह पूर्नपक्ष हैः--“यह सुख दुःख मोहरूप जो जगत्‌ इसका स्वतुल्य॒ही कोई 
जपादान है तासें अन्वित होनेसें, यथा मृत्तिका अन्वित घटादिकोंका उपादान है 
इस अजुमानसें जो सुखदुःख मोहरूप वस्तु सिद्ध होवे है सो प्रधान अंगीकार 
है याते सांख्यसिद्धांत प्रामाणिक है. इति। तहां यह उत्तर है. चेतनप्रेरणांरहित 
रचनाज्ञानशून्य जो अधान तासें अनेकविध विचित्र जगतरचना जलुपंपत्तेः 
नाम संभवे नहीं यांते अठुमानम्‌ नाम उक्त अजुमानकरके सिद्ध जो प्रधान 
सो जगतका उपादानकारण नहीं, चकारसें स्वरूपासिद्ध हेत्वाभास सूचना 


किया है, याते सांख्यसिद्धांत अंप्रामाणिक है. इति ॥ १ ॥ 


१०४ * जहसूत्राणि । [ज० २ पा० १ सू०५] 


प्रदत्तेश्न ॥ २७ 
प्रवृत्ते: । च । इति प०। 


अथे-साम्यावस्थाको आ्राप्त जे गुण तिनका नाम प्रधान है. साम्यावस्थाका- , 
ठूमें रंचक कार्य उपजे नहीं, किंतु साम्यावस्था हटकर गुणोंका अंगांगीभाव 
हुएसें अर्थात्‌ कम ज्यादा हुएसें कार्य उपजे है, यह सांख्यसिद्धांत है सो 
असंगत है. लछोकमें जे अचेतन रथादिक तिनकी प्रवृत्ति चेतनाधीन देखीं है. 
अधानका जो साम्यावस्थाका छोड़नारूप प्रवृत्ति सो चेतनप्रेरणाविना संभवे 
नहीं, याते भनृत्ते!” नाम उक्त विधसें प्रवृत्तिके असंभवर्से सांख्यमत असंगत 


है. इति॥ २॥ ः 
पयोश्म्बुवच्चेत्तत्रापि ॥ ३ ॥ 
पयो5म्बुवत्‌ । चेत्‌। तत्र | अपि । इति प०। 


अर्थ-नन॒ अचेतनकीभी स्वतः प्रवृत्ति होवे है. यथा पयस्‌ नाम दुग्ध 
चत्सके लिये आपकी प्रवृत्त होवे है, यथा जल स्वाभाविकही चले है अर्थात्‌ 
निश्न देशमें गमनार्थ प्रवृत्त होवे है तथा प्रधानभी चेतनप्रेरणाबिना प्रवृत्त 
होवे है, इति चेत्‌ नाम यह कब्पना करें तौ तत्रापि नाम तहां जलादिकोंमेंभी 
परमात्मा प्रेरक सुना है, यांते अचेतनकी प्रवृत्ति स्वतः संभवे नहीं. इत्ति ॥३॥ 


व्यतिरिकानवस्थितेश्वानपेक्षत्रात्‌ ॥ ४॥ 
व्यतिरिकानवस्थितेः । च । अनपेक्षव्वात्‌। इति प० | 
अ्थ-प्रधानको ख्तंत्र कारण अंगीकार कियेसे कदाचित्भी कार्यके व्यत्ति- 

रेक नाम अभावकी अनवस्थितेः' नाम अवस्थितिका अभाव होवेगा. अर्थात्‌ 
किसी कालमैंभी कायेका अभाव नहीं होवेगा किंतु सर्वदा कार्य चना रहेगा। 
ख्तंत्रप्रधानका अपर कोई चेतन सहकारी “अनपेक्षत्वात्‌र॑ नाम तुमने 
अंगीकार नहीं किया याते उक्त अथ सिद्ध होबेगा. सो असंगत है. याते 
स्वतत्र ग्रधान जगत्‌का उपादान नहीं. इति ॥ छह | 


अन्यत्राभावाच्र न तृणादिवत्‌ ॥ ५॥ . 


अन्यत्राभावात्‌। च । न । तृणादिवत्‌ । इति प०। 
अथे-नन्॒ठण जलादिक अपर निमित्तसें बिना दुग्धाकार परिणामकों 


[ज० २ पा० २ सू० ८] भाषादीकासहितानि । १०५ 


प्राप्त होवे हैं, तथा अधान जगताकार अपर निमित्तविनाही होवे- है. यह दृष्टां- 
38 असंगत है, तथाहि-अन्यत्र नाम धेनुआदिकोंसें अपर जे वैल्ादिक 
पं तृणादिकोंके दुग्धाकार परिणामका अभाव देखा है, यातें तणादिवत्‌ 
2 संभवे नहीं, यातें घेन्वादिक निमित्तसेंही ठणादिक क्षीररूप होवे है, 
इति॥ ५॥ 


अभ्युपगमे5पि अर्थामावात्‌ ॥ ६ ॥ 
अभ्युपगमे । अपि । अर्थाभावात्‌ । इति । प० । 


अधथ-प्रधानकी स्वतःप्रवृत्ति'अभ्युपगमे नाम अंगीकार कियेसेंभी अरथांभाव 
नाम प्रयोजन सिद्ध होवे नहीं. तथाहि-प्रधानकी प्रृत्ति भोगअर्थ मारने तो 
भोग्य पदार्थ अनंत हैं, यातें कदाभी सोक्ष नहीं होवेगा, जो प्रधानकी प्रवृ- 
त्तिको अपवर्ग अर्थ मानेंगे तो भोग नहीं होवेगा, यातें प्रयोजनका अभाव- 


होनेसें प्रधान जगतका कारण नहीं. इति॥ ६ ॥ 
[0० 6 चेत्तथापि 


पुरुषाश्मवदिति चेत्तथापि ॥ ७ ॥ 
पुरुषाश्मवृत्‌ । इति । चेत्‌ । तथापि । इति । प०। 


अथे-नलु पुरुष यद्यपि असंग है यातें सो प्रधानका प्रवर्तक नहीं तथापि 
यथा पंशुपुरुष स्वप्रजृत्तिसें रहितभी प्रदृत्तिमें समर्थ अंधको प्रदत्त करे है और 
अश्म नाम अयस्कांत संनिधिमान्नसें छोहको प्रवृत्त करे है, तथा प्रधानका प्र- 
बतक पुरुष है. यह कल्पना करें तो तथापि नाम तोभी दोष दूर होचे 
नहीं. तथाहि- पुरुषको प्रेरक मानेसें प्रधान स्वतंत्र है, जा प्रतिज्ञा भंग होचेगी 
और पुरुष अकर्ता नहीं सिद्ध होवेगा और दृशटांतोंमें पंगुपुरुषका वाणीरूप 
व्यापार है. अयरकांतका अनित्य संनिधि व्यापार है. प्रधानपुरुषकी संविधि 
सदाही है, यातें सो व्यापार नहीं- जा विध दोष दूर होवे नहीं. इति॥ ७ ॥ 


अड्लिखानुपपत्तेश्व ॥ ८ ॥ 
अड्विलाउपपत्तेः । च । इति । प०। 
अथै-ग़ुणोंका अंगांगीमाव होकर महत्तत्वादि कार्य उपजे हैं यह सांख्यवाले 
कहटे हैं. तहां यह पूंछा चाहिये। कि प्रकृति कूटस्थ है वा विकारी है ? प्रथम पक्ष 


मानें तो गुणसाम्यावस्थाका भंग नहीं होवेगा यातें अंगित्व नाम ग्युणोंका कम 
बक्, १४ 


7] जंदसूजाणि].. [ज० २ पा० २ सू७ ११] 


ज़्यादारूप अंगांगीभाव 'अलुपपत्ते! नाम नहीं बनेगा, यातें कार्य नहीं उप- 
जेमा. जो विकारी मानें तो साम्यावस्थार्भगरूप विकार स्वतः होवे है वा परसें 
होवे है? खतःपक्षमें कार्य सदा बना रहेगा. परसें मानें तो पुरुषको उदासीन 
कहिना असंगत होवेगा. यातें अंगांगीसावके असंभवसें का्यका अभाव 
होवेगा. इति ॥ « ॥ 


अन्यथाश्लुमितो च ज्ञशक्तिवियोगात्‌ ॥ ९॥ 
अन्यथा | अनुमितो । च। ज्ञशक्तिवियोगात्‌ | इति । प० । 


* अथे-नठु हमको उक्तविधसें अंगीकार नहीं किंतु अन्यथा नाम कार्यसें 
अंगांगीसावकी 'अनुसितौं! नाम अनुमिति अंगीकार कियेसे उक्त दोष नहीं 
यहभी असंगत है. चेतनत्व धर्म पुरुषका है गुण” शशक्तिवियोगात्‌ नाम ज्ञा- 
नरूप शक्तिसें रहित हैं यातें तासें अनुमिति संभवे नहीं. तात्परय॑ यह है कि 
गुण साम्यावस्थाभंगके योग्य हैं तथापि ताका भंग निमित्तविता संभवे नहीं. 
निमित्त कोई बने नहीं, स्वतः भंग मानेसे सदा वैषम्यता रहेगी. जो खतः 
“78 मानेंगे तो सदा साम्यता रहेगी, यातें अंगांगीभाव संभवे नहीं. 
इति ॥ ६ ॥ 


प्रतिषेध 
. विप्रतिषेधाचासमञ़्सम्‌ ॥ १० ॥ 
. विप्रतिषेघधात्‌ । च । असमझसम्‌ । इति। प्र०। 
अथ-सांख्यवाले कहूँ तो महत्तत्वसें पंचतल्मात्रकी उत्पत्ति कहे हैं और 
कहूँ अहंकारसें कहे हैं, कह एकादश इंद्वियां कहें हैं कह, सस इंद्वियां कहे हैं, “यातें 
परस्पर विप्रतिषेघात्‌ नाम निषेध करनेसेंसी सांख्यमत “असमझसम” नाम 
असमीचीन है. इति सिद्धम्‌ ॥ १० ॥ 


महद्वीघवद्य हखपरिमण्डलाभ्याम्‌ ॥ ११ ॥ 

महत्‌ । दीधवत्‌ । वा । हस्व॒परिमण्डलाभ्याम्‌ । इति ॥ प० । 
अथे-जो समन्वय चेतन चहासे जगत्‌की उत्पत्ति कहे है सो इस अधिक- 
रणका विषय है. कारणके गुण स्वसमान ग्रुणोंको कार्यमें आर॑भ करे हैं, इस यु- 


क्तिसें तिस समन्‍्वयका विरोध है वा नहीं यह तहां संदेह है। ब्रह्मको प्रपंचका 
उपादान मानेसें प्रपंचभी. बह्मवत्‌ चैंतल्य हुआ चाहिये, कारणंके शुण,कांर्यमें 


 [अ० २ था० २ सू० १२ ] भाषाटीकासहितानि । १०७ 


अवश्य जावे हें यातें चेतनसें जड़की उत्पत्ति माननी विरुद्ध है, यह पूर्वपक्ष है. 
उक्त कंल्पनाका व्यमिचार है यातें सिद्धांतविरोध नहीं. अक्षराथ यंह है 
कि यथा 'हस्वपरिमण्डलाभ्याम्‌' नाम छ्वणुक और परमाणुसें महत्‌ दीघे 
ज्यणुक उपजे है अर्थात्‌ परमाणुसें अशु छस्बर क्यणुक उपजे है. अणु हस्ब द्रव 
णुकसें महत्‌ दीर्घ ज्यणुकादि उपजे हैं तथा चेतनभी अहम अचेतनका कारण 
हैं, इति । यह चैशेपिकमत है. दो परमाणुवोंसे हस्त अणु क्यणुक उपजे है. तहां 
तीन तीन ह्वछुकसें महत्‌ दीघे ज्यणुक उपजे है. तहां परमाणुमें जो परिमाण- 
रूप गुण सो स्तसमान परिमाणको ह्यणुकमें नहीं उपजाये है, किंतु परमाणुगत 
जो दित्वसंख्या सो ह््यशुकमें हस्वत्व अणुत्वका आरंभ करे है. और दछ््वणुकमें 
जे अथुत्व हस्वत्व ते ज्यणुकमें स्तसमान अगुत्व हस्व॒त्वका आरंभ नहीं करे हैं, 
किंतु क्मणुकमें जो जित्व संख्या सो ध्यणुकमें महत्वादिकोंका आरंभक है. 
यह तिनका संकेत हैं. इनका इस मतमें कारणके ग्युण कार्यमें जायें हैं जा 
संकेतमें व्यभिचार स्पष्ट भान होवे है, यातें उक्त नियम असंगत हैं. इति ॥११॥ 


आगे ताका मत खंडन करें हैं:-- 


उमयथाषपि न कर्माष्तस्तद्भावः ॥ १२ ॥ 
उभयथा | अपि | न । कम । अतः | तदभावः । इति । प०। 


अथे-परमाणु्से जो जगतकी उत्पत्ति सो इस अधिकरणका विषय है. सो 
प्रमाणमूल है वा आंतिमूल है यह तहां संशय है. पूर्वपक्षमें प्रामाणिक अंगी- 
कार कियेसें यह सिद्धांत है. स्यायमत्तमें प्रथम परमाणुमें क्रिया मानी हैं- तिस 
क्रियाका परमाणु समवायिकारण है. आत्मपरमाणुर्सयोग असमवायिकारण है. 
अदृष्टादि निमिच कारण हैं. तिस क्रियासें परमाणु दोका संयोग होवे है. सं- 
योग होकर ह्यणुक उपजे है. यह तिनका सिद्धांत है सो असंगत है. तथाहि- 
परमाणुमैं जो प्रथम कर्म है तामें कोई निर्मित नहीं सानें तो कर्म नहीं होवेगा- 
जो निमित्त मानें तौ दृष्ट है वा अदृष्ट है. दृष्ट तो जीवप्रयल हस्तसंयोगादि 
हैं. ते तदा विद्यमान नहीं- और अद्दष्टपक्षमें यथा आत्मसमवेत्र अदृष्ट निमि- 
 है-तथा अदृष्टवाच्‌ आत्माका संबंधभी सदा रहे है, यातें प्रढयका अभाव 
होवेगा यातें उसयथा नाम निमित्त मानेसें और नहीं मानेसें कर्म नाम किया 
संभवे नहीं, अतः नास कर्मके - असंभवसें तत्‌ नास कार्योत्पत्तिकाभी अभाव 
सिद्ध होवेगा यातें परमाणुकारणवाद असंगत है. इति॥ श्री .. “ - - ० 


१०८ *  ब्ह्मसूत्राणि। [अ० २ पा० २ सू० १५] 


समवायाम्युपगमाच् साम्यादनवस्थितेः ॥ १३ ॥ 
समवायाभ्युपगमात्‌ | च | साम्यात्‌ । 
अनवस्थितेः । इति । प० | 
* अथ-दक्वणुक परमाणुमैं समवायसंबंधसें रहे है, यह न्‍्यायमतम्मे मानें हैं 
यातेंमी परमाशुकारणवाद असंगत है. तहां दोष कहे हैं-यथा ह्यणुक परमा- 
णुसें अत्यंत भिन्न है, ताको समवायकी अपेक्षा है, तथा समवायभी परमाणुसें 
अल्ंत भिन्न है यातें ताकोभी समवायकी अपेक्षा होवेगी. जैसे ह्वणुकमें मिन्न- 
त्व है तथा समवायमैंभी भिन्नत्व है यातें साम्यात्‌ नाम भिन्नत्वकी तुल्यतासें 
ताको अपर समवायकी अपेक्षा अवश्य होवेगी. ताके अंगीकार कियेसें “अन- 
वस्थिते/ नाम ताको अपर समवाय चाहिये जाविध अनवस्था प्राप्त होवेगी- 
जो समवाय नहीं सिद्ध हुआ तो ह्यणुकादि काये कैसे होवेगा? इति ॥ १३ ॥ 


निद्यमेव च भावात्‌ ॥ १४ ॥ 
निल्मम्‌ । एवं । च। भावात्‌ | इति । प०। 


अथ-किंच परमाणुका प्रदृत्तिस्वभाव है वा निदृत्तिस्वभाव है? प्रवृत्तिस्- 
भाव मानेसें प्रदत्तिको नित्य नाम सदा भावात्‌ नाम होनेसें प्रठढय नहीं होवे- 
गा. और निदृत्तिस्वभाव मानेसें निवृत्तिको नित्य नाम सदा भावात्‌ नाम हो- 
नेंसें उत्पत्तिका अभाव होवेगा- इति ॥ १४ ॥ किंचः--- 


य॑यो $ य 
रूपादिमलाच विपरययो दर्शनात्‌॥ १५॥ . 

रूपादिमल्ात्‌ । च्‌। विपर्ययः | दर्शनात्‌ । इति । प० । . 
अधथे-चतुर्विध परमाणु गंधादिवान्‌ नित्य अणुरूप है यह वैशेषिक मानें हैं 
सोभी असंगत है. तथाहि-परमाणु अनित्य स्थूछरूप हैं रूपादिवान्‌ होनेसें 
पटादिकोंकी नांई है. इति। पटमें रूपादिक हैं यातें सो तंतुर्से स्थूल और 
अनित्य है तथा जगत्कारणमें रूपादिक अंगीकार कियेसें सो स्थूल और अनि- 
त्य सिद्ध होवेगा यातें जगत्‌ कारण रूपादिकोंसें रहित है. अक्षर योजना यह 
है कि तुम्हारे मतमें जगत्‌ कारणका रूपादिमत्वात्‌ नाम रूपादिकवान होनेसे 
अणुत्व नित्यत्वसें विषय॑य नाम उलदे धर्म जे स्थूलत्व अनित्यत्वादि तिनकी 
बा छोकमें रूपादिकवान्‌ जे पटादिक ते तैसेही दशनात्‌ नाम देखे 

 इतित श्णत / .  -४ . ४.७. /6०. ७ * 


(अ० २ पा० २ सू० १८] भाषाटीकासहितानि । १०९ 


उभयथा च दोषात्‌॥ १६॥ 
. उभयथा | च। दोषात्‌ | इति । प०। 

अथे-किंच रूप रस स्पर्श गंधवान्‌ ४ पृथिवी स्थूछ भान होवे है. रूप रस 
स्पशवान ३ 'जछ सूक्ष्म भानहोवे है. रूपस्पशेवान्‌ २ तेज सूक्ष्मतर भान होवे 
है. वायु स्पर्शवान्‌ सूक्ष्मतम भान होवे है. उनके अनुसार परमाणुको कबपें 
अशु कथन संभवे नहीं. जो रूपादिवान्‌ नहीं कब्पेंगे तों प्थिबी आदिकोंमें 
रूपादिकोंका लाभ नहीं होवेगा, इस प्रकार उभयथा नाम दोनोंहीं प्रकारसें 
दोष होनेसें परमाणुकारणवाद असंगत है. इति ॥ १६ ॥ 


अपरिग्रहाचाद्यन्तमनपेक्षा ॥ १७ ॥ 
अपरिग्रहात्‌ । च | अलन्तम्‌ । अनपेक्षा । इति । प० । 


अथे-प्रधानकारणवादको.सत्कायेअंशमें मनुआदिकोंने अंगीकार किया 
है परंतु परमाणुकारणवाद किसी अंशर्मेंसी अहण नहीं किया; यातें सो अत्यंत 
नाम सर्व अंशरमें अनपेक्ष नाम अधिकरीको त्यागनेयोग्य है. यातें वैशेषिक- 
मतसे समन्‍वयका विरोध नहीं. इति ॥ १७॥ 

अच०-पूर्व वेशेषिकमतका खंडन किया है आगे बैनाशिकमतका खंडन 
करें हैं । बुदुसुनिने जिस आगमका उपदेश किया है सो आगम वैभाषि- 
क ३, सौत्रान्तिक २, योगाचार्य ३, शूल्यवादी ४, जा चार शिष्योंकी बुद्धि- 
अनुसार चार प्रकारका है तहां आदिके दोयके मतमें ज्ञानादिक सब पदार्थ 
क्षणिक माने हैं और सत्यरूप माने हैं. तिनमेंभी एता भेद है। वैभाषिकके 
मंतमें घटादिक पदार्थ प्रत्यक्ष हैं और सौत्रांतिकके मतमें घटाकारज्ञान उपजे 
है ता शानसे अप्रत्यक्ष घटादिकोंका अनुमान होवे है। * घदादूयः अप्रत्य- 
क्षा भवितुमहेन्ति खाकारज्ञानाविषयत्वात्‌ घर्मादिचत्‌ ! यह अनुमा- 
नका आकार है।॥ उक्त उमय मतनको मिलाकर सूत्रकार खंडन करें हैं।- 


समुदाय उमयहेतुकेजपि तदग्राप्तिः ॥ १८ ॥ 
समुदाये । उभयहेत॒के । अपि । तदग्राप्तिः । इति । प०। 


अथ-उक्त सत असाणमूल है वा भआंतिमूछ है जा संदेहसें पूर्चपक्षमें प्रमा- 
णमूल अंगीकार है. तथाहि-शभ्ूमि जरू तेज वाडु यह चारों भूत चतुर्विध पर- , 


११० * * ब्रह्मसूत्राणि। '[अ०२ पौं० २ सूं० १९] 


माणुके पुंजस्वरूप हैं. परमाण॒विना अवयवीरूप कार्य रंचंक नहीं. यह प* 
रमाणुद्ेतुक जरादिसमुदाय वाह्य हैं. द्वितीय आध्यात्मिक समुदाय है तांके 
हेतु स्कंध हैं. तथाहि-रूप १, विज्ञान २, वेदना हं, संज्ञा ४, संस्कार ५५ यह 
पंच स्कंध हैं. विषयोंसहित इंद्रियोंका नाम रूप स्कंध है, १ अहम्‌ यह जो आ- 
लयविज्ञानप्रवाह सो विज्ञानस्कंध कहिये है २। खुखादि प्त्यय वेदनास्कंध 
अंगीकार है ३, गो है अश्व है इत्यादि शब्दविशिष्ट वस्तुविषय सबविकल्प प्र 
त्यय संज्ञास्कंध है ४, राग, द्वेष, मोह, धमोघर यह संस्कारस्केंध है ५. तहां 
विज्ञानस्केधको चित्त और आत्मा कहे हैं. अपर चारों चैत्तस्कंध हैं- अथात्‌ 
चित्तमें हैं. यह उभय स्कंधनका समुदाय सर्व व्यवहारका कारण है. यह आ- 
ध्यात्मिकसमुदाय स्कंधहेतुक है. यह वैभाषिक और सौचांतिकका मत है. इन- 
का खंडन करे हैं. उभयहेतुके नाम परमाणुहेतुक वाह्मयसमुदायमें और स्कंधहेतुक 
आध्यात्मिक समुदायमें तत्‌ नाम उसय समुदायकी अग्रासि है. परमाणु स्कंध 
डभयही अचेतनरूप हैं. ( यातें स्वतः ) तिनका समुदाय संभवे नहीं. अपर 
कोई समुदायकता माना नहीं यातें समुदायप्राप्ति संभवे नहीं. इति ॥ १८ ॥ 


इतरेतरप्रययलादिति चेन्नोत्पत्तिमात्र- 
निमित्तत्रात्‌॥ १९ ॥ 


इतरेतरभ्रययत्वात्‌ । इति । चेत । न । उत्पत्ति- 
मात्रनिमित्तच्ात्‌ । इति । प० । 


अरथ-नज्ञु-चेतनविनाभी संघात संभवे है. तथाहि-अविद्या १, संस्कार २, 
, विज्ञान २, नाम ४, रूप ५, षडायतन ६, स्पशे ७, वेदना ८, यह अविद्या- 
दिक इंतरेतर नाम परस्पर प्रत्ययत्वात्‌ नाम हेतु हें यातें घटीय॑त्रवत्‌ इनसे 
संघालकी उत्पत्ति संभवे है यह आधे सूत्रसें पूर्वपक्ष है। क्षणिक पदार्थमे स्थि- 
रत्वनिष्थत्वादि स्यांति अविद्या माने हैं सो विषयोंमें रागादिरूप संस्कारोंका 
,- हेतु है तिस संस्कारसे रा्भग >शर्भगत आद्य विज्ञान उपजे है. तिस विज्ञानसें प्रथिवी 
३ चार भूत उपजे हैं, तिनकोही नाम कहे हैं. रूपपदसे शरीरका ग्रहण 
है. श्रूमिंआदिक चार .एकं शरीर एक' विज्ञान यह पद आश्रय होवें जिसका 
ताका नाम पडायतत) है अर्थात्‌ ईद्रियोंका नाम है. नाम रूप इंद्वियोंका 
जो परस्पर संबंध सुर स्पश अंगीकार है,:तिनसें सुखादिवेदना: उपजे है. तासें 


[अ० २ पा० २ सू० २१] भाषाटीकासहितानि | १११ 


पुनः अविद्या उपजे है जाविध परस्पर कारण हैं, यह कल्पनाभी असंगत है. 
दो प्रकारकी कार्योत्पत्ति तुमने सानी हैं एक हेतुअधीन मानी है एक समु- 
दायअधीन मानी है. यथा + घीजसें अंकुर अंकुरसे पत्र पत्रसें कांड उपजें हैं 
यह हेत्वधीन है. भूमिआदिक भूतनके मिलनेसे बीजसें अंकुर उपजे है. सो स- 
मुदायाधीन है. ओर आध्यात्मिक उत्पत्तिभी दो प्रकारकी है. तहां अविद्या- 
दिकोंकी उत्पत्ति हेतुअधीन है. और भूमि जरू तेज वधायु आकाशके समुदाय- 
से जो कार्योत्पत्ति सो समुदायाधीन है. तहां उमयविध उत्पत्तिमँ चेतनकी अ- 

पेक्षा नहीं. तहां प्रथमको अंगीकार करके द्वितीयको दूपित करे हैं. अविद्यादि- 
कोंको परस्पर कारण मानेभी उत्पत्तिमान्ननिमित्तत्वात्‌ नाम हेतुअधीन उत्प- 
त्तिमें निमित्त होनेसे समुदायाधीन कार्योत्पत्ति संभवे नहीं. अपर चेतन कोई 
माना नहीं यातें संभवे नहीं इति ॥ १९ ॥ 


क्षणिकवादमैं हेतुअधीनभी उत्पत्ति संभवे नहीं यह कहे हैं/- 


उत्तरोत 5 ु निरों 
त्पादे च पूवेनिरोंधात्‌ ॥ २० ॥ 
उत्तरोत्पादे । च । पूर्वनिरोधात्‌ | इति । प० । 
अधथ-कार्यउत्पत्तिकालमें विद्यमान जे म्त्तिकादि तेही कारणत्वरूपसें 
प्रसिद्ध हैं. नष्ट हुआ कारणकारयका जनक देखा नहीं और तुझारे मतमें 
उत्तरोत्पादे नाम कार्योत्पत्तिकारूमें पूषे जो कारण क्षण तिसका नाश माना 
है यातें हेतु अधीनभी कार्योत्पात्ति संभवे नहीं. इति ॥ २० ॥ 


हेतुविना उत्पत्ति माने दोष कहे हें । 


असति प्रतिज्ञीपरोधो योगपच्मन्यथा ॥ २१ ॥ 
असति। प्रतिज्ञोपरोधः । यौगपयम्‌ । अन्यथा .। इति | प० । 


अध-असति नाम हेतुविना कार्यउत्पत्ति अंग्रीकार कियेसें पूर्वज्ञान १५ 
नेत्र ९, आरोक ३, विषय ४, यह चार हेतु होवें तो नीछादिज्ञानरूप कार्य 
उपजे है जा प्रतिज्ञाका उपरोध नाम बाध होवेगा और अन्यथा नाम कार्यप 
अत कारणकी स्थिति मानें तौ चौगपद्यम्‌ कार्यकारणंकी एककालमें स्थिति 
होवेगी. तिसके सिद्ध हुएसे क्षणिकत्व पतिज्ञा भंग होवेगी- इति ॥ २१ ॥ 


अव०-चुद्धिपूर्वक नाश अजुद्धिपूवक नाश आकाश यह त्रय अवस्तु है, 


११२ बद्सूत्नाणि । [अ० २ पा०'२ सू० २४ ] 


निर्देतुक हैं, तुच्छ हैं, निरुपाख्य हैं. यह वैनाशिक माने हैं तहां पहिले दोनों- 
को प्रथम खंडन करे हें. 


प्रतिसंख्या5प्रतिसंख्यानिरो धा प्राप्तिर- 


विच्छेदात्‌ ॥ २२॥ 
3७७७७ ५४०५४ । अविच्छेदात्‌ । 
इति । प०। 


अथे-प्रतिसंख्यापदसे बुद्धिका अंगीकार है. बुद्धिपूषिक जो नाश सो प्रति- 
संख्यानिरोध कहिये है. अबुद्धिपू्वंक जो नाश सो अग्रतिसंख्यानिरोध अंगी- 
कार है. तिस उभय प्रकारके विनाशकी प्रवाहप्रवाहीमें अप्रासि नाम असंभव 
है. अविच्छेदात्‌ यह तहां हेतु है. तथाहि-उमय प्रकारका नाश प्रवाहप्रवाहीके 
विच्छेद्से कहा चाहिये. प्रवाहका विच्छेद तो चर्मप्रवाहीके विच्छेदअधीन है. 
' प्रवाही घटादिक क्षणिक हैं यांतें तिनका बुद्धिपूर्वक नाश तो संभवे नहीं, 
और कारणरूप म्रत्तिकादिक प्रतीत होवे हैं. यातें अबुद्धिपू्वकमी समर नाश 
संभवे नहीं, यातें उभय प्रकारका निरोध संभवे नहीं. इति ॥ २२ ॥ 


उमयथा च दोषात्‌ ॥ २३ ॥ 

उभ्यथा । च्‌ । दोषात्‌ । इति । प्‌० । 
अथ-किंच क्षणिकमें स्थिरत्वश्नांति तुमने अविद्या मानी है सो सम्यक्‌ 
ज्ञानसें नाश होवे है था स्वतः नाश होवे है? ज्ञानसें नाश मानें तो निर्हेतुक 
नाश कथन असंगत होवेगा. स्त्रतः नाश मानें तो ज्ञानका उपदेश अनथथेक 


होवेगा. जाविध उभ्यथा नाम दोयही प्रकारसें दोष होनेसें खुगत ( बुद्ध ) 
मत असंगत है. इति ॥ २३ ॥ | | 


आकाशे चाविशेषात्‌ ॥ २४ ॥ 
आकाशे | च अविशेषात्‌ । इति । प०। 
अथे-* आत्मन आकाझाः सम्क्तः ! इत्यादिक अआतिसें और शब्द- 


गुणल्वसें आकाशे नास आकाशमैंभी भ्ूमिआदिकोंके अविशेष नाम तुल्यवस्तु- 
ज्ञान होवे है; याते आकाश निरुपार्य अर्थात्‌ अभावरूप नहीं. इति ॥ रु ॥ 


[अ०२ पा० २ सू० २७] भाषाटीकासहितानि । ११३ 


का, 
अलस्मतेश्व ॥ २५॥ 
अनुस्मृतेः । च्‌ । इति । प०। 
अधथे-अनुभवसें अनु नाम पीछे उपजे जो ज्ञान सो अनुस्मृति अंगीकार 
है. तुमने अनुभवकताको क्षणिक माना है. अपरके अनुभवसें अपरका स्मरण 
होवे नहीं; यातें “अनुस्मृतेश नाम आत्माका स्मरण होनेसें अनुभवकतांको 
क्षणिक कहना संभवे नहीं. इति॥ र५ ॥ 


'नासतोष्दछत्वात्‌ ॥ २६ ॥ 


न्‌। (असतः । अदृशलात । इति प०। 
अथ-तुमने स्वग्रंथमें साक्षात्‌ अभावसें भावकी उत्पत्ति मानी है, निरु- 
पार्य जे नरविपाणादि तिनसें भावकी उत्पत्ति देखी नहीं यातें असतः नाम 
अभावसें कार्योत्पत्ति युक्त नहीं. 'अचृष्टत्वात!र नाम छोकमैं अभावसें भाव 
उपजा कह देखा नहीं यातें सुगतमत असंगत है. इति ॥ २६॥ 


उदासीनानामपि चेव॑ सिद्धि! ॥ २७॥ 
उदासीनानाम्‌ । अपि । च । एवम्‌ | सिद्धिः। इति । प०। 


अथे-एवं नाम अभावसे भावकी उत्पत्ति अंगीकार कियेसें तत्‌ तत्‌ कार्यके 
साधन जे कृष्यादि तिनको त्यागके स्व स्वर गेहमें 'उदासीनानाम' नाम जे 
स्थित हैं तिनको स्वस्ववांछित कार्यकी सिद्धि नाम प्राप्ति होनी चाहिये. याते 
आंतिमूलक वैभाषिक सौत्रांतिकके इस बाह्य अर्थवादसें समन्‍्वयका विरोध 
नहीं. इति सिद्धमू ॥ २७॥ - 

अच०-आगे विज्ञानवादीका खण्डन करे हैं। यह तिसका मत है। विज्ञा- 
नविना अर्थात्‌ बुद्धिबिना बाह्य पदार्थ कोई नहीं यह तिसका सिद्धांत उत्तर 
अधिकरणका विषय है. सो प्रमाणमूल है, वा आंतिमूछ है, यह तहां संदेह 
है. म्रमाणमूल है यह तहां पूर्वपक्ष है. तथाहि-नीछादि विज्ञानस्वरूपसे सर्च 
पदार्थोका तुल्यत्व है यातें विज्ञानको नीलादिज्ञानत्वकी सिद्धिके अर्थ बाह्य 
अर्थवादीकोभी नीरादिआकारत्व अंगीकार किया चाहिये, ताके भानेसें 
ज्ञाननिष्ठ जो नीछादि आकारत्व तिससें सर्व व्यवहारसिद्धि संभव है. बाह्य 
नीलादिक मानने अनथथक हैं. सो विज्ञान स्वप्रकाश है, क्षणिक है, साकार हैं 
यातें निराकार विज्ञानरूप बह्ासें उत्पत्तिकथन असंगत है. इति। इसमें यह 


सूत्रकारका सिद्धांत हैः-- 
ब्रह्मण १५ 


११४ बक्षसूत्राणि |[ अ० दे पा०२सू० ३०] 


नाभाव उपलब्धे! ॥ २८ ॥ 


न । अभावः । उपलब्धेः । इति । प०। 
अर्थ-यह घट है यह पट है इत्यादि अजुभवर्से सिद्ध जो विज्ञान तासे 
भिन्न पदार्थकी उपरव्धि नाम प्रतीति होवे है यातें विज्ञानसें भिन्न पदार्थका 
अभाव कहना संभवे नहीं, वाह्यविपय बिना ज्ञानमें विषयाकारताकथन असे- 
गत है, यातें वाह्यपदार्थोंके विद्यमान होनेसे ज्ञानको साकारता सिद्ध होवे 
नहीं, और ज्ञान क्षणिकभी नहीं ॥ २८॥ 


अच०-ननु-जाग्रतअवस्थामें उपजे जे ज्ञान ते निरालम् हैं अर्थात्‌ निर्वि- 
षय हैं ज्ञान होनेसे स्व॒प्त गंधवेनगरादिज्ञानवत” जा अनुमानसें ज्ञान निर्विषय 
सिद्ध होवे है, जा शंकासें कहे हैं।-- 


वैधर्म्याच् न खप्नादिवत्‌ ॥ २९ ॥ 


वैधम्योत्‌ । च। न । खप्मादिवत्‌ | इति । प० । 

अथे-स्वमज्ञानमें बाधित विषयत्व है, जाग्तज्ञानमें अबाधित विषयत्व है 
यातें दोनो ज्ञानोंको विषम्यात्‌” नाम विरुद्धधर्मवान्‌ होनेसें स्वम्मादिदश्ांतसे 
जाग्रतज्ञानको निर्विषय कहना संभवे नहीं. चकारपदसे दृष्टांतमें अनुमानविषे 
साध्याभाव बोधन किया है. स्वम्मेंभी प्रातिभासिक विषय है. ॥| २९ ॥॥ 
: आव०-किंच बाह्य पदार्थ नहीं मानें तो “घटज्ञानँ 'पदज्ञान इत्यादि 
ज्ञानमैं विचित्रता नहीं सिद्ध होवेगी; जो पूर्व पूर्व अनादि विचित्र वासनासें 
विचित्रता मानें तौ बाह्य पदार्थ कोई माना नहीं, यातें वासना सिद्ध होवे 
नहीं. यह सूत्रकार कहे हें. 


न भावोडतुपलब्घे! ॥ ३० 0 


 न। भावः | अनुपलब्धेः | इति | पए०।॥ 
अथे-तुम्हारे सतमें वाह्य पदार्थकी अन्ुुपलब्धि है अर्थात्‌ बाह्मज्ञान हुंआ 
नहीं यातें. वासनाका संभव नहीं. इति ॥ ३० ॥ 


* अच०-किंच संस्काररूप वासनाका तुम्हारे मतमें आश्रयभी कोई नहीं. जो- 
“अहम” जा आलूयविज्ञानको आश्रय कहे तो तिसका निंषेध करे हैं:-- . . 


[अ० २ पा० श सू० ३२] भाषाटीकासहितानि । श्श्ष 


क्षाणकलात्‌॥ ३१ ॥ 
एक पद है। 
अर्थ-आल्यविज्ञान क्षणिक है यातें ताको वासनाका आश्रय कहना संभवे 
नहीं. आश्रय मानेंगे तो सो क्षणिक नहीं सिद्ध होवेगा. इति ॥ ३१॥ 


सर्वथाओलुपपत्तेश्च ॥ ३२॥ 
सर्वथा ! अजुपपत्तेः | च । इति । प०। 


अध-द्शनम! इस शब्दके स्थानमैं पश्यना यह अपशब्द उच्चारण करे हैं 
और स्थानम इस शब्दके स्थानमें तिधना यह अपशब्द उचारण करे हैं यातें 
सर्वेथा नाम अथसे और अर्थस यह वेदबाह्य मत असंगत है. “अन्नुपपत्ते:” 
नाम असंगत होनेसे सोक्षार्थी पुरुषोंकी यह सोगतमत आदर करनेयोग्य 
नहीं. इति ॥ ३२॥ * 


अव०-उक्त तीनों मतोंके अडसार शूल्यमत भी असंगत है. झन्‍्य किसी 
प्रमाणसे सिद्ध होवे नहीं. सर्च प्रमाणोंकरके वाघित है, यातें ताके खंडनमें 
 सून्रकारने पृथक्‌ प्रयथल्ल नहीं किया. इति । पूर्व. म्ुक्तकचछ वौद्धनके मतको 
खंडन करके आगे विवसन जेनोंके मतको खंडन करे हैं. यह जैनोंका सिद्धांत 
हे--स्यादस्ति ९, स्थान्नास्ति २, स्थादस्ति च नास्ि च ३, स्थादवक्तव्यः ४, स्थाद- 
स्ति चावक्तव्यः ५, स्पान्नास्ति चावक्तव्यः ६, स्थादस्ति नास्ति चावक्तव्यः ७, 
जाविध अस्तित्व नास्तित्त आदिक विरुद्धधर्मोको थहण करके सर्च पदार्थों 
उक्त सप्तभंगनयको जोड़तेहुए विवसन पदार्थमात्रको अनेकरूप कथन करे हैं. झ- 
हणादिव्यवहारकी सिद्धिके लिये उक्तविधि नहीं माननेसें यह दोष कहे हैं, वस्तुका 
एकरूप़ अंगीकार कियेसें वस्तु है यह कहा चाहिये, वा वस्तु नहीं यह कहा 
चाहिये, प्राप्यरूपसेंभी वस्तुका सत्व है यातें चस्तुप्राप्तिके अर्थ अहणादि व्यवहार 
नहीं सिद्ध होवेगा, यातें एकरूपता संभवे नहीं. किंतु घटादिरूपसेंही म्राप्यादि 
रूपसे नहीं जाविधही माना चाहिये; यातें वस्तुको अनेकरूपता संभवे है. 
सप्तभंगनयका यह अर्थ है. अस्तित्वादि सपकोटिविषे एक वस्तुर्में जो विरोधका 
भंग सो सप्तभंग कहिये. तहां जो नय नाम युक्ति सो सप्तभंगनय कहिये- 

, तिनका यह अक्षरार्थ है किसी्रकार है १, किसीमकार नहीं २, किसीप्रकार 
है और नहीं २, किसीप्रकार कहा नहीं जाय ४, फिसी म्रकार है और - कहा 


११६ ब्रह्मसूत्राणि [अ०२ पा०४ सू० ३४] 


नहीं जाय ५, किसी प्रकार है नहीं और कहा भी नहीं जाय ६, किसी प्रकार है 
भी, नहीं सी है और कहा भी नहीं जाय ७, इति । है कहनेकी अभिलापासें 
प्रथम भंग अवृत्त होवे है, निषेघेकी इच्छासें द्वितीय २, औमसें उमय इच्छासे 
हवीय ३, एककालमें उभय इच्छासें चतुर्थ ७, प्रथम चतुर्थकी ऋमसें इच्छासे 
पंचम ५, द्वितीय चतुर्थकी इच्छासें षष्ठ ९, प्रथम, द्वितीय, चतुर्थकी इच्छासें 
सप्तम संग प्रवृत्त होवे हैं. इसप्रकार एकत्व, अनेकत्व, नित्यत्व, अनित्यत्वादि 
विरुद्ध धर्मोंको अहण करके उक्त नयकी योजना करनी चाहिये- यातें वस्तु- 
मात्रको सत्वअसत्वादि अनेक विरुद्ध धर्मवान्‌ होनेसें एकरूप बरह्ममें समन्वय 
असंगत है. यह उक्त पक्षमें दोष कहे हैंः-- 


नेकस्मिन्नसम्भवात्‌ ॥ ३३ ॥ 
न । एकस्मिन्‌ । असम्भवात्‌ । इति । प० । 


अथे-एकस्मिन्‌ नाम परमार्थरूप एक बस्तुमँ असंभवात्‌ नाम विरुद्धधम- 
नका असंभव है यातें एक वस्तुको अनेकरूपता संभवे नहीं । जो है. सो है 
ही, नास्ति नहीं । जो नित्य है सो नित्यही है, अनित्य नहीं- यथा पत्यग 
आत्मा है. भ्रपंचभी तुम्हारे मतमें सत्स्वरूप है. यातें ताको अनेकरूप कहना 
संभवे नहीं. ओर हमारे मतसमें प्रपंच सत्य. नहीं और असत्यभी नहीं किंतु 
अनिवेचनीय है. यातें स्व व्यवहारसिद्धि संभवे है. इति ॥ ३१ 

बविवसन आत्माको देह जितना माने हैं ताका निषेध करें हेंः-- 

एवं चात्माउकाल्ूर्यम्‌ ॥ ३४ ॥ 
... एवम्‌ । च्‌। आत््मा5कात्स्न्यम्‌ । इति । प० । 

अथे-यथा तुम्हारे सतमें एकविपे विरुद्ध धर्ममका असंभवरूप दोष है, एवं 
नास तथाहि आत्माको “अकात्स्लथेम! नाम परिच्छिन्नत्वरूप अपर दोष हैं. जी- 
वको देहपरिमाणवान माना है यातें परिच्छिन्न होनेसें घटादिवत्‌ आत्मा अनित्य 
सिद्ध होवेगा, और गजादिशरीरमें संपूर्ण प्रवशसी नहीं होवेगा- इति ॥ २७ ४ 

अचब०-जो सावयव मानके आत्माको बढ़ने घटनेवाछा मानके दोषका 
निषेध करें तो सोभी संभवे नहीं, यह कहे हें;--- 


227 कल न नमक लय था स 6 5 0 >> 
_ १ जीव है- ९ जीव जडमें नहीं: ३ जीव शरीरकालमैं प्रसिद्ध है, अद्यरीरकालमें नहों- "४ जीव 
है, फट्दा नहीं जाय- है 


(अ० श्पा० १ सू० ३८ ] भाषाटीकासहितानि । ११७ 


| पे [4 प] 2 

न च पर्योयादप्यविरोधो विकारादिभ्यः ॥ ३५॥ 

न। च। पयायात्‌। अपि। अविरोधः । विकारादिभ्यः। 

इति । प०। 

अथे-पर्यायात्‌ नाम अवयवनके गमनागमनसें भी आत्मामें उक्त दोषका 
अधिरोध संभवे नहीं. आत्माको सावयव मानके बढ़ने घटवाला माननेसें 
: आत्मा बिकारी होवेंगा, अनित्य होवेगा, इत्यादिक दोष प्राप्त होवेंगे यातें 
उक्त दोप दूर होवे नहीं. इति ॥ ३५ ॥ 


| 2 श्रोभमयनिद्यलवा [4] 
अन्त्यावस्थितेश्रोमयनिद्यवादविशेषः ॥ ३६ ॥ 

अन्त्यावख्ितेः । च। उभयनित्यवात | अविशेषः | इति । प० 

अथ-मुक्त आत्माका जो परिमाण सो नित्य है यह जैनसिद्धांत है सो 
असंगत है. तथाहि-यथा अंत्यपरिमाणमैं परिमाणत्व हैं यातें आद्य और 
मध्य परिमाणमें परिमाणत्व है, यातें आद्य मध्य परिमाणकोमी नित्य 
होना चाहिये यातें तीनोहीं तुल्य सिद्ध होवेंगे. अक्षरयोजना यह है कि अंत्य 
नाम अंतके परिसाणकी नित्यरूपसे “अवस्थितेः” नाम स्थिति होनेसें 
उभय नाम प्रथम मध्यपरिमाणका भी नित्यत्व सिद्ध होवेगा. यातें अविशेष 
नाम तीनोही तुल्य सिद्ध होवेंगे- उक्तविधिसें इस मतकोभी असंगत होनेसें 
इनसेभी समन्चयका विरोध नहीं. इति सिद्धम्‌ ॥ ३६ ॥ 

अच०-ईश्वरवादी जे सांख्य, पतंजलि, शैंव, कणभुकू आदिक ते ईश्वरको 
केवल निम्मित्तकारण माने हैं, उपादान नहीं माने हैं. आगे तिनके मतका 
खंडन करे हेंः-- 

पत्युरसामञझ्स्यात्‌ ॥ ३७॥ 
पत्युः । असामजञ्जस्यात्‌ | इति । प० | 

अर्थ-ईश्वरको जगद्गचनामें प्रवृच्त होनेसें 'असामज्ञस्पात! नाम वैषस्य 
नैघ्व॑ण्यादि दोप प्राप्त होवेंगे यातें 'पत्यु!” नाम परमेश्वरको निमित्तमात्र कहना 
संभवे नहीं ॥ २७॥ हि 

सम्बन्धानुपपत्तश्व ॥ ३८ 
सम्बन्धानुपपत्तेः । च। इति । प० । 

अथे-प्रेरणायोग्य जे प्रधानादिक तिनसें इंस्वरका संबंध कहा चाहिये, सं- 

चेंधबिना प्ेरकता संभवे नहीं- ईश्वर निरवयव है ताका प्रधानादिकोंसे संबंध 


१्१्८ ब्रह्मसूत्राणि । [अ० श्पा० २ सू० ४१ ] 


संभवे नहीं यातें संबंधके नहीं बनंनेसें निमित्तमात्र कारण कहना संभवे 
नहीं- इति ॥ ३२८ 0 


अधिष्ठानालपपत्तेश्व ॥ ३९ ॥ 
अधिष्ठानाजुपपत्तेः। च। इति। प०। 


अधे-प्रधानादिक नीरूप है यातें तिन विषयक ईश्वरकों अधिष्ठान नाम 
३ 4 च 
प्रेरणा संभवे नहीं, यातें भी निमित्तमात्रकथन असंगत है. इति ॥ ३५९५ ॥ 


करणवच्चेन्न भोगादिभ्यः ॥ ४०॥ 
करणवत्‌ । चेत्‌ । न । भोगादिश्यः। इति । प०। 


अधथे-ननु अप्रत्यक्षरूप करण नाम इंद्रियोंका जीव यथा प्रेरक है तथा अग्र- 
त्यक्षरूप प्रधानादिकोंका ईश्वरको प्रेरक मानना संभवे है, यह शंका करें 
भोगादि दोषनसें संभवे नहीं. जीव इंद्वियोंको स्वभोगाथ्थ प्रेरणा करे है तत्‌ 
दृ्ांतसें इम्वरकों प्रेरक मानेसें ईम्धरकोभी भोगादिप्राप्तिरृप दोष हो- 
वेगा, इति ॥ ४० ॥ 


अन्तवत्त्वमसंकज्ञता वा ॥ ४१ ॥ 
अन्तवत्तम्‌ । असर्वज्ञता । वा। इति । प०। 


अथै-किंच मधान, जीव, ईश्वर, इन तीनोंकी जो संख्या और परिमाण 
तिन दोनोंको इश्वर जाने है वा नहीं ? प्रथम पक्ष मानें तो संख्यापरिमाण- 
वान्‌ होनेसे तीनोंही घटादिकोंकी नांई घिनाशी होवेंगे. दूसरे पक्षमें ईश्वरको 
असचवेज्ञता सिद्ध होवेगी, यातें अभिन्न निमित्त उपादान ब्रह्ममें जो समन्वय 
ताका उक्त सतनसें विरोध नहीं, इति ॥ ४१ ॥ 


अव०-आगे भागवतसतखंडन करे हैं। भागवतमतमें ईश्वरको अमभिन्ननि- 
मित्त उपादान साने हैं परंतु जीवकी उत्पत्ति साने हैं. तिस अंशर्में भागवतमत 
आंतिमूल है वा प्रमाणमूल है यह तहां संदेह है? पूर्पपक्षम प्रमाणमूल है. तथा 
हि वासुदेव परमात्मा जगतका उपादान और निमित्तकारण है- तिस वासुदेवसें 
संकर्षण नाम जीव उपजे है, तासें अद्युज्ञ नाम सन उपजे है, मनसे अनिरुद्ध 
नाम अहंकार उपजे है, यातें जीवाभिन्न अहसें जगतकी उत्पत्तिका बोधक 
समन्वय असंगत हें, इति, तहां यह सिद्धांत -है+-- 


[जि० २ घा० रसू० ४५ ]: भाषाटीकासहितानि । १६५ ह 


-' उत्पत्त्यसम्भवात्‌ ॥ ४२ ॥ 
उत्पत््यसम्भवात्‌ । इति । पृ०। 
अर्थ-चासुदेवपरमात्मासें जीवकी उत्पत्तिका असंभव है: यातें यह मत 
असाधु है. जो - उत्पत्तिही अंगीकार करेंगे तो जीव अनित्य सिद्ध होवेगा 
यातें भगवद्माधिरूप मुक्ति किसकी होवेगी. इति ॥ ४२ ॥ 


न च कठुः करणम्‌ ॥ ४३ ॥ 
न। च्‌। कतुः | करणम्‌ | इति । प०। 
अथै-लोकमें कर्ता जे देवदत्तादिक तिनसें कुठारादिक करणोंकी उत्पत्ति 
देखी नहीं यातें जीव कतासे सनरूप करण उपजे है, यह कथन युक्त नहीं 
यातें सी यह मत असंगत है. इति ॥ ४३ ॥ 


अच०-नज्ु संकर्षण, मयुन्त, अनिरुद्ध, यह त्रथ जीव नहीं किंतु बासुदे- 
ववत्‌ विज्ञानस्वरूप ईश्वर हैं, जा शंकासें कहे हैंः-- . 


विज्ञानादिभावे वा तदग्रतिषेधः ॥ ४४॥ 
विज्ञानादिभावे । वा । तदग्रतिषेधः । इति । प० । 


अथे-संकर्षणादित्रयको वासुदेववत्‌ विज्ञानादि नाम ऐ्वरादि निर्दोषभाव 
नाम स्वरूप सानेसें तत्‌ नाम उत्पत्तिके असंसवरूप दोषका अपरत्तिषेध नाम 
निषेध होवे नहीं. तथाहि-चारोंको ईश्वर माननेका कुछ अयोजन अतीत होचे 
नहीं- एक ईश्वरसेंही कायेसिद्छि संभव है. और “भगवान एव एको बाख- 
देव; परमाधेतत्त्वम! इस तुम्हारे सिद्धांतरीसी हानि होवेगी. जो संकषे- 
णादित्रयको वासुदेवके तुल्य मानके वासुदेवसे तिनकी उत्पत्ति सानें तो उ- 
त्पत्ति असंभव दोष आप होवेगा. क्योंकि वासुदेवतुल्यनकी वांसुदेवसे उत्पत्ति 
संसवे नहीं. इति ॥ ४४ ॥ 


विप्रतिषेधाच ॥ ४५ ॥ 


विप्रतिषेधात्‌ । च । इति । प०.। 
अर्थ-कहूं ज्ञान, इश्वरी कर चर, वीर्य, तेज, यह वासुदेवके गुण कहे 
हैं, और कह उक्त शुणोंका ग्रणीसे अभेद कहा है यातें परस्पर विमभ्मतिपेघात्‌ 


१२० 


ब्रह्मसत्नाणि ! 


[अज० २ पा० ३स० १] 


नाम निषेध करनेसें यह भागवतमतभी असंगत है. यातें विवादरहित अद्विती- 
य त्ह्ममें सवे वेदांवका समन्वय है. इति सिद्धू ॥ ४५ ॥ 


इंति शारीरकसत्रभावप्रकाशिकाभाषाटीकायां 
हितीयाध्यायस्य हितीयः पादः समाप्तः । 


अथ तृतीयपादप्रारम्मः । 


इस पादमें अतिविरोधपरिहार करे हैंः--इस पादके त्रय अधिक पंचाशत्‌ 
सून्न हें, तहां १७ अधिकरण हैं, २६ गुण हैं । तथाहि--- 


सूत्रसंख्या । अधिकरण । गुण । 


| 
डे 
छ 
प्‌ 
द्‌ 
3. 
८ 
९ 
२० 
५११ 
श्२ 
श्र 
श्छ 
श्ण 
श्द 
२७ 
श्द 


2५१६. 


-२० 


ता 
गु० 


ध्त 
हि] 


8 + कक के के के कक + + + ५ #ु ५ ५ 


प्रसक्ष- 
आकाशो त्पत्तिनिषेध, 
पूर्वपक्ष, 
आ०नि० 
आ० 
आ० 
आकाशोत्पत्तिसिद्धि- 
आ० 
चबायुड ० 
अह्मउत्पत्तिनिषेध. 
तेजडउ ० 
जलरूड ० 
प्ृथिवीड० 
भतत्रह्म अधीन 
भ्रूतरूयचि० 
इंद्रियउत्पसिंविचार. 
जीवउत्पत्तिनिषेध- 
जी० 
जीवस्वप्रकाश- 
जीवअयुपूर्वपक्ष- 
जी० 


[अ० २ पा० ३ सू० १]. - भाषाटीकासहितानि । १२१ 


२१ हि गु० जी० 

श्र न शु० जी० 

श्र न गु० जी० 

श्छ न गु० जी० 

श्ण्‌ न शु० जी० 

श्पं न शु० जी० 

२७ न गु० जी० 

घ्८ न गु० जी० 

श्र न शु० जीवमहान्‌ सिद्धांत- 
झ्‌० न गशु७० जीवबूद्धिसंयोगविचार. 
३१ ध् शु० जी० 

नह न गु० अंतःकरणसिद्धि. 
झ्इ आ० ट आत्माकर्ता सिद्धि- 
इ्छ हि शु० आ० , 

है रन शु० आ० 

झ्ध + गु० आ० 

७ न शु० आ० 

इ८ न शजु० जा० 

ञ्द र्नः शु० आ० 

४० आ० है कठेत्वउपाधिक सिद्धि- 
छ१ अ० + क॒र्दईश्वरअघीन- 

छ्र न शु० इम्घर प्रेरक- 

छह आ० न इश्वरअंश जीव- 

छ्छ ही 5 है ई० 

छ्ष हज झु० ई० 

छ्द + गु० इेश्वरमें सुखादिनिषेध- 
छ्७छ नै शु० ्ई रे 

छ्८ ++ डु० देहसंबंधानज्ञापरिहार- 
९ + खु० कर्मसंकरनिपेध. 

प्ध्० र्कः शु० े इश्चरआभास जीत्र- 


ब्रक्ष, १६ 


१्श्२ ,.. !: अहसूजाणि । .. [अ०-२ पा० ३ सू० ३-] 





७५१ 'क गुण ..._ स्यायमतखण्डन, 
ण्र्‌ के शु० न्या० 
ण्र न गु० ज्या० 

्ब् त्त्र् द्दें. इति 

तहां यह प्रथस सूत्र हैः--- 


न वियदश्रुतेः ॥ १॥ 
न । वियत्‌ । अश्वुतेः | इति । प०। 


अथे-आकाशकी उत्पत्तिमें संदेह हुए यह पूर्वपक्ष हैः--“तत्‌ तेजोउ्स- 
जत' जा छांदोग्यश्रुतिमें तेजादिकोंकी उत्पत्ति सुनी है, आकाशकी नहीं 
और “आत्मन आकाहः संप्तूतः” जा तैत्तिरीयश्रुतिमें आकाशकी उत्पत्ति 
सुनी हे, यातें वाक्यनका परस्पर विरोध है. इति । अध्यायसमासिपर्यत पर- 
स्पर विरोधसें वाक्यनकी अप्रमाणता पूर्वपक्षका फल है और विरोधके असं- 
भवर्े प्रमाणता सिद्धांतका फल है. एकदेशमतसें समाधान करे हैं:--'अश्र॒तेः' 
नाम आकाशउत्पत्तिबोधक वाक्य सुना नहीं यातें वियत्‌ नाम आकाश उ« 
पजे नहीं. * आत्मनः ” यह श्रुति गौण है यातें आकाशकी उत्पत्ति नहीं 
होनेसें वाक्यविरोध नहीं. इति ॥ १॥ 


शेकासूत्र । ८ 
अस्ति तु॥२॥ 
अस्ति । तु । इति । प०। 
अथे-तु पद अपरपक्षके गरहणार्थ है. तैक्तिरीयमैं आकाशउत्पत्तियोधक 


अति अस्ति नाम है, यातें विरोध दूर होने नहीं. इति ॥ २ ॥ 
एकदेशी स्वाभिप्रायको कहे हैः-- 


गोण्यसम्भवात्‌॥ ३॥ 
गोणी । असम्भवात्‌ | इति । प०। 


(0 
अर्थ-आकाशकी उत्पत्तिमं समवायि आदिक कारणोंका * असम्भवात्‌! 


हब 


नाम अभाष हे और विमु होनेसें नित्यभी है यातें कारणके असंभवसें आका- 
शजल्मबोधक श्रुति मुख्य नहीं, किंतु गौणी है. इति ॥ ३ ॥ गह 


[अ० २ पा० ३ सू० ६ ] भाषाटीकासहितानि ; श्र्३्‌ 


शब्दाच ॥ ४ ॥ 
'शब्दात्‌ । च । इति । प०। 


अथे-८ चायुथआान्तरिक्ष चैतद्म्हतम्‌ ! जा श्रुतिबिषि अमृतपदसे आकाश 
अहण किया है, यातें * छाष्दात्‌” नाम अमृत शब्दसेंसी आकाशका जन्म 
संभवे नहीं. इति ॥ ४ ॥ 

अब०-ननु एक संभूत शब्दकोही आकाशमें गोण- मानना और तेजादि- 
कॉमें मुख्य मानना असंगत हैं, जा शंकासें कहे हैंः-- 


स्याचेकस्य ब्रह्मशब्दवत्‌ ॥ ५ ॥ 
स्थात्‌ । च । एकस्य । बह्मशब्दवत्‌ । इति । प० । 


अभे-यथा भ्ृशगुवक्छलीके द्वितीय अनुवाकके आरंभमें “अन्न न्रह्म इति 
डयजानाल्‌ ! यह कहकर पछ्ठ अनुवाकके आरंसमें “आनन्दो ज्रह्म इति 
व्यजानात्‌ ! यह कहा है. इसमें अन्नके साथ ब्रह्म शब्द गौण है, आनंदके 
साथ मुख्य है; तथा ब्रह्मशब्दबत्‌ आकाशके साथ संभूत्त शब्द गोण है, 
तेजादिकोंके साथ मुरूय है, यातें बरह्मशव्दवत्‌ “ एकस्य ” नाम एकही संभूत 
शब्दको गौणता घ॒ मुख्यता “ स्थात्‌ ” नाम संभवे है. इति॥ ५॥ 
अव०-सूत्रकार स्वसिद्धांत कहे हेंः--- 


प्रतिज्ञाप्हानिरव्यतिरिकाच्छब्देमभ्यः ॥ ६ ॥ 
प्रतिज्ञापहानिः । अग्यतिरेकात्‌ । शब्देभ्यः । इति । प० । 


अधथे-ज्ञेय बहासें सवे जगत्‌ ' अव्यतिरिकात्‌ ! नाम अभिन्न है यातें अभेद- 
ज्ञानसैं सबके ज्ञानप्रतिज्ञाकी ' अहानि होवे है अथांत्‌ प्रतिज्ञा समीचीन 
होबे है. जो ऋह्मसें भिन्न मानके आकाशको नित्य मानेंगे तौ प्रतिज्ञाकी हानि 
होवेगी यातें प्रतिज्ञासिद्धिअर्थ आकाशका जन्म अवश्य साना चाहिये. किंच 
€ छाब्देम्यः ” नाम कायकारण अभेदबोधक शब्दोंसेंसी प्रतिज्ञा सिद्ध होवे है. 
'ऐतद्तत्म्यभिद्म्‌ स्वेम्‌! इत्यादिक शब्द सर्व कार्यकों अक्माभिन्न कहे हें. 
आकाशको नित्य माननेसें उक्त शब्दोंका बाघ होवेगा- उत्पत्ति माननेसें जो 
विरोध कहा है; ताका यह परिहार है. छादोग्यमें उत्पत्तिमात्र सुनी है 
अमुक प्रथम ड़पजा यह सुना नहीं. ओर तैत्तिरीयमें "आत्मन आकाहाः 


१२४ » ब्रह्मसृत्राणि [अ० २ पा० ३१ सू० ९ ] 


सम्भूतः । आकाआात ्‌ वायुवायोरत्षि!” जाविध तेजकों ठतीय जगा सुना 

है, यातें आकाश वायुको रचके तेजकों रचा जाविध तैत्तिरीय अछुसार छाँ- 

दोग्यमैं अंगीकार कियेसें उमय वाक्यनका विरोध नहीं. इति ॥ ६ ॥ 
अच०-उत्पत्तिकी सामओ ब्रह्म है यह कहे हैंः--- 


यावहिकारं तु विभागो लोकवत ॥ ७॥ 
यावद्धिकारम्‌ । तु । विभागः । छोकवत्‌ । इति । प०। 


अधै-सु शंकानिषेधार्थक है, ' यावचत--विकारस ” नाम जितना कार्यमात्र 
है सो “विभागों? नाम सेदवान्‌ है. अविकाररूप अह्ममें भेद प्रतीत होवे 
नहीं, छोकमें घटादिक विकारकोही भेदवान देखा है. तहां यह अनुमान हैः 
“आकाश, दिशा, कार, मन, परमाणु, यह पराधीनसत्तावान्‌ हैं, स्वसमान 
सत्ताको विभागवान्‌ होनेसें घटशरावादिवत्‌.” आकाशमें जो अम्गत शब्द कहा 
था सो “ अम्बतादों वा! जा अमृत शब्दवत्‌ सापेक्षक है, यातें आकाश 
ब्रह्मका कार्य है. इति॥ ७॥ 


एतेन मातरिशा व्याख्यातः ॥ < ॥ 
एतेन । मातरिशा । व्याख्यातः । इति । प०। 


अथे-एतेन नाम आकाशका जन्म साधनेसें * मातरिश्वा ! नाम वायुभी 
आकाशावच्छिज्न अहासे उपजे है यहभी “ व्याख्यातः नाम कहदिया- वायु- 
कोभी नित्य मानेसे प्रतिज्ञाहानि होवेगी- इति ॥ ८ 0 


असम्मवस्तु सतोञ्लुपपत्तेः ॥ ९ 0॥ 
असम्भवः । तु । सतः । अजुपपत्तेः । इति । प्र०। 
अधथै-नन॒ ' सं जातो5सि विश्वतोसुखः' जा श्वेताश्वतरकी अह्मजन्म- 
बोधक श्रुतिका जक्षनित्यत्ववोधक अ्रुतिसें बिरोध है, यातें विरोधनिषेधार्थ 
अद्धाका जन्म अंगीकार किया चाहिये जा शंकामें यह सिद्धांत हैः---“सतः” नाम 
संत्स्रूप ब्रह्मकी उत्पत्तिका असंभव है. सत्‌ सामान्‍्यसें सत्‌ सामान्यकी तो 
उत्पत्ति “ अनुपपत्तेः ” नास बने नहीं. विश्वेष जे घटादिक ते सामान्यजन्य. 
हैं यातें तिनसेंभी सत्सामान्यकी उत्पत्ति संभवे नहीं. और ब्रह्मको .विशेष 
समानके ताका जन्म मानें तो जो ताका जनक सामान्य है तिसको हम बक्ष 


[ अ० २ पा० ३ सू० १२ ] भाषाटीकासहितानि । श्श्ष्‌ 


सानेंगे और जन्मबोधक जो श्रुति कही है सो औपाधिक 
यातें श्रुतिविरोधभी नहीं. इति ॥ ९ ॥ 3022000532 


तेजोज्तसथाह्याह ॥ १० ॥ 


हि तेजः | अतः | तथाहि । आह । इति । प०। 

अथ- तक्तेजोडसजत' जा छांदोग्यश्रुतिमें तेजजो अह्मजन्य सुना है 
बायोरप्नि! जा तैत्तिरीयमें तेजको वायुजन्य सुना है. इन वाक्यनके 
विरोधका संदेह हुएसें पूर्वपक्षमें श्रुतिके बछसें विरोध अंगीकार कियेसे यह 
सिद्धांत हैः---अतः नाम वायुसें तेज उपजे है. तथाहि नाम वायुजन्यत्व वायो- 
रप्िः जा श्रुति आह नाम कहे है. यथा वायुरूपको आराप्त अक्मसें तेजका 
ज़न्म छांदोग्यसे कहा है तथा * बायोरज्िः ” इस वाक्यमेंसी वायुउपहित 
हा अश्लि उपजे है यह अंगीकार है, यातें उसयवाक्यनका विरोध नहीं. 
इते ॥ १० 


आपः ॥ ११ ॥ 
आपः । इति । प०। 


अथ-तद्पोड्सूजत' जा छघंदोग्यवाक्यमें जलको न्द्याजन्य सुना है और 
अफग्नेराप;' जा तैत्तिरीय श्रुतिमें अभ्विजन्य जरू सुना है, यातें उमयवाक्य- 
नके विरोधका संदेह हुएसे पूर्वपक्षमें विरोध माननेसें यह उचर है. पहला सूच 
इसमें मिकाकर यह अक्षरार्थ हेः--अतः नाम तेजसें “आपः नाम जरूू 
उपजे है. तथाहि नाम तेजोजन्यत्व जरूको 'अश्नेराप? यह श्रुति आह नास 
कहे है. श्ुति-अविरोध पूर्वबत्‌ जानना चाहिये. इति ॥ ११ ॥ 


पृथिव्यधिकाररूपशब्दान्तरेभ्यः ॥ १२ ॥ 
एकपदम्‌ | इति । पए०। 8, 


अधथे-ता अन्नम्‌ असजन्त' जा छांदोग्यवाक्यमें जलसें अन्नकी उत्पत्ति 
सुनी है- इसमें अन्नशब्दसें जीह्यादिका अहण है वा प्धिचीका महण है ? यह संदेह 
है, और 'प्रथिच्या ओषघय ओषधिन्योउ्श्मम! जा तैत्तिरीयआ॒तिमें अन्नको 
पृथिवीजन्य सुना है, यातें उमयवाक्यनका विरोध है. तहां यह उत्तर हैः 
अधिकार १, रूप २, शब्दांतर ३, जा त्रय हेतुसे अन्नशच्दसें छांदोग्य अ्ुतिमें 


१२६. -: बअह्मसत्नाणि। [अ० २ पा० ३ सू० १३ ] 


पृथिवीका अंगीकार है, त्रीह्यादिकोंका ग्रहण नहीं । 'तत्तेजोडसजत' यह 
महाभूतउत्पत्तिका अधिकार हैं. तहांही यत्‌ कृष्ण तद्न्नस्याँ जा श्रुति 
क्ृष्णरूप अज्न शब्दका वाच्य जो प्थिवी ताका बोधक है. और 'तद्यदपां 
शर आसीत तत्समहन्यत सा पृथिवी अभवर्ता जा बवृहदारण्यक 
श्रुतिमं जलजन्य जो पृथिवी ताका बोधक शर यह झब्दांतर है. झ्तिअर्थ-- 
“तत्‌ नाम तत्न उत्पत्तिकालमें 'घत्‌ अपाम नाम जलोंका शर नाम कीच 'आसी- 
त! नास हुआ सो 'समहन्यत” नास संघातरूप हुआ. 'सां” नाम सो कठिना- 
कार परिणाम पृथिवी हुई. इति । जा उक्त जय कारणोंसें ब्रीद्यादिक अन्नका जल 
उपादान नहीं, किंतु पृथिवी उपादान है; यातें श्रुतित्रिरोध नहीं. इति ॥१श। 
हि अच ०-पूर्व महाभूत्तउत्पत्तिनोधक श्रुतिवचनोंके विरोधका परिहार किया 
हैं. आगे महाभूतअभिमानी देवताओंका विचार करे हैं. ते देवता स्वतंत्र 
भौतिक कार्य उत्पत्तिमैं प्रवृत्त होवे हैं वा ईश्वरअघीन हुए भ्रवृत्त होवे हैं! 
यह उत्तरअधिकरणमें संदेह है। 'आकाञात इत्यादिक अ्रुतिमें स्वस्वकार्य- 
उत्पत्तिमें देवतानको स्वतंत्रता सुनी है, यातें ऋह्मसें उत्पत्तियोधक वाक्यनका 
238 उत्पत्तिबोधक वाक्यनसें विरोध है, यह पूर्वपक्ष है। तहां यह उत्तर- 
सूत्र है४-- 


तदभिध्यानादेव त॒ तल्लिज्ञत्सः ॥ १३ ॥ 
तदभिध्यानात्‌ | एवं । तु । तललिज्ञत्‌ । सः। इति । प०। 


अथे:-सः” नाम परमात्मा 'तत” नाम तत्तत्कार्यविषयक जो ज्ञानरूप 
ध्यान तिसकरके सर्वकार्यको रचे है। पृथिव्यां तिषछ्ठन पृथिव्या अन्तरों 
थ॑ पृथिवी न चेद्‌॥ यस्‍्य पृथिवी दारीरं॑ यः प्रथिवीसन्‍्तरों यमयति 
एव ते आत्मा अन्तर्याम्यस्धतः ।' इत्यादि बृहदारण्थरश्रुतिमें “तत” नास 
परमात्माकाही प्रेरणारूप छिंग प्रतीत होवे है। जो प्थिवीके अंतर है, पृथिवी 
आवक कर है, प्थिवी.जिसको जाने नहीं, पृथिवीमैं स्थित हुआ जो एथि- 
डक करे है, यह तुम्हारा अमृतरूप अंतर्यामी आत्मा है. इति! 
अतिमें “पृथिवीमें स्थित हुआ” जा कथनसें पथिवीअभिमानीदेवतानमैं स्थित 
हुआ प्रेरणा करे है, यह अंगीकार है, यातें श्रूताभिमानी देवनको स्वकार्यरच- 
नामें स्वतंत्रता नहीं. इति ॥ १३ ॥ 


अचव०-आगे ल्यविचार करे हैं: . 


( अ० २ पा० हे सू० १५ ] भाषादीकासदितानि । १२७ 


# पर्ययेण ० प 
विपर्ययेण तु क्रमोड्त उपपचते च ॥ १४॥ 
विपरययेण | तु। क्रमः । अतः । उपपयत्ते । च । इति | प्‌०। 
.. अथ०-भूतनकी उत्पत्तिका क्रम यथा श्रुतिमें कहा है तथाहि रूयका कम 
है वा तासे उल्टा हैं? यह इसमें संदेह है. पूर्वपक्षमं जन्मअनुसार रूय अंगी- 
कार कियेसें यह सिद्धांत है+--अतः नाम उत्पत्तिके ऋससें ऊयका कम वि- 
पर्ययेण नाम उलदठा है. स्वस्वकारणमैं कार्यलय होये हैं और उछूटाही रूय- 
क्रम 'उपपद्चते” नाम बने है. जो उत्पक्तिक्रमसैंही रूयक्रम भानेंगे तो कार्यमें 
कारणका नाश होचेगा, सो युक्त नहीं ॥ १४ ॥ 
अव०-भूतनके उत्पत्तिक्रमसे इंद्रियउत्पत्तिकमका विरोध है वा नहीं ? यह 
उत्तर--अधिकरणसें संदेह है। दि 


अन्तरा विज्ञानमनसी क्रमेण तल्लिजझ्ञदिति 


किक प [पु 
चेन्नाविशेषात्‌ ॥ १५ ॥ 
अन्तरा । विज्ञानमनसी । क्रमेण । तलूलिज्ञात । इति । 
चेत्‌ । न । अविशेषात्‌ | इति । प०। ' 
अथ-ननु 'एतस्मात्‌ जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च। खे वायु- 
ज्यातिरापः एथिवी विश्वस्थ धारिणी”' जा द्वितीयछुंडकश्र॒ुतिका सूज्नके 
“तत्‌ू--लिंग'! जा पदसें अहण है. विज्ञानपदसें बुद्धि और इंद्वियोंका भहण है. 
ते इंद्रियां, बुद्धि, मन, भूत और आत्माके 'अन्तरा नास अन्तर हैं. अर्थात्‌ 
भध्यमें ऋमसे उपजे हैं. “तत्‌-लिंगात्‌! नाम उक्त श्ुतिवाक्य इसीपकार कहे है. 
आत्मासें इंद्रियां, बुद्धि, सन उपजे हैं. .तिनसें भूत उपजे हैं. इति तात्पर्यम्‌। और 
आत्मन आकाहा;ः सम्भूतः जा श्रुतिमें आत्मासें भूतनकी उत्पत्ति कही है 
यातें उसयवाक्यनका विरोध है. इति। उक्त पूर्वपक्षका 'अविशेषात जा पदसे 
निषेध करे हैं. इंद्रियां, मन, बुद्धि, यह भूतनका कार्य है; यातें भ्रतनकी उत्प- 
सिके ऋमसें इंद्रियां, बुद्धि, मन, उत्पत्तिका कम अविशेष है अथात्र्‌ तुल्य है 
यातें विरोध नहीं। 'एत्तस्मात जाथते प्राण” यह झुति सबेका आत्मासें 
जन्मसाज्न कहे है, क्रम नहीं कहे है, यातें विरोध नहीं. इति ॥ १५ ॥ 
अच०-आगे जीववोधक श्रुतिवचनोंके विरोधका परिहार करे हें। जीवकी 
: उत्पच्तियोधक अऋुतिका जीवनित्यत्ववोधक श्रुतिसें विरोध है वा नहीं? जा सं- 
देह है. पूर्वपक्षमं विरोध मानेसे यह सिद्धांतसून्न हैः--- 


श्श्ट रु *... ब्रह्मत॒त्राणि। [अ० २ था० १ सू० १८-] 


चराचरव्यपाश्रयस्त स्यात्तद्मपदेशो 
भाक्तसद्भावमावित्वात्‌ ॥ १६ ॥ 
चराचरव्यपाश्रयः | तु । स्थात्‌ | तत्-व्यपदेशः । भाक्तः 
तद-भावभाविल्वात्‌ । इंति । प० १ 
अथे-अम्कुक मरगया अम्ुुक जन्मा यह छोकमें जो जन्ममरणका व्यपदेश 
नाम कथन है, सो चरअचर-व्यपाश्रय है अर्थात्‌ स्थावर जंगम देहविपयक 
मुख्य है. और जीवमें 'साक्त' नाम गोण है. जन्ममरणका जो कथन है सो 
तदू-भावभावित है अथांत्‌ देह उत्पत्तिनाशअनुसारी है, यातें जीवमें गोण 
है अथोत्‌ औपाधिक है, यातें जीवनित्यत्ववोधक श्ुतिका जीवजन्मबोधक 
आुतिसें विरोध नहीं- इति ॥ १६ ॥ 
अव०-एतस्मादात्मनः सर्वे एते आत्सानो व्युचरन्ति! जा वाक्‍्यमें 
परसें जीवकी उत्पत्ति कही है और “तत्सट्ठा तदेवान॒प्राविशत' जा झुंडक- 
अुतिमें “अनेन जीवेनात्सना प्रविद्रय! जा छांदोग्यमैं अविकारी न्ह्मका 
जीवरूपसें प्रवेश कहा है, इस विरोधके निषेधा्थ कहे हेंः--- 


नात्माश्वुतेनिद्यत्वाच ताम्यः ॥ १७७ 

न। आम्मा | अश्रुतेः । नियतात्‌ | च | ताभ्यः | इति | प० । 

अथे०-आरत्मा नाम जीव उपजे नहीं. उत्पत्तिका जहां जहां प्रसंग है तहां 
तहाँ अख्लुत्ते/ नाम जीवकी उत्पत्ति सुनी नहीं. उलटा 'ताम्यं नाम झुति- 
वांक्यनसें जीव नित्य निश्चित है। जीवापेत॑ चाव किलेद 'मियते न 
जीचो प्नियते' जा छांदोग्यवाक्यमें और 'स वा एव सहानज जात्मा- 
उक्षादी चखुदोनों विन्दते चस्सु य एवं चेद” जा बृहदारण्यकश्रुतिमैं जी- 
वको नित्य कहा है. पूर्त जिस अआतिमें जीवकी उत्पत्ति कही है तहां कार्यकार- 
णर्संघात उपाधिनिमित्तसे कही है, यातें उक्तवाक्यनका विरोध नहीं. इति॥१ण॥। 

ज्ञोज्त एव ॥ ह ॥ 
<. ज्रौः । अतः । एवं। इंति | प०4 

' अंथ-अंतः नाम उत्पत्तिरहित होनेसें जीव 'ज्ञ/ नाम स्वयंप्रकाशरूप है- 
स्वयंप्रकाशरूप अह्मही उपहित हुआ जीवरूप है, यातें जीवसी स्वयंप्रकाशरूप 
है. “अच अर पुरुष: खर्स॑ज्योतिः” यह श्रुतिसी जीव॒को स्वप्अवस्थामें स्वयं- 


[ज०२ पा०३ सू० २१] भापाटीकासहितानि । १२९ 


प्रकाश कहे हु. यद्यपि 'पशुयन्‌ चक्ष! झपवन्‌ ओजस! इत्यादिक श्रुतिका उक्त 
अ्ुतिस विरोध प्रतीत होवे है; तथापि यह श्रुति गौण स्वयंग्रकाश कहे है; 
यातें विरोध नहीं. झ्ुतिमें चश्षुपद्‌ दरशावाचक है ॥ १८ ॥ 

पूर्वपक्ष १० सूत्र+-- 


उत्कान्तिगत्यागतीनाम्‌ ॥ १९ ॥ 


उत्कान्तिगद्यागतीनाम्‌ । एकपदस्‌ । 
अथ-“एपोडणुरात्मा चेतसा वेद्तिव्य/' जा झुंडकश्र॒तिंसं आत्माको 
अणु कहा है. और उत्क्लांति, गति, आगति, अर्थात्‌ स्वत्वत्याग, गसनागमन 
यह त्रय उत्तरश्रुतिमें सुने हैं. विभ्ुुमें त्रयही संभवें नहीं; यातें जीवात्मा अछु 
ह। “स यदा अस्मात्‌ दारीरात्‌ उतक्रामति स तदा वागादिशि प्राणेः 
सह उतकरासति * जामें सरणसमय उत्कांति सुनी है। 'थे के च वे अ- 
स्मात्‌ लाकात्‌ प्रयन्ति चन्द्रमसम्‌ एच ते सर्वे गच्छान्ति इति। तस्मात्‌ 
लोकात्‌ घुनः एति अस्मे लोकाय कमेणा इसमें गसनागमन सुने हैं, यातें 
जीव अणु है. इति ॥ १९ ॥ 


खात्मना चोत्तरयोः ॥ २० ॥ 


खात्मना। च । उत्तरयोः । इति । प०। 
अथ-यच्पि स्वत्वत्यागरूप उत्कांति आत्माको विभ्वु मानेसेभी संभवे है, 
तथापि 'उत्तरयों: नास गति, आगति, यह उभय आत्मना नास जीवके 
स्त्रूपसे संबद्ध हैं थातें आत्मा अशु हैं. इति ॥ २० ॥ 


नाणुरतच्छतेरिति चेन्नेतराधिकारात्‌ ॥ २१ ॥ 
न । अणुः | अतत्‌ । श्रुतेः। इति | चेत्‌ । न। इतरा- 
घिकारात्‌ । इति । प० 


अथ-ननु “ अतत--श्रुतेः” नाम ' सहानज आत्मा अनन्त ब्रह्म ' इत्या- 
दिकोंमें जीवको विभु सुना है, यातें जीव अणु नहीं- यह शंका सिद्धांती करे 
तो संभवे नहीं. जीवसें इतर जो ब्रह्म ताका “एप सहानज जात्मा ' जामे 
अधिकार है. अ्थांत्‌ सब वेदांतमें प्रधानताकरके ज्ञेयरूपस प्रसंगमें अह्मको 
महान्‌ सुना: है. इति ॥ २१ ॥ 


१ कीपीत्तकि, ३ बृहतपष्ठगत 
अह्य० १७ 


१३० - त्रह्मस॒न्नाणि । [अ० रे पा० ३ सू० २४] 
ने कप पृ | 
सशब्दोन्मानाभ्यां च ॥ २२ ॥ 
खशब्दोन्मानाभ्याम्‌ । च । इंति । प०॥ 
अर्थ-स्त्र नाम अणुत्वका वाचक “एषोज्णुरात्मा ! यह शब्द है, यातें 
जीव अणु है. और वालाअशत'भागस्प दातघा कल्पितस्थ च। भागों 
जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्प्यते ” जा ब्वेतास्वतर पंचमअ 
ध्यायगत अ्रुतिका उन्‍्मानपदसें महण है. इससेंभी जीव अणु निश्चित है. सर्वे 
स्थूछोंसें जो निकले वा जो निकाछा हो सो उन्‍्मान कहिये हैं. इति ॥ २२॥ 


अव०-नड आत्मा जो अणु होवे तो गंगाजरूमें निमझनको देहव्यापी 
शीतका ज्ञान नहीं होवेगा, जा शंकासे कहे हैं।-- 


अआधिराधश्रन्दनवत्‌ ॥ २३ ॥ 
अविरोधः । चन्दनवत्‌ । इति । प० | 


अथे-यथा शरीरके एकदेशमें स्थित जो चंदनविंदु सो सर्वशरीरमैं व्यापके 
सुखको उपजाबे है, तथा जीवभी देहव्यापी शीतज्ञानको बनावे है. इति ॥२३॥ 


अवस्थितेवेंशेष्यादिति चेन्नाभ्युपगमात्‌ 
हृदेहि।२५४७॥ 


अवख्ितेः । वैशेष्यात्‌ । इति । चेत्‌। न । अभ्युपगमात्‌। 
हृदि । हि। इति । प०। 


अथ-चंदनबिंदुकी जो अवस्थिति नाम स्थिति सो “चैद्ञोष्धात्‌! नाम 
एकदेशमें अत्यक्षका विषय है. जीवकी स्थिति अत्यक्षसें निश्चित नहीं यातें 
अतुल्यता होनेसे चंदनदृष्टांत संभव नहीं; यातें व्यापक शीतज्ञानरूप कार्यसें 
महत्वकत्पना युक्त है. इति | यह शंकाभी असंगत है. 'कतम आत्मेति यो5य॑ 
विज्ञानमयः भाणेषु हृदि अन्तज्योंतिः पुरुष: जा बुहृदोरण्यक पष्ठणत 
अतिर्से अल्पपरिभाणवान्‌ हृदयविंषे जीवकी स्थिति कही है, यातें अल्प 


हुदयमें “अभ्युपगमात्‌! नाम अंगीकार करनेसें जीव अणु है और उक्त शैका 
असंगत हैं. इति ॥ २७ ॥ 


[०9 २ पा०३ सू० २८ ] भाषाटीकासहितानि । १३१ 


शुणाद्य लोकवत्‌॥ २५ ॥ 
गुणात्‌ | वा। लछोकवत्‌ । इति । प० । 

अथे-अथवा आत्माकों अशु मानेभी जीवका जो ज्ञान गुण सो व्यापक है 
यातें व्यापक गुणसें सर्व शरीरव्यापी कार्य उत्पत्ति संसवे है. यथा छोकमें 
दीप अल्प है तोभी प्रभारूप दीपगुणसें गृहव्यापी प्रकाशरूप कार्य होवे है 
तथा प्रसंगमें संभवे है, विरोध नहीं ॥ २५ ॥ 

_ अब०-नल॒ ज्ञानको व्यापक मानेसें जीवसें अधिकदेशमें भी ज्ञानगुण रहेगा 
और है नहीं. ओर दीपकी जो प्रभा है सो दीपसंयुक्त अपर द्रव्य है; यातें 
सो दृष्टांत संभवे नहीं; जा शंकासें कहे हैं।-- 


व्यतिरेकों गन्धवृत्‌ ॥ २६॥ 
व्यतिरेकः । गन्धवत्‌ । इति । प०। 
अधे-यथा गन्धगुण गुणीसें भिन्नदेशवृत्ति है तथा ज्ञाचकोसी जीवसें 
व्यतिरिक नाम भिन्नंदेशमें मानना संभवे है. इति ॥ २६ ॥ 


तथा च दर्शयति ॥ २७॥ 
तथा । च । दशेयति । इति । प०। 
अथै-अणु आत्माको ज्ञानगुणसेंही देहव्याप्ति है, इस अर्थमें सूत्रकार 
आुतिको दिखावे हैं:--“स एव इह प्रविष्ट आलछोमभ्यः आनखेभ्यः यह 
बृहृदारण्यकश्वुति चेतनरूप गुणसें सर्व देहमें जीवको व्यापक कह है 


इति ॥ २७ ॥ 
९ 
पृथशपदेशात्‌॥ २८७ 
पृथक । उपदेशात्‌ | इति। प०। 
अभे-' प्रज्ञया दारीर॑ समारुठ्मय ” जा अश्रुतिमें आत्मा और ज्ञानका 
कृतीकरणरूपस पृथक्‌ नाम भिन्न सिज्न उपदेश किया है, यातें व्यापक 
शुणद्वारा जीवकी शरीरसमें व्यासि 2 है- उक्त विधिसें ज्ञानगुणको 
व्यापक होनेसें और जीवको अणु होनेसें महद्धोधक अुतिका वाघ संभवे 
है. इति ॥ २८ ॥ ५; 


श्३२ ..  ्ह्मसूत्राणि. । [ ज० २पा० २ सू० २९.] 


अव०-आगे यह सिद्धांत हैं। अग्ु जो जीव सो ब्रह्मका कोई अपर ख- 
रूप है वा कार्य है वा अह्मस्वरूप है? प्रथम पक्ष मानें तो एकज्ञानसें स्वेके 
ज्ञानकी प्रतिज्ञाका बाध होवेगा. कार्यरूपताभी पूर्च खंडन करी है यातें द्वि- 
तीय पक्षभी असंगत है. तृतीय पक्ष मानें तो अह्म महान है यातें जीवभी 
महान्‌ अवश्य सिद्ध होवेगा. 'एषो5णुरात्मा चेतसा वेद्तिव्य/ जा श्रुतिमें 
बेदितव्य सुना है यातें इसमें जीवका ग्रहण नहीं किंतु नेत्रादिकोंका जो अबि- 
पय ज्ञेय ब्रह्म ताका झहण है, यातें उक्त छठुति जीवको अशु नहीं कहे है. 
और “ बालाग्रदतमागस्य ” यह श्रुति जीवके औपाधिकस्वरूपका बोध' 
करे है. और “सच आनन्त्याथ कल्प्यत्ते ” इतने वाक्यसें तिसमें जीवको 
अपरिच्छिन्न कहा है. किंच अणु माननेसे स्व -देहमें व्यापी ज्ञान नहीं हो- 
ऐप चंदनाविंदुका ५३. .। डे ५ ०६ ७ 
वेगा. चंदनविंदुका जो दृष्टांत कहा है सो सावयव पदाथ है यातें ताको 
अवयवद्दारा देहज्यापित्व संभवे हैं. आत्मा निरवयव है यातें इृष्टातकी 
तुल्यता नहीं. और गंधके दृष्ांतसें जो ज्ञानगुणको व्यापक मानके सर्बदेह- 
व्यापी कार्य माना है, सोभी असंगत है. गंधगुण आश्रयविना गमन करे 
नहीं. जो आश्रयविना ताका गमन मानें तौ सो गंध ग्रुण नहीं सिद्ध होवेगा- 
और 'प्रज्ञया चारीर॑समारुछठ्म' जा जो श्रुति कही सो इसमें प्रज्ञापदसे 
बुद्धिका अहण है. ओर जीवनिष्ठ जो अणुत्वकथन है सो उत्तरसूच्रसें कहे हैं।-- 


तहुणसारत्वात्‌ तु तह्यपदेशः प्राज्ञतत्‌ ॥ २९ ॥ 
तहुणसारल्ात्‌ । तु । तश्यपदेशः । प्राज्ञवत्‌ । इति । प०। 


. अथ-तत्‌ नाम बुद्धिके जे गुण नाम अणुत्व, उत्करांति, गमनागमन, 
खुखबुःखादि धर्म, ते धर्मसार नाम प्रधान होवें जिसमें सो तत-गरुणसार 
कहिये- अर्थात्‌ बुद्धिके गुणोंसे गुणवान्‌ जीवका ततशुणसार इतने पदसें 
अहण है यातें जीवनिष्ठ तत्‌ नाम अणुत्वव्यपदेश नाम कथन है. स्वाभाविक 
नहीं. प्राज्ववत' यह तहां दृष्टांत है. “दहरोउस्मिन्नन्तराकाश+$ अणी- 
यान जा श्ुतिमें सगुण उपासनाविषे उपाधिके वशसें प्राज्ञ नाम परमात्माकों 
अणु कहा है तथा जीवको अणु कहा है. इत्ति ॥ २९ ॥ 


अबव०-नज्ञ बुद्धिउपाधिसें आत्मामैं अणुत्वादि संसार अंगीकार कियेसें 
कदाचित्‌ आत्माका बुद्धिसें वियोग हुए आपत्मामें संसार नहीं रहेगा,. जा 


शंकाका उत्तर कहे हैंः--- 


(भ० २ पा० शसू० ३१] भाषाटीकासहितानि । श्श्रे 


४ ० तदरश «2३००३ 
यावदात्ममावित्वाच न दोषः तद॒र्शनात ॥ ३० ॥ 

यावत-आत्मभावित्रात्‌ । च । न दोषः । तदशेनात्‌ । 

ह इति । प०। न 
अथ-बुद्धिका जो संयोग सो यावत्‌ नाम जहांपर्यत 'आत्मसावित्वात्‌” 
नाम आत्माको संसारभाव है तहांपर्यत है, थातें उक्त दोषकी प्राप्ति नहीं 
तत्‌ नास बुद्धिसेयोग, देहवियोग हुएभी दर्शनात! नाम श्रुतिमें देखा है 
तथाहि---कतम आत्मेति यो5डर्य॑ विज्ञानमयः प्राणेषु हृदि अन्तज्योतिः 
 पुरुषः स समान; सन्‌ उस्ौ छोकौ अलुसंचराति ध्यायति इच लेलां- 
यति इच” इस बृहदारण्यक पष्ठगत श्रुतिमें आत्माको जहांपर्यत संसार है 
तहांपर्यत्त श्रममूलक बुद्धिसंयोगको माना है. इति । अथे-जो यह बुद्धिउपा- 
घिक है, प्राणोंसे व्यतिरिक्त है. कमलाकार जो सांसपिंडरूप हृदय तामें स्थित 
होनेसें बुद्धिही हृदय है तासैंभी भिन्न है, सो बुद्धिके तुल्य हुआ उभय लोकमें 

बिचरे है. इति ॥ ३० ॥ 
अव०-नजु सुषुप्तिमें ब्रह्मयकी श्रासि और कार्यका नाश माना है यातें 
बुद्धिसयोगको जहांपर्यत संसार है तहांपर्यत कहिना संभवे नहीं, जा शंकाका 
उत्तर कहे हैं।-- 


पुं बकाया घर तोर्ष [4२०५ ३. 2७... 
स्तवादिवत्तस्य सतोअभिव्यक्तियोगात्‌ ॥ ३१ ॥ 
पुंस्व्ादिवत्स्य । सतः । अभिव्यक्तियोगात्‌ । 

इति प०। ह 
अथ-यथा वालअवस्थामें जे पुंस्वादि धर्म तिन 'सतर! नाम विद्यमान 
घर्मनकी योवन अवस्थामें अभिव्यक्ति नाम प्रगटताका योग कहिये संयोग 
होथे है. तथा बुद्धियोगादिक सुइसिमें सृक्ष्मझपसें विद्यमान रहे हैं. तिनकी 
जाय्तमैं प्रकटतासान्र होवे है; यातें यावत्‌ आत्मभावित्वका विरोध नहीं. 
इति ॥ ३१ ॥ | 
अव०-ननु जाकर आत्मामें संसार है तिस अंतश्करणका साधक कौन 
प्रमाण है? जा शंकासे कहे हैंः--- 





१ चलतेकी नाई है. 


१३४ ब्रह्मसूज्नाणि [ अ०२ पा० शसू० ३श]- 


निद्यो न्‍ ध्यत्ञपलब्धिप्रसड़ो हा 
पलब्ध्यतुपलब्धिप्रसड्रो3न्यतरनि- 
यमो वाधन्यथा ॥ श्र॥.... 
निद्योपलब्ध्यनुलपब्धिप्रसड्रः । अन्यतरनियमः । वा | 
अन्यथा । इति । प० । 

अथे-अंतःकरण अवश्य मानना चाहिये. अन्यथा नाम अंतःकरण अनंगीकार 
कियेसें सर्व इंद्रियोंकी स्वस्वविषयसमीपता कालमें नित्य उपलब्धिप्रसंग होवेगा 
अर्थात्‌ एककालमैं सब विषयोंका ज्ञानहुआ चाहिये. मनविना ज्ञानकी सबवे- 
सामग्री विद्यमान है. जो सामग्री होतेभी ज्ञानरूप फल नहीं होवेगा तो नित्य ' 
अनुपलब्धिप्रसंग होचेगा, अर्थात्‌ एकभी विषयका ज्ञान नहीं होवेगा. अथवा 
एकविषयका ज्ञान होवे अपरका नहीं जाबिध इच्छा हुएसे ज्ञानसामग्रीके मध्यमैं 
अन्यतरस्पा नाम आत्माकी शक्तिका वा इंद्रियोंकी शक्तिका नियम नाम प्रति- 
बंध कहाचाहिये, सो संभवे नहीं. आत्मा तो निर्धमेक है, यातें तामें शक्तिका 
अभाव है और इंद्वियोंकी शक्तिको प्रतिबंध तो होबे, जो कोई प्रतिबंधक 
होवे. प्रतिबंधक कोई है नहीं यातें उक्त स्थलूमें इच्छाकों ही नियामक कहा 
चाहिये. सो आत्माका धर्म नहीं किंतु “ कामः संकल्प ” इत्यादिक श्ुति 
इच्छाको मनका धर्म कहे है, यातें अन्तःकरणविना इच्छाके नहीं बननेसें और ' 
श्रुत्तिसें अंतःकरण अवश्य सिद्ध होवे है. तिस अंतश्करणकरकेही आत्मामें 
संसार है, स्वाभाविक नहीं. ॥ ३२ ॥ ; 

अबव०-आगे आत्माको कता सिद्ध करके पुनः बुद्धिगुणोंसे गुणवान्‌ 
सिद्ध करे हैंः-- 


न ८ 
कर्ता शाख्रार्थवत्तात॥ ३३ ॥ 
पा कतो । शास्रा्थवत्तात्‌ । इति । प० । 
अथे-कतो आत्मा है वा बुद्धि है ? यह इसमें संदेह है. पूर्वपक्षमँ बुद्धिको 
करती अगीकार कियेसें यह सिद्धांत है। आत्माही कता है, बुद्धि कर्ता: नहीं, 
आत्माको कत्ता सानेसें विधिशासत्र अर्थवान्‌ नाम सफल होवे है. आत्माकों 
अक़र्ता भानेसें विधिशास्ध सफर नहीं होबेगा. और बुद्धिको कर्ता मानके 


आत्माको भोक्ता मानें तोभी विरोध है, यातें आत्माही करता है, बुद्धि 
नहीं- इति ॥ १३ ॥ . 


[अ७० २ पा० हे सू० ३६] भआापाटीकासहितानि । पं! श्३्५ 


विहारोपदेशात ॥ ३४ ॥ 
एकपदम्‌ । 


अधथे-स यथा महाराजो जानपदान गहीत्वा खे जनपदे यथा- 
काम परिवतंते एवसेच एप एतत्‌ प्राणान्‌ गझहीत्वा खे शाशीेरे 
यथाका॑ पारिवतले” जा बृहदारण्यक चतुर्थ अध्याय प्रथमत्राह्मणकी श्रुतिमें 
कामनाअजुसार विहार कथन किया है, यातें विहारके उपदेशसेंभी जीवही 
कर्ता है. इति। आुतिअथे-यथा सो महाराजा जानपदान्‌ नाम भ्रृत्योंको 
अहण करके स्वरच्छाअनुसार जनपदमें वर्ते है. तथा विज्ञानमयभी प्राणोंको 
ग्रहण करके इच्छाअनुसार देहकरके विहरता हुआ वर्ते है. इति॥ ३२४ ॥ 


उपादानात्‌ ॥ ३५ ॥ 
उपादानात्‌ । एकप०॥। 
अधथै-'स होचाच अजातञन्चु) यञ्च एप एतत्‌ खुघोह्आत्‌ यो विज्ञा- 
नसयः पुरुष; तदेषां प्राणानां विज्ञानेन विज्ञानम्‌ आदाय यएषः 
अन्तहँद्ये आकाश: तस्मिन शोते' जा श्ुतिमैं तहांही आत्माकों उपा- 
दान सुना है, अर्थात्‌ प्राण जे इंद्रियां तिनका स्वीकार करना सुना है यातें 
आत्माही का है, बुद्धि नहीं. प्राण नाम इंद्रियोंकी विज्ञान नाम बुद्धिसें 
अहणरूप शक्तिको अहण करके स्वापकारूमैं जीव हृदय आकाशमें शयन 
करे है. यह श्रुतिका अक्षरार्थ है. इति ॥ ३५॥ । 
रे प्रक्रियायां चेन्निदें किए. 5 द 
व्यपदेशाच प्रक्रियायां न - 
विपरययः ॥ ३६॥ 
व्यपदेशात्‌ । च । प्रक्रियांयाम । न । चेत्‌ । निर्देश- 
विपयेय 
: । इति | प०। 
अधथै-“चिन्ञान् यज्ञ तलुते कर्माणि तन॒ते' जा अह्मानंद्वछीगत 
श्रुतिमें लौकिक वैदिक प्रक्तिया नाम कर्मोविषे विज्ञानशब्दबाच्य आत्माको 
कर्ताका ज्यपदेश नाम कथन किया है, यात्रें आत्मा करता है.-नलु विज्ञानपद 


बुद्धिवाचक है, जीववाचक नहीं; जा शंकासें कहे हें न चेत्‌ नाम जो विज्ञा- 
नपदको जीववाचक नहीं मानेंगे तो न्र्धिंशविपयंय होवेगा- अथात्‌ बुद्धि- 


१३६' | ' ब्रह्मसूत्राणि [अ०श पा०३ सू० २९] 


को विज्ञानपदका अर्थ माननेसें “विज्ञान यज्ञ तलुते! जा पाठकी जगा 
निर्देश नाम पाठका विपयेयः नाम ' चिज्ञानेन यज्ञ तल॒ते  जाविध पाठ 
चाहिये. इति ॥ ३६ ॥ : 

अचब०-ननु आत्मा कता होवे तो जो अपनेको इष्ट है सो किया चाहिये, 
.अनिष्ट नहीं किया चाहिये, जा शंकासें कहे हैं।-- 


उपलब्धिवदानियमः ॥ ३७॥ 
उपलब्धिवत्‌ | अनियमः । इति । प०। 


अधे-यथा ज्ञानमें आत्मा सख्तंत्र है, तोौसी इश्टअनिष्टरूप उभय ज्ञान 
वाको होवे है, तथाहि इष्ट अनिष्ट उसय क्रियाको करे है । स्वअतिरिक्त करण 
अनपेक्षत्वरूप खतंत्रता ईश्वरकोभी नहीं तो जीवको कैसे होवेगी, किंतु सर्वे- 
कारक प्रेरकत्वरूप स्वतंत्रता अँंगीकार है यातें अनिष्टताधन कारकों मैंभी 
इष्टसाधनत्वश्मसें अनिष्टकोमी जीव करे है. इति ॥ ३७ ॥ 


शक्तिविषययात्‌ ॥ ३८॥ 


एकपद है । 
. अथ-जो बुद्धिको करता मानेंगे तौ शक्ति नाम करणशक्ति “विपयेयात्‌ 
नाम नहीं रहेगी, करणविना कतासें कार्य होचे नहीं यातें जुद्धिरुप कतोका 


अपर करण कल्पना करना पड़ेगा, यातें करणभिन्न कतो कल्पना कियेसें नाम- 
हे 
मात्र्में विवाद प्रतीत होवे है. वस्तु विवाद नहीं. ॥ ३८ ॥ 


समाध्यभावचाच्च ॥ ३९५॥ 
समाध्यभावात्‌ । च । इति । प०। 


अथे-आत्माकारवृत्ति विद्यमानभी जा अवस्था असतकी नांई होवे 
सो समाधि कहिये हैं. तिस समाधिका जो आत्माको करता नहीं मानेंगे तो 
समाधिका अभाव सिद्ध होवेगा, यातें आत्माको कर्ता माने बिना समाधिको 
नहीं बननेसें आत्माको कतो अवश्य मानना च़ाहिये॥ ३९ ॥ ! 

अंब०_सो क्ृत्व स्वाभाविक नहीं क्रिंतु औपाधिक , है, यह सूत्र- 
कोर कह की 8 7 के 0 ' 


[ भ० २ पा० ३ सू० ४१ ] भाषाटीकासहितानि । १३७ 


यथा च तक्षोमयथा ॥ ४० ॥ 


यथा । च्‌। तक्षा । उमयथा । इति प्‌०। 


अथ-सांख्यमतमें बुद्धिको कतों माना हैं ताको खंडन करके पूर्व आत्माको 
कता सिद्ध किया है सो कतेत्व स्वाभाविक है वा ओपाधिक हैं ? जा संदेहसे 
न्‍्यायमतर्मे वास्तव अंगीकार कियेसे यह सिद्धांत हैं। बृहदारण्यकके पछ्ठ- 
के द्वितीय ब्राह्मणमें यह वाक्य हैं-अर्थ पुरुष) प्राज्ञेन आत्मना सम्परि- 
चवक्तो न वाह्य॑ किल्वन चेद्‌ नानतरं तदा अस्य एतत्‌ आप्तकामम्‌ आ- 
त्मकामसम्‌ अकार्म रूप छझोकान्तरम्र्‌ ” यह कहकर आगे यह कहा है-ए- 
पघाउस्प परसा गतिः एपाउस्थ परमा सम्पत्‌ एषघो5स्थ परसो छोक ए- 
पषोष्स्य परसानन्दः । एतस्थव एवं आनन्दस्प अन्यानि फ़ूतानि मात्राम 
डउपजीवन्ति' इति। श्षुतिअथ-यह जीव प्राज्ेन नाम परम आत्मास अभिन्न 
हआ वाह्य अंतर बविपयको नहीं जाने है. तत्‌ एतत्‌ नास पसंगर्म प्राप्त 
जो न्रह्म तत्‌ अस्य नाम जीवका आत्मकाम हैं अथांत्‌ सर्बविषे स्वरूपसे 
कामना करने योग्य हैं. आघपकाम यह तहां हेतु हैं. ' अकाम ” यह आस- 
काममें हेतु है. अपर कामना नहीं होवे जिसको सो अकास कहिये है. सर्वे 
शोकसंबंधरहित होनेसेंसी आघ्तकाम कहिये है, यह कहे हें. 'शोकान्तरभ्‌ 
इाति | शोकसे अंतर नाम भिन्न हें. यह उक्त जो स्वरूप है, सो इसकी परम- 
गति है. यही परम संपत्‌ है. यही परमलोक है. यही परमानंद है. इस आ- 
नंदके एक अंशमात्र्स स्वेभत आनंदवान्न हैं. इति । इस श्रुतिउक्त अथंको 
भगवान्‌ सूत्रकार कहे ढें-चथा तक्षा नाम खाती उभयथा नाम बास्यथादि करण 
अहण कियेस कर्ता होकर दुश्खी होवे है, तिनको त्यागके अकता होकर सुखी 
होवे है, तथा आत्माभी वुद्धिआदिक करणोंके संबंधर्स कतों संसारी होवे हैं, 
तिनको त्यागके अकता परमानंद होते हैं. चकारपदर्स स्वभाविक कतेत्वका 
निषेध किया हैं; यातें आत्मा ओपाधिक कता है. इति ॥ ४० ॥ 


परात्तु तच्छुतेः ॥ 2१ ॥ 


परात्‌ । तु । तत्‌ । झतेः | इति प०। 


अधथ-जो औपाधिक जीवमें कठेत्व कहा है सो इंश्चराधीन हे या नहीं ? 
अहम, १८ धि 


श्यूद अक्षसूत्राणि । | [ ज० २ पा० हे सू० ४२) 


जा इसमें संदेह है. जीवको करणोंकी वाहुल्यतासें कठंत्व संभवे है, ईम्वरा- 
धीन नहीं, यह पूर्वपक्ष है. तहां यह उत्तर हैं-परात! नाम परमेश्वरसेंही 
जीवको कर्दत्वादि संसार है. और मोक्षभी परमेश्वराधीन है. तत्‌ नाम इश्व- 
राधीनता अ्रुतिमें सुनी है तथाहि 'एब हि एवं साधु कम कारयति ते 
यमेभ्यो लोकेम्य! उनच्चिनीषते एप उ. एव असाधु कम कारयति त॑ 
यमधो निनीषते जा कौषीतकिश्रुतिमें ईम्धराधीनता कटेत्वको स्पष्टही 
प्रतीत होवे है. इति ॥ ४१ ॥ 


अच०-नजु जीवके कठेत्वको ईश्वराधीन मानेसें ईश्वरको जीवसें धर्मही 
कराना चाहिये अधम नहीं, अन्यथा इम्वरमें विषमता निर्देयता दोष होवेंगे; 
जा शंकासे कहे हें।-- 


कतप्रयलापेक्षास्त विहितप्रतिषिदवेयर्थ्या- 
दिभ्यः ॥ ४२॥ 


कृतप्रयत्नापेक्षाः । तु । विहितप्रतिषिद्धावेयर्थ्या- 
दिभ्यः । इति। प०। 


अपध-तु शंकानिषेधाथेक है. जीवकृत नाम किये जो प्रयल धर्माधर्म- 
रूप तिनकी अपेक्षासेंही इस जन्समें ईश्वर जीवसें कम कराये है, तिन कर्मोके 
अनुसारही सुखादि फ्‌्ल देवे है, यातें ईश्वरसें विषमतादिदोषकथन असे- 
गत है. ईश्वरको पूर्वकर्मद्वारा प्रेरक मानेसें विहित, अतिषिझ, अचधैयथ्य॑ नाम 
अनर्थक नहीं होवे हैं. अन्यथा विधिनिषेधशार्त्र अनर्थक होवे हैं. घर्मकर्ता 


कु अधर्सकर्ता खुखकों, संपादन करेगा यह आदिपदसें क्‍झहण 
. इति ॥ ४२ ॥। 


अब०--पूर्व स्वयंप्रकाश आत्माको अकर्ता कथन किया है, आगे तिसका 
अहासें अभेद सिद्ध करे हें भेदाभेदबोधक अआरुतिके विरोधका संदेह हुएसें पूर्व- 
पक्षम विरोध अंगीकार है. पूर्व जो ईश्वरजीबका उपकारकडपकायेरूप संबंध 
कहा है सो भेदविना संभवे नहीं. और अभेद्विना “ ततक्त्यमसि ” आदिक 
वाक्य असंग्रत होवेंगे, यातें विरोध प्रसिद्ध है. इति। तहां यह सिद्धांतसूत्र हैः--* 


] 


: [ज० २ पा० ३२ सू० ४५ ] भाषादीकासहितानि ॥ १३६, 


अंशो नानाव्यपदेशादन्यथा चापि दाश- 
कितवादित्वमधीयत एके ॥ ४३॥ 


अंशः । नानाव्यपदेशात्‌ । अन्यथा । च। अपि । दाश- 
कितवादिलम्‌ । अधीयते । एके । इति प०। 


अथे-अँंचाः नाम जीव ईश्वरका अंश है. अर्थात्‌ अंशइब अंश है. स्वाभा- 
बिक अंश नहीं. स्वाभाविक अंश मानें तो “ निष्कलम््‌ ! इत्यादि ईम्वरनि- 
रंशबोधक श्रुतिसे विरोध होवेगा, यातें ईश्वरका कल्पित अंश जीव है और 
भेदाभेदश्रुतिसें भी जीव ईश्वरका अंश अंशीमाव है। * थ आत्मनि तिछन 
आत्मानसन्तरों यमयति * इत्यादि श्रुतिमें जीव इंश्वरका ' नानाव्यप- 
देश * नाम भेद कथन किया है। और “अन्यथा चापि' नाम अनानाव्यप- 
देशभी श्रुतिमें किया है. तथाहि-- त्रह्म दासा अह्म दाशा अरह्ेव इसे 
कितवा: इति। यांतें अनाना नाम अभेदकथनसेंभी अंशांशीभाष है- अ्रुतिमें 
दासपद भ्रृत्यवाची है, दाशपद कैवर्तवाची है. कितवपद द्यूतकृत्‌ भ्वरष्टवाची 
है. इति। प्रत्यक्षसिद्ध जो सेद ताका अनुवाद करके श्रुतिका अभेदमें तात्पर्य 
है, यातें कल्पित भेदवान्‌ अंश जीव है. इति ॥ ४३ ॥ 


मन्त्रवर्णाच ॥ ४४ ॥ 
मन्त्रवर्णात्‌ । च | इति प०। 
अथै-'पादोडस्थ विश्वा भ्ूतानि त्रिपात्‌ अस्थ अस्त दिवि! जा 
छांदोग्यश्रुतिसंभी जीव ईश्वरका अंश है. उक्त मंत्रके व्णसें भी जीव अंश 


हे बे जीव इस परमात्माके पाद नास 
है. यह सूत्राक्षराथे है। भूत नाम सब जीव १ 2246 
एक अंश हैं. च्रय पाद अम्ृतरूप दिबवि नाम स्वरुपमें हैं, यह श्रुतिअर्थ 


है, इति ॥ ४४ ॥ प 
अपि च स्मयेते ॥ ४५४ 
अपि । च। स्मयेते । इति प०। 


अधै-'मसमैवांशों जीवलोके जीवभूतः सनातनः” जा गीतावाक्यमें 
हि कस 
सगवाननेंसी जीवको इैश्वरजँदा स्मरण किया है. इति ॥ ४७... 


१8४० . अल्नसूत्राणि |: ([ज० 2 पा9० ३ सू० ४७ ] 


अब०“-नहठु यथा पाद्रूप अंशका ढुःख अंशी देहमें भान होवे है तथा 
जीवको ईश्वर अंश मानेसें जीवके दुःखसे ईश्वरको दुःखी हुआ चाहिये जा 
शंकासें कहे हैंः-- 


प्रकाशादिवन्नेवं परः ॥ ४६॥ 


प्रकाशादिवत्‌ । न । एवम्‌ । परः । इति प० । 


अथे-यथा सूर्यका प्रकाश काष्ठादि उपाधिकरके काष्ठादि आकारको प्राप्त 
हुआभी वोस्तवसें काउचक्रताकार होवे नहीं तथा जीवको दुःख हुएभी एवम्‌ 
नाम जीववत्‌ पर नाम परमात्मा दुःखी नहीं होता. जीव प्रतिविंबरूप है, ईश्वर 
विंबरूप है. प्रतिविंबके घ॒मम बिंबमें जाते नहीं, यातें ईम्धर दुःखी नहीं होता- 
इति ॥ ४४६ ॥ 


स्मरन्ति च॥ ४७ ॥ 


स्मरन्ति । च्‌ । इति प०। 


,अथे- ततन्न या परमात्माइसौ न नित्यो निगुणः स्खतः। न लिप्यते 
फलेय्थाउपि पं्मपत्रभिवाम्मसा॥ कर्मात्मा त्वपरो योडसौ मोक्ष- 

बन्घेः स घुज्यते ' इत्यादिक स्छतिमें व्यासादिकभी जीवदुःखसें इंश्वरको 
अदुः्खी स्मरण करे हैं. इति ॥ ४७ ॥ 


अच०-ननु एव ते आत्सा अन्तयोसी अरूतोड्दछो दृष्टाउश्वुतः 
आरोता5पन्तो मन्ताडइविज्ञातों विज्ञाता नान्योउतोडस्ति द्वष्ठा नान्थो- 
उतोषस्ति ओता नान्थोड्तोडस्ति सन्‍ता नान्यो्तोषस्ति विज्ञाता 
एव ते आत्मा अन्तयोमी अम्ृतः अतोडन्यदातेम्‌ ! जा बृहदारण्यक 
सप्तमत्राह्मणमें सेदमान्रका निषेध किया है. छ्रुतिअर्थ पूर्व कर दिया है. 


और “थदेवेह तद्सखुच यद्सुत् तदन्विह । रुत्योः स रत्युमामोति 
थ इद नानेव पहयति | सनसैवेद्वाप्तव्य नेह नानास्ति किंचन”ः जा 
कठचतुर्थवल्लीमें, भेदमात्रका निषेध किया है. कठ कतुतिअथ-जो कायकीरण- 
संघातथुक्त है सोई तत्संघातरहित है, जो संघातरहित है सोई संघात- 
वान्‌ है; तिस अभिन्न वस्तुमें जो सिन्नत्व देखे है सो खत्युसें सत्युको प्राप्त 
होये है. इति ।.उत्तविध अभेद मानेसें मित्र सेवितव्य है, शह्मु परिहरतव्य. है, 


[ ज्र० २ पा० ३. सू० ५० ] भाषांदीकासहितानि । १४१ 


इत्यादिक अनुज्ञा परिहार असंगत होवेंगे जा शंकाका उत्तर भगवान्‌ सूत्रकार 


अन॒ज्ञापरिह्री देहसम्बधाज्ज्योतिरादिवत्‌ ॥ ४८ ॥ 
अनुत्ञापरिहारों । देहसंबन्धात्‌ । ज्योतिरादिवत्‌ । इति प०॥। 


अधे-उक्त अनुज्ञा और परिहार आत्माको एक मानेभी “मनुष्योड्हम' 
जाविध देहसम्बध नाम देहाभिमानसें संभवे हैं ततततदेहविशिष्टरूपसें आत्मा- 
का भेद है यातें आह्यत्याज्यका भेद संभवे है; यथा ज्योतिः नाम अग्नि एक है 
तौभी श्मशानसम्बन्धी अप्रि त्याज्य है अपर भाद्य है तथा कौकिक बैदिक 
अनुज्ञा परिहार संभवे है. इति ॥ ४८ ॥ 
: अव०-सथापि सर्वशरीरमें चेतन एकरूप है थातें देवदत्तशरीराबच्छेदसे 
कर्म कियेसे यज्ञदत्तशरीरावच्छेद्स उपजे चाहिये? जा शंकाका उत्तर कहे हैं।--- 


असन्ततेश्राव्यतिकरः ॥ ४९ ॥ 


असन्ततेः । च्‌ । अव्यतिकरः। इति प० । 
अप-परिच्छिन्न अंतःकरण उपाधिवान्‌ जो परिच्छिन्न देवदत्तका आत्मा 
ताका यज्ञदत्तशरीरसैं * असन्ततेः ! नाम संबंध होबे नहीं यातें घर्माधर्मका 
व्यतिकर साम संकर होवे नहीं, यातें देवदत्तको यश्ञदत्तशरीरावच्छेदसें घर्मा- 
दिप्राप्ति संभवे नहीं. ॥ ४९ ॥ 


आभास एवं च॥ ५० 0 


आभासः । एवं । च। इति प०। 

अशै-यथा अनेक घटजडॉँमैं प्रतिबिंबित जे सूयौभास त्तिनमैं किसी एक 
सूर्याभासके कंपमान हुए अपर सूर्याभास कंपमान होवें नहीं तथा इंश्वरका 
आभासरूप यह जीब है, यातें घर्मादिसंबंधी एक जीवमें अपर जीवके घमो- 
दिकोंका संबंध होने नहीं. किंच जिनके सतमें अनेक विभ्रु आत्मा माने हैं 
तिनके मतमें धर्मादि संकरकी प्रासि है, तथाहि-सांख्यमतमें भोगसाधनरूप 
प्रधानका सर्व आत्मासें संबंध है यातें एक आत्माका खुखादिकोंसें संबंधहुए 
सर्व आत्मासें सुखादिकोंका संबंध होवेगा; तथा स्यायमतमेंमी देवदसके 
आत्माका जो खुखादिहेतु मन/संयोग सो सर्व आत्मामें तुल्य है-यातें फठका 
नियम नहीं रहेगा. इति ॥ ५० ॥ ; 


१४७२ बह्मसूत्नाणि [अ० २-पा० ३ सू० ७३ ] 
अच०-नलु अद्ृषटके नियमसें फलका नियम संभवे है, जा शंकासे कहे हैं।-- 
| #० 
अद्दश्टानियमात्‌॥ ५१ ॥ 


एक पद है। 

अभथ-सांख्यमतमैं अदृष्ट प्रधानमें रहै है, सो प्रधान सर्वमें साधारण है यातें 
अदृष्टके अनियमसें फलकाभी नियम नहीं रहेगा. और न्‍्यायमतरम अदृष्टका 
हेतु मन आत्माका संयोग है सोभी सर्व आत्मामें तुल्य है; यह इसका अदृष्ठ 
है इसका नहीं, जाविध जो अदृष्टका नियम है तिसका अभाव है यातें फल- 
काभी नियम नहीं रहेगा. इति ॥ ५१ ॥ 

अव०-ननु  इदं प्रापवान्‌ इद परिहारिष्यासि हद करिष्ये इद न 
करिष्ये ! इसप्रकारके जे अभिसंध्यादि ते भिन्न भिन्न हैं ते स्वसाध्य अदृष्ट 
नियमके हेतु होवेंगे, यातें व्यवस्था संभवे है, जा शंकाका उत्तर कहे हैंः-- 


अभिसन्ध्यादिष्वपि चेवम्‌॥ ५२॥ 
अभिसन्ध्यादिषु । अपि | च । एवम्‌ । इति । प०। 
अथे-अभिसंधिपद्‌ अभिप्रायवाची है. अर्थात्‌ ज्ञानका अंगीकार है. आदि- 


पद्सें इच्छादिका अहण है. तोभी साधारण मनःसंयोगकरके साध्य हैं, यातें 
तांमेंसी एवं नाम अदृष्टयत्‌ अनियम है. इति ॥ ७२ ॥ हे 


का 
प्रदेशादिति चेन्नान्तर्मावात्‌ ॥ ५३ ॥ 
म्रदेशात्‌ ! इति । चेत्‌ । न । अन्त्भावात्‌ । इति । प० । 
हक अथ-नजु आत्मा विभु है, यातें स्वस्वशरीराबच्छिन्न आत्मा परदेशम अभि- 
संधि आदिकोंका हेतु सनका संयोग होवे है, यातें अभिसंध्यादि नियम संभवे 
है जा कल्पनाभी असंगत है. सबे आत्मा सर्व शरीरके अंतर हें यातें इस 
आत्माका यह शरीर है इस नियममें कोई हेतु मिले नहीं यातें इस आ- 
व्माका इस शरीरमें प्रदेश है, यह कल्पना संभवे नहीं, यातें वेदांतपक्षद्दी सर्च- 
दोषरहित हे. इति सिद्धम्‌ ॥ ५३ ॥ ४ 
इति शारीरकसूत्रभावत्रकाशिका भाषादीकायां. दिती- 
. याध्यायस्य तृतीयः पादः समाप्तः ॥ शुभमस्तु ॥ 
॥ श्रीरामाय नमो नमः्॥ . 


[ अ० २ प्रा० 9 सू०१-] भाषादीकासहितानि । श्ध्र 


अथ चतुर्थपादप्रारम्मः । 
पूर्व महाभूतउत्पत्तिवोधक वाक्यनके विरोधका परिहार किया है. इस 
पादमें लिंगशरीरबोधक वाक्यनके विरोधका परिहार करे हैं. इस पादके दो 
अधिक बीस सूत्र हैं. तहां ९ अधिकरणरूप हैं. १३ शुणरूप हैं. 


तथाहि।-- 
* सृन्नसंख्या । अधिकरण । गुण । प्रसद्भ- 
4 आ० न इंद्रियउत्पत्तिविचार 
4 नै शु० ड्ं .] 
झ््‌ ने गु० ५ डर ० 
छठ न- गु० ईं० पूर्वपक्षविरोध 
प्‌ आ० न विरोधनिषेध 
छ््‌ हु गु० सप्तनिषेघ 
७ अ० नः इंद्रियसूक्ष्म 
८ ञ्० न प्राणउत्पत्ति 
९ अ० ने प्राणवायुक्रियानिषेध- 
५० ++ गु० प्राणजीवकरण 
५११ न गु० प्रा० 
१२ न शु० प्राणवृत्तिसिद्धि 
श्इ आअ० रन प्राणअणु 
५४ आअ० न इंद्रियचेष्टा देवताअधीन 
श्ष्‌ न गु० जीवसोक्ता 
श्द न शु० जी० .. 
श्७ आ० + आणइंद्रियमेदसिद्धि 
श्८ हज गु० पग्रा० 
५९ +- गु० आरा० 
. २० आ० + परसें उत्पत्ति 
२१ + शु० भूतकार्यविचार 
श्र न जशु० 5८% 
जय ः श्श 


_ इति॥ . 


१३४ ॥॒ ब्ह्मसूत्राणि । [अ० श्पा० 9 ० ४ ] 


इस पादमैं वाक्यनका परस्पर विरोध मानके अप्रमाणतासें पूर्वपक्षमे 
समन्‍्वयकी असिद्धि फछ है, और सिद्धांतमैं अविरोधसे प्रमाणताके संभ- 
बसे समन्‍वयकी सिद्धि फल है। 'आत्मन आाकादः सम्मूतः जा उत्पत्ति- 
प्रकरणमैं इंद्वियोंकी उत्पत्ति सुनी नहीं. और ' ऋषयो वाव एते अग्ने 
सदासीत्‌ के ते ऋषय इति प्राणा चाव ऋषयः ? जा श्रुतिमें इंद्रि 
योंको सत्य सुना है। और “ एतस्माज्वायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि 
च। खे वायुज्यॉतिरापः पथिवी विश्वस्थ घारिणी' जा झुडकअ्ुतिम उ- 
त्पत्ति सुनी है यातें उक्त वचनोंका विरोध है, जा पूर्वपक्षमं अंगीकार कियेसे 
यह सिद्धांत सूत्र है।-- 

तथा प्राण: ॥ १ ॥ 
तथा प्राणः । इति प०। 

, अधे-यथा आकाशादिक उपजे हैं तथा 'एतस्मात्‌ जायतें प्राण/ जा 
श्रुतिसें प्राण नाम इंद्वियां उपजे हैं. इति ॥ १॥ हे 

अब०-नछ उत्पत्तिबोधक श्रुति उक्त विरोधसे गौण है, जा झंकासे कहे हैं।--- 

गोण्यसम्मवात्‌ ॥ २॥ 
गोणी । असम्भवात्‌ । इति प० । 

अथ-उत्पत्तिश्ुतेकों गौणी कहिना असंभव है, यातें शंका असंग्रत है- 
इंद्रियोंको नित्य अंगीकार किये “ येन अश्जुर्त झुतं० जा भतिज्ञासें विरोध 
होवेगा. और जो श्रुति इंद्वियोंको सत्य कहे है सो अवांतरप्रलूयमें हिरण्य- 
गर्भकी इंद्रियोंको सत्य कहे है. इति ॥ २॥ 

रच ] 
तदआाकऋशुत॒श्र ॥३॥ 
५ तत्‌ | आक-श्रुत्ेः । च । इति प० । 

अर्थ-एतस्मात्‌ जायते प्राण: जा वाक्यमें तत्‌ नाम जायते यह 
जो पद है सो आकाशादिकोंसे प्राऋू नाम पूर्व जे इंद्रियां तिनमें श्रुतेः नाम 
सुना है, यातें इंद्रियोंका मुख्य जन्म है ॥ ३ ॥ 

अव०-उत्पत्तिमें अपर श्रुतिप्रमाण कहे हैं:-- 


तत्पूर्वकवाद्मचः ॥ ४ ॥ 
तताबवकलात्‌ ) वाचः । इति प०। 


[अ० २ पा० 9 सू० ७५] भाषाटीकासहितानि । श्श्ष 


अथे--तेज, जछ, भूमि जा त्रयका तत्पदसें ग्रहण है, ताके अंगीकार किये 
यह अर्थ सिद्ध हुआ। “अजन्नमर्य हि सोम्प मन! जआापोमय!ः प्राण! ते- 
जोमयी वाक” जा छांदोग्यश्व॒त्तिमें वाचः नाम प्राण-मनसहित वाकूको 

बे 
तत्पूर्वकत्वात्‌ नाम तेज, जल, भूमि, पूर्वक सुना है. मनके पूरब भूमि है. 
कप डे 

प्राणके पूर्व जल है, वाकूके पूर्व तेज है अर्थात्‌ मन, प्राण, वाकू, भूमि, जरू 
तेजसे ७ अर च््ज श्रुतिको [च होनेसें ट 
तेजसें उपजे हैं, यातें उत्पत्तिबोधक पा विद्यमान होनेसे और सत्यवोध- 
कको हिरण्यगभ इंद्वियवोधक होनेसें उक्त वाक्यनका विरोध नहीं, इति ॥४॥ 


पूर्वपक्षसूत्र । 
४० विश [० प] 
सप्तगतेविंशेषिताच ॥ ५॥ 
90९ विशेषितत् कप 
सप्तगतेः । त्‌।च। 
इति प्‌०। 

अधथे-“सप्त प्राणा; प्रभचन्ति” जा छितीय झुंडकश्रुतिमें सप्त इंद्रियां 
कही हैं. प्राणपदका अर्थ इंद्रिय है. और “हैनम्‌ आतेंभागः पप्रउछ कति 
अहाः कति आतिग्रहाः इति । अछीो ग्रहा अष्ठछी आतित्रहा इति। ये ते 
अछी ग्रहा अछी अतिग्रहा! कतमे ते इति प्राणो वै ग्रह। सोड5पानेन 
आतिग्रहेण ग्रहीतोड्पानेन दि गनन्‍्ध जिघरति। वाग वै अहः स नाता 
अतिगत्रहेण ग़हीतो चाचा हि नामानि अभिवद्ति! जा वृहदारण्य- 
कके पंचमअध्याय द्वितीय ब्राह्मणमें आठ इंद्वियां कही हैं।आण पदसे 
वायुसहित प्राणकणा अरहण है, अपानपदसें गन्धका ग्रहण है अपानकरके 
उपहत गंधको सर्बछोक झहण करे है, इति। और “सप्त शीषेण्यः प्राणा 
दो अवोचौ! जा अ्ुतिमें नव प्राण कहे हैं।सप्त शिरमें हैं, दो नीचे 
हैं, इति। “नच वै पुरुषे प्राणा नाभिदशमः! जामें दश कहे हैं। “दर्श 
सै पुरुष भराणा आत्मैकादशः” जा अतिमें एकादश कहे हैं: आत्मापदसें 
मनका ग्रहण है. कह द्वादश, कहूँ तयोदशभी सुने हैं. इन वाक्यनका 
परस्पर विरोध श्रास हुएसें एकदेशीके मतमें यह अथ है। अ्॒तिमें इंद्विय- 
निछ सप्तत्व ' गते;” नाम सप्त संख्या निश्चित है, यातें इंद्वियां सात हैं और 
*सप्त चै ज्ीषेण्यः प्राणाः ” जा श्रुतिमें इंद्रियोंको शीर्षण्य जा बिशेषण क- 
रके विशेषित्वात्‌ नाम विशेषण करके युक्त किया है, यातेंभी इंद्रियां सल 
हैं. और अष्टादि जो संख्या कही है, सो ससतोंकी दंत्तिके भेदसें संभवे है, 
यातें श्रुतिविरोध नहीं. इति 0 ५ ॥ 

व५ 


१४६ *. ब्ह्मसन्नाणि [अ० २ पा० ४ सू० ९] 
सिद्धान्तसूत्र :। 


स्थिते ने ८ ४ 
हस्तादयस्तु स्थितेड्तो नेवंस्‌ ॥ ६॥ 
हस्तादयः | तु । खिते । अतः । न । एवम्‌ । इति प०। 
अथ-तु सघसंख्यानिषेधार्थ है। उक्त बृहत्‌ श्रुतिके आगे यह श्रुति हैं। 
जिह्ना चक्षु ओज्र मनको ग्रहण कहकर “ हस्तो वे अहः स कसेणा अतिग्रहेण 
गहीतो हस्ताम्यां हि कसे करोति ' यह कहा है. इसमें हस्तादिक भिन्न इंद्रियां 
सुनी हैं. आदिपिदस त्वचाका महण है, यातें सससंख्यासें “स्थिले! नाम अधिक 
खिति है, ' अतः? नाम सप्तसंख्यासे अधिक संख्या स्थित होनेसें “नैचस्‌ 
नाम सप्त इंद्रियां माननी योग्य नहीं किंतु एकादश हैं. इति। सप्संख्यावोधक 
अतिने स्थानभेदमाजसे चारोंको सप्त कहा है. नववोधक वाक्यका छिद्रोंमें 
तात्पय है, यातें वाक्यविरोध नहीं. इति ॥ ६ ॥ हि 
अधथे-सांख्यमतमैं इंद्रियोंको ज्यापक माना है, तिनका निषेध करे हैं।--- 
आअणूवश्ष ॥ ७ 
अणवः । च । इति प० । 
अथे-यह इंद्वियां अणु हैं अर्थात्‌ इंद्वियोंसें ईंद्रियोंका अहण होवे नहीं, 
यातें सूक्ष्म हैं. जो इंड्रियोंको विभु मानें तो काशीगत विश्वनाथका सेतुबासी 


जनोंकोभी दशन हुआ चाहिये, इत्यादिक अनेक दोष ता पक्षमैं हैं, यातें 
परिच्छिन्न सूक्ष्म ईंद्रियां हैं. इति ॥ ७॥ 


'भव॒०-प्राणोंकी उत्पत्ति होते हे, वा नहीं ? जा संदेहसें कहे हैं।--- 
श्रेष्ठ श्न ॥ ८ ॥ 
श्रेष्ठ । च्‌ । इति प०। 

अथे-“ एतस्मात्‌ जाथते घराणः? जा श्रुतिमैं प्राणकी उत्पत्ति सुनी है, 
यातें श्रेष्ठ नाम प्राण अह्मका कार्य है. इति॥ ८॥ 

अच०-प्राणोंका स्वरूप कहे हैं।--- ह 

न वायुक्रिये एथशुपदेशात्‌ ॥ ९ ॥ 
न । वायुक्रिये | पृथरू । उपदेशात्‌ । इति प०। 
अथे-* यः प्राण: सः वायुः” जा वाक्यसैं महान्‌ वायुको प्राणर्प कहां. 


(अ० २ पा० ४9 सू० १२] भाषाटीकासहितानि ।' १४७ 


है यातें महान्‌ वायुही प्राण हं, जा पूवपक्षसें कहे हें. प्राण वायुरूप नहीं 
और क्रिया नाम इंद्वियोंका ज्यापाररूप जो क्रिया तत्स्वरूपभी प्राण नहीं। 
एतस्मात्‌ जायते प्राण: ? इत्यादि श्रुतिसें घायु ओर इंद्वियोंसें प्रथक््‌ नाम 
प्राणोंको भिन्न उपदेश किया है, यातें म्राण वायु और क्रियारूप नहीं । “य; 
प्राण: सः वायुः ! जा श्रुतिमं कायकारणका वास्तव अभेद कहा है, और 
& ज्ञायते प्राण; * जामें कल्पित भेद कहा है, यातें उमयश्रुतिविरोध नहीं 
इति॥ ९ ॥ 
अचब०-देहम यथा जीव स्वतंत्र है तथा प्राणभी स्वतंत्र करण है, यातें 
उसयस्वतंत्रतासें शरीरउन्मथनप्रसंग होवेगा, जा शंकासें कहे हैं।-- 


चह्ठुरादिवत्तु तत्सहशिष्टयादिभ्यः ॥ १० ॥ 
चश्लुरादिवत्‌ । तु । तत-सह-शिप्वादिभ्यः । इति प०। 


अथ-लु प्राणोंकी स्वतंत्रताका निपेघ करे है । चश्षु आदिकोंके साथ जो 
गराणोंका संबाद तासें तत्सह नाम इंद्रियोंके साथ प्राणोंका शिष्टि ( शासना ) 
अथोत्‌ उपदेश किया हैं, यातें चशुरादिवत्‌ नाम यथा चक्षु आदिक अस्व- 
तंत्र हें तथा पराणभी अस्वतंत्र हें. आदिपदसें अचेतनत्वादिका अंगीकार है 
इति ॥ १० ॥ 

अव०-यथा नेत्रादिकॉके रूपादिक थविपय हैं, तथा प्राणोंका साधारण 
विषय नहीं यातें नेत्रादिबत्‌ करणत्वयुक्ति नहीं, जा शंकासें कहे हें:-- 


अकरणलाच न दाषसथा है दर्शायांत॥ ११ ॥ 
अकरणलात्‌ | च । न । दोषः | तथा । हि। दशेयति । 
इति | प० | 
थ-प्राण अकरणत्वात्‌ नाम करण नहीं यातें प्रागविषयका अभाव 
दोषरूप नहीं, उक्तदोप करणको होवे है, अकरणको नहीं, चकारसें देहधा- 
रणरूप काय प्राणका है. यह अंगीकार है. तथाहि-श्रुति “द्शायति! नाम 
दिखावे है। 'तान चरिछः प्राण उचाच सा सोहम्‌ आपद्यथ अहमेव एत- 
त्पश्चचा आत्मान विभज्य एतत्‌ वाणम्‌ अवष्टभ्य विधारयामि' जा 
द्वितीय प्रश्नश्नुतिमें देहधारणरूप असाधारण काये दिखाया है. इति॥ ११ ॥ 
अब०-प्राणोंका अपर कार्य दिखावे हैं: 


पंचदत्तिमनोवह्यपदिश्यते ॥ १२ ॥ 
पञ्मवृत्तिः । मनोवत्‌ । व्यपदिश्यते । इति। प०। 


१४८ ब्रह्मवत्राणि | (अ० २ पा० 9 सू० १५] 


अथ-यथा अनेक चृत्तिरूप असाधारण कायकी दृष्टिस मन नाम अंतः्क- 
रण अनेक प्रकारका है अर्थात्‌ प्रमाण, विपयेय, विकल्प, निद्रा, स्मृति, जा 
पंचदृत्तिवान्‌ है; तथा ग्राणभी प्राण, अपान, व्यान, उदान समान, जा पँच- 
वृत्तिवान्‌ “व्यपदिश्यते” नाम श्रुति कहा है. इति ॥ १२ ॥ 


आअशणुश्वय॥ १३ ॥ 
अणुः । इति । प्‌०। 
अध-यथा नेत्रादिक अणु हैं तथा प्राणभी परिच्छिन्न सूक्ष्म है, इति ॥१श॥ 
लिनिशििकी ७० जे 48० प ५ 
ज्योतिरायधिष्ठानं तु तदामननात्‌॥ १४ ॥ 

ज्योतिरायधिष्टानमम्‌ । तु । तदामननात्‌ | इति। प०। 

अथ-इंद्वियां और प्राणोंकी देवता अधीन चेष्टा हैं, या स्वतंत्र है, यह 
इसमें संदेह है। 'चक्षुषा हि रूपाणि पद्यति' जा श्रुतिमें देवता- 
बिना इंद्वियोंकी चेष्टा प्रतीत होवे है, ओर “अज्लिवाग फत्वा छुख॑ प्रावि- 
शत्‌। वायु) प्राणो भत्वा नासिके प्राविशत्‌ । आदिल्यअश्लुशेत्वा 
अक्षिणी प्राविशत्‌। दि्रि; ओज फ्र्त्वा कर्णो प्राविशन। ओपधिव- 
नस्पतयो लोसानि घूृत्वा त्वचं प्राविशन्‌। चन्द्रमा सनो फूत्वा हृदय 
प्राविशत्‌। झत्यु। अपानो फ़ूत्वा नाभि प्राविद्यत्‌। आपो रेतो फ््त्वा 
शिक्ष प्राचिशन' जा ऐतरेयके द्वितीय खेंडकी श्रुतिमं देवता अधीन चेष्टा 
अतीत होवे है. इन उभय वचनोंके विरोधमेँ यह उत्तर है। ज्योति नाम अग्नि 
आदियमें होये जिनके ते ज्योतिआदि कहिये. तिनकरके जो प्ेरित सो ज्योति- 
आदि अधिष्ठान अंगीकृत है. अथोत्‌ अभ्निआदिक देवताकरके भेरणावान 
घाक्यादिकोंका गहण है. तत्‌ नाम देवताप्रेरित वाक्यादिक 'आमननात्‌' 
नाम उक्तश्लुतिसें अंगीकार किये हैं, यातें ईंद्रियोंकी देवताअधीन चेष्टा है- 
अचेतनकी स्व॒त+ चेष्टा संभवे नहीं. इति ॥ १४ ॥ 

अच०“प्रेरणासें देवता अधीन भोगप्रासति नहीं यह कहे हैंः--- 


प्राणवता शब्दात्‌॥ १५॥ 
प्राणवता । शब्दात्‌ 4 इति | प्‌० 


अथे-प्राणवता नाम जीवसेंही इन्द्रियोंका स्तस्वामिरूप संबंध है, यातें इं- 
. द्वियसाध्य जो भोग सो जीवकोही होजे है. शब्दात्‌ यह तहां हेतु है। “* अथ 


[ज०२ पा० 9 सू० १८] भाषाटीकीसहितानि । १४९ 


यजत्र एतत्‌ आकाइाम्‌ अनुविषण्ण चक्षुः स चाह्ुषः पुरुषो ददीनाय चक्षुः” 
जा छांदोग्यके अष्टम अध्यायगत श्रुतिका शब्दपद्स झहण है. अथे-अथ 
नाम देहमें प्राणप्रवेश अनंतर यन्न नाम कृष्णतारामैं जो सिद्धरूप आकाश तामें 
चश्षु अनुविपण्ण! नाम प्रवेश किया तहां 'स चाछुष/ नास चक्षवान्‌ पुरुष 
है. रूपादिदर्शनअर्थ तिनके यह चश्लु हैं. इति॥ १५ ॥ 


वस्य च । नियवात्‌ ॥ १६॥ 
तस्य । च्‌ । निसल्ात्‌ । इति । प० 


अग्म-किंच स्वकर्मोकरके प्राप्त जो देह इसमें तस्य नाम जीवको कतो भोक्ता 
रूपसे नित्य होनेसें देवता इस शरीरमें भोक्ता नहीं, किंतु इन्द्रियोंके अधिष्ठाता 
हैं. इति ॥ १६ ॥ 

अच०-ननु इंद्वियां कोई पदार्थ होयें तो तत्‌ देवनका विचार किया चा- 
हिंये, इंद्रियां मांसपिंडमात्र हैं वा प्राणव्यापारमात्र हैं, यातें उक्तविचार नि- 
प्फल है. जा शंकासे कहे हैं।-- 


त इन्द्रियाणि तहयपदेशादन्यत्र श्रेष्ठात्‌ ॥ १७॥ 
ते । इन्द्रियाणि । तत-व्यपदेशात्‌ । अन्यत्र । अरेष्ठात्‌। इति | प०। 


अथ-एतस्मात्‌ जायते प्राण?” जा श्र॒ुतिमें आ्राणोंसें इंद्रियां मिन्न प्रतीत 
होवे हैं और 'हन्त अस्पैव सर्चे रूप असाम इति त अस्येव सर्वे 
रूपम अभवन” जा शअ्रुतिमें प्राणरूपही इंद्वियां कही हैं यातें दोनो 
श्रुतियोंका पूर्वपक्षमें विरोध मानेसें यह सिद्धांत है. अ्रेष्ठात्‌ नाम ग्राणोंसें ते 
नाम वाक्यादिक अन्‍्यत्र नाम अन्य इन्द्रियाणि! नाम इंद्वियां हैं; प्राणव्यापार- 
रूप नहीं. तत्‌ नाम प्राणोंस “एत्तस्मात्‌ जायते! जा अ॒तिमें “व्यपदेशात्‌' 
नाम भिन्न कथन किया है यातें प्राणव्यापाररूप इंद्वियां नहीं. श्लुतिअर्थ-अब 
हम सर्व बाक्यादिक इस प्राणकी नाई रूपवान्‌ होवें इस प्रकार ते वाक्यादिक; 
इस प्राणका स्वरूप हुए. इति ॥ इस झतिमैं प्राणअधीन 'चेष्टाचान्‌ ईंद्वियां हैं, 
यह अंगीकार है; प्राणस्वरूप हैं, यह अंगींकार नहीं- इति ॥ १७॥ 


मेदश्ुतेः ॥ १८॥ 
भेदश्रुतेः । इति । प०। हे 
अधथै-'अथ हू इमम्‌ आसन्य प्राणम्‌ ऊल्ुः जा झुतिमिं प्राणको 


१५० .. ब्ह्मसूत्राणि ।- [अ० शपा० ४ सू० २१ ] 


इंद्रियोंसें भिन्न सुना है, यातें प्राणव्यापाररूप इंद्रियां नहीं। आस्य नाम झु- 
खमें जो होये सो आसन्‍्य कहिये, अथांत्‌ प्राणका नाम है. इति॥ १८ ॥ 


वेलक्षण्यात्र ॥ १९ ॥ 
चैलक्षण्यात्‌ । च । इति । प० । 


आथे-सुषुसिम भ्राणोंकी स्थिति है, इंद्रियोंकी नहीं. इत्यादिक चहुविरक्ष- 
णतासेंभी इंद्वियां प्राणोंसें भिन्न हें यातें वाक्यनका विरोध नहीं- इति ॥ १९॥ 

अव०-“अनेन जीवेनात्मना अलुप्रविदयय चाधंख्पे व्याकरवाणि ता- 
सां चित्त जिन्वतम एके करवाणि' जा छांदोग्यश्र॒ुतिम नाम रूप मअकट 
करनेका कर्ता सुना है; सो जीव है, वा ईम्बर है, जा संदेहसें पूर्वपक्षमें जीव 
अँंगीकार कियेसें यह सिद्धांतसून्न हैः--- 


सं्ञाधतिह॒पिस्त त्रिदवत्कुब॑त उपदेशात्‌॥ २० ॥ 

संज्ञामूतिक्ृप्तिः । तु । जिवृत्कुबतः । उपदेशात्‌। इति । प०। 

अर्थ-तु जीवकठंत्व निपेधार्थ है. संज्ञा जो नाम, .सूर्ति जो रूप तिन 
उभयकी जो छूछति नाम कल्पना अर्थात्‌ नासरूपका प्रकट करना सो 
तिघूत्कुवेतः' नाम परमेश्वरकोही योग्य है. उपदेशात्‌ नाम “व्याकरबाणि! 
जा श्रुतिमें परदेवताकोही नासादिकोंका कर्ता उपदेश किया है, यातें जीव 
कर्ता नहीं. इति ॥ २० ॥ 

अवब०-शरीरमें त्रिवत्‌करण दिखावे हैँ:--- 


4 ८ ०... थ्‌ 6 

मांसादि सौर यथाशब्द्सितरयोश्व ॥ २१ ॥ 

मांसादि । भोमस । यथाराज्दस्‌ । इत्तरयोः । च । इति | 
अथे-शरीरमें पृथिवीके त्रय कार्य हैं. पुरीष, मांस, सन, इति। जलकेभी 
तय हें-मूत्र १, छोहित २, प्राण, ३, तेजकेसी त्रय हें-अस्थि १, मज्जा २, 
वाक्य रह, इति। यह आध्यात्मिक न्रिवृतकरण है. सोई सूच्रकार कहे हैं-“सौ 
मस्त नाम भूमिके कार्य मांसादि त्रय हैं. यथा०-“अज्नमशितं ज्िधा विधी- 
चते तस्य यः स्थविष्ठो' धातु) तत्‌ पुरी्ष भवाति यो मध्यमः तम्साँसे 
थोडणिछ! तन्‍मनः और “इततरयों” नाम जरू तेजकेभी त्रयही कार्य हैं 
“यथाशव्दम नास आप; पीताः जिधा विधीयन्ते तासां यः स्थविष्ठो 
घातुः तन्मूज भव॒ति यो सध्यमः तछोहित॑ योडणिष्ठः खत .प्राणः | 


[ज० है पा० १लू० १] भायाटीकासहितानि । १५६. 
तेजोउशितं जिधा विधीयते तस्य यथः स्थविछो घातुः तदस्थि मवति यो 
सध्यल्। सा सज्या योडणिष्ठ: सवा चाका जा श्रुति अचुसार ग्रहण किये 
चाहिये. इति ॥ २१ ॥ - 


.. अब०-ननु सर्वका त्रिवृत्करण हुएसें यह पृथ्वी है, यह जछ है, यह तेज 
है, जाविध भिन्न भिन्न व्यवहार कैसे होवेगा, जा शंकासें भगवान्‌ सूत्रकार 
कहे हैं।-- 
वेशेष्यात्ु तदादस्तद्वादः ॥ २२ ॥ 
ग्प वि 
वैशेष्यात्‌ | तु । तद्घादः । तद्घादः | इति। प०। 
अथ-तु पूर्वपक्षनिषेधक है. पृथिवी आदिकोंका त्रिवतूकरण हुएसे भरी 
चिद्वेष्यात! नास स्वस्त अद्धभागकी अधिकतासे तत्-वाद नाम यह पृथ्वी है 
इत्यादि व्यवहार संभवे है. द्वितीय 'तत्‌-बादपद अध्यायकी समाध्तिके अर्थ 
है, उक्तविधसे श्रुतिवाक्यनका रैचक विरोध नहीं, यातें सबब वेदांतका बह्ममें 
समब्वय है. इति सिद्धम्‌ ॥ २२ ॥ 


इति शारीरकसूत्रभावप्रकाशिकाभाषाटीकायां दिती- 
हा 
याध्यायस्य चतुथः पादः समाप्त ॥ ४ ॥ 
अआलाया: (20) 0 
अथ तृतायाध्यायप्रार॒ब्मः ॥ ३ ॥ 
दोहा-विराग पदार्थशोधन, परणुणउपसंहार। 
उप वहि साधन दोयका, जामें करें विचार ॥ १ ॥ 
इस अध्यायकेभी चार पाद हैं, तहां प्रथमपादमें जीवका जो परलोकममें ग- 
सन ताका विचार है; लो विचार विरागार्थ है. द्वितीयपादमें तत्‌ त्व॑ पदार्थन- 
का शोधन करेंगे, ठृतीयमें सगुणविद्यामें गयुणनका उपसंहार विधान करेंगे, 
चतुर्थमें निर्गुण बह्मज्ञानके वहिरंग और ज॑तरंग साधन कहेंगे. तहां प्रथम 
पादके सप्त अधिक वीस सूत्र हैं, तिनमें पट्‌ अधिकरण हैं, एकविंशति गुणरूप हैं. 
तथाहि+--- 


संडुधा अधिकरण . गुण असकझु 
१ आ० ने जीवगमनविचार.- 


श्पर ब्ग्मस॒त्राणि 


मे नै गु० 
झ हम गु० 
छ ने गु० 
प्‌ न गशु० 
द्‌ नै गु० 
हे ने शु० 
०4 आ५च गु० 
हि. न शु० 
१० न गु० 
१३ नै गु० 
श्र अ० न 
श्र न गु० 
१५४ न गु० 
श्ष न शु० 
श्दं ने शु० ५ 
१७ हज गु० 
श्द ने गु० 
५९ हि गु० 
२० +ः शु० 
२१ भ गु० 
34 अआअ० न. 
श्र आ० जु 
ग्छ आअ० न 
ब्ण हि शु० 
श्द्े हम शु० 
हि 2 शा गु० 


इति ॥ तहा थह प्रथम सूत्र है+--- 


(जि०३पा० १ सू० १] 


जी० 

जी० 

जी० 

जी० 

जी० 

जी० 
कर्मयुक्तआगमन- 
कर्म ० 

कर्म ० 

कर्म ० 
पापीचंद्रछोकप्राप्तिपूर्व ० 
तन्निषेधनरकप्राप्ति- 
तत्‌० 
सपतनरकनिधान- 
तहां यमआज्ञा- 
ठत्तीयमार्ग. 
आहतिनियमनिपे: 
आ० 

आ० | 
अंडजादिभेद- 
आगममसार्ग. 

आ० 

अन्नमें संवंधसिद्धि- 
संच 

सं० न 
योनिजन्मअंगीकार 


[जञ० हे पा० १ सू० १] साषादीकासहितानि |. १५३ 


तदन्तरपग्रतिपत्तो र॑हति सम्परिष्वक्तः प्रश्न- 
निरूपणाभ्याम ॥ १॥ 


तदन्तरप्रतिपत्तो । रंहति । सम्परिष्वक्तः । प्रश्ननिरू- 
पणाभ्याम्र्‌ । इति प० । 


अथे-जीव यदा पूर्वदेहको त्यागके अपरदेहको प्राप्र होवे है तदा प्राण, 
इंद्रिय, मूंछाबिद्या, धमोधसे, पूर्चश्रमजन्य संस्काररूप पूर्वज्ञान इतनी साम- 
ओसहित अपरदेहको प्राप्त होबे है; यह श्रुतिसिद्ध अर्थ हे. तहां देहके आर॑- 
भक्त व प्रणादिकोंके आधाररूप जे पंचीकृत भ्रूतनके भाग तिन भागोंसें सम्प- 
रिष्वक्त जीव गमन करे है वा असम्परिष्वक्त, गमन करे है? यह इस. अधि- 
करणमें संदेह है। तहां प्रमाणके अभावसें असम्परिष्वक्त गमन करे है यह पू- 
बपक्ष है। पूवपक्षमें वैसग्यकी असिद्धि फल है. सिद्धांतमें तत्सिद्धि फकः है. 
यहां यह सिद्धांत हैः-तत नाम पूवशरीरसें अंतर नाम अपरशरीरकी जो 
प्रतिपत्ति नाम प्रा्ठि हि सम्परिष्वक्त नाम भूतभागसें सम्बद्ध जीव रंहाति 
नाम गमन करे है. प्रश्ष व निरूपण यह दो तहां हेतु हें. तथाहिः-छांदोग्यमें 
पंचाग्रिविद्यासें कहा है कि कोई प्रवाहणनाम राजा था ताकी सभामें स्वेत- 
केतु गया था ताके आगे राजाने पंच पश्न किये, यह प्रश्नपदका अर्थ है. 
'तिनका उत्तर श्वेतकेतुको नहीं आया तब श्वेतकेतुने आकर पितासें पूछा तो 
उसने कहा हमकोसी यह विद्या नहीं आती, तब उद्दाछकने जाकर राजासें 
पूछा तब राजाने यह उपदेश किया---असौो वाव छोको गौतमाश्रिस्तस्पा- 
दिल्य एव समिद्रश्मथों धूमो5हराचिश्रन्द्रमा अज्ञारा नक्षज्ञाणि विस्फु- 
लिज्ञा; ॥१॥ तस्मिन्‌ एतस्मिन अज्नौ देवाः अं ज़हूति तस्वा आहुतेः 
सोमो राजा सम्भवति ॥२॥ १॥ पर्जन्यो चाव गौतमभाप्रिः तस्व 
वायुरेच समिद््श्य धूमों विद्युदाचिरशनिरह्ाराः हाइुनथो पिस्फु- 
प'लिज्ञा। ॥ १॥ तस्मिन एतस्मिन्‌ अझौ देवा! सोम राजानं जहाति तस्या 
आहुतेः वर्ष सम्भवति ॥ २॥ एथिवी वाव गौतसाझ्ने! तस्वाः सं- 
चत्सर एच सलित्‌ आकाओ धूमो राजिरचिदिशो5ह्ञारा अवान्तर- 
पदेशो बविस्फुलिज्ञाः। तस्मिद एतस्मिन्‌ अन्नौ देवा वर्ष हुह॒ति तस्वा 
आहते! अल सम्मवति ॥ ३ ! पुरुषों वाव गौतमाप्नमिः तस्थ वागेव 
समित्‌। प्राणों घूमो जिह्ार्चिअक्लुरज्ञाराः ओज ,विस्फुलिज्वः | तस्मिन 


बतह्म, २० 


१७४ अहसूत्राणि । [अ० रे पा० १ छू० ३] 


णएत्तस्मिन्‌ अञ्नी देवा अन्न छद्लाति तस्था आहुते। रेतः सम्भवति ॥ ४॥ 
योषा वाच गौतमाजिः त्तस्या उपस्थ एवं सामिद्‌ यदुपसन्त्रयते स घूमों 
योनिरचियद्न्तः करोति तेडज्ञारा अभिनन्दा विस्फुलिज्ा! तस्मिन ए- 
तस्मिन्‌ अग्नी देवा; रेतो जुहूति तस्था आहुतेः गर्भ! सम्भवाति ॥५॥ इति 
तु पश्चम्पास्‌ आइहुतौ' आप; पुरुषवचसों 'मवन्ति । इति । इस पंचासिवि- 
झ्ाके उपदेशका निरूपणपदसे ग्रहण है. उक्त प्रश्न व निरूपणसे जलादिभूतसम्बद्ध 
जीवका गमन होवे है, यह निश्चित है। अर्थ-हे गौतम! यह झुलोक अश्षे है 
इससें देवा नाम अभिआदिरूप यजमानके प्राण श्रद्धा नास दुग्धादिरूप ज- 
लका हवन करे हैं, तिस आहुतिसें त्तिन जलोंका परिणामरूप सोम राजा अ- 
थांत्‌ चंद्रसमीपस्थ तत्सद॒श शरीर होवे है। पर्जन्य ( देवताविशेष ), देव 
( इंद्रादि ), इसीतरह आगे जानना चाहिये- पंचमी आहतिमें जलोंकी पुरुष- 
संज्ञा होवे है. इति ॥ १॥ 


व्यात्मकतात्तु भ्रूयस्वात्‌ ॥ २॥ 
ज्यात्मकत्वात्‌ । तु । भूयरत्वात्‌ । इति प०। 


अधे-यद्यपि उक्त प्रसंगमैं जलसंवद्ध गसन भान होचे है तथापि जिवृत्कर- 
णश्ुतिस देह “यात्मकत्वात' नाम त्रयभूतस्वरूप निश्चित है; यातें यज- 
मानद्वारा ताको जलूजन्य सिद्धहुए अपर दो जन्यत्व और तत्संबंद्धल्यभी 
सिद्ध होवे है. श्ुतिमें जो केवल जलूका ग्रहण है सो भूयस्त्वातँ नाम 
तेजादिकोंकी अपेक्षासें जलकी वाहुल्यतासें है. इति ॥ २ ॥| 


प्राणगतेश्व ॥ ३॥ 
आपगतेः । च । इति प०। 


अथ-देहरूप जे भूत तत्‌-आश्रित म्राण व ईंद्रियां पतीत होवे हैं। 'हृद्‌- 

यस्याग्न॑ प्द्योत्ते तेन प्रयोतिन एब आत्मा 'निष्क्रामति चक्षुषों था 
के शारीरदेशोश्य: 4 हा 

सूझों वा अन्फ्ेम्यो वा शरीरदेशोम्थः । तस््‌ उत्कामन्त घाणोड्लू- 

त्कासति प्राणस्‌ अनूल्कामन्तं सर्वे प्राणा अनुत्कामन्ति' जा बृहदार- 

ण्यकके षष्ठ अध्याय व चतुर्थ ब्राह्मणगत अ्ुतिमें मरणकारुमैं प्राणोंकी 

गति नाम गमन सुना है, यातें जीवनकालमें यथा प्राण देह-आश्रित हैं 


[ ज० ३१ या० १ सू० ५ ] भाषाटीकासहितानि । श्थप्‌ 


तथा मरणकालमेंभी भ्रूत-आश्रित अणोंका गसन सिद्ध होनेसें जीव भूतस॑- 
चद्धही गमन करे है. इति ॥ ३ ॥ 


अभ्यादिगतिश्र॒तेतिरिचेन्न भाक्तच्ात्‌ ॥ ४ ॥ 
अध्यादिगतिश्व॒तेः। इति । चेत्‌ । न । 
भाक्तत्रात्‌ । इति प०। 


अथे-“यज्ञास्प पुरुषस्य ग्वतस्थ अर वागप्येति चात॑ प्राणः चक्षुरा- 
दिले मनअन्द्र दिश! ओजे प्थिवी रारीरस्‌ आकाशम्‌ आत्मा ओषधी- 
लॉमानि वनस्पतीन केशाः” जा बृहदारण्यकके पंचम अध्याय द्वितीय 
श्राह्मणगत श्रुतिमं वाक आदिक इन्द्रियोंका अश्निआदिक देवतनमें गति 
नाम रूय सुना है यातें अपरलोकमें इंद्रिययममन--असंभवसें भ्रूतसम्बद्ध 
जीवगमनकथन असंगत है, जा शंका करें तो असंगत है. तथाहि-उच्त 
श्रुतिका यह भर्थ है क्वि मम हृदयके अग्रभागमैं प्रकाश होवे है तिसकरके 
यह आत्मा गमन करे है. तिसके गमन पीछे प्राण गसन करे हैं, प्राण गमन 
किये पीछे सर्व इन्द्रियां गमन करें हैं. इति । और 'ओषधीलोमानि' जा श्व॒- 
तिमें औपधिनमें छोमनका रूय कहा है. वनस्पतिमें केशलूय कहा' है. ते 
छोम केश सृतपुरुपके प्रत्यक्षसें छय होते प्रतीत होवें नहीं और वाकू आदि- 
कॉंका रुयभी तहां कहा है यातें पूर्वउक्त गम्नवोधक अ्रुतिसें विरोध नि- 
पेध अर्थ चाकू आदिकोंका लय भाक्त नाम गौण है, मुख्य नहीं. इति ॥ ४ ॥ 


9००९ 5 6 ० 
प्रथमे3श्रवणादिति चेन्न वा एव ह्युपपत्तेः ॥ ५ ॥ 
प्रथमे । अश्रवणात्‌ । इति । चेत्‌ | न । ताः । एवं। हि। 
उपपत्तेः । इति प० । 

अधै-ननु 'एतस्मिन्‌ अज्नौ देवा; अर्झां हुदृति! जा अुतिमें अथम 
नाम प्रथम अम्निविषे-अद्धारूप आहुति सुनी है जरू नहीं खुना, इति चेत्‌ 
नाम जो उक्त शंका करें तौ असंगत है. श्रद्धा मनकी दृत्तिविशेष है, यातें 
ताकी आइति संभवे नहीं, किंतु जरूरूप डुग्धादिकोंकीही आहुति संभवे है 
यातें ताः नाम जरही अ्ुतिमें श्रद्धापदर्से महण किया है, जछसें अ्रद्धाशव्द 
लाक्षणिक है, इति ॥ ५ ॥ 


१५६ अक्चसत्राणि । [ज० ३ पा० १ सू० ७] 


| 0०० # कि न्नेष्ठादिकारि 4 ग 
अश्वुतत्वादिति चेन्नेष्टादिकारिणां प्रतीतेः ॥ ६॥ 
अश्वुत्वात्‌ । इति। चेत्‌ | न । इष्टादिकारिणाम्‌ । 
प्रतीतिेः । इति प०। 

अथै-ननु जलादिकोंकी नांई जीवको उक्त छुतिमें गमनका कर्ता छुना 
नहीं, यातें जलादिभूतसम्बद्ध गमनकथन असंगत हैं, जा शंशाका आधे सू- 
न्सें निषेध करे हैं. जे शहस्थ इश्टापूर्तदत्तको करे हैं ते चंद्रढोकम जावे हैं ति- 
नका 'एपष सोमों राजा” जा श्रुतिमं सोमराजशब्दस अहण है तथा पंचापनि- 
विद्यामैंमी आहुतिको सोमराजशब्दसें सुना हैः यातें तिन इष्टादिकारी पुरु- 
पोंकी पंचाभ्निविद्यामें प्रतीति होनेसें भ्ूतसंचद्ू जीवगमन संभवे है, इति ॥६॥ 


अव०-ननु ते चन्द्र भाप्य अन्न भवन्ति” जा श्रुतिमें कर्मीजनोंको दें. 
वनका अन्न कहा है, यातें चंद्रलोकमें तिनका गमन स्वकर्मफलभोगार्थ हैं, 
यह तो संभवे नहीं जा शंकासें कहे हैंः-- 


भाक्त वानात्मवित्वात्तथाहि दर्शयति ॥ ७॥ 


भाक्तम्‌ । वा। अनात्मवित्वात्‌ । तथाहि । दशयति । इति प्‌०। 
अथे-वा पद उक्तदोपके निषेधाथ है. उक्त श्रुतिमें कर्मीको जो अन्नरूप 
कहा है सो “ भाक्तम्‌! नाम गौण है, मुख्य नहीं. यथा पुत्नादि भोगके सा- 
घन होवे हैं तथा कर्मीजनभी देवनके प्रति भोगके साधन हैं; यातें तिनको 
अज्ञ कथन किया है. और “ अनात्मवित्वात्‌” नाम कर्मीजन अज्ञानी हैं, 
यातेंसी देवनप्रति तिनको भोग्यकरके कहा है. तथाहि-“त्तरश्रुतिर्दृशयत्ति 
नाम जनात्मवेचा होनेसें कर्मीको देवनका भोग्यकरके दिखावे है। “अथ 

' चोथ्न्यां देवताम्‌ उपासते अन्धोडसौ अन्योडहसस्मि न स वेद यथा 
पहुः एवं स देवानाम हाति! यह श्रुति बृहदारण्यकके प्रथममें है. अर्थ-जो 
अन्नह्मवित्‌ आत्मासें भिन्न देवताकी उपासना करे है, यह हमसे भिन्न है, मैं इसका 
दास हों, जाविध माने है, सो तत्त्वको नहीं जाने है, सो देवनका पश्च हैं. इति। 

. यातें अज्ञकथनको गौण होनेसें परछोकरभोगार्थ गसन संभवे है. इति ॥ ७ ४ 


[ अ० ३ पा० १ सू० ९] सापाटीकासहितानि । श्णछ 


कऊतायये | कप 4. नेव॑ 
अतुशयवान्‌ दृष्टस्थतिभ्यां ययैतमनेवं च ८ 
कृतालये । अनुशयवान्‌ । दृष्स्वृतिभ्याग्‌ । यथा । 
एतम्‌ । अनेवम्‌ | च्‌। इति प्‌०। 

अथे-तस्मिन यावत्‌ सस्पातम््‌ ऊषित्वा अयैतम एवं अध्वान पुनारनि- 
चतेन्ते यथेतम्‌ आकाचहामस्‌ आकाशाद्‌ वायुस्‌ जा श्रुतिमैं तहांही यह कहाहै 
कि तिस चंद्रछोकसें भोक्तव्य कर्मको भोगके पुनः इसी मार्गकों आप होवे है. 
इति। इसमें यह संदेह है कि तहांसें अनुश्यबान्‌ आवे हैं वा अनुशयरहित 
आवे हैं! पूर्वपक्षमें अलुशयरहित अंयीकार कियेसे यह सिद्धांत है; कि 'क्ूता 
नाम स्वगेदाता कर्मके “ अत्यये ? नाम भोगसे विनाश हुएसें शोप कर्म यु- 
कही जीव आवे है. दृष्ट व स्मृति यह तहां हेतु हैं। 'तद्य इह रमणीयच- 
रणा अभ्याशों ह यत्ते रमणीयां योनिम्र आपयेरन्‌ ब्राह्मणयोरनिं वा 
क्षत्निययोर्निं वा वेश्ययोरनि था अध यथ इह कपूयचरणा अभ्याशों 
ह यत्ते कपूर्यां घोनिस आपदेरन। ब्वथोनि वा खकरयोनिं वा चण्डा- 
लयोनिं वा! यह अशुतिवचन दृष्टपदसे अंगीकृत है। अथे-ये कर्मी इस 
कर्मभूमिमें शुभ कम करे हैं ते स्वर्गस आकर न्राह्मणादिकयोनिको प्राप्त होवे 
हैं, ये पापकारी हैं ते आकर स्वानादिक योनिको पावे हैं. अभ्याशपद्‌ शीघ्र- 
'बाची है. * छोषेण जन्म पतिपयन्ते ? जा स्पृतिवाक्यका स्थृतिपदसें झ- 
हण है. उसय श्रुति स्मृतिसें शेषकर्मवानकाही आगसन प्रतीत होत्रे है: ते 
कर्मी जा मार्गसें जावे हैं उसी सार्गसे आदें हैं वा अपर मार्गसें आबे हैं ? जा 
संदेहसें कहे हैं-6 यथा एतम्र्‌ ” नाम जिस मार्गद्वारा चंद्रलोकमें प्राप्त हुए थे 
*€ अनेच च? नाम तिससें अपर मार्गसे आवे हैं. इति ॥ ८ ॥ 


चरणादिति चेन्नोपलक्षणार्थेति कार्ष्णाजिनिः ॥ ९ ॥ 
च्रणात्‌ । इति । चेत्‌ । न । उपलक्षणार्था । इति । 
| कार्ष्णाजिनिः । इति प०। 
अथै-नन् श्ुतिमें चरणसें योनिप्राप्ति सुनी है. सो चरण अनुशयकर्मसें 
भिन्न है यातें शेषकर्मवान्‌ आवबे है. जा कथन संभवे नहीं जा शंकाका यह 
उत्तर है कि चरणश्रुति अलुशयके उपलक्षणार्थ है. यह कार्ष्णजिनि आचार्य 
सामे हैं. इति ॥ ६ ॥ 


१७८ बक्वसूत्नाणि । [ अ० हे पा० ३१ सू० १३] 


आनर्थक्यमिति चेन्न तदपेक्षब्रात्‌॥ १०॥ 
आनर्थक्यम्‌ । इति। चेत । न । तत-अपेक्षल्वात्‌ । इति प० । 
अथ-ननु चरणश्रुति उपलक्षणार्थ है यह असंगत है. शुभाशुभरूप जो 
चरण तिससें उत्तम मंद योनि प्रापि संभवे है, अन्यथा चरण अनथथेक होवेगा 
जा कल्पना करें तो असंगत है. कर्मनकों तत्‌ नाम चरणकी अपेक्षा है यातें 
चरण -अनर्थक नहीं. इति ॥ १० ४ 


सुकृतदृष्कृते एवेति बादरिः ॥ ११ ॥ 
सुकृतदुष्कृते । एवं । इति । बादरिः । इति प०। 
अधथे-चरणपदनसें सुक्ृत नाम धर्म दुष्कृत नाम पाप यह उभयही-अंगी- 
कार हैं, यह बाद्रि आचार्य माने हैं“ घर्म चरति एव महात्सा ? जा- 
बिध लोकसें कम॑ और चरणमें एकही प्रयोग देखा है, यातें चंद्रलोकसें अनु- 
शयवानही जा लोकमें आबे है. इति सिद्ध ॥ ११॥ ' 


अनिष्टादिकारिणामपि श्रुतम्‌ ॥ १२॥ 

« अनिष्टदिकारिणाम्‌ । अपि । श्वुतम्‌ । इति प०॥ 
अथे-चंद्रलोकमें पापी जावे हैं वा नहीं ? जा संदेह हुएपर पूर्लपक्षमें यह 
सूत्रार्थ है. यथा इश्वदिकोंके करनेवाले चंद्रकोकमें जावे हैं तथा “ अनिष्टा- 
दिकारिणाम्‌ * नाम पापीजनोंकाभी चंद्रछोकमें गमन होवे है। “श्रे वे के 
चास्माछोकातू्‌ प्रयन्ति चन्द्रससम्र्‌ एवं ते सर्वे गच्छन्‍्ति ' जा कौषी- 
तकिश्रुतिमें सवेका गमन चंद्रछोकमें “श्रुतर् नाम सुना है यातें धर्मीही तहां 
जावे हैं, यह असंगत हैं. तहां चंद्रलोकमें पापीजनोंको भोग नहीं होता किंतु 
तहां गमनमात्रकरके तहांसें आकर नरकमें दुःखका अनुभव करे हैं. इति ॥१२॥ 

सिद्धांतसूत्र । 


संयमने खनुभ्येतरेषामारोहावरोही 
तद्गतिदशनात्‌ ॥ १३ ॥ 
संयमने । तु । अनुभूय । इतरेपाम्‌ । आरोहावरोहो । 


। तदतिदशैनात्‌ । इति प०॥। 
अथे-चंद्रलोकमें जो गमन है सो भोगार्थ है, जो बिना भोगसें पापीका 


[ अ० ३ पा० £ सू० १७] भाषादीकासहितानि | । १०९ 


गमन होवे तो सो व्यर्थ होवेगा. पूर्व जो श्रुति कही है सो धर्मिवरिषयक है 
पापिविषयक नहीं यातें धर्माही चंद्रोकमें जावे हैं. और पापी “ संयसने * 
नाम यसछोकमें पापफल दुःखके अनुभवार्थ जावे हें. तहां दुःखका ' अलुभ- 
य * नाम अनुभवकरके पुनः इस छोकमें आवे हैं. इसप्रकार 'इतरेषाम” नाम 
पापीजनोंका आरोह अवरोह नास गमनागमन होवे है. तत्‌ नाम यमपुरके 
प्रति जो गति सो दर्शनात्‌ नाम ' अर्थ लोको नास्ति पर इति मानी 
पुनः पुनर्वैद्यासापग्मते से” जा कठगत द्वितीयवल्लीश्रुतिमं देखी है. इति ॥१३१॥ 


स्मरन्ति चे ॥ १४॥ 
स्सरन्ति । च । इति प० । 


अथे-मनु आदिकोंनेभी पापीजनोंको नरकमें भोग स्मरण किया है, यातें 
चंद्रकोकप्राप्ति धर्मीकोही है. इति ॥ १४ ॥ 


अपि च सप्त ॥ १५॥ 


अथे-पौराणिकोनेसी रौरवादिक सप्त नरक, पापफल, भूमिरूपकरके स्मरण 
किया हैं. तिनमें पापी प्राप्त होवे हैं. इति ॥ १५ ॥ 


. तत्रापि च तद-व्यापारादविरोधः ॥ १६॥ 

तत्र | अपि। च। तत-व्यापारात्‌ | अविरोधः। इति प०। 

अथै-थचपि महारौरवादिक नरकनमें चित्रगुसकी शासना सुनी है यातें 
'तहां यमराजकी शासना है यह कथन विरुद्ध है; तथापि तत्रापि नाम चित्र- 
शुप्तकी शासनामें भी तत्‌ नाम यमराजकाही आज्ञारूप व्यापार है यातें अबि- 
सोध है, चित्रादिक यमके अधीन हैं. इति ॥ १६ ॥ 

अच०-उपासकोंका अप्रि आदि मार्ग है. केवठ कर्मीजनोका भूमादि मार्ग 
है उक्त मार्ग दोयसें स्रष्ट जे पापी तिनके लिये ठृतीयमार्ग कहा है, यातें भी 
तिनको चं॑द्रलोक प्राप्त होवे नहीं, यह कहे हैंः-- 


विद्याकर्मणोरिति ठु प्रकृ॒तलात्‌ ॥ १७॥ 


विद्याकर्मणोः । इति । तु । प्रकृतात्‌ । इति प०। 
अथै-राजा प्रवाहणने श्वेवकेतु्से पूछा था कि बहु जीव गत होते हैं ति- 


३६० ब्रह्नसूत्राणि [ज० ३ पा० १ सू० १९] 


नसे चंद्रलोक कैसे नहीं पूर्ण होता यह प्रकार तुम जानते हो ? इस श्श्षका 
उत्तर राजाने उद्दाऊक मुनिके प्रति कहा है. पापी जीवोंके अप्लिभूम सार्ग नहीं 
किंतु “ जायख स्रियख ? यह तीसरा मार्ग है, यातें ख्र्ग नहीं पूर्ण होता, 
यह सूत्रकार कहे हैं । विद्या नाम उपासना देवयान सार्गका साधन हैं. कर्म 
पिठ्यांन सार्गका साधन है. पापीका इन मार्गनसें अधिकार नहीं. उभ्यमा- 
गैनके विद्या कर्म साधनरूपसें ' प्रकृतत्वात्‌ ” नाम पसंगमें प्राप्त हैं. और पापी 
जीवनका पुनः पुनः जन्समरण वाहुल्यतायुक्त तीसरा मार्ग है यातें स्र्ग पूर्ण 
होता नहीं. इति ॥ १७ ॥ 


अब०-नज्ु जा छोकमें पापीके जन्मअर्थ पापीको चंद्वलोककी प्राप्ति 
कही चाहिये जो नहीं मानेंगे तो पांचवीं आहुतिसें जलूकी पुरुषसंज्ञा होवे 
है, यह नियम नहीं रहेगा, जा शैकाका उत्तर कहे हैं।-- 


न व॒तीये तथोपलब्धेः ॥ १८॥ 
न । तृतीये । तथा । उपलब्धेः । इति प०। 


अथे-ततीये नाम तीसरे मार्गमें प्रवशवान्‌ जे पापी तिनके अथ देहम्रा- 
घिके अर्थ आहुतिसंख्याका नियम नहीं * अथ एतयोः पथोंने कतरेण 
चन तानि इमानि छुद्राणि असकृत्‌ आवर्तीनि मतानि भवान्ति 
जायरब प्रियसत्र॒ इति एतत्‌ तृतीय स्थानम्‌ । लेन असौ लछोको न 
संस्पूयेते तस्मांत्‌ हुमुंप्सेत ' जा श्रुतिमें संख्यानियमविनाही * तथा 
डंपेलेब्चे! ” नाम ठतीय मार्गमें देहप्राप्ति -परतीत होवे है. आहुतिका योनि 
जो यम सो धर्मीके अर्थ है. इति ॥ १८ ॥ ह 


स्मय॑तेजपि च लोके ॥ १९॥ 
सर्यते | अंपि । च । छोके । इति प०।. 


अधे-लोके नाम महाभारतादिकोंमें द्रोण, ध्रृंश्युज्न, सीता, द्रौपदी आदि- 

, कॉंको योनिरहित स्मरण किया है. तहां द्वोणादिकोंकी योषिव आहुति एक 

नहीं धृष्टझुम्नादिकोंकी योषित पुरुष दोनोंकी आहुति नहीं है, यातें संख्याका 
नियम नहीं ॥ १९ 


[अ० ६ पा० १ सू० २२ भाषाटीकासहितानि । १६१ 


दर्शनाच ॥२० ॥ 
दर्शनात्‌ | च | इति। प० । 


अथे-किंच लोकमें जरायुज, अंडज, स्वेदज, उद्भिज्ज, ये चार भेद दे- 
हके सुने हैं तहां आटे उद्सिज्की योपित पुरुष संवंधविनाही उत्पत्ति 
* दरोनात्‌ ? नाम देखनेस आहुतिसंख्याका नियस नहीं- इति ॥ २० ॥ 

अव०“-ननु ' तेषां पफ्रताने जीणि एव चीजानि भसवान्ति अण्ड्ज॑ 
जीवजम्‌ उछ्िज्जम! जा श्वेतकेतु 'डपदेशात' श्ुतिमें शरीरके तीन भेद सुने 
हैं यातें चार भेद कथन विरुद्ध हैं, जा शंकासे कहें हैं।-- 


तृतीयशब्दावरोधः संशोकजस्य ॥ २१ ॥ 
तृतीयशब्दावरोधः | संशोकजस्य । इति प० । 


अथ०-श्षुतिमें उद्भिज्ज यह जो ठतीय शब्द है. इसकरके 'संशोकजस्य 
नाम स्वेदजकासी अचरोध नाम झहण है. वृक्षादिक पृथिवीको फोड़कर नि- 
कलें हैं. स्वेदन जलको फोड़कर निकले हैं. यातें उभयमें अवयवार्थ अर्थात्‌ 
फोड़ना तुल्य होनेंस उदभिज्से स्वेदजका महण संभवे है. इति ॥ २१॥ 


| 2 ८००. म 
तत्सासाव्यापात्तरुपपत्त: ॥ २२ ॥ 
पे उपपत्ते ० 

तत्साभाद्यापत्तिः । उपपत्तेः । इति प०। 
अर्थ तस्मिन्‌ घावत्‌ सम्पातम्‌ उपषित्ता अथ एतसेवाध्वानम्‌ पुन- 
निंवर्तन्ते सधेतम्‌ आकाशमस्‌ आकाशादू चायुं चायुभेत्वा धूमो मचते 
घूमो ऋत्वा अर भचति ॥ १ ॥ अर्ञज ऋत्वा मेघो भवाति सेघो अत्वा 
चपाति त इृह प्रीहियया औषधिवनस्पतयः सिलमाषा इति जायन्ते 
अतो वै खलु दुर्निष्पपतरं यो यो हि अच्च अत्ति यो रेतः सिश्वति 

ए“् आप ० ्‌ ३ 
तद्धूयः एवं भवाति ॥ २ ॥! यह छांदोग्यके पंचसप्रपाठकके दशमखण्डगत 

श्रुत्ति उक्त सूत्रका विषयवाक्य हैं. 

अथे-/ तस्मिन्‌ ! भाम चंद्रछोकमें जबतक . संपातं' नाम कर्मचका क्षय 
होय * उपित्वा ! तवतक रहकर । उसी मार्गसे फिर छौंटते हें. चंद्रछोकगत- 
जल आकाशवत्‌ सूक्ष्म होवे है। अतः नाम अजुशयवान्‌ रेतशसिक्‌ आकृति- 
रूप होवे है. इति । यवादिकोंमें निकलना दुर्निब्प्रपतरं' नाम. दुर्निष्प्रपतर है 

अहम 3१ हे 


श्ष्र्‌ ब्रह्मसत्राणि [अ० ३ पा० १ सू० २४ ] 


अर्थात्‌ कठिन है. जो रेतसूसिंचन- करे है सो लूथ एच नास तत्‌-आकृति 
ही होवे है अथात्‌ यदा जीवकछ्ा स्वगेंस आगमन होवे है तदा आकाशादिकों- 
का स्वरूप होवे है वा तत्‌ ठुल्य होवे है. पूवरपक्षम श्रुति अक्षर अडसार जीव- 
को आकाशादिकोंका स्वरूप अंगीकार कियेसें यह सिद्धांत हैं कि जीवकों 
आकाशादिकोंकी 'सालावया नाम तुल्यताकी आपत्ति नास पापि होवे हैं 
सोई 'उपपच्ते/ नाम बने हैं. छोकमें क्षीरकाऊम दथि होवे नहीं यातें दुग्धको 
दधिरूपता युक्त हैः पूष विद्यमान जो आकाशादि स्वरूप तत्‌ रूप जीवकों 
होना सेभवे नहीं किंच जीवको आकाश स्वरूप सानेस उत्तर वायु आदिकोंका 
स्वरूप कहिना असंगत होवेगा, यातें जीवका आकाशादिकॉस संबंध मात्र 
होवे है सो साहश्यरूप है. इति ॥ २२ ॥ 

अच०-तहां जीव वहुकारू साइश्यकों प्राप्त होकर अपरके साहश्यको 
प्राप्त होवे हे वा अल्पकाल रहे है ? जा संदेहसें कहे हँः--- 


नांतीचरण वशधात ॥ एस ॥ 
न । अतिचिरेण । विशेषात्‌ । इति प० । 


अथ-जीव अतिचिरेण नाम वहुकारू साइश्यको ग्राप्त नहीं होचे हैं 
किंतु अल्प अल्पकारू आकाशादिकोंके ठुल्य स्थित होकर वर्षाधाराद्वारा 
पृथिवीमें प्रवेश करे है, ' विशेषात्‌ ? यह तहां हेतु है. “ दुर्निष्प्रपतरं ! जा 
पूष श्रुतिमें ब्रीद्यादिकोंस जीवका निकरूना दुःखतर कहा हैं वातें आकाशा- 
दिकोंसें खुखसें निकले है यह प्रतीत होवे है यातें ब्रीहि आदिकोंमें चिरकाल 
स्थितिरूप जी बशपता तास आकाशादिकोंसे जअजवद्प कृपकारू साहश्यस 
स्थिति सिद्ध होवे है. इति ॥ १३ ॥ 


अन्याधिषिते पूवेबद्भिक्ापात्‌॥ २४ ॥ 
अन्याधिष्ठिते । प्रवेवत्‌। अभिरापात्‌ । इति प० । 
थे-पूर्व श्ुतिमें जीवनका जरीज्मादिरूपसें दिरूपसें जो जन्म कहा है सो सुख्य है वा 
अपर जीवॉकरके युक्त जे जीह्यादि तिनमें संदंधमान्न होवे है? जा संदेहसें कहे 
हैं. अन्य नाम अपर जीवॉकरके 'अधिछिते! नाम युक्त जे भीह्यादिक तिनमें 
अनुशयचान्‌ जीवोंका संसग मात्र होवे है. पूर्वचत्‌ लाम आकाशादिकोंमें यथा 
सं॑बंधमात्र होवे है तथा जीद्यादिकोंमें भी कर्मपरामशसें विनाही अवेश अमि- 
छाप नाम कथन किया. है यातें तहां तिनका संबंधसात्र होवे है. इति 0 २४ ॥ 


[ज० हे पा० श्सू०२७] भाषादीकासहितानि । १६३ 


अशुडमिति चेन्न शब्दात्‌ ॥ २५॥ 


पति 
५ अशुद्धमू । इति । चेत्‌ । न । शब्दात्‌ | इति प०। 
अर्थ-नत्ु ज्योतिष्ठोमादिक कर्मनमें पश्चुआदिहिंसा होवे है यातें ते कम 
अशुद्ध हैं अथांत्‌ पापके हेतु हें यातें तिनके करनेवाले जे अनुशयवान्‌ जीव 
तिनका त्रीह्यादिकोंमें दुःखाहुभवार्थ मुख्यही जन्म मानना चाहिये यह 
शंका कर तो “ज्दात! नाम विधिशास्त्रस हिंसाको धर्मरूप होनेसे असंगत 
- इति ॥ २५ ॥ 
3 2 
शसभमकगयांगाष्य ॥ २६ ॥ 
ही [&«प] 
रेत'भसिग्योगः । अथ | इति प०। 
अथ-अथो नाम ब्रीहिआदिक मावसें अनंतर श्ुतिमें रेतःसिग्योग 
कहा है. रेतसपद दीयवाचक है, तिसको जो सिंचन करे सो “ रेतःसिग्‌ 
कहिये, तिसका जो भाव सो रेतःसिग्योग कहिये, तथाहि श्रुति! । यो रेतः 
सिश्वाति तद्भूब! एव 'जवति इति' इसमें जो रेतसका सिद्चन कहा है सो 
अज्ुद्ययवानको मुख्य तो संभवे नहीं, इस काठमें तिसने प्रवेश किया है यातें 
ताको योवनत्वकी गप्ासिसें सुख नहीं किंतु तहां ताका संसगमात्र कहा 
चाहिये यातें त्रीद्यादिकोंमें संसगमात्रह्दी हैं. इति ॥ २६ ॥ 
च०-नतु अनुशयवानका सर्वमें संवंधसात्र अंगीकार कियेसे ताका 
मुख्यजन्म कहूंभी नहीं होवेगा, जा शंका कहे हैं: 


योनेः शरीरस ॥ २७॥ 

योनेः | शरीरम । इति प० । 

अशथे-योनिमें वीयेके प्रवेश हुएसे योनिस अधुशयवान्‌ जीवका अनुशयरूप 
कमफलके भोगके अथ्थ शरीर उपजे है, यह शास्त्र कहे हैं. 'रसणीयचरणा 

इत्यादि, यातें बराह्मणादियोनिमें अजुशयवानका मुख्य जन्म होवे है. इति। 


4०] 


इस गसनागमस-विवेकर्स जो बेराग्य उपजे है सो ज्ञानका साधन हे. इति 


तात्पयंम्‌ ॥ २७॥ 
इति शारीरकसत्रभावप्रकाशिकाभाषादीकायां 
दृतीयाध्यायस्य प्रथम+ पादः समाप्तः 


१६४ 


सह्ृया । 


7 ७०१ छ छा & ०८ छा ७ ४० 


बन्वसत्राणि 


[अ० ३ पा० रसू० १] 


हिती 
अथ हितीयपादप्रारम्भः । 
इस पादमे तत्त्वंपदनके अर्थत्ा शोधन करे हूं, आत्माकी स्वप्रकाशता 
सिद्धिमें स्वप्तको स्पष्ट साधनता हैं यातें प्रथम स्वमब्रिचार करेंगे. इस पादके 
एक अधिक चालीस सूत्र हें. तहां अष्ट अधिकरण हैं. जप गुण हंं. तथाहि-- 


अधिकरण । 


के ही के के के के के के के कक के 4 48 8 + कैककक कक 9 


गुण । 
न 
गु० 


असल. 
स्वप्नसत्यपृर्यपक्ष- 

स्व० 

मायामातन्रसिद्धान्त- 

मा० 

परस चन्धमुक्तिअज्ञान- 
देहसंवन्धईश्धरतिरोधान- 
सुषप्ति आत्मामें, 

चह्मसे उत्थान: 

सोई जीब उठे है; 

मूछा. 

निर्विशेषविचार. 

नि० 

मि० 


मि० 


50 50 3? 
9 9०0०9 


09 


०9 


2 57 5) 57 
09 


व 
श्यं 
७0 


नामरूपनिषेध- 
ना० 


[ज० सपा०्२सू० १] भाषादीकासहितानि । दण 





्श्छ ्‌ः शु० ना० 

प्‌ न- शु० ना० 

श्द न शु० ना० 

२७ न गु० ना० 

श्ध च- गु० ना० 

मर९्‌ न शु० ना० 

538 न गु० ना० 

३१ आ० के ब्लैतसिद्धिपूर्वपक्ष- 

श्र र्नः गु० तत्‌-निपेघसिद्धान्त- 

श्इ ने शु० त्‌० 

श्छ न गु० त्त० 

श्५ न शु० त० 

हे नः शु० तत० 

३७ न गु० त० 

झ््द् आ० न इश्वरसें कर्मफल- 

श्द्‌ -क- शु० ई० 

४० हु गु० कर्मसें फल जैमिनि- 

छ१ आ० 55. इंश्वरसें फलसिद्धांत, . 
००० न हज ह 
इति 


६54०... (पु | आप 
सन्ध्य खाष्टराह है ॥ १ ॥। 
सन्ध्ये । सृष्टि' । आह । हि । इति प०। 
अथ-“ न तत्र रथा न रथयोंगा न पन्थानोी भवान्ति अथ रथान 
रथयोगान्पथः झजते। न तत्न आनन्दा झुद॒३ परछुदो भवन्ति अधथ 
अननन्‍्दान छुद॒ प्सुद! रूजते स हि कता' जा बृहदारण्यक पष्ठ अध्याय- 
गत श्रुति सूत्रका विषयवाक्य है. अथे-तत्र (स्व्ममें) रथयोगा नाम अस्वादिक, 
आनंद ( सुखबविशेष ), मुद (पुत्रादिकाभनिमित्तहष ) सोई प्रमुद है यातें सो 
कर्ता है, इति। यथा घटादिक व्यावहारिक हैं तथा स्वप्नप्रप॑च व्यावहारिक है? वा 
यथा शुक्तिर्जतादि हैं तथा मायामात्र- है? यह तहां संदेह है. पूर्वपक्षमं यह अर्थ 


१६६ बद्मसृज्नाणि । [ज० ३ पा० २सू० 9] 


है जागत्‌ सुए॒प्तिकी जो संघिमें होवे सो संध्य कहिये है अर्थात्‌ स्वम्का- नाम 
संध्य है. तामें जो सृष्टि नाम गजादि सो व्यावहरिक हैं. न तत्न'! यह दच्त 
शखुति स्वप्नसष्टिको व्यावहारिकी आह नाम कहे है. इति ॥ १ ॥ 
निमोतार तथा चके एत्रादयश्व॥ २॥ 
निर्मातारम । तथा । च । एके । पुत्रादयः । च्‌। इति प०। 

अथ-एके नाम किसी शाखावाले स्वप्नमें तथा नाम जीवचत्‌ परमात्माको 
विपयोंके “निमोत्रारख! नाम रचनेवाला माने हंं. तथाहि-“थ गप सरुप्तेयु 
जाद्यति कार्म कार्म पुरुषों निर्मिमाणः तदेवम्‌ झुक तद अ्ह्य तदेवा- 
सतमुच्यते' जा कठश्रुति तहां प्रमाण है. अथ-नेत्रादिक करणोंके निच्यो- 
पार हुएसें तिस तिस अभिरूपितको रचताहुआ जागे है सो चुद्ध है, सोई ब्रह्म 
है, सोई अमृत कहलाता है. कामपदसे घुछ्धिदृत्ति और पुत्नादि विषयोंका 
गहण है. इति। यातें पुत्रादि स्वम्नप्रपंच सत्य है. ताका इंश्वरको कता होनेसे 
इत्ति॥ २॥ 

| दि सिद्धांतसूत- 
सायामात्र तु कालू्यनानांभ्वव्यक्तसरूपलात ॥ ३॥ 
मायामात्रम्‌ | तु। कार्त््येन | अनभिव्यक्तखरूपतात । 

इति प०। 

अथ-तु पूवपक्षनिषेधाथंक हे. स्वम्नमगजादिक कारत्स्थना नाम सब प्रका- 
रसे अनभिव्यक्त स्ररूप हैं अथात प्रकट नहीं यातें मायामात्र हैं. अथात्‌ छ- 
'क्तिरजतवत्‌ मिथ्या है. उक्त अनुमानमें उचित देशादिजन्यत्व उपाधि हैं, यातें 


सो असंगत हैं. ओर “क्ार्म कास पुरुषो नि्मिसाणः ” जा आुतिसें सी 
जीवही स्वश्नकता अंगीकार हें; बह्म नहीं, इति ॥ ३ ॥ 


अव०-ननु स्व॒म्तको मिथ्या मानेसे ताको शुभाझुभका सूचक नहीं हुआ 
चाहिये, जा शंकासे कहे हं/--- 


सूचकश्च हि शुतेराचक्षते च तहिदः ॥ ४॥ 


सूचकः | च्‌। हि। श्ुतेःआचक्षते । च | तत-विदः। इति। प० 

अथे-यदा कसर कास्येणु स्त्रियं खप्ते पहयति स सम्ुदधि ततन्र जा- 
मींयात्‌ खप्तनिद्शाने तस्सिन सखमनिद्ठाने ! जा छांदोउथ पँचम प्रपाठ- 
कगत अुतिसें खम्म झुभाशुभ सूचनका हेतु प्रतीत होवे है, यातें असत्यमी 


[ज० ३ पा०२ सू० ७] भाषाटीकासहितानि । १६७ 


स्वम्न सत्यत्वप्राध्तिका सूचक है. यथा असत्य रजत सत्य हर्पादिकोंका जनक है 
ओर “तत्‌-विद्‌ः” नास स्वप्ाध्यायवेत्तासी स्वप्तको शुभाशुभका सूचक  आ- 
चक्षते' नाम कहे हैं. इति । अथ-चदा कामअर्थ कर्मोमें स्लीको स्वम्में देखे 
तदा कमंफल सिद्ध होवेगा यह जाने, परंतु स्रीआदिक प्रशरत्त खमके देखेसें. 
इति॥ ४ ॥॥ - 


अव०-संकल्पसात्रसें जीव कतो नहीं यह कहे हैं।--- 
85 ्टः [0० सी.० से #७ शक. किक बन ! 4» अव ५ परी 
पराभिध्यानात्त तिरोहित॑ ततो ह्यस्य बन्धविपर्ययी ५ 
पराभिध्यानात्‌ । तु । तिरोहितम्‌ । ततः । हि। अस्य । 
वृन्धविपयंयों । इति प०। 
अथ-जीवका ईन्वरसें अमेद है, तौसी जीव प्रति ईश्वर सायाकरके तिरो- 
हित है अर्थात्‌ आच्छादित है; थातें जीवको संकव्पमात्रस कर्तापना संभवे 
नहीं. जीवका तिरोहितपत्ाा पर नाम परमात्माके अभिध्यानात ” नाम 
अभेदाभ्याससें प्रकट होवे हैं. “ततः ! नाम इंश्वरके अज्ञानसें ' अस्थ ” नाम 
जीवको कर्तृत्वादि वनन्‍्ध है, ताके ज्ञानसें विपयेय नाम मोक्ष प्राप्त होये है, यातें 
इश्वरकृपा बिना ईम्थर प्रकट होवे नहीं. इति ॥ ५ ॥ हे 
अव०-जीवके इंग्वरत्वतिरोंभावमें अपर हेतु कहें हें:-- , 
__. देहयोगाद् सोडपि॥ ६॥ 
देहयोगात्‌ । वा । सः | अपि । इति प०। 
अथ-जीवके इश्वसत्वका सो नाम तिरोभाव देहादिकोंके * योगात्‌ * नाम 
सम्बन्धसे है. यथा भस्मके सम्बन्धरसें अम्नि तिरोहित होवे है, तथा जीवका 


इश्वरत्व आच्छादित है. “ वा? पद इंन्वरत्व अभाव अंगीकारके निषेधार्थ, हैं; 
यातें स्व्॑त जागरतादिक मायामात्र हैं. आत्मा अवस्थात्रयसें रहित है. इति ॥६॥ 


तदमभावी नाडीए तच्छृतरात्मनि च ॥ ७॥ 
तदभावः । नाडीबु। तच्छुतेः । आत्मनि । च । इति पं०। 
अथे-- यन्न खुछ! खर्म न विजानाति आझ्ल तदा नाडीघु खुस्तो 


मधषति' इति। जा अवस्थामें बाह्य ईंद्रियां उपराम हुए सोचे है. सबे वृत्ति' 
सहित अंश्तकरण.रूथ होवे है. स्व॒मको जाने नहीं तदा नाडीसें सोवे है. यह 


१६८ ब्रह्मसृत्राणि । [अज० ३ पा० २ सू० ९] 


श्रुत्तिका अक्षरार्थ है। “य एप विज्ञानसयः पुरुषस्तेषां प्राणानां विज्ञा- 
नेन विज्ञानसादाय य एपोउन्तह्द्य। आकाइस्तस्मिन छीले ” जा बृह- 
दारण्यकके चतुर्थ अध्यायगत श्रुतिमें आत्मामें सुद्रुध्ि प्रतत होवे है. और 
तहांहीं आगे यह कहा हैः-तामि; प्रद्ययस॒प्य पुरीतति शेते स यथा 
छुमारो वा सहाराजो वा महात्रनाह्मणों वाउतिप्लीमानन्द्स्थ गत्वा 
हायीत एचमेच एप एतच्छेते! इति । इसमें पुरीततिबिषे सुषर्ति मान होवे 
है. इसमें संदेह हुएसें पूवपक्षमें विकल्प अंगीकार किये यह सिद्धांत है तत्‌ 
अभाव नाम स्वप्धका अभ्रावरूप जो सुषुप्ति सो नाड़ियोंसँ और आत्पमामं होने 
है. यातें सर्वेका समुच्चय अंगीकार है, विकल्‍प अंगीकार नहीं. नाडीपुरीतत्‌ 
अवेज्ष विना आत्मासें प्रवेश संभवे नहीं यातें नाडी और पुरीततर्म 
गौण और आत्मामें मुख्य म्रवेश अंगीकार है. 'ततः झआुले! नाम 
नाडी आदिकोंको सुषुप्तिका स्थान सुना है यातें उक्त व्यवस्था संभवे है. जो 
समुख्चय नहीं मानेंगे तो श्रुतिव्यवस्था नहीं वनेगी. इति ॥ ७ ॥ 


अतः प्रबोधोष्स्मात्‌ ॥ <॥ 
अतः | प्रबोधः । अस्मात्‌ । इति प०। 


अथ-“अतः/ नाम सुषुप्तिको परमात्मामं होनेसें 'अस्माद!॑ नाम पर- 
सात्मासें जीचके प्रवोध नाम उठनेका झुतिमें उपदेश किया है। प्रधोधकाले 
कस्मात्‌ जीवात्मानः सम्त्तिष्ठन्ति । परमात्सन; सकाशात्‌ उत्ति- 
छान्ति! जा श्रुति परमात्मासें प्रयोधको कहे है. जो आत्मासें अपरको सुप॒- 
घ्विका अवस्थान मानेंगे तो उक्त श्रुतिका बाघ होवेगा. इति । सुषुरसचिम मिथ्या- 
ज्ञानके अभावमात्रसें इंपत्‌ ब्रह्मम्राप्ति होवे है तो मूलाज्ञानके निवृत्त हुएसें 
सकल तह्मप्राप्ति अवश्य होवेगी. इति । सुडइस्तिवोधक श्रुतिका अर्थ-तामि/? 
नाम शरीरमें अनेक नाडी हैं तिनकरके “ प्रत्यवस्तत्य ” नाम रोकके 'पुरी- 
लेति! नाम नाड़ीमें सोचे है. यथा अतिबारू और महाराजा ओर विद्वान 


ब्राक्षण आतिप्तीस्‌” नाम दुःखनाशक आनंद अवस्थाको प्राप्त होकर सोंबे 
तथा यह सोबे है. इति ॥ ८ ॥ 


. ,. स एव कमांनुस्मृतिशब्दविधिम्यः ॥ ९॥ 
सः ) एवं । कमाजुस्ततिशब्दविधिम्यः । इति प० । 
अथे-जलूराशिमें एक बिंदु जल डालनेसे सो बिंदु घुनः निकले नहीं यातें 


[ ज० ३ -पॉ०-२ सू० -१० ] भांपाटीकासहितानि । १६९ 


परमांत्मोको सुएसिका स्थान कहिना असंगत है, जा पूर्वपक्षसें कहे हैं--जो' 
जीव सोधे है * सं! नाम सोई उठे है अपर नहीं; तहां येई पंच हेतु हैं. दो 
दिनमें होनेवाके कर्मको आंधा करके सोजाय तो उठकर आधेको करे है. यह 
कर्मरूप हेतु है ! जिस मेंने पूर्बले दिनमें काशीनाथको देखा था सो में अब 
सणिकंर्णिकामें स्थित हूँ जाविध प्रतिज्ञाका अहण अनुशव्दसें है, यह द्वितीय 
हेतु है २. स्मृति तृतीय हेतु हैः “स वा एव एतस्मसिन, सम्प्रसादे रत्वा 
घचरित्वा दृष्टा एव पुण्य च पाप च पुनः प्रतिन्याय पतिथोन्‍्या- 
द्रचति खप्ताथ एव स यक्तत्न किखित्‌ पहयतति अनन्वागतस्तेन 'भचति 
अखसंगो छाय॑ पुरुष:” जा बृहदारेण्यक षष्ठाध्याय तृतीय ब्राह्मणगत वावयका 
अहंँण शब्दपदसें है. श्रुतिअ्थ्ट-सो विज्ञानमय ज्योतिपुरुष सुषुधतिमें स्थित 
होकर शोकादिकोंसें रहित होवे है. स्वम्ममेँ रतिका और श्रमका अनुभव करके 
पुण्यपापके फलको देखके सुषुप्तिमें प्राप्त होने है. स्वमसें सुदप्तिका अचुभव 
करके जागरितसे स्वप्तको, तासे सुच्॒ध्तिको गमन करे है. सुषुप्तिसें स्वपश्नको वा 
जागरितको जो गमन करे है उसका प्रतिन्यायपदसें ग्रहण है. और प्रतियोनि 
नाम स्वमस्थानकों स्वम्॒वासते  आद्रवति ” नाम आगमन करे है. सो आत्मा 
स्वंप्तेमें जिस पुण्यपापफलको देखे है, तिस.देखनेसें ताका बंध नहीं होता. इति। 
यह चौथा हेतु है ४. ज्योतिष्ठोमादिका विधिसें महण है. जा पंचकारणसें जो 
सोवे है सोई उठे है जा निश्चित है, अन्यथा उक्त कारणोंका ब्राध . होवेगा- 
इति॥ ५९ ॥ - - न ४ 
- अव०-समूर्छाअचस्था सुषुस्िके- अंदर है! वा तासेँ भिन्न है? जा संदेहसें पू- 
वपक्षम खुदुसिके अंतर भहण कियेंसें यह सिद्धांतसूत्र है-- .. ' 
या 0.० न 

. मुग्धेष्ध॑सम्पत्तिः परिशेषात्‌ ॥ १०॥ 
, मुख । अंद्धेसम्पंत्तिः । परिशेषात्‌ । इति प०। ; 
अंथे-मूछामें ज्ञान होवे नहीं यातें सो जाग्मतू संबम्के अंतर नहीं, मूछामें प्राण 
और गरमी रहे है; यातें वह मरणके अंतर सह - मूर्छितके शरीरमें कंप, भयंकर 
चदन, निश्चक, उन्‍्मील़ित नेत्रादि प्रतीत होवे हैं; सुष॒सचिमें बेसे नहीं यातें सुपु- 
घिके अंदरभी मूर्छा नहीं- किंतु 'परिदोषात्‌ ! नाम उक्त . सर्वे अवस्थाबोंके 
अंदर नहीं होनेंसे मुग्धमें अंद्धघर्सोकी कर: “ नाम भापिरूप : माया 
है. सुष॒प्तिमें पस्विन्नवदनत्व, निमीछितनेत्रत्व, प्राणणममनागमन, वि- 
के व धर्म हैं तिनमें जे विशेष विज्ञानराहित्यादि अर्द्धधर्म 

ते मूछामें हैं याते अर्ूंधमेसंपत्ति मूछा अंगीकृत है- इति ॥-१० ॥ 

अहम, २९ 


१७० ब्रह्मसूत्राणि । [ अ० ३ पा०. ३ सू० १२] 


न स्थानतो5पि परस्योभयलिहछं सर्वत्र हि॥ ११ ॥ 
न। स्थानतः । अपि । परस्य । उभयलिड्भम्‌ । सर्वत्र । 
हि। इति प०। 

अधथ-अब तत्‌ पदार्थता शोधन करे हें-“सत्मसंकल्प आकाशात्मा 
सर्वकर्मी सर्वकासः स्ेगन्ध! स्वेरस! स्वेभिद्म अभ्यात्तोडवाक्य- 
नाद्र;” इस छांदोग्यके तृतीय प्रपाठकगत श्रुतिविषे श्रह्मकों सविशेष सुना हैं 
और तदक्षरंगार्मि ्राह्मणा अभिवद्न्ति अस्थूलमनण्चहखमदीधेम- 
लछोहितमस्तेहमचछायसतसोडवायवनाकाशमसहमर समगन्धसचछुष्क- 
समत्रोत्रमवागभनोते जस्कम्‌ अप्राणम्‌ अम्ुखम्‌ अमान्रम्‌ अनन्तरयाद्यम्‌ 
न त्तदक्षाति किचन न तद्श्लाति कश्वन” इन दृहदारण्यकके पंचम- 
अध्यायगत वाक्यनमें ब्रह्मको निर्विशेष कहा है. तहां उभयवाक्यके अ- 
झुसार ब्रह्म उभयस्वरूप है वा एक स्वरूप हैं? एकरूप मानेभी सविशेष हैं, 
वा निर्विशेष है ! यह संदेह है. पूवपक्षमें श्रुतिअनुसार उभयरूप अंगीकृत है 
तहां यह सिद्धांत है--परस्प' नाम ब्रह्मके उसमय लिंग” नाम दो रूप स्वतः 
संभवे नहीं; एक वस्तु एककालमें धर्मवान्‌ और धर्माभाववान्‌ होवे नहीं 
“स्थानतः नास उपाधिसेंभी ब्रह्मफो उभयरूपतायुक्त नहीं. अग्रिसंयोग मा- 
अ्से जरूका उष्ण स्वभाव होवे नहीं किंतु अक्म एकरूप है सोभी निर्विशेष है 
सबिशेष नहीं. 'हि! पद छेतुअथक है. 'सर्वेक्र! नाम “अस्थूछम इत्यादिक 
वचनोंमें सविशेषका. निषेध करके निर्विशषका उपदेश किया है यातें निर्विशेष 
एकरूप अह्म है. इति। श्रुतिअथे-सर्व जगत्‌ जिसकरके व्याप्त होवे सो 'अ- 
भ्याक्त' कहिये। वाक्यरहित अवाकी अंगीकृत है । ईश्वर नित्य दप्त है, थातें 
अनादर है अथात संश्मरहित है, इति । हे गार्गि | अक्षरसें सबे ओतग्रोत हैं 
2 कहे हैं सो अस्थूलसें. भिन्न -है इसीतरह आगे जानना चाहिये: 
इति॥ ११ ॥ 


मेदादिति चेन्न. प्रयकमतहचनात्‌ ॥ १२॥ 
भेदात्‌ । इति । चेत्‌ । न । प्रेकम | अतत-वचनात्‌ । 
इति प०। 


धथ-ननु किसी विद्यांमें रद्यके चार पाद हैं; किसी विद्यामें पोडशकला- 
वान्‌ कहा है; किसी विद्यार्मे त्ैकोक्य--शरीरवान्‌ कहा है; यातें 'मेदात 


[अ० ३ पा० २ सू० १६ ] भाषाटीकासहितानि । १७१ 


नाम विद्याका भेद होनेसें तक्षको निर्विशेष कहिना संभवे नहीं, जा शंकासें 
फहे हैं ध्रद्येकम! नाम उपाधि उपाधिमें 'अतदचनात' नास परन्रह्मका असेद 
सुना है, थातें शंका असंगत है. इति॥ १२ ॥ 


अपि चेवमेके ॥ १३ ॥ 
अपि | च। एवम) एके । इति प०। 
अथ-अपि च नाम किंच कोई शाखावान्‌ एवम! नाम भेदकी निंदा क- 
रके ब्रह्मका अभेदही कहे हैं. तथाहि-सनसेचेद्साप्तव्य नेह नाना5स्ति 
किचन जा कठवाक्यमें कठवान्‌ अभेदही कहे हें. अह्म शुद्दूमनकरके प्राप्त 
होनेयोग्य है, तिसके प्राप्तहुए ब्रह्म तासें भिन्न रंचक - नहीं, यह श्रुति-अक्ष- 
राथ है. इति ॥ १३॥ 


अच०-नलु सगुणनिगुणवोधक उभयश्वुतिके विद्यमान होते केवल निगु- 
णमें हठ केसे हे? जा झ्ंकासें कहे हैं- 


अरूपवदेव हि तत्प्रधानवात ॥ १४॥ 


अरूपवत्‌ । एवं | हि। तत्रधानत्वात्‌ | इति पृ० 

अथ-अस्थूलम! 'अनणु! इत्यादि निपेधरूप शास्त्र 'तत नाम निर्शुण 
बहामें प्रधान है यातें 'अरूपवत्‌” नाम रूपादिकोंसें रहित निर्विशेषरूपही 
ब्रह्म है; सविशेष नहीं, इति ॥ १४ ॥ 

अथघ०-ननु सगुणवोधक वाक्यनकी क्या गति होवेगी ? जा हंकासे कहे हें- 

प्रकाशवचावेयथ्योत्‌ ॥ १५॥ 
प्रकाशवत्‌ । च | अवेयथ्यात्‌ । इति प० । 

अथ-यथा सूर्यादि प्रकाश वक्र ऋज्ञु काष्ठादि उपाधिसें चक्रकी नाई व ऋ- 

जुकी नाई होबे है तथा भरह्मभी पथिवीआदिक उपाधिके वशस तत्‌ तत्‌ उपा- 


धिकी नाई होवे है; सो उपाधि-आकारताही सशुणवोधक चाक्यनकी गति है 
यातें ताको 'अवैयथ्यात' नाम अनर्थकता नहीं. इति ॥ १५ ॥ 


आह च तन्मात्रमत्‌ ॥ ३१६॥... 
आह | व्‌ | तत-मात्रम्‌ । इति पव्ल 


श्ज२्‌ - ब्रह्मतुन्नाणि | . [अ०-३पा० रे सू० है४ ] 


- अर्थ-स यथा सैन्धवधनोडनन्तरो<्वाद्यः कृत्खों रसघधन एव वा , 
अरे अयमात्मा5नन्तरो5वाह्यः क्ुत्सः प्रज्ञानथन एव! जा बृहदारण्यक- 
के पष्ठ अध्यायगत श्रुति 'तन्मान्नम चाम चेतन्य एकरस निर्विशेषरूपसें अह्म- 
को 'आहः' नाम कहे है. श्रुतिअथ-यथा सैन्धवघन नाम लूवणमूर्तिविशेष 
अंतरवाह्मसँ विलक्षण रसरहित सर्व लषणरूपही ठोकमें प्रसिद्ध है, तथा यह 
आत्मा अंदरबाहिरसें भेदरहित सर्वस्पप्रका्श चैतन्य एकरूप स्थित है 
इति ॥ १६ ॥ 


दर्शयति चांथोपि स्मर्यते ॥ १७॥ . . 
दशयति । च्‌ । अथो । अपि। स्मयते | इंति प०) 


अथ-“अथात आदेशो नेति नेति” इत्यादि श्रुति निषेधमुखसें ब्रह्मको 
“दद्योयति' नाम दिखावे है. पंचभूत-उत्पत्ति-अनंतर अधपदका अर्थ हैं. आ- 
देशनाम उपदेशका है. सूत्रम जो अथपद है तिसका तथा अर्थ है. तथा नाम 
निषेधमुखकरके ज्रह्मका 'स्मरथेत्रे! नाम स्मरण भी किया हैं. 'ज्ञिय॑ यत्‌ तत्‌ 
प्रवध्यामि यउज्ञात्वाइ्मृतमश्लुत्ते” इत्यादिक स्मृतिमें स्मरण किया है; 
थातें ब्रह्म निर्विशेष है. इति ॥ १७ ॥ 


अत एव चोपमासूर्यकादिवत्‌ ॥ १८॥ 


अतः । एवं । च । उपमा । सूर्यकादिवत्‌ । इति प०। . 


अधथे-उक्तविधिसें अह्मको एक निर्विशेष सिद्ध किया है, “अतः” नाम 
निर्विशेष होनेसें औपाधिक सविशेषको सहण करके “जलूखूर्यादिवत्‌ उप- 
सा नाम दृष्टांत अहण किया है. यथा जलमें 'खयेक:” नाम सूर्यका अतिविंब 
होवे है, आदिपदसे यथा चंद्रप्रतिबिंब होवे है तथा एकही आत्मा उपाधिसें 
अनेकरूप होवे है. तथाहि श्रुतिः--/“घथा हि अर्थ ज्योतिरात्मा विचखा- 
न अपो भिन्ना वहुचैकोडलुगच्छन्‌ । उपाधिना क्रियते भेद्रूपों देवः 
क्षेल्रेष्वेवसजोडयमात्मा इत्ति। अथ-यथा ज्योतिःस्वभाव सूर्य एकभी तत्‌ 
तत्‌ उपाधिकरके अनेकप्रकारका होवे है, तथा. यह प्रकाशस्वरूप, कूटरथ, 
नित्य; एकरूप आत्मा भिन्न भिन्न शरीरोंमें प्रक्‍स्‍तहुआ उपाधिकरके भेदरूप 
होवे है. इति। उक्त-इृशांतसेंभी जहा निर्विशिषरूप है. इति ॥ १८ ॥ 


(अ० हे पा० २ सू०२१] भाषादीकासदहितानि । १७३ 
! शंकासून्र । हू अप. 
अम्बुवदग्गनहणात्त न॒ तथावम््‌ ॥ १९ ॥ 
अम्बुवत्‌ । अग्रहणात्‌ । तु। न। तथालम्‌ । इति प०। 
कप अथ-यथा जर-सूर्यादि मूर्तपदाथोसें मिन्न है और दूरदेशगत है सो प्रति- 
विंवकी उपाधिस प्रतीत होवे है, और आत्मा व्यापक हे यातें “ अम्बुब॒तः 
नाम जलवबत्‌ आत्माकी उपाधि आत्मासें दूरदेशगत 'अग्रहणात्त नाम अहेण 
होवे नहीं; यातें 'तथात्वम्र! नाम सूर्यादितुल्यता आत्माको संभवे नहीं. इति१६ 
| उत्तरसूत्र। ... ... हा 
02382 मांवाहुमय ; 
उडिहासभाक्वमन्तर्मावाहुमय- 
.. सामञस्यादिवम्‌ ॥ २० ॥ 
वृद्धिहासभाक्लम्‌ । अन्तर्भावात्‌ । उभयसाम- 
झस्यात्‌ । एवम्‌ । इतिप०। 
अथ-यथा सूर्यका जरूके अंद्र जो प्रतिबिंव तामें जल-उपाधिधर्म चडि- 
हासादि “माक्त्वम नास गौण हैं, बासव नहीं; एचमस! नाम तथा अविकारी 
परमात्माका जो देहादि-उपाधिके विपे अंतर्भाव तासें देहगत दृद्धिहासादिक 
आत्मामें गौण हैं, चासतव नहीं; इतने अंशर्मं डमय' नाम दृष्टांत दाष्शत उभ- 
यही ' सामझ्स्यात्‌ ! नाम समीचीन हैं यातें उक्त शंका असंगत है. सूयौदि 
दृष्टांतकी सर्वअंशमें तुल्यता संभवे नहीं. सर्वअंशमें तुल्यता मानें तो दृष्टांतः 
भाचर्भग होगा. इति ॥ २० ॥ 5 हर 


दर्शनाच ॥ २१.॥ 
दर्शनात्‌ | च.। इति प०। “ 


अधे-परबह्मका प्रतिविंवरुपसेंही देहअंतर वेश “दंदनात! नाम अ्र॒तिमिं 
देखा है. तथाहि--पुरश्नक्ते द्विपद्‌: पुरश्चककरे वर 0. पुर) स पक्षी 
भूत्वा पुरः पुरुष आविदशादिति ? अथे-परमेश्वरने भू लोकनको 
रुचकर दविपदवान्‌ शरीर उत्पन्न किये और .चारप्रदवान्‌ शरीर रंचें. सो इम्वर 


श्डई ) अंझ्सूत्राणि । [ज० ३ मा० २ सू० २३ ] 


पूर्व लिंगशरीर होकर दारीरोंमें प्रवेश करताभया. इति। यातें निर्विशेष चेतन्य 
एकरस बह्म है. इति ॥ २१ ॥ ह 


अच०-बृहदारण्यकके चतुर्थ अध्यायमें यह कहा है-द्वि चाव त्रह्मणों 
. रूपे खूर्त चैयासूर्स च यह कहकर अंतर्मे यह कहा है-अथात आदेशों 
नेति नति नाहिे एतस्मात्‌ इति न इति अन्यत्‌ परम अस्ति अथ नाम- 
थेय॑ सत्यस्प सत्यमिति प्ाणा वे सर्त्य तेषामेष ,सर्म न इति' इति। 
तहां 'नेति नेति! जा बाक्‍यसे प्रप॑च ब्रह्म उसयका निषेध अंगीकृत हैं? वा 
अपचका निषेध है ! वा अद्मयका निषेध है ? यह संदेह है. श्रपंच प्रत्यक्ष सिद्ध 
है, यातें ताका निषेध तो संभवे नहीं किंतु अक्मका निषेध तहां अंगीकृत है; 
यह पूर्वपक्ष है; तहां यह उत्तरका सूत्र है- 


०ण्बद,. 5 3 «सा भू $ 
प्रकृतेतावत्तं हि प्रतिषेधति ततो ब्रवीति च भ्रूयः २२ 

प्रकृतेतावत्तम्‌ । हि। प्रतिपेधषति । ततः | 

*. ब्रवीति। च। भूयः | इति प०। 
अथ-हअह्के जे दो सूतामूर्त रूप तेही 'प्रक्ृर्ता नाम असंगर्म 'एलावच्त्वस 

नाम परिच्छिन्नखूपसे प्राप्त हें. तिन उसयरूपनकाही 'नेति नेति” श्रुति अति- 
घेधति' नाम निषेध करे है. वाक्यमें जो “ इति * पद है सो प्रसंगर्म प्राप्तका 
स्मरण करावे है; अहम प्रसंगमें प्रधान नहीं यातें श्रुत्ति अह्मका निषेध नहीं करे 
है. 'ततश नाम प्रपंचनिषेधस अनंतर 'सूथः” नाम पुनः श्रुति त्रवीति' नाम 
कहे है. तथाहि-- न हि एतस्मात्‌ इति न इति अन्यत्‌ परम अस्ति 
इति! इसका यह अर्थ है निति नेति” जा वाक्यकरके उपदेश किया जो 
अहा एसस्मात! नाम तिस अहायसे “अन्यत' नाम भिन्न रंचक नहीं; किंतु 
अह्ही पर वस्तु है. इति। उक्त वाक्‍्यार्थस निति नेति! वाक्य अह्मका निषेध 
नहीं करे है, यह निश्चित है, इति ॥ २२॥: 


अच०-ननु बक्ककी उपरूब्धि कैसे नहीं होती? जा हशंकासे कहे हैं:- 
775 - : तदव्यक्तमाह हि॥ रश१॥ .. 
-,.५  :-तैत। अद्यक्तम्‌ | आई। हि ।इति प०। 
::. अथे-*तत्‌! नाम अह्म-अव्यक्त है अर्थात्‌ श्ुतिभिन्न प्रमाणका- अविप्य है- 


[ ज० ३ पा० श सू० २६ ] भाषाटीकासहितानि । १७५ 


निव-चाचा न मनसा भाएछुं दाक्यों न चक्षुषा' जा -कठवयाक्य अपरधप़- 
साणका अविषय आह!” नाम कहे हे; यातें महणके योग्य नहीं, इति ॥२झा 

अव०-जो सर्वदा महण नहीं होवेगा तो मोक्ष नहीं होवेगी जा शंंकाको 
निषेध करे हेंः- 


आपि सराधन प्रयक्षाउमानामभ्याम्‌ ॥ २०॥ 


अपि | संराधने । प्रलक्षान॒मानाभ्याम्‌ । इति प०। 

अभथ्र-इस आत्माको 'सेराधने' नाम समाधि-अवस्थामैं-कृतार्थ योगीजन 
देखे हैं; यह प्रत्यक्ष! नाम श्ुति और “अनुमान” नाम स्मृतिसें प्रतीत होवे 
हैं. अपिशव्दस प्रत्यक्षकरकेभी विश्वासके योग्य है. तहां कठचतुर्थवल्लीगत यह 
श्रुति हे-पराश्वि खानि व्यत्रणत्‌ खथस्भृूस्तस्मात्पराड पश्यति ना- 
न्तरात्मन | कश्वचित्‌ धीरः प्रत्मगात्मानम्‌ ऐक्षत आधचृत्तचश्ुरमृतत्व- 
मिच्छन” इति | अथ-परमात्माने इन्द्रियोंको अनात्मविपयक रचा है; यातें 
इन्द्रियां चाह्मही देखे हैं, अन्तरात्माको नहीं देखे हैं. कोई विधेकी जितेन्द्रिय 
मोक्ष-इच्छा करता हुआ प्रत्यकू आत्माको समाधि-अवस्थामें देखे है. इति। 
स्मृतिः-थ विनिद्रा जितम्वासाः सनन्‍्तुष्ठाः संयतेन्द्रियाः। ज्योति 
पदयन्ति युझ्षानांस्तस्मे थोगात्मने नमः इति॥ २४॥ 

अजब०-ननु जीव इश्वरको ध्याता व ध्येयरूप माननेसें भेद सिद्ध होवेगा, 
जा शंकाका उत्तर-- 
प्रकाशादिवचावेशेष्य॑ प्रकाशश्र कर्मण्यभ्यासात्‌ २५ 

प्रकाशादिवत्‌ । च.। अवैशेष्यंग्‌ | प्रकाशः । च। कमणि | 

अभ्यासात्‌ । इति प०। 
श्ै-यथा सूर्यका प्रकाश अंग्रुल्यादि उपाधिरूप कममें मिन्नकी नांइ और 
वक्तकी नांई भान होते है, तो भी वासतवर्से एकरूप है, तथा प्रकाश: नाम 
आत्माभी ज्ञान ध्यानादि कर्मरूप उपाधिमें मिन्नकी नांई भान होवे है, परंतु 
वासवसे “अवैश्येप्पम! नाम एकरूप है. अभ्यासात्‌! नाम 'तत्त्वमसि' जा 
अभेदके अभ्याससें उक्त अर्थही समीचीन है. इति ॥ २५ ॥ 
अतोश्नन्तेन तथाहि लिड्वम॥ २६॥ 
अतः । अनन्तेन । तथाहि । लिज्लम । इंति प० । 


श्ज्द् » “:- अहासूत्राणि । [ ञ० ३ या० २ सू० ३० ] 


जअधै-पअत/ नाम :भेदको औपाधिक होनेसें ज्ञानस भेदके निदृत्त हुएपर 
जीव अनन्‍तेन', नाम परमात्मासे अभ्ेदको धास होवे है. 'तथाहि लिडझम 
न्ोम,उक्त अर्थवोधके खुति अनेक हैं. तथाहिं-“न. तस्य घराणा उत्कासन्ति 
ब्रह्मेव सन्‌ अद्याप्येति” यह बृहृदारण्यकके सप्तमाध्यायगत श्रुति उक्त 
अथैका वोधक लिंग है. इति ॥.२६ ॥ 


अच०-स्वसतबुद्धि-अर्थ भेदासेद--पक्ष कहे हैं-- 


'उम्यव्यपदेशात्तहिकृण्डलवृत्‌ ॥ २७ ॥ 

उभयब्यपदेशात्‌ । तु । अहिकुण्डलवत्‌ । इति प्‌०। 
आर्थ-/ उमय * नाम ध्याताध्येयरूपसें भेदामेदकों श्रुति ' व्यपदेशात 
नाम कहे है, यातें जीवइन्धरका भेदानेद है. यथा अहिकुंडरूका भेदाभेद हैं, 


जहित्वधर्मस अभेद है, कुंडलत्वघधमस भेद है, तथा जीवडइश्वरका भेदाभेद है. 
ठु ? सिंद्धांत--विलक्षणताका वोधक है. इति ॥ २७॥ 


अव०-धर्मस्ेदसें भेदाभेद कहकर एकधर्मावच्छेदसे भेदाभेद कहे हैं-- 
 अ्रकाशाश्रयवहद्य तेजस्वात्‌ ॥ २८ ॥ 


प्रकाशा श्रयवत्‌ । वा । तेजस्लात्‌ । इति प०। 


अथ-यथा सूयका प्रकाश और तत-आश्रय जो सूर्य ता उमयका अत्यंत 
भेद.नहीं; तिज़स्त्वात! नाम यथा तेजस्त्वधर्म प्रकाशमें है, तथा सूचमें है; 
यातें तेज॑स्वको उभयमें नतुल्य होनेसें तिनका भेद नहीं, तथापि भिन्न भिन्न 
प्रतीत. होवे हैं; तथा जीव ईम्वरकाभी सेदाभेद है. इति ॥ २८॥ 
अचब०-सिद्धांत कहे हेँ--- 


पूवेवद्या ॥ २९ ॥ 
पूबेवत्‌ । वा। इति प० । 


अथ-पूव जो ओऔपाधिकभेद ओर वासव अमेद कहा है, सोई सिद्धांत 
अंगीकृत है. इति ॥ २९ ॥ 


प्रतिषेधाच् ॥ ३० ॥ 
प्रतिषेघात्‌ । च । इति प०-।. 


[अ० ३ -पा०२-सू० ३२] माषाटीकाप्तहितानि । श्छ्छ' 


अर्थ-नानन्‍्योड्तो5स्ति द्र्टा/ इत्यादिक श्रुति परमात्मासें भिन्न चेतनका 
प्रतिषेधात' नाम निषेध करे है और “नेति नेति” इत्यादिक श्रुति प्रपंचका 
निषेध करे है, यातें जह्म अद्वितीय है, यह सिद्धांत है; यातें परमात्मा निर्विशेष 
, है; इतिं सिद्धमू ॥ ३० ॥ ५ 5 8, ५* जय 

०६.  , . पूृवपक्षसूत्रम।' 8 
| पे तृल्म भेद5 वि प है 

परमतः सेतृन्मानसम्बन्धभेदव्यपदेशेम्यः ॥ ३१ ॥ 

परम्‌ । अतः | सेतून्मानसम्बन्धभेदव्यपदेशेभ्यः | इति प०। 

अथे-अहसे भिन्न घस्तु है वा नहीं जा संदेहसें पूर्वपक्षी कहें है-अतः नाम 
ब्रह्मसें परम” नाम भिन्न वस्तु है. तथाहि-'अथ य आत्मा स सेतुर्विध्वाति- 
रेषां लोकानामसम्भेदाय' जा छांदोग्यश्वुतिमें ब्रह्मको सेतु कहा. है यातें यह - 
अनुमान है कि, अहम सह्दितीय है, सेतु होनेसें “ रामसेतुचत्‌ ” इति। “ब्रह्म 
चतुष्पात” जा अतिमें उन्‍्मान कहा है. 'इतना यह है! इस परि- 
चिछज्न कथनका “उनमान' पदसें अहण है. चारों दिशा एक पाद है १;.पू-. 
थिवी, अंतरिक्ष, सर, समुद्र ये चारों द्वितीय पाद है ४ अश्ि, सूर्य, 
चंद्रमा, विद्युत्‌ ये चारों ठतीय पाद है ३; चक्ष,' ओज, बाक़ मन; ये. 
चारों चतुर्थ पाद है ४; उपासनाके अर्थ ये ब्रह्मके पाद कहे हें. “ खुघुघौ. 
प्राश्ेनात्सना शारीरः सम्परिष्वक्तः ” इत्यादि झ्ुतिमें सम्बन्ध कथन 
किया है. आदित्यमैं ईश्वर॒क़ा उपदेश ,करके तिससें भिन्न नेत्रोंमें उपदेश 
किया है यातें सेठु ९, उन्‍्मान २, संबंध ३, और भेद ४, जा चार हेतुसें बह 
सद्वितीय है. इति॥ ३१॥ ..! *. ; $ 

* - सिद्धान्तः। 


सामान्यात्तु ॥ ३१२ ॥ 


सामान्यात्‌ | तु । ईति प०। 
अथै-तु! पूर्वपक्षनिषेधक है. स्त्तिका काध्रचनाविशेषमें सेतुश्ंद रूढ 
है, तत-रूप सेतु अक्मको कहना संभवे नहीं किंतु यथा सेठ जलका व्यवस्थापक 
है तथा अह्ममी सकछ जगत-मर्यादाका व्यव्रस्थापकः है यातें असिद्ध सेतुके 
'सामान्यात नाम तुल्य सेठ कथन किया है; यातें सेतुदोप .नहीं.. इति.३२ 
ब्ह्चन्स३े. , 


१७८ 'अक्षसूत्राणि [अज० रे पा० २ सू० ३६ ] 


बुच्यर्थः पादवत्‌ ॥ ३३ ॥ 
बुच्यथः | पादवत्‌ । इति प०। 
अधथे- अह्य चतुष्पात्‌! इत्यादि श्रुतिमें पादकथन मुख्य नहीं किंतु “ बुद्धि 
नाम उपासनाके अथे है. यथा अह्मकी प्रतीक जो मन ताके वाकू, घ्ाण, चक्ष, 
ओज्र ये चार उपासना-अर्थ पाद कहे हैं तत-पादवत्‌ ब्रह्मके पाद कहे हैं. इति ३३ 


स्थानविशेषागकाशादिवत्‌ ॥ ३४ ॥ 


स्थानविशेषात्‌ । प्रकाशादिवत्‌ । इति प०। 

अथे-सुष्तिमें अह्मसें जीवका जो सम्बन्ध है सो घटपटकें सम्बन्धंसमान 
नहीं; किंतु “स्थानविशेषात”ः नास चबुद्धिआदिके उपाधिराहित्यसें है. 
विशेष विज्ञान उपाधिके रथ हुएपर रहता नहीं, यातें अभिव्यक्त उपाधिकरके 
जो भेद सो रहता नहीं; यातें ऋद्यासें जीवका सुष॒धिमें सम्बन्ध कहा जाता है; 
और आदित्यका जो पुरुषसें भेद है सोभी नेत्रादित्यरूप स्थानविशेषकी अपे- 
क्षासें है. * प्रकाद्ादिवत्‌ ! नाम यथा सूर्यका अकाश अंगुलियोगसे घटादि- 
डपाधिविशेषकरके असम्बद्ध इध भिन्न इब भान होवे है, उपाधिके दूर हुए 
सम्बद्ध अभिन्न भान होवे है, "आदि! पदसें आकाशका अ्रहण है, तथा ब्रह्म 
भान होवे है, यातें अह्मसें जीवका सम्बन्ध और भेद औपाधिक है, स्वाभा- 
विक नहीं. इति ॥ २४ ॥ 


उपप्त्तेश्व ॥ ३५॥ 
उपपत्तेः । च । इति प० । 
अर्थ-किंच परमात्मासें जो जीवका सम्बन्ध है सो झुख्य नहीं किंतु “ ख- 
सपीतो 'मवति !्जा छांदोग्यके पष्ठ भ्रपाठकगत श्रुति स्व॒रूपकोही सम्बन्ध 
कहे है. स्वरूप सवेदा बना रहे है यातें तहां गौणसम्बन्ध है, तथा मेदभी 
मुख्य नहीं, यह अनेक श्रुति कहे हैं. इति ॥ ३५॥ ' 
अव०-अद्वितीयसाधक अपर हेतु कहे हैं-- 
तथाअ्न्यप्रतिषेधात्‌ ॥ ३६ ४ 
. तथा। अन्यप्रतिषेघात्‌। इति प०। 
अथ-यथा सेतुआदिक हेतुनसें अहासें सिनत्न वस्तु सिद्ध हुआ नहीं तथा 


(अ० ६ पा० २ सू० ३९ ] भाषाटीकासहितानि । १७९ 


अधथातो5हंकारादेश एवाहम्‌ एवाभस्तात्‌ अहम उपरिष्ठात्‌ झहं थ- 
खात्‌ अहं पुरस्तात्‌ अहं दक्षिणतः अहम्‌ उत्तरतः अहम एचेद॑ सर्व 
इति। इस छांदोग्यके सप्तम प्रपाठकर्म आत्मासें भिन्न सबेका निषेध किया 
हैं; यातें ब्रह्म अद्वितीयस्तरूप है. इति ॥ ३६ ॥ 

अव०-ननु जो त्रह्म अद्वितीय है तो ताको सर्वगत कहिना असंगत है, 
जा शंकासें कहे हैं--- 
अनेन सर्वग्हच्ारएप्शब्दादिभ्यः ॥ ३७ ॥ 
अनेन । सर्वेगतत्नम्‌ । आयामशब्दादिश्यः । इंति प०। 
अथे-* अनेन * नाम सेतुआदिकोंके निपेघसें और अपरवर्स्तुके निपेधर्स 
४ सर्वंगतत्वम्‌” नाम त्रिधापरिच्छेदशल्यत्व सिद्ध हुआ है. तहां 'आयासत्ी- 
ब्दादिभ्यः यह देतु है. आयाम पद व्यासिवाचक है. “आकाहंवर्त सब्वे- 
गतश्र नित्य! ” इत्यादि श्रुतिका शब्दपदसें महण है. “ नित्यः सर्वंगतः 
स्थाणुः ” इत्यादि स्वृतिका आदिपदसें ग्रहण है; यातें अद्वितीय ऋहममें अवि- 
थक सर्वको महण करके श्रुतिस्द्रतिसं सर्वगतत्व-सिद्धि संभवे है, इति॥३७॥ 
अव०-ननु अरक्षको निर्मुण माननेसें अक्म कर्मफलदाता नहीं सिद्ध हो- 
वेगा ? जा शंकाका उत्तर कहे हैं--- 
फलमत उपपत्तेः ॥ ३८ ॥ 
फूलम्‌ । अतः । उपंपत्तेः | इति पं०। 
अधै-जीवको कर्मसें फरू होवे है वा ईश्वरसें होवे है? जा संदेंहसें सिद्धांत 
कहे हैं-“अतः” नाम इस परंमात्मासेही सर्वको 'फलम नाम सुखंदुशखांदिक 
होवे हैं, कर्मो्से नहीं- कर्म जड हैं, तासें फल संभवे नहीं; यातें ईः्वरंकोही फल- 
दातत्व 'डपपत्ते!” नाम संभवे है, यातें सोई फ़रूदाता है. इंति ॥ ३८ ॥ 
अतत्वाच ॥ २९ 


श्रुतत्वात्‌ । च | इति प० 4 
अपै-* स्त था एप महानज आत्मा अन्नादों बछुदेनों विन्दते 


रशट० - “- अललसूज्राणि 4. [ अ०' हे पा6 ३ सू०] 
'चेखुं थ एंव: चेद”' जा क्वददारण्यकके पह्ाध्यायगत वाक्‍्यमें इश्वरकोही फ- 
लका हेतु सुना है; यातें इश्वरही कर्मफलदाता है. इति ॥ ३९ ॥ 
8५८ [5 " पूर्वपक्षसूच्नमू । , 
4 जेरमि | आप नेर ह 5 ५ 
घरमे रत एवं ॥ ४०॥ 
धर्मम्‌ | जैमिनिः । अतः । एवं । इति पे०। 
अथे-अंतिसें और युक्तिसें यथा ईश्वरको फलद्वाता माना है, तथा. अतः! 
नाम अति और युक्तिसे धर्मको फलदाता जैमिनि आचार्य माने हैं. तथाहि 
“खगेकामो यजेत” इस विधिका विषय जो यज्ञ तांकों स्वर्गसांधनता सुनी 
है. ताके निर्वाहार्थ श्रुतिप्रमाणसैं यज्ञकी उत्तरअवस्थारूप 30.38 कल्पी 
चाहिये; यातें यागादि धर्मही फछदाता हैं, और ईम्वर तर्बमें साधारण है, 
थातें तको फलदात्त्व संभवे नहीं, इति ॥ ४० ॥ - | 
हर पल हे * बे उत्तरसूच्रम्‌ । 
7 पूर्व हि हेतुत्वव्यपदे विद. पे ५ जे 
/ : इन तु बादरायणो हेतुलवव्यपदेशात्‌ ॥ ४१ ॥ 
- पूवेम। तु । बादरायणः । हेतुत्वव्यपदेशात्‌ । इति प०। 
अथे-बाद्रायण आचार्य * पूर्वम नाम्र' पूर्वउक्त ईश्वरकोही फलदाता 
माने हैं:-* तु ? उक्त शंकानिपेधार्थ है. “ एब एच साधु कमे कारयति। 
अन्नादो चछुदानः”।| इत्यादिक श्रुति और “रूसते च ततः कामान मयैव 
विहितान्‌ हितान” इत्यादिक स्मृति परमेश्वरकोही घर्माधर्मफलका 'हेतुल' 
गाम कारण “व्यपदेशात्‌'. नाम कथनः करे हैं; यातें तत्तत्कर्मसापेक्ष परमा- 
त्मासेंही सर्वफ़॒लप्रासि.होवे है. इति सिद्धम्‌ ॥ ४१॥ " 


हर इ्ति शारीरकसूत्रभाव॑प्रकाशिकाभाषाटीकायां वर्तीवाधिविल्य 
/ « द्वितीयः पादः समाप्त ॥ २ ॥ ओरासाय नमोनमः ॥ी ' * 
अथ तृतीयपादप्रारम्भः । 


पूर्वपादमँ वाक्याबज्ञानका उपयोगी तस्वंपदार्थशोधन किया है. इस 
'पादसे वाक्‍्यांर्थ:निरणय करें हैं. इस पादके-पदट्‌ अधिक साठ सूंज हैं. तहां पद 





[अठ० ३ पा० ३सू० १] भाषाटीकासहितानि । १८६१ 


अधिक तीस अधिकरण हैं, तीस सूत्र शुणरूप हैं. अधिकरणरूप सन्नोंके 
और गुणरूप सूत्रोंके देखनेका प्रकार यह है. तथाहि- 


सड्डथा। अधिकरण। ग्ुण। पअसज्ू, 

१ अ० + उपासना-अभेद- 
२ न शु० अपि-अभेद- 
> - के शु० शिरोत्रतविचार- 
छ के शु० निर्मुणविद्या एक. 
पर ' आ० न समान-उपासना-गुण-उपसंहार- 
दर आ० न प्राणविद्या्भेद- 

७ न शु० प्राणविद्या्ेद- 
& न शु० बि० 

९, आ० के उद्दीधविचार- 
१० .. _अ० नः शुण-उपसंहार- 
११ आ०. ++ आनन्दादिगुण-उपसंहार- 
श्र के शु० प्रियादिनिपेध. 
श्इ.... + गु० आ० उ० 

श्छ आ० न वाक्य-एकसिद्धि- 
श्ज्‌ न शु० चा० 

37 आ० +े आत्मबोधता«» 

१७ ने - शु० आ० 

श्८ .. अ० का... जलवासविधान- 
१९ आ० न शुण-उपसंहार« 
२० आ० नः पूर्वपक्ष- 

२१ न+ शु० नामव्यवस्था- 
श्श न शु० उपसंहारनिषेध- 
श्झ्‌ , » “आं०' न सम्भूति-उपसंहार- 
२छ . आठ न उपसंहारनिषेधे- 
शणू ४ -:: >्ख० ्नः वेधादि-उ०निषेध- 
न पुण्यादिभह्वण-उ० 


श्ट्रर 


. रे 
८ 
५ 
० 
१ 
7333 
श्र 
न््छ 
हर्ष 
श्छ्ं 
७ 
३८ 
र्‌९ 
छ्० 
१ 
छ्र 
डर 
छठ 
छ्ण 
छ्द 
छ७छ 
ख्द 
छ९ 


णज्‌१ 
पर 
ण्श्‌ 
पड 


पुणू ..... 
भद्ट 


आछ 


केक फकककककक कक 448 +क 


ब्र्नसूत्राणि 


++ के पसिककक कप ऊ कक क+ ५ ककभृक 


क्ष +५9+५५ ५ ०५४ ५ ५ ०५३५ ३ 


(अ० १ पा० ३४8० १६] 
कर्मविधान- 
क्क० 
देवयानविचार- 
निर्शुणविद्यामार्गनि० 
उपासनामार्ग-3० 
ज्ञानिजन्मनिषेध- 
गुण-3० 
वेच्य एक, पिया एक. 
एक 
वेद्य एक, विद्या एक. 


, व्यतिहार-उ ० 


सत्य विद्या एक: 
सत्यकामादि-उ० 
प्राणाभिहोत्रविचार- 
प्रा० 
अक्ृ-उपासनाबि० 
पुरोडाशचबि० 
मन-आदिविचार- 
स० 

सक 

सक 

भ०' 

स० 

म््० 

स० 

स्‌० 
देह-आत्मापूर्वेपक्ष. 
तत्‌-निषेघ 
अद्भ-उपासनावि० 
अचछ 


[झ० ३ पा० १ सू० १] भाषाटीकासहितानि । श्टर३्‌ 





ण््‌छ अ० न उपासनाविधान- 
ण्द आअ० + एक उपास्थ-उपासनाभेद- 
९ आ० ने उपासनाविकल्प- 
६० आ० हु इच्छासे समुच्य- 
६१ आ० के प्रतीक-इच्छासें निषेध. 
धर्र न- शु० पूर्वपक्ष 
छ््र्‌ न गु० पू० 
द्द्छु न शु० पू० 
3 न गु० समुच्नयनिषेध- 
_दए्‌ + गु० आ० 
2 >०- ह् हे 


अच०-सगुण विद्या अंतःकरणशुद्धिद्वारा वाक्याथैज्ञानका साधन है यातें 
या पादसें समुणवोधक वाक्यार्थविचार करे हेंः-तहां अ्रथम सम्रण अ्रह्मकी 
पंचाप्नमिप्राणादि उपासनाविषे भेदाभेद विचार करे हैं. तहां प्राण-उपासना 
और पंचाप्नि-उपासना एक है वा भिन्नामिन्न है, यह संदेह है. कहूँ पंचाशि- 
विद्यामें पछ अभि उपास्य सुना है, कहं पंचही अधि सुने हैं; यातें उपासनाके 
रूपका भेद होनेसें उपासनाका भेद है, यह पूर्नपक्ष है. तहां यह सिद्धांत है--- 


सर्ववेदान्तप्रययं चोदनायविशेषात्‌॥ १ ॥ 
सर्ववेदान्तप्रसयम्‌ । चोदनाग्रविशेषात्‌ । इति प० | 


अर्थ-“चोदना” नाम विधि और “आदि पदसें संयोगरूप समाख्या 
थह सर्व वेदांतमें 'अविशेषात्‌” नाम तुल्य है. “यो ह वे ज्येष्ठ॑ च ओछं 
अब चेदज्येछल्थ ह वे ओेछख सवति पभाणो चाव ज्येष्ठश ओेछठख्थ यह 
छांदोग्यके पश्चम प्रपाठकके आरंभमें कहा है और “यो ह वै ज्येष॑ च ओह च 
घेद्‌ ज्येछस ओेछल खानां भवति पाणो वे ज्येष्ठश ओेछल् ज्येष्ठत 
शेषश खानां मचति अपि च थेषां बुश्ूषति य एवं वेद” जा बृहदारण्य- 
कके पष्ठ अध्यायके आरंभमें कहा है. इन उसय वाक्यनमें चोदना और 
प्रयोजन संयोग अविशेष है, अथात्‌ तुल्य है, यातें सर्च वेदांतमें प्रत्यथम्‌! नाम 
प्रतीयमान उपासना एक है, भिन्न भिन्न नहीं- इति॥ शव... झा 


१८४" प्र्मसुन्नाणि | [(अ० ३ पा० दे सू० ३:] 


. भेदान्नेति चेन्नेकस्थामपि ॥ २ ॥ 
भेदाव। न । इति । चेत । न । एकस्याम्‌। अपि । इति प० 


अर्थ-नतु 'मेदात' नाम छांदोग्यमैं पंचाप्नि उपास्य मानी हैं, ब्रृहतमें 
प्रसिद्ध अग्नि मिलाकर पद अश्नि उपास्य मानी हैं, यातें उभय शाखामें पंचाप्नि 
विद्याका भेद मानना चाहिये, 'इति चेत्‌” नाम उक्त शंका करें तो ए- 
कस्पाम्‌ ! नाम एक विद्यार्में रूपभेद संभवे नहीं, यातें शंका असंगत हैं. पष्ठ 
अश्निका छांदोग्यमें उपसंहार अंगीकृत है. इति तात्पर्यम्‌ ॥र॥ 
अचव०-“ तदेतदचा5स्युक्त क्रियाचन्त)! ओजिया बअ्रह्मनिष्ठा।। खर्च 
जुद्ते एकषिश्रद्धावन्तः तेषामेवैषां ब्रह्मविद्यां बदेत शिरोबतं विधि- 
बत्‌ यैस्तु चीणेस्‌। तदेतत्‌ सत्य ऋषिरक्विराः पुरोचाच नेतदचीणे- 
ब्रतोडघीते ” जा तृतीय झुंडकसमाधिमें कहा है. अथ-यह बिया 
ऋचा नाम मंत्रकरके कही है कि जे क्रियावान्‌ हैं, ओत्रिय हैं, श्रद्धा 
चान्‌ हुए एकऋषि नाम अश्निका सेवन करे हैं और बह्मनि्ठ हैं तिन पान्न- 
रूपोंके श्रति अह्मविद्याकों कहे. जे शिरमें अप्निधारणरूप शिरोत्रत करें 
तिनके प्रति कहे. इस सत्य अक्षरकों अंगिरा नाम ऋषिने शॉनकप्रति कहा था- 
इस अंधको अचीर्णबत नहीं अध्ययन करे. इति। उक्तवाक्यमैं मुंडक-अध्यय- 
, नमें जतका नियम सुना है, अपर उपंनिपद्‌ अध्ययनसें नहीं सुना; यातें 
मुंडकविद्या्से अपरविद्याका भेद है, जा शंकाका सूत्रकार उत्तर कहे हैं--- 


खाध्यायस्य तथातेन हि समाचारेडधिकाराच 
सववच तान्नेयमः ॥ ३ ॥ 


खाध्यायस्य | तथालेन । हि । समाचारे । अधिकारात | च । 
सववत्‌ । च । तत-नियमः.। इंति प० । 


: अथ-उक्त शिरोत्रतरूप धर्म 'खाध्याथस्य ! नाम चेदपंठनका जंग है, वि- 
दाका अंग नहीं. स्वाध्यायकाही * तथात्वेन ! नाम अंगकरके ' समाचारे 
नास वेदब्॒त उपदेशबोधक प्र॑थमें शिरोत्रतको अथर्वणंवान्‌ वेद्अतकरके माने 

: हैं, यातें शिरोबतः मुंडक-अध्ययनका अंग है, मुंडक उत्तविद्याका अँग-नहीं, 
कि अधिकारात्‌ च' इसका यह.अथथ है-- (४ नैतद्चीणेब्रतोड्ची ते- * - यह: 


[अ० ३ पा० ३ सू० ५] भाषादीकासहितानि । श्ट्ष 


जो मुंडकवाक्य है, इसमें “ एतत्‌! पद मझुंडकर्भथंका वाचक है. “अधीते ? 
पद्‌ अध्ययनवोधक है. इस भंथको अतरहित नहीं अध्ययन करे यह उत्त 
वाक्यका अथ है, यातें ' आधिकारात्‌ नाम “ एत्तत्‌ ! झब्दसें चकारकरके 
अधीतशब्दसे शिरोत्रत अध्ययनकाही अंग है. * सवचत्‌ ! यह तहां दृ्शंत 
है. सौयादि सप्त होसोंकी संज्ञा सब है. ते पूर्वमीमांसामें प्रसिद्ध हैं. तिनका 
त्रेताशिसे असम्बन्ध है, अथर्वेण उक्त एक अम्निसें संबंध है; यातें यथा तिन- 
का अथर्वणअश्ीसें नियस है तथा * एतत्‌ ? शब्दसें अधीतपदसें सुंडक अध्य- 
७५ 
यनमें ही * ततः ! सलाम शिरोब्रतका नियम है. इति ॥ ३ ॥ 


दर्शयति च ॥ ४॥ 


' दर्शयति । च । इति पृ०। 
अर्थ-“ सर्चे घेदा यत्पद्सामनन्ति तपांसि रूवाणि च॑ यत्‌ वि- 
दन्ति | यदिच्छन्तों श्रह्मचय चरन्ति तत्ते पद संग्रहेण ज्रवीमि” जा 
ऋठकी द्वितीयव्लीगत वाक्य निर्मुण अकह्मविद्याकी सर्व एकरूपताही दिखाये 
है. इति ॥ ४ ॥ 


' अव०-उतक्त विचारका प्रयोजन कहे हैं--- 


उपसंहारोज्थामिदात्‌ विधिशेषवत्‌ समाने च ॥ ५॥ 


उपसंहारः । अर्थाभेदात्‌ । विधिशेषवृत्‌ । समाने । च। इति प०। 

अधथ-सर्व शाखाओंमें एक उपासना माननेसेभी एक झाखागतविद्यार्मे जि- 
तने गुण कहे होवें उनसे अपरशाखामें अधिक शुण कहे होवें तो तिन अधिक 
गुणोंका दूसरी शाखामैं उपसंहार किया चाहिये वा नहीं ? यह इसमें संदेह है. 
जितने गुण इस शाखामें सुने हैं तिनसेंही आकांक्षा शांत हुएपर उपसंहारका 
कुछ प्रयोजन नहीं, यह पूर्वपक्ष है. तहां यह सिद्धांत है कि 'अथे” नाम उपास्य 
शुणोंकरके सिद्ध होने योग्य जो उपासनारूप अर्थ सो सर्व शाखामें 'अमेदात' 
नाम अभिन्न है अर्थात्‌ एक है, यातें 'समाने' नाम उपासना एकसें गुणोंका 
उपसंहार कर्तव्य है. 'लविधि? नाम यथा अश्रिहोत्र सबैशाखामें एक है 
तिसके * छोष ? नाम अंगोंका उपसंहार होबे है, तथा उपासनामें कर्तव्य है- 
इति ॥ ५॥ * या 

अ्रद्य. २४ 


१८ :... अहमसत्नाणि | [अ० ३.पा० ३-सू० ७] 


५ ५ । # «० अक+०. | 20० १ 

अन्यथातवं शब्दादिति चेन्नाविशेषात्‌ ॥ ६ ॥ 
अन्यथातम्‌ । शब्दात्‌ | इति । चेत्‌ ।न। अविशेषात्‌ | इति प०। 

अथै-इस संत्नमें पूर्वपक्ष सिद्धांतीका है, सिद्धांत पूर्वपक्षीका है. बृददार- 
प्यकर्मं उद्लीथका कतो जो प्राण ताको डउपास्यथ कहा हैँ और छांदोग्यमंमी 
प्राण उपास्य कहा है, तहां उमयविद्याओंका भेद है वा अभेद है? जा संदे- 
हसें यह पूर्वपक्ष है. “अन्यथात्वस' नाम भिन्न भिन्न आकार आणोंका उभय्‌ 
शाखाओंमें कहा है. बृहतमें उद्नीथका कर्ता कहा है. छांदोग्यमे उल्लीथका कर्म 
कहा है. शाज्दात नाम “त्व॑ न उद्भाय। तम्‌ उद्दी्थ उपासांचकरिरे” जा 
उभयश्नुतियोंसें निश्चित है यातें विद्याका भेद है. इति । तहां यह पृर्वपक्षीका 
सिद्धांत है. “अविशेषात” नाम देवअसुरविवादादिक अनेक अथ उभय- 
शाखाओंमें तुल्य हैं यातें विधाका भेद नहीं. छांदोग्यमं जो प्राणको कर्म कहा 
है सो लक्षणसें कर्ता मानना चाहिये यातें विद्या एक है. इति ॥ ६॥ 
सिद्धांत 
(२ वरी [4 
न वा प्रकरणमेदात्परोवरीयस्वादिवत्‌ ॥ ७ ॥ 


न। वा । प्रकरणभेदात्‌ । परोवरीयस्तवादिवत्‌ । इति प० । 

अथे-वा' पद निश्चयार्थक है. प्रकरणका उभयशाखाओंमें 'भेदात? नाम' 
भेद है, यातें विद्या एक नहीं. तथाहि-छांदोग्थमें “(ओम इति एतत्‌ अक्ष- 
रम्‌ उद्लीथस्‌ उपासीत' जा आरंभसमें उद्लीथके अवयवको उ्लीथत्वरूपसें 
उपास्थ कहकर “य एवाय झुरूयः प्राण: तम्‌ उद्धीथम्‌ उपासीत” जा उ- 
तरवाक्यमें प्राणकोभी उज्नीथ कथन किया है. और बृहत्में “त्व॑ं न उद्घाय” 
जा बाक्यमें सामउद्नीथभक्तिका प्राणको कर्ता कहा है, यातें प्रकरणभेद्स उमय 
विद्याओंका भेद है. यथा छांदोग्यके तृतीय प्रपाठकके नवमें खडमें यह कहा है- 
४ स एवं परोचरीयान्‌ उद्लीथः स एपोडनन्तः परोचरीयो हास्य भ- 
वाति परोचरीयसो ह लोकान, जयाति य एतदेव .विद्ान परोचरीयां- 
सम्त्‌ उद्ञीथस उपास्ते ।” इति । इस वाक्यमें परत्व वरीयस्त्वादि गुणवान्‌ 


उपासनाका विधान , किया है इससे हिरिण्यश्मश्रुत्वादि गुणविशिष्ट उद्नी- 
थकी उपासना भिन्न है तथा असंगमें विद्याका भेद है. इति ॥ ७ ॥ . . 


[ अ० ३ पा० है सू० १० ] आषाटीकासहितानि । १८9 


संज्ञातश्रेत्तदुक्तमस्ति तु तदपि ॥ ८॥ 
संज्ञतः । चेत्‌ । तत्‌ । उक्तम। अस्ति । तु । तत्‌ । अपि । इति प० 


अथ-ननु उद्नीथविद्या जा “ संज्ञातः * नाम संज्ञाको उभयशाखाओंमें एक 
होनेसे विद्या एक हैं. इति * चेत्‌ ! नाम उक्त शंका करें तो 'तत नाम उत्तर 
£ उक्तम्‌ ! नाम पूष कह दिया हैं: संज्ञाकरण पौरुषेय है यातें सो विद्या भे 
दका साधक नहीं. * तत्‌ ? नाम संज्ञा एकत्वस्िज्न उपासनाकोभी संभवे है 
४ अपि * शब्दसें इसमें अपर दृष्टांत अंगीकृत है. यथा एक काठकम्रंथमें भिन्न 
भिन्न कमनकी काठक यह एक. संज्ञा है, तथा संज्ञा संभवे है; यातें विद्याका 
भेद है, एक नहीं. इति ॥ ८ ॥ | 


व्याप्तेश्व समझसम्‌ ॥ ९ ॥ 
व्याप्तेः । च । समझसम्‌ । इति प० 
अथ-“ ओमिल्येत्दक्षरछुद्वी यसुपासीत” जा छांदोग्यवाक्यमें ऑँका- 
रसें उक्नलीथका समानाधिकरण प्रतीत होवे है. सो नाममें ऋह्मदंष्टिवत्‌ अध्यास- 
रूप है वा “ यत्‌ रजत सा झुक्ति/” इसकी नांई अपवादरूप है? वा “ू- 
झुरों प्राह्मण: जाविध तुल्यघमकी प्रतीति है? वां * नीछोत्पलम्‌! जांबिध 
विशेषणविशेष्यभाव है ? जा संदेहहुए पर यह सिद्धांत है कि-ऑकार अति- 
ऋचा भ्रतिअनुवाक्‌ प्रतिसाम आदि अंत्म व्याप्त है; यातें कौन ओंकार उपास्य 
है? जा आकांक्षा हुएसें * ओम इति एतत्‌ अक्षरम्‌ उद्लीथम्‌ उपासीत 
यह आज्ञा है. इसमें ऑकारका उद्नीथ विशेषण अंगीकृत है; यातें विशेष- 
णको “ समझसम्‌ ” नाम समीचीन होनेसें अपर त्रय पक्ष अंगीकृत नहीं, 


इति॥ ९ ॥ 

« भेदादन्यत्रेमे अप ह 

सर्वरभिद ॥१०॥ 

सर्वाभेदात्‌ । अन्यत्र । इमे । इंति प० 
, अथ-“ प्राणों वाच ज्येषछ्श् अेछस्वथ ” जा पंचमप्रपाठकमें अेडगुणयुक्त 
प्राणोंको उपास्थ कहकर आगे यह कहा है-“वाग्वाव वसिष्ठः । चकछुबोब 
प्रतिष्ठा । ओज वाव सम्पत्‌। सनो हवा आयतनम्र्‌ ” यह वाक्यादि- 
कॉमें वसिष्ठत्यादिक गुण कहे हैं. यह गुण जा शाखामें नहीं कह्टे तहां इनका 
उपसंहार किया चाहिये वा नहीं? जा संदेहसें कहे हैं (सच्चे! नाम, सर्वे शाखा 


श्ट्ट बरद्मसृत्राणि | [ अ० ३ पा० हे सू० १४] 


प्राणडपासना अभेदात्‌! नाम एक है; यातें अन्यत्न! नाम जा शाखाम ते 
गुण नहीं कहे; तहां; 'इसे'नाम उक्त गुण डपसंहारके योग्य हैँ. इति॥ १० ॥ 


आनन्दादयः प्रधानस्य ॥ ११ ॥ 


आनन्दादयः । प्रधानस्थ । इति प०। 

अथ्थ-# आनन्द ब्राह्मणों विद्वान न विभेति कदाचन आनन्दो बहन 
इति व्यजानात्‌ ” इत्यादिक अनेक वाक्यनसे आनंदत्वादि युण सुने है 
तिनका अपर शाखामें उपसंहार किया चाहिये वा नहीं ? जा संदेहसे कहे हैं 
प्रधानस्प ? नाम ब्रह्मके जे आनंदत्वादि शुण ते जा शाखाम नहीं कहे तहां 
उपसंहार करे चाहिये. इति ॥ ११ ॥ 

अच०-ननु सैत्तिरीयमें यह सुव्रा है- “ तस्प प्रियमेच छिर१, मोदो 
दक्षिण! पक्ष), भभोद उत्तर पक्षर, आनन्द आत्मा; ब्रह्म पुच्छ प्रतिष्ठा? 
इति। इसमें जे गुण सुने हैं तेभी आलंदादिगुणोंवत्‌ अह्मके थम हैं; यातें 
तिनकाभी सवत्र उपसंहार करना चाहिये, जा पूर्वपक्षर्स कहे हैं--- 

न 5 
प्रियशिरस्तवाद्प्राप्तिसप्चयापचयो हि सेदे ॥ १२॥ 
प्रियशिरस्वायप्राप्तिः । उपचयापचयों । हि । भेंदे ।इति प०। 

अथ-उत्त श्रुतिमं प्रियशिरस्त्वादि धर्म कह्टे ह॑ं तिनके उपसंहारकी सर्वशा- 
खाओंमें अप्राप्ति है. 'लिदे! नाम भेद हुएपर उपचय व अपचय धर्म होवे हैं; 
असेद हुएपर नहीं. प्रियादिक घर परस्पर उपचय अपचय स्वरूप हैँ, अथोत्‌ ता- 
रतम्यरूपसें बर्ते हें; और भोक्ताकासी भेद है. तरह्म अद्वधितीयस्वरूप है यातें 
बअह्मके उपचित अपचित प्रियादिधर्म स्वाभाविक नहीं; यातें अस्वाभाविक घ- 
मैनका ऋल्कज्ञानार्थ उपसंहार संभवे नहीं. इति ॥ १२,॥ 


इतरे तर्थसामान्यात्‌॥ १३॥ 
. ... -ैँतरे। तु । अथसामान्यात्‌ । इति प० । 
अथे-अथे, नाम प्रतिपाद्य जो अक्म सो 'सासान्यात्‌र नाम एक है यातें 


क233% जय जे आनंदादिक धम तिनका उपसंहार अवश्य कतंत्य हैं 
तिनके उपसंहारविना अविद्यानिदृत्ति होये नहीं. इति ॥ १६ ॥ 


आंध्यानाय प्रयोजनामादात्‌ ॥ १४॥ 
आध्यानाय । प्रयोजनाभावात्‌ | इति प०। 


[ अ० हे पा० ३ सू० १७] भाषाटीकासहितानि । ५१८५ 


अथ-कठततीयवह्ीमं यह कहा है-“हन्द्रियेम्ध: परा छह्ाथा अरधैभ्यत्ध 
पर सन; | सनसस्तु परा वुद्धिवुछेरात्मा सहान्परः॥ सहत। परसव्य- 
क्तमव्यक्तात्‌ पुरुष; पर।। पुरुपाज्ञ पर॑किशित्‌ सा काछा सा परा 
गतिः” इति | इस उक्त श्रुतिमें वाक्य एक है वा अनेक हैं? जा संदेहसें कहे 
हँ आध्यानाथ' नाम ध्यानसाध्य साक्षात्कारके अथ पुरुषपही विपयादिकोंसे 
परे अथात्‌ सूक्ष्मरूप प्रतिपादन किया हैं; इंद्रियादिकाँसे परे कर विपयादिक 
प्रतिपाद्य नहीं, तिनके प्रतिपादनस कुछ प्रयोजन सिद्ध होवे नहीं; यातें मति- 
पायको एक होनेसं वाक्य एक है, अनेक नहीं- इति ॥ १४ ॥ 


आत्मशब्दाद््‌ ॥ १५ ॥ 
आत्मशब्दात्‌ । च । इति प० 
थ-उत्त दाक्यर्क आग कठस यह वाक्य हं- एप सच्रयषु फ्र्तषु गृ: 
ढोडत्सा न प्रकाइते | ह॒इयते त्वच्यया बुद्धवा सक्ष्मया खध्मद्शिभिः' 
इति | इस उत्तरवाक्यमें पुरुपवाचक आत्माशब्द सुना है; यातें 'इन्द्रियेम्ध 
यह आत्मवोधक एकही बाक्य है. इति ॥ १८५ ॥ 


2 6 
आत्मश्हीतिरितरदुत्तरात्‌ ॥ १६॥ 
आत्मग्रहीतिः । इतरवत्‌ । उत्तरात्‌ । इति प० 

अथ--“अात्मा वा इद्मेक एवाश्र आसीत” जा ऐेतरेयके आरंभमें 
वाक्य है. इसमें आत्माशव्द हिरण्यगर्भका बाचक है वा परमात्माका वाचक 
है? जा संदेहसें कहे हैं कि-उक्तवाक्यमें आत्माशव्दसें परमात्माका “ग्रहीति” 
नाम भहण है, हिरण्यगर्भेका ग्रहण नहीं; 'इतरवत्‌! नाम यथा-/आत्मन 
आकार: सम्मूतः* इत्यादिक उत्पत्तिवोधक अपरवाक्यनर्स आत्मापदसें पर- 
मात्माकाही ग्रहण है ओर “स हेक्षत लोकाइुसरुजा इति स' इमाँछोकान- 
खूजत” जा उत्तरात नाम इस ऐतरेयके उत्तरवाक्यमें इच्छापूर्वक कतृत्व 
रूप विशेषण कहा हैं; सो विशेषण सुख्यताकरके परमात्माविषेही अपरश्व॒त्तिसें 
निश्चित है; यातें आत्मापद परमात्माका वोधक है, हिरण्यगर्भका वोधक नहीं, 


इति । १६ ॥ 
अन्क्यादेते चेत्स्यादबधारणात। १७॥ 
अन्वयात्‌ । इति । चेत्‌ | स्थात्‌। अवधारणात्‌ । इति प्‌०। 


१०७० ब्रह्सत्राणि । [अ० ३ पा० ३ सू० १९] 


अथै-पूव उत्तर विचार कियेस 'अन्वयात'-नाम प्रजापतिसंही उक्त ऐत- 
रेयवाक्यका सम्बन्ध है, यातें सो प्रजापतिकाही वाचक है. 'इति चेत्‌' नाम 
यह शांका करें तो 'आत्सा थे इृदं ० इस वाक्यम निश्रयवाचक 'ि!शब्द महण 
किया है सो 'अवधारणात' नाम निश्चय करके उत्पत्तिस पूर्व परमात्मामेही 
समीचीन है, अपरमें नहीं; यातें अवधारणासंभी तहां परमात्माका भ्रहणही 
धस्थात! नाम युक्त हैं. इति ॥ १७ ॥ 


कार्याख्यानादपूर्वम्‌ ॥ १८॥ 
कार्यास्यानात्‌ । अपूर्चेम्‌ । इति प०। 


अथे-बूहदारण्यकके पछ्ठ अध्याय प्रथमन्नाह्मणमें यह वाक्य हँ-“तत्‌ 
विद्यांस! श्रोजिया अहिष्यन्त आचामन्ति अदित्वा व आचामन्ति 
एतम्‌ एच तत्‌ अन्नम्‌ अनस छुवेन्तो मन्यन्ते तस्मात्‌ एचंचित्‌ अशिष्यन्‌ 
आचामेत्‌ अशित्वा च आचासेत्‌ एतम्‌ एवं तत्‌ अज्नस्‌ अनभ्मम्र॒ छुमूते” 
इति ॥ इसका यह अर्थ है- भाणोंका जरमें घास कहा है, यातें प्राणडपासक 
भोजनसे पूर्व और पीछे आचमन करें; तिस आचमनसम्बन्धी जलके वाससें 
इस भाणको आच्छादन किया हुआ पूर्वले जन चिंतन करे हैं यातें इस काल- 
सैंसी म्राणएपपासक तैसेही चिंतन करें, इति । तहां यह संदेह है कि-आचमन 
योग्य जरूमें प्राणके चासका ध्यान विधेय है वा आचमन विधेय है? इति। 

के सिद्धांत ०0 ल्में ०. |. 
तहां यह सिद्धांत हैं कि-जलूमें प्राणके वासका जो ध्यान सो “अपूर्य नाम प्राण 
उपासनाका अंग करके विधेय है. 'छिजो नित्यस्‌ उपसपशेत! जा स्मृतिडक्त 
बिघिसें से अलुष्ठानका अंग प्रतीत होवे है, यातें झुद्धिअर्थ- “कार्य! नाम 
कर्तव्यताकरके प्राणविद्यामँ प्राप्त आचमनका “अआर्यानात' नाम कथन है, 
यातें आचमन विधये नहीं किंतु जरूचासही विधेय है, इति॥ १८ ॥ 


समान एवं चासेदात्‌॥ १९ ॥ 
समाने । एवम्‌ । च । अभेदात्‌ । इति प०। 
हक कप अथे-“स आत्मानम्‌ उपासीत सनोमय॑ प्राणशरीरं भारूपम” जा 
शांडिल्यविद्यामें मनोमयत्वादिक गुण सुने हैं और “भनोसयो5र्य पुरुषो 


सा; सत्य: तस्मिलन्तहेदये थथा ब्रीहिया यों थार एप स्वेस्पे- 
झानः खर्वेस्पाधिपति: स्ेभिदं प्रशास्ति यदिदं किश्” जा बृहदा- 


([अ० ३ पा०- ३ सू०-२२] भाषाटीकासहितानि । १९१ 


रण्यकके पश्चम अध्यायम ग्रुण सुने हैं. तहां उमयशाखागत विद्या एक है था 
भिन्न है? जा संदेहसे कहे हैं. मनोमयत्वादियुणवान्‌ उपास्य उभ्रयशाखाओंमें 
अभेदात' नाम एक है, यातें यथा भिन्नशाखामें एक विद्याविपे गुणोंका उप- 
25 होवे हैँ तथा 'समाने! नाम एक शाखामेंभी गुणोंका उपसंहार युक्त है 
इति ॥ १९॥ 


सम्बन्धादेवमन्यत्रापि ॥ २० 0 


सम्बन्धात्‌ । एवम्‌ । अन्यत्र । अपि । इति प०। 


अथ-बृहदारण्यकके सप्तम अध्यायमें यह कहा है कि-- थ एप एंत॑- 
स्मिन्मण्डले पुरुषः। तस्य उपनिपद्हस्‌ हाति हन्ति पाप्मान॑ जहाति च 
थय एवं चेद ॥ योड्यं दक्षिणे अक्षन्‌ घुरुष। तस्य उपनिषद्हम! 
यह सत्यविद्यार्म कहा हैं. इति | तहां नामोंकी व्यवस्था ध्यान कर्तव्य है 
था नामद्धयका पुरुषनम उपसंहार अंगीकृत है ? जा संदेहसें पूर्वपक्षम यह अथे 
है कि--यथा उक्त शांडिल्यविद्यामँ एक शाखामें भिन्न भिन्न पठन 
शुणोंका एकविद्यात्व संवंधसे उपसंहार पूर्न कहा हैं 'एचम' नाम तथा अन्य- 
आपि' साम सत्यविद्यामभी सत्यत्वसंबंधसे एक विद्या मानके नामोंका उपसं- 
हार मानना चाहिये. इति ॥ २० ॥ 


ेृ सिद्धांत । 
न वा विशेषात्‌ ॥ २१ ॥ 
न । वा । विशेषात्‌ | इति प० । 


अधै-विद्या एक अंगीकार कियेभी नेत्र ओर आदित्यरूप स्थान “विशे- 
पात्‌ ! नाम भिन्न भिन्न है, यातें नामद्धयका पुरुषद्दयविपे उपसंहार अंगीकृत 
नहीं किंतु अहम अहम ये उभय पुरुपनके नाम हैं- इति ॥ २१ ॥ 


दशयांत च ॥ २२ ॥ 
अथ-छवदोग्यके दतीयअध्यायमें “य एफोडन्तरादित्ये हिरफ्यमयः 
पुरुषों दृुश॒थते” जा वाक्यमें आदित्यको पुरुष कहकर “थ एबोडन्तर- 
क्षिणि पुरुषो दृश्यते तस्थ एतस्थ तदेव रूप यदखुष्य रूप यज्ञास 


१९२ ' अक्षसत्राणि [ज०३ पा० ३ सू० २५] 


तनज्ञाम जा धाक्यम नेत्रगतको आदित्यका रूप कहा हैं. यह अतिदेशभी 
सत्यविद्या स्थठमें स्थानके भेदर्स घर्मनका भेद 'दरोयाति! नाम दिखावे हैं; 
यातें उपसंहार अंग्रीकृत नहीं. इति ॥ २२ ॥ 
| ०० _ प 
सम्यतियुव्याहश्वात) ॥ २६ श 
सम्पृतियुव्यात्िः । च । अतः । इति प०। 
अर्थ- न्रह्मज्येछा चीया सम्भुतानि जअ्ञत्मात्रे ज्येष्ठ दिघमात- 
तान यह छुति विपयवाक्य है. इसका अशे-तह्म हे  ज्थेंठ * नाम स्वतंत्र- 
कारण जिनोंका ते ब्रह्मज्येछ कहिये. त्रह्म करके निर्विन्न जे वृद्धिको प्राप्त होदें 
ते * सम्भूतानि'! पदसे मरहण किये हैं. ब्रह्मके कार्य जे 'चीघे” नाम आकाश्या- 
दिक ते अतिदृद्धिको प्राप्त हें. इति। सो 'ज्येछम साम स्वतंत्रकारणरूप जो त्रह्म 
सो अग्ने! नाम इंद्रादिकोंके जन्ससे पूर्व (दिवस! साम स्वर्यको "आततान नाम 
व्याप्त करताभया अर्थात्‌ नित्य सर्वच्यापक है. इति | इस वाक्यम दृद्धि सर्च- 
व्याप्तित्वादि शुण सुने हें. तिन गुणोंका अपर बकह्यविद्यार्मं उपसंहार अंगी: 
कृत है वा नहीं ? जा संशयस कहे हैँ, यथा पृवस्थानके सेदसस नामोंकी व्यव 
करी है. तथा 'संभ्वाति! नाम वृद्धि चझुव्याप्ति! नाम स्वर्गव्यासित्यादि 
शुणनका शांडिल्यादि विद्या उपसंहार अंगीकृत नहीं; अतः: नाम 
स्थानभेदसें उक्त अथही समीचीन है. इति ॥ २३ ॥ 


पुरुषविद्यायासिव चेतरेषासनाम्नानात्‌ ॥ २४॥ 
पुरुषविद्ययाम्‌ । इव । च । इततरेपाम। अनाम्रानात। इति प०। 


अथे-तांड्बशाखामें और तैत्तिरीयमें पुरुपविद्या कहे हैं. तहां उभय बिद्या- 
ऑमें परस्पर गुण उपसंहार अंगीकृत है वा नहीं ? जा संदेहस कहे हैं- तांडय 
शाखागत पुरुषविद्यार्म यथा ग्रुण कहे हैं, 'इबा नाम तथा 'इतरेणाम' नाम 
तैत्तिरीयशाखावानोंकी पुरुषविद्यास ग्रुण * ऊअनाज्ञानात्‌ ! नाम कहे नहीं; 
यातें विद्याका भेद होनेसे गुणउपसंहार अंभीकृत नहीं. इति ॥ २७ ॥ 


वेधायथंसंदात्‌ ॥ २५ ॥ 
वेधायथमेदात्‌ । इति प०। 


अथर-“सर्च प्रविध्य हृदय परविष्य घसनी। प्रन्नज्य शिरोडमिप्र* 
चुज्थ: चिधा विएकतः ” इत्यादिक संत्र उपनिषदोंके आरंभमें सुने हैं. अथे- 


[अ०३8 पा०३सू० २६ ] भाषादीकासहितानि ! १९३ 


अभिचारक कर्म देवताकी अभिचारकर्ता प्रार्थना करे है. हे देवते ! हमारे रिपुके 
सर्व अंगनको विदारण कर, हृदयको विदारण कर, धमनी शिर भेदन कर, 
और शिरको चारों तरफसे भेदन कर; इसप्रकार मेरा रिपु चयप्रकारसें मेदन 
होवे. इति। इसप्रकार उपनिपदोंके आरंभमें जो मंत्र हें तिनका तत्‌ तत्‌ उपनिष- 
दोमें जो विद्या कही है, तामें उपसंहार है वा नहीं? जा संदेहसें कहे हें-“सर्न 
प्रविध्या इत्यादि मंत्रोंकरके कहा जो विधादिअर्थ” नाम मारणादिअर्थ तिन- 
का अभिचारक कर्मसे संबंध है, विद्यार्स संबंध नहीं; यातें चेधादिक अर्थनका 
भेद होनेसे तिमका चि्यामें उपसंहार अंगीकृत नहीं. इति ॥ २५॥ 


हानो तृपायनशब्दशेषपलात्कुशाहन्दःस्तुत्युपगा- 
नवत्तदुक्तम ॥ २६ ॥ 


हानो । तु। उपायनशव्दशेपलात्‌। कुशा-छन्दः-स्तुत्युपगानवत्‌ । 
तत्‌ । उक्तम्‌। इति प०। 


अथे-तांडिच्छांदोग्यरहस्पमें यह छुना है-/इयामाच्छ बर्ू प्रपये शबरा- 
अछचामम प्रपच्ने अश्व इध रोमाणि विधूय पाप 'चनन्‍्द्र इच राहोसख्ेखात 
प्रसुच्यते घूत्वा शरीरसक्ृतं कृतात्मा ब्रह्मलोक आमिसम्भवामि ” 
इति। अधथ-यथा अश्व रजसहित जीर्ण रोमोंको त्यागकर निर्मल होवे है तथा 
सब पापको त्यागकर निर्मल होता है. और यथा राहुके झुखसें छूटके चंद्र भा- 
स्व॒र होवे है तथा हमभी प्रवाहरुपसें “अक्ृतम नाम अज्ञादिशरीरको धूत्वा” 
नाम त्यागके अतिनिर्म हो कृतकृत्य होकर अह्मलों कम नाम बह्मरूप छोक- 
को अभिसंसमवामि' नाम प्राप्त होते हें. इति “तथा विदान परण्यपापे 
विधूय निरज्ञनः परम साम्यछ॒पैति” जा अथर्वण शुतिका यह अथ है कि- 
विद्वान पुण्यपापको त्यागके निरंजन हुआ परम अह्मको प्राप्त होवे है. इति। 
“तस्व पुत्ना दायखुपयन्ति सुहृदः साधुकृल्यां दिषनतः पापकृत्याम/जा 
श्रुतिका यह तात्पय है कि-झूत विद्वानके पुत्र विभागको झास होवे हैं, सहद्‌ 
पुण्यको, और छेपी पापको श्राप्त होवे हें. कौपीतकिमेंभी कहा है-“ तत्सखु- 
कृतदुष्कृते विधूल॒तते तस्प प्रिया ज्ञातयः सुक्तसुपयन्ति आगिया 
दुष्कृतम! इति। अथ-तत नाम विद्याके वलसे विद्वान पुण्य पापको विधू- 
लुते ! नास त्याग देता है. तिस तजेहुए पुण्यपापको सेवक निंदक प्राप्त होने 
अक्ष ३५ 


१९४ बन्मसूत्राणि [ ज० ३ पा० ३े सू० २७] 


हैं यातें उपासक्स द्वेप नहीं करे. इति। 'पुत्र दायको प्राप्त होवे हैं? जा श्ष॒तिमें 
पुष्य पापका अहण मात्र सुना है सो पुण्यपापके त्याग बिना संभवे नहों 
यातें तहां त्याग अर्थात्‌ सिद्ध होये है. तांडिरहस्थ और अथवेणमे पुण्यपापका 
त्याग मात्र सुना है. तिस तजेहुए पुण्यपापका अपरवाक्यमें सुना हुआ अहण 
भानना चाहिये वा नहीं ? जा संदेहसें कहे हैं 'तु” पद केवल हानिवाचक है, 

जहां विद्धानके पुण्यपापकी हानि छुनी है तहां पृण्यपापका अहणभी मानना 
चाहिये. ' उपायनराव्द्शेषलात्‌ ! यह तहां हेतु है. कोौपीतकिसें 'विघूनुते 
सुकृतम्‌ उपयल्ति' यह हानिका उपायनशब्द शेप है यातें उपायनको हानिका 
शेष होनेसें केवढ हानिकी जगासें 'डपायन” नाम अहण किया चाहिये. विं- 
द्वान्‌ करके भोज्यत्वाभावहानि अँगीकृत हैं; तत्‌ तुल्यकर्म प्राप्ति अहण अंग्री 

कृत है. इति तात्पयम्‌। तहां कुशादिक दृष्टांत हैं, तथाहि “कुछा वानस्पत्माः 
ख्थ जा छुतिका यह अथ है कि-“हे समिद्धग्प कुशो ! तुम वनस्पतिमें स्थित 
हो सम यजमानकी रक्षा करो” इति।उतक्तवचनसें सामान्य समित्‌ श्रवण होनेसे 
#“आओदुम्बरा। जा अपरशाखागत श्रुतिका आश्रय किया है. ओद्दुचर शब्द 
कुशाबाचक है इति । छितीय दृष्टांत-“छन्दोभिः स्तुवीत” जा वाक्‍्यसें देव 
असुर उभयच्छेदनके भाप्त हुएसें “ देचच्छन्दांसि पूर्वाणि ” जा. अपर 
शाखागत श्रुतिकरके छंदनके पूर्व उत्तरभावका निश्चय होवे है. तृत्तीय दृष्टांत- 
पोडशी पात्रविशेषके ग्रहण कियेसें तिसका अंगरूप स्तोत्र किसकाह्में 
उच्चारण करे? जा आकांक्षा हुसें छांदोग्यमँ कालके तुल्य प्राप हुएसें 
“४ समसयाध्युणिते सूर्य घोडाशिन स्तोत्मम उपाकरोंति ” जा तैत्तिरीय 
वाक्‍्यसें कालविशेषय्वुद्धि होवे है. उपगान दृष्ठांत-“ ऋत्विज उपशाय- 

ते” यह सामाल्य वाद्य है. “ नाध्यथुरुपगायातरि ” इस विशेषया- 
क्यसें अध्वयुवर्जित गायन करे; यह निणय होवे है. यथा उक्त दृष्टांतनमें 
अपर श्रुतिगत विशेषका अन्य होवे है तथा त्यागरमें ग्रहणका अन्बय हैः 


* तत्‌ उक्तम्त्‌ नाम इसी अरथंका पृव॑मीमांसामें जैमिनि आचार्यने अंगीकार 
किया है. इति ॥ २६ ॥ 


साम्पराये तर्तव्यामावात्तथाह्मन्ये ॥ २७ ॥ 
साम्पराये । ततेव्याभावात्‌ । तथाहि । अन्ये | इति प०। 


'- अर्थ-पर्यकगगत ब्रह्मका जो. उपासक ताके देहत्याग्सेँ अनंतर यह सुना है- 


[अ० ३ या» ३ सू० २९ ] आपषादीकांसहितानि | १९७ 


कौषीतकिमें-“स आगछति विरजां नदी ता मनसचात्येति तत्सुक्ृत- 
दुष्छृते चिघूडुते” इति। अर्थ-जब उपासक बह्मछोकको जावे है, तब मार्गमैं 
महाजलहुद आवे है, तासें.आगे सो विरजा नाम नदीको प्राप्त होवे है, ता 
नदीको अपर साधनरहित फेवर मनकरके तरे है. घन खुकृत विरजाके उत्त- 
रणमें सहायता करे है जा शंकाके निषेधार्थ श्रुति कहे है-/तत नाम शरीरके 
त्यागकारमें वा उपास्यमान साक्षात्कारकारुमैं हुण्यपापको “ विधूलुते ! नाम 
त्याग देता है. यथा अश्व रोमनको त्याग देता है तथा परिपाकज्ञानसे त्याग 
देता है, अर्थात्‌ दाह अंग्रीकार है. इति । इसमें यह संदेह है कि विरजावदी- 
तरणसे अन॑तर कर्महानि होवे है वा देहत्यागर्सें पू्षकालमें कर्महानि होवे है! 
इति। पूर्वपक्षमँ विद्याचिना नदीतरणकोही कर्महानि-कारणता है, विद्याको 
हानिकारणताकी असिद्धि पूर्वपक्षका फल है, तत्‌ सिद्धि सिद्धांतता फल है. 
सिद्धांतमें यह अर्थ है कि-खाम्पराये' नाम परकोकसाधनरूप विद्याकाल्में 
ही कर्महानि होवे है; नदीतरणसें अनंतर कर्मोका फल कोई शेष' रहा होवे 
तो तरणअनंतर कर्महानि माननी चाहिये. 'ततेड्याँ नाम तरणअनंतर कर्मसें 
प्राधव्यका अभाव है; यातें विद्याकालमैंही कर्महानि होवे है. * तथाहि ! नाम 
उक्तविधही “अन्ये” नाम तांडिआदिक जीवनकालमेंही कमनके क्षयकरों अश्व 
इच * इत्यादि अ॒तिसें दिखावे हैं. इति ॥ २७ ॥ 

अब०-ननु॒ यथा बह्मग्राप्ति देहत्यागअनंतर होवे है तथा कर्मनाशभी 
देहत्यागके अनंतर होवेगा; जा शंकासें कहे हैं-- 


छन्दत उमयाविरोधात्‌ ॥ २८ ॥ 


-छन्दतः । उभयाबिरोधात्‌ । इति प०। 


अधे- छब्दतः ! नाम स्वइच्छासें जो विद्याका सेवन सो जीवत्कालमेंही 
कंमोंके नाशका हेतु है. कारण होनेसें काये अवश्य होवे है. विद्या कर्मक्षयकों 
कारणकार्थरूप सिद्ध हुए * उमयाविरोधात्‌ ! नाम तांड्यादि उभय अआ्रुतिका 
अविरोध सिद्ध होवे है; यातें कर्मक्षय विद्याका फछ है. इति॥ २८ ॥ 


गतेरथेकत्वछ्ुमयथाउन्यथा हि विरोधः ॥ २९ ॥ 
गतेः । अर्थवत्वय। उमयथा । अन्यथा ! हि। विरोधः । इति प० । 
अजै-कर्महानिके समीप कहूँ देवयानमार्ग सुना है, कह निर्गुणविद्यार्मे 


१९६ * ब्रहसत्राणि [अ० ३ पा० दे सू० ३१ ] 


नहीं सुना; तहां मार्गउपसंहार किया चाहिये वा नहीं ? जा संदेहसें यह उत्तर 
है-- गते!” नाम देवयानमार्गको ' उममयथा ? नाम दोप्रकारसें विभाग करके 
अर्थवक्त्वम! नाम सफलता है. सगुणविद्यामं देववानमार्ग है, निर्शुणविद्या्मे 
नहीं. इति । “ अन्यथा ! नाम सर्चेन्र देववानका उपसंहार कियेसें “ विद्वान 
परृण्यपापे विधुथ निरक्षन! परस॑ साम्परुपैति ? जा ब्रह्मरूप प्राप्तिबोधक 
श्रुतिसें विरोध होवेगा. इति ॥ २९ ॥ 


9... ६ 3 
उपपन्नस्तहक्षणाथोंपलब्घेलोकवत्‌ ॥ ३० ॥ 
०. 9८5 ३. 
उपपन्नः | तछक्षणाथोंपलब्धेः | लोकवत्‌ । इति प० । 
अथै-कहू सार्ग है, कह नहीं; जाबिध उभसयप्रकारसें मार्ग “ उपपन्नः 

नाम सिद्ध हुआ है. अह्मछोकमें पर्यकगत ऋद्यमाप्ति जो विद्याका फर तिस 
विद्याफलरूप अर्थका 'तत नाम सो मार्ग लक्षण” नाम कारण है, तिसि फल- 
रूप अर्थकी श्रुतिमें 'उपलबच्घेः” नाम प्रतीति होगे है और निर्मुणविद्यामं मार्ग- 
साध्य फल कोई भान होचे नहीं, यातें तहां मार्गपसंहारका अंगीकार नहीं; 
यथा छोकमें रामसेतुवासी जनोंको गंगाआसिअर्थ मार्ग चाहिये, गंगावासी 
जनोंको नहीं, तथा, इति॥ ३० ॥ 
._ अच०-सगुणविद्यामेंभी कह मार्ग सुना है, कहँ नहीं; वहां मार्गका उपसंहार 
किया 'चाहिये वा नहीं ? जा संदेहका निषेधक यह सूत्र है-- 


९ श 

अनियमः सर्वासामविरोधः शब्दात॒मानाम्याम ॥३१॥ 
अनियमः। सवोसाम्‌। अविरोधः । शब्दानुमानाभ्याम्‌ । इति प० 

अथे-“सर्वा साम नाम सवे सगुण उपासनाके सार्मका अनियम है अर्थात्‌ 
जहां सा सुना हद तिसका जहां जहां मार्ग नहीं सुना तहां तहां सर्व जगा उप- 
संहार अंगीकार है. “शब्द नाम श्वतिमैं * अन्लुमान ? नाम स्मृतिमें मार्गका 
अंगीकार किया है; यातें उभवसे अविरोधः' नाम प्रकरणविरोधभी नहीं- 
इति ॥ ३१ ॥ . 

अब०-कहिद्वापरकी संधिमें विष्णुके नियोगसे क्ृष्णद्वैपायनही उपजे इत्या- 
दिक वचनोंमें निर्गण अक्मवेत्ताका जम्म सुना है. तहां यह संदेह है-अह्मवेत्ता- 
की वर्तमान देह पात हुए ताको अपर देहप्रासि होवे है वा नहीं? इति । व्यास 
वसिष्ठादिकोंमं तरह्मविद्या है,तिनका जन्मभी सुना है, यातें भह्मवेत्ताको अवश्य 
जन्म होवेंगा; विद्या सोक्षका हेतु नहीं यातें फलभोगके अर्थ बह्मवेचाकों 


[ज०-३ पा० है सू० ३३ ] भाषाटीकासहितानि | १९७ 


अपर देहकी प्राप्ति होवे है, यह पूर्तपक्ष है. इनका निर्युणविद्यामें मागे उपसं- 
हार फल हें. तहां यह सिद्धांतसूत्र हैं-- 


यावद्धिकारमपस्थितिराधिकारिकाणाम्‌॥ ३२॥ 
यावत्‌ू-अधिकारमस्‌ | अवस्थितिः। आधिकारिकाणाम्‌ | इति पथ 


अथ-परमात्माकी आज्ञास वेदप्रवर्ततादिे लछोकव्यवस्थाहेतु अधिकारॉमें 
जे पवृत्त होवे हें ते आधिकारिक अंगीकृत हैं; तिन अधिकारी जनोंकी 'घावत्‌-- 
अधिकारम” नाम जहांपर्यत प्रारव्धकर्स है तहांपर्यत अवस्थिति रहे है, 
सो प्रतिवंधकरूप प्रारव्धकर्म अनेक शरीरकर भोग्य फरूका हेतु है. तिस 
फछका भोगसे नाश हुएसे अपर कोई पतिवंधक रहे नहीं; यातें वर्तमान 
देहपात अन॑तर केंवल्यप्राप्ति होवे हैं, अपर जन्मग्राप्ति होवे नहीं; यातें ब्र- 
हावेत्ताको भार्यकी अपेक्षा नहीं- इति ॥ ३२ ॥ 


अचव०-बृहदारण्यक्म याज्ञवल्क्य॒का गार्गित्रति उत्तर सुना है- एत्तद्ढै तद्‌- 

क्षरंगार्मि ब्रह्मणा अभिवद्न्ति अस्थूलम्‌ अनणु अहम अदीघेम ” 

, इत्यादि और “थत्‌ तत्‌ अद्बेश्यम्‌ अग्राह्मम्‌ अगोतज्रम्‌ अवणेम्‌ अचक्षु) ”? 

इत्यादि झुंडकमें सुना हे. तहां जो निषेध सुना ताका अपरजगा डउपसहार 
अंगीकृत है वा नहीं ? यह संदेह है. तहां यह संदेहनिपेधकसरूतन्न है--- 


अक्षधियां खबरोधः सामान्यतद्धावाभ्यामोपस- 
दवत्‌ तहुक्तम ॥ ३३ ॥ 


9९ सामान क 
अश्षरभियाग। तु। अवराध+भ न्यतड्ावाभ्याम्‌ । आओपसदवत्‌ | 
तत्‌ | उत्तम । इति प०। 

अथै-'अस्थूलस्‌ अनणु! इत्यादिक जे अक्षरमें निषेघुद्धि तिनका सर्च नि- 
पेघप्रकरणमें 'अचरोध/ नाम उपसंहार अंगीकृत है. सामान्यतद्भावास्थाण' 
यह तहां हेतु है. सर्व प्रपंचका निषेध करके जो बअह्मका प्रतिपादन है सो 
सर्वजगा सामान्य है और प्रतिपाथ एक बह्मका जो 'साव'* नाम सत्त्व सोभी 
सर्वजगा एकरूप है; यातें तिसके शेप जे निषेध तिलका स्वेजगा उपसंहार 
अंगीकृत है. 'औौपसद्चत' यह तहां इशांत है. जमदप्ियागर्मे जे घुरोडाश 
तिनकी संज्ञा उपसद है, पुरोडाशप्रधानक मंत्रोंकी संशा ओपसद हैं; ते मंत्र 


१९८ * बल्यसूत्नाणि : (अ० १पा० इसू० ३४५ ) 


उद्दाताके बेदमैं उपजे हैं, यातें उद्भाताकरके तिनके प्रयोगकी ग्रासति हुएसें 
तिन मंत्रोंका अध्वर्युकतेंक पुरोडाशप्रदानमें विनियोग है. विनियोगविधि 
उत्पत्तिविधिसे सुख्य है, यातें तिस मुख्य अलुसारही अध्वर्युकतेक मंत्रप- 
योग किया चाहिये; गौण उत्पक्तिदेघधि-अनुसार उद्भाताकठेक अयोग नहीं 
किया चाहिये; यातें अध्वयुकर्ंक पुरोडाशके शोष जे मंत्र जहाँ तहां सुनेहुए 
तिन सर्वका यथा अध्ययुसे संबंध अंगीकार है, तथा अक्षरत्रह्मज्ञानके होष 
जे निषेध जहां तहां सुनेहुए तिन सर्वका अक्षरसें सर्वेजगा संबंध अंगीकृत 


हैं. 'तत्‌ उत्तम ' नाम पूर्वेमीमांसामें जेमिनिने यही रीति अंगीकार करी है 
इति॥ शश ॥ 


अव०-“हा सुपर्णा सयुजा सखाया समान धृक्ष॑ पारिषस्वजाते। 
तथोरनन्‍्यः पिप्पल खाहवत््यनशक्षज्नन्योडमिचाकशीति जा मंत्र तृतीय 
भुंडकके आरंभमें कहा है. अर्थ-दो पक्षी हैं, स्वेदा युक्त हैं, आपसमें सखा 
हैं, ते शरीररूप वृक्षमें संबंध पाकर स्थित हैं; तिनमेँ एक फलको खाबे है, 
ओर एक प्रकाशे- है, खाबें नहीं-इति। “ऋत 'पिबन्तों खुक़तस्थ लोके 
ण॒हां भविष्ठी परसे परार्थे। छायातपौ ब्रह्मविदों बदन्ति पक्चाश्मयों 
ये व जिणाचिकेताः ” यह संत्र कठतृतीयवलछीके आरंभमें कहा हे. ॥॒ 

कहदिया है. इति | उक्त उभय मंत्रोंमें विद्या एक है था भिन्न है? जा 
संशयसें कहे हैं-- ' 


इयदामननात्‌ ॥ ३४ ॥ 
इयूत्‌ । आमननात्‌ । इति प० । 


अथर-इचसत' नाम इयत्ता अर्थात्‌ छवित्वसंख्या अविच्छिन्न जो वेच उसका उ- 
भय मंत्रोंमें एकरूप “अभआाधभननात नाम अंगीकार किया है, यातें अतिपाद्यको 
एक होनेसें निगुण विद्या उसयमें एक है. इति॥ ३४ ॥ 


अच०-बहतम उपस्तका याज्ञवव्क्यके पति प्रश्न है कि-“यत्साक्षादपरो- 
छ्ात्‌ चर्म य आत्मा सवोन्तरस्तं से व्याच्चक्ष्व” इति। इसका यह उत्तर है- 
४ एब त आत्मा सवोन्तर!ः” पुनः अक्ष-“कतम्तो याज्ञवल्क्थ सवीन्तरः”। 
उत्तर-/ थ; पराणेन प्राणिति खत जात्मा सवोन्‍तरों योष्पाने 
नापानिति खत आत्मा खबोनतरः ” इत्यादि । इससे उत्तर ब्ा- 
छाणमें- कहोलग्रशक्ष है. “ कतझो याकह्षदल्क्थ सवोन्लरः इति। उचर-- 


(अ० ३ प०३ सू० ३६] भाषादीकासहितानि । १९९ 


“योड्दानायापिपासे शोक मोह जरां झत्युम अल्येति एतं वे तम्‌ आ- 
त्मान चिदित्वा त्राह्मणाः परश्नेपणायाश्व वित्तेषणायात् लोकैषणा- 
याश्व व्युत्थाय जथ पफिक्षाचस चरनल्ति” इति। अथ-जो प्राणकरके आा- 
णचेष्टाको करे हैं अधांत्‌ जिसकरके प्राण चेष्टा करे हैं. चेष्टा चेतनाधिष्ठान- 
पूर्वक है. अचेतनम्रजृत्तिरूप होनेसें रथादिचेष्टाचत्‌ जानना. इति। 

अच०-तहां उभय ब्ाह्मणोंम विद्या एक है वा भिन्न हैं?जा संदेहका 
परिहार करे हँ--- 


अन्तरा भतग्रामवत्‌ स्वात्मनः॥ ३५॥ 


अन्तरा। यूतग्रामवत्‌ । खात्मनः | इति प० | 

अथ-उभय ब्राह्मणमें स्तर आत्माका सर्वके 'अन्तरा” नाम अंतर अंगीकार 
किया है, यातें उसय वेच्च आत्मा एक है. यथा भश्ूतग्रार्भा नाम भूतनका समू- 
हरूप जो स्थूलदेह तिससमें पृथिवीसें जल अंतर है, जरूसें तेज अंतर है, 
इत्यादि क्रमस सापेक्षक भूतनको अंतरत्व है, सुख्य नहीं; तथा उसय बाह्म- 
णमें विद्याभेदका अंगीकार कियेसें वेद्यात्मा सबके अंतर नहीं सिद्ध होवेगा अ- 
थांत्‌ उमय आत्माका अंगीकार कियेसे गौण अंतरत्व सिद्ध होवेगा; यातें बेचे 
एक होनेसे विद्या एक है. भूतदृष्टांत व्यतिरिकी है. इति ॥ ३२५ ॥ 


पर 4 की 

अन्यथा मेदालुपपत्तिरिति चेन्नोपदेशान्तरवत्‌ ॥३६॥ 
अन्यथा । भेदानुपपत्ति॥ इति। चेत्‌। न। उपदेशान्तरवत्‌। इति प०। 

अथ- अन्यथा” नाम तहां विद्याभेदका अनंगीकार किये आत्माके भेदकी 
अनुपपत्ति होवेगी अधांत्‌ भेद नहीं बनेगा, 'इति चेत्‌” नाम उक्त शंका करें 
तो असंगत है. तथाहि-यथा छांदोग्यमें 'उपदेशन्तरवत? नाम तत्त्वमासि? 
जा वाक्यका नववार अभ्यास कियेभी विद्याका भेद नहीं, तथा आाह्मणउमरयसें 
भेद अभ्यास कियेपरभी विद्यासेद नहीं- इति ॥ ३६ ॥ 


अव०-«“ तद्योड्ह सोड्सो योडसों सोडहस्‌ ” जा वाक्यमें आदि: 
त्यपुरुका अधिकार कहा हैं. ओर “ त्व॑ चा5हसस्फि भगवों देवते अहँ 
जे त्वमसि भगवों देवते ” जा जावालिमें कहा है. उक्त उभयवाक्यनमें 
आत्माका केवर ईम्वररूपसें चिंतनका विधान है .वा आत्माका ईम्वररूपसें 
और ईश्वरका आत्मारूपसें चिंतनका विधान है ? यह संदेह है. तिसका नि- 


पेधक यह सूत्र है--- 


२०० अहछासूत्राणि । [अ० हे पा० ३ सू० ३८] 


2 ३ का 65३ [2 पु [पु 
व्यतिहारों विशिषन्ति हीतरवत्‌ ॥ ३७॥ 
व्यतिहारः । विशिंपन्ति । हि । इतरवत्‌ । इति प० 
अश्ै-श्रुतिमें यह अर्थ कहा है कि जो में उपासक हैँ सोई यह जपास्य हैं, 
जो यह उपास्य है सोई में उपासक हूँ.” इति । हे सगवन ! हे देवता ! जो त॑ है 
सो में हूं,! हे भमगवन्‌ ! हे देवता ! जो में हूं, सो तं हे. इति। इनके अनुसार यह 
सूत्रार्थ है. उक्तवाक्यनर्म व्यतिहारः” नाम परस्पर उपास्यत्वरूपर्स उपदेश 
किया है, केवल आत्माका इंश्थररूप्स चिंतनका विधान नहीं- इतरवत्‌ 
नाम थथा सब आत्मत्वादि गुण उपास्य करके उपदेश किये हैं तथा असंगस 
अंगीकार है. “विशिंषन्ति'यह यहां हेतु हैं. उक्त शाखावान्‌ू जीव और 
परमात्माको व्यतिहारसें “विश्विपान्ति'नाम योडह! इत्यादिकाँसे परस्पर 
विशेषणविशेष्यभावको कहे हैं. जो परस्पर विशेषणविशेष्यभाव नहीं मानेंगे 
तो 'योडउहं सोड्सखी ? इतना श्रुतिका अंश सफल होवेगा, घोड्सो 
सो5हम! इतना अंश अनर्थक होवेंगा, यातें उभयरूप चिंतन ही विधेय 
इति ॥ ३७ ॥ 


अच०-बहत्‌ पद्नसअध्यायमें यह कहा है कि-“ तद्धे तदेव तदास स- 
व्यमेच स.यो हेत॑ महत्‌ यक्ष प्रथमर्ज वेद स्य त्रह्मेति जयाति इमान्‌ 
लोकान” इति। अर्थ-यह जो हिरण्यगर्भाख्य बह्म व्यापकरूप सर्वकरके पूज्य 
सर्वेसें प्रथम उपजाहुआ है इसको जो जाने है अर्थात्‌ इसकी उपासना करे है 
सो सघलोकनको जय करे है-पुनः तहांहीं कहा है कि-“तत्सत्यम्‌ असौ स्‌ 
आदित्यो थ एव एवं एतस्सिन्‌ सण्डले पुरुषों यश्ाय दक्षिण अक्षन 
पुरुष: तो एतो अन्योडन्यस्मिन्‌ प्रतिष्ठितों रह्विमभिरेषोडस्सिन, प्रति- 


छितः। भाणेरयम्‌ अरुष्सिन” इति। उक्त उसय वाक्यनम विद्या एक है वा 
भिन्न है? जा संशयसे सूत्रकार कहे हैं--- 


सेव हि स्यादयः ॥ ३८ ॥ 


सा । एवं । हि। सत्मादयः । इति प०। 
अथ-- तत्सत्यम्‌ ” जा छतिमें जो विद्या कही है सो ' सा एवं ” नाम 
सोई पूवश्षत्तिउक्त सत्यविद्याही है; तासे भिन्न नहीं. “ तत्सत्यम ? जा श्रुतिमें 
* तत्‌ ! पदसें पूववश्रुतिउक्त हिरण्यगर्भ उपास्यका गहण है. उसयश्रुतिमें उपास्य 
एक होनेसे उपासनाका भेद्‌ संभवे नहीं; यातें उभय वाक्यनमैं उपासना. एक 


है। ० '३ं पा०'३ सू० '३९ ] भाषाठीकासहितानि । २०१ 


होनेसे उभयवाक्यनमें जे 'सत्याद्यः” नाम सत्यत्वादियुण, तिनका उपसंहार 
कर्तव्य है. इति ॥ ३८ ॥ 


._ अव०-छांदोग्य अष्टमप्रपाठकर्में यह कहा है कि-“ एब आत्माउपहतत- 
पाप्मसा विजरो विरृत्युविशोकों विजिधत्सोइडपिपासः सत्यकामः 
सत्यसंकल्पः ” इति । बृहदारण्यकवाक्य-“ स एव महानज आत्मा 
योड्य विज्ञानमथः प्राणेघु य एषोउन्तहृदय आकाशस्तस्मिन शेते” 
इति। उक्त उभयवाक्यनमें परस्पर गुणउपसंहार अंगीकृत है वा नहीं? जा 
संदेहसें कहे हैं-- 


कामादीतरत्र तत्र चायतनादिभ्यः ॥ ३९॥ 
कामादि । इतरज्न । तत्र | च । आयतनादिशभ्यः । इति प० । 


अथ-'कासादि” नाम सत्यकामत्वादि जे छांदोग्योक्त गुण तिनका “ इत्त- 
रत्न नाम बृहदारण्यकमें उपसंहार अंगीकृत है. 'आयतनादिश्थ# नाम हृदय- 
स्थानवान्‌ ब्रह्म और उपास्य तह्मा 'तत्ञ! नाम उभयशाखामें एकही कहा है, 
यातें परस्पर ग्रुणोंका उपसंहार संभवे है. इति ॥ २९ ॥ 


अच०-छांदोग्य पंचमप्रपाठकर्मे वैश्वानर उपासनाविषे प्राणाभिहोत्र सुना 
है- “तत्‌ यत्‌ भक्त प्रथममागच्छेत तत्‌ होमीय॑, स यां प्रथमामर्‌ आ- 
'हुतिं कछहुचात्‌ तां जहुयात्‌ धाणाय खाहाँ हति प्राणस्तृप्याति, प्राण 
तृप्यति चक्षुः तृप्याति, चक्ुषि तृप्याति आदिव्यस्तृप्यति, आदिव्ये 
तृप्पति ऑऔस्तृप्यति, दिवि उष्यत्यां यत्‌ किश्य चोग्यादित्यव्थाधिति- 
छतस्तच्ृप्याति, तस्थाजुत॒सि तृप्पति प्रजया पहुभिरज्ञाओन तेजसा ज्र- 
झ्वचेसेन इति” । अथे-जो भोजनकालमें भोजनअर्थ आबे सो होतच्य 
है; सो भोक्ता जा प्रथम आहुतिको करे ताको कैसे करे ? जा शंकासें कहे हैं- 
'ग्राणाय खाहाए जा मंत्रसें अज्ञका प्रक्षेप करे- अनु” नाम ताकी तृप्ति होनेके 
अन॑तर प्रजादिकोंसें मोक्ता ठघ होवे है. तह्मवर्चेसेन! इस पढदसें तेजका 
अंगीकार है. इति। “पूर्वोडतिथिभ्योडश्षीयात्‌? यह जावालमें सुना है कि- 
अतिथियें पूर्व भोजन करे; यह ख्ुति-अक्षर-अर्थ है- वहां उभयशाखावचनोंमें 
मोजनछोप हुएसें प्राणाशिहोत्रका छोप अंगीकृत है? वा अलोप आदरात! 
नाम अंगीकृत है? यह संदेह है. तहां यह पूर्वपक्षका,सूत्र है-- . ह 
अक्म- २६ 


२०२ ' अद्यसूनाणि | [अ० ३ पा० ३१ सू० ४२ ) 


आदरादलोपः ॥ ४० ॥ 
आदरात्‌ । अलोपः । इति प०। 

अथे-जावालश्रुतिमें प्राणापक्‍िहोत्रका आद्रात्‌! नाम आदर किया है, 
थातें प्राणाप्रिहोत्रके अलोपका अंगीकार है. अतिथिस पूर्व भोजनमें जो प्रथमत्व 
धर्म तिसके छोपको नहीं सहारतीहुई जावालुश्रुति प्राणाश्निहोत्ररूप धर्मीके 
लोपको कैसे अगीकार करेगी? याते भोजनलोप हुएसी अपर भक्ष्य द्वव्यकरके 
प्राणाशिहोत्र कर्तव्य है. इति ॥ ४० ॥ 

उत्तरसूच-- 
शी 
उपस्थितेष्तस्तहचनात्‌ ॥ ४१ ॥ 
उपखिते । अतः । तदचनात्‌ । इति प० । 

अथे-“लपस्थिते! नाम भोजन आप्त होवे तो “अतः” नाम इस भोजनसे 
प्राणापिहोत्र कर्तव्य है. जो भोजन प्राप्त नहीं होवे तो प्राणाक्‍्निहोत्र कर्तव्य 
नहीं । * तद्बषचनात्‌ ” नाम “तत्‌ होमीयं०” जा बचनसे “ यत्‌ भर्क्त 
प्रथमम्‌ आगच्छेत” जा चाक्यसें “तत्त होमीय०* जा वाक्यका संबंध निश्चित 
है, यातें भोजनअर्थ प्राप्त द्वव्यको होमसाधनत्व प्रतीत होवे है; यातें भो- 
जनलोप हुए प्राणाशिहोत्रके छोपका अंगरीकार है. इति ॥ ४१॥ 

अच०-छांदोग्यके आरंभमें कर्मअंग उद्नीय्े प्राणकी उपासना कही है, सो 
कर्मोका अंग है वा स्वतंत्रफलका साधन है? यह तहां संदेह हे. पूर्वपक्षमें 
कर्मनका अंग साननेसें यह सूत्रसिद्धांत है कि--- 
तन्निधोरणानियमस्तदृष्टेः एथग्ध्यञ्प्रतिबन्धः फलम्‌ ॥ 

तन्निधोरणानियमः । तदृष्टेः । पृथक्‌ । हि। अग्रतिबन्धः । 

फूलम्‌ । इति प०। 

अधे-तत-नि्धारण' नाम कर्मअजग आश्रित उपासनाके सेवनका अनियम 
है. सदा कम अजुछान कियिपर तिसके अनुछ्ानका अंगीकार नहीं तहुछे+ 
नाम तिस अनियमको “तेनोमौ कुरुतः” जा अझ्ुतिमें तहांही देखा है. और 
'उपासनाका 'धरथकं नास स्वतंत्र अतिवेधरहित तहांही- “यदेच विद्यया 
करोति अजछ्योपनिषदा तदेव वीयेचत्तरं मचति” जा श्रुत्तिमं फकू सुना 
है। यातें नियमका अगीकार किया नहीं. इति ॥ ४२ ॥ । 


[अ० ३ पा० ३ सू० ४५ ] भापादीकासहितानि । र्०्ई 


अव०-छांदोग्यके चठुथे प्रपाठक्मं यह वाक्य है कि-“वायुवाच संबंगों 
यदा वा अभपिरुद्धायति वायुमेवाप्थेति थदा सूर्योडस्तमेति वायुमे- 
चाप्येति इति” “प्राणो बाव संचगे! स यदा खापिति प्राणसेव वाग- 
प्येति” इति। उक्त उसय अ्रुतिनमें वायुको अभिआदिकोंसें उत्तम कहा है और 
प्राणको वाक्‍्यादिकोंसें उत्तम कहा है; तथा बृहदारण्यकसभी कहा है. तहां 
वायु और प्राणका प्रयोग एक है वा भेदयुक्त है? जा संदेहसें कहे हैं.-- 


प्रदानवंदेव तहुक्तम॥ 2३॥ 
« , अदानवत्‌। एवं । तत्‌ । उक्तम्‌। इति प० । 

अथ-इंह, राजा, अधिराजा इत्यादि राज अधिराज स्वाराद आदि शुणोंके 
भेदसे यथा इंबरअर्थ पुरोडाशके प्रदान” नाम मक्षेपका भेद है तथा आधिदेवत्व 
आध्यात्मिकत्वरूप अबस्थाके भेदसे गुणनके भेदसें प्रयोगका भेद है. “ तत्‌ 
उत्तम नाम देवताकांडसें उक्त अथे कहा है, यातें प्रयोगका भेद है. इति॥४१॥ 

अव०-वाजसनेयिक अश्निरहस्यमें “आत्मनो5श्नीनकोन्‍्मनोमया- 
न्मनश्ित्‌” इत्यादिक वाक्‍्यनसे सन और इंद्वियोंकी इत्तिकों अभिरूप कहा 
है. ते सर्व बृत्तिरूप अप्लि कर्मोके अंग हैं वा स्वतंत्र हें? जा संदेहसें कहे हैं-- 

लिह्भयस्त्वात्तदडि बलीयस्तदपि॥ ४४॥ 

लिड्रभूयस्वात्‌ | तत्‌ । हि । बलीयः । तत्‌ । अपि । इति प० | 

अधै-स्वत॑त्रताके घोधक लिंग तहां “मूयस्त्वात्‌र नाम अनेक हें, 


थातें मन आदि चृत्तिरूप अश्नि स्वतंत्र हैं. 'तत नाम ते लिंग बलीयः” नाम 
प्रकरणसें बलवान्‌ हैं “तत्‌ अपि! नाम सो हिंगमी पूर्वकांडमें कहे हें. इति ४४ 


ह पूर्वपक्षसूच्न-- 
पूवेविकल्पः प्रकरणात्स्यात्‌ क्रिया मानसवत्‌ ॥ ४५॥ 
प्रवेविकल्पः । प्रकरणात्‌ । स्थात्‌ । क्रिया! मानसवत्‌ | इति प्‌०। 


अथै-संकल्परूप जे अश्नि कहे हैं ते स्वतंत्र नहीं किंतु प्रकरणसें, तिनसें 
पूर्व जो क्रियारूप अप्नि ताके अंतर विकल्पसंकल्परूप अधि 'स्थात्‌! ,नाम 

१ संभसनसें वायु संवर्ग है. २ उपशांत होवे हैं. ३ यथा दशरातन्नस्प दशमेड5ह॒नि अविवाक्ये ४थिव्याः 
पात्रेण समुद्र सोमस्य प्रजापतिदेवतान खह्ममाणस्य अद्णासादनइवबनाइरणोपह्ानभक्षणानि मानसानि एच 
आश्नायन्ते: 


२०४; ।.. अहमसूत्राणि । /(अ० हे पा० ३ सू० ४९] 


है; यथा द्ांदशाहमध्ये दशम दिनका अँग सानस पूर्वमीसांसामें प्रसिद्ध 
है तथा * सानस * अप्लि कर्मोका अँग है; स्वतंत्र नहीं: इति ॥ ४५ ॥ 


अतिदेशाच ॥ ४६॥ 


अतिदेशात्‌ | च.। इति प०। ॥ 
अधथे-“तेषाम्‌ एकैक एवं तावान्‌ यावान्‌ असौ पूर्व!” जा वाक्यमें पूर्व- 
अपश्लिकी मानसअग्निमें साइहशाताका उपदेश किया है, सो एक क्रियामें प्रवेश बिना 
संभवे नहीं; यातें उक्त अतिदेशर्स मानस अश्लि स्वतंत्र नहीं. इति ॥ ४६ ॥ 
सिद्धांत- ह॒ 
क्यि निधोर मी 
व्‌ तु निधोरणात्‌ ॥ ४७॥ 
विद्या । एव। तु । निधारणात्‌ । इति प० 
अशथ-* तु! पूवरपक्षका निषेधक है. मानस सर्व अश्नि स्वतंत्र विद्या नाम 
जपासनारूप हैं; कर्ममें तिनका प्रवेश नहीं. “त्ते ह एते विद्याचित एवं” 


जा अुतिमें तहांही "एच? पदसे विद्यारप तिनको मनिधौरणात्‌ नाम निश्चय 
किया है; यातें विद्या स्वतंत्र है. इति ॥ ४७॥ 


दर्शनाच ॥ ४८॥ 


दशनात्‌ । च इति प्‌ृ०। 


अथे-मानस अश्नियोंकी स्वतंत्रताके वोधक लिंगभी देखे हैं, ते पूर्वमीमा- 
सामें कहे हैं. इति ॥ ४८ ॥ 


अचव०-नजु प्रकरणसें लिंगका बाध हो, जा शंकाका निषेध करे हैं कि- 


श्रुयादिवलीयस्ताच न बाघः ॥ ४९ ॥ 
अुस्रादिबलीयस्वात्‌ | च। न बाघः । इति प०। 
अथे-श्षुतिकों और, आदि' पदसे लिंगवाक्यको प्रकरणसैं बलीय- 
स्त्वात! नाम बल्वान्‌ होनेसें घाध होबे नहीं; “विद्याचित एव” यह श्रुति 
है; “ सचेदा स्वमयानि फ्रूतानि” यह लिंग है; “विद्यया हैवैते एच- 
विद्श्चिता भवन्ति” यह वाक्य है; इन त्रयको वलुवान्‌ होनेसे प्रकरणसें 
“ न बाधः३ * नास स्वतंत्र अस्निका वाध संभवे नहीं- इति 0 ४९ ॥ 


[अ० ३ पा० ३ सू० ९१] भाषाटीकासहितानि | र्छ्५ 


हे आ. 

अनुबन्धादभ्यः प्रज्ान्तरश्यक्ववहूए्टश्व तहक्तम ५० 

अनुवन्धादिभ्यः । अज्ञान्तरपथक्खवत्‌ । दृष्टः । च | तत्‌ । ... 

उक्तम्‌ | इति प०। 

अधथै-“ते सनसा एव अधीयन्त । सनसा अचीयन्त । सनसा. 
एव भ्रहा अगृह्यन्त) सनसा स्तुवन्‌ | सनसा5शंसन्‌। थत्‌ किंच 
यज्ञे कमे क्रियते, यत्‌ किंच यज्ञियं कम, मनसा एव तेघु तत्‌ सनो- 
सयेपु मनखित्सु मनोसयसेच करियते” जा झुतिसें भन आदि दृत्तियोंविपे 
'अनुरवंध” नाम कर्मोग आधानादिक संपादन किये हें; यातें ते स्वतंत्र हैं. 
आदि पदसे अतिदेशका ग्रहण है. प्रज्ञान्तरपृधक्त्ववत्‌्र] नाम चथा शां- 
डिल्यादिविद्या स्वतंत्र है तथा मानस अश्नि स्वतंत्र है. यथा “ राजा राज्य- 
कामों राजसयेन यजेत” इत्यादिक पसंगोंमें बाह्मणकर्दक अंत्येष्ीको राजमात्न- 
कर्दूक राजसूयप्रकरणमैं उत्कर्प देखा है; तथा प्रसंगमैंभी अश्नियोंकों कर्मप्र- 
करणसें उत्कर्पता देखी हे. 'तत्‌ उत्तम नाम यह सर्व अर्थ पूर्वमीमांसामें 
कहा है. शुतिअर्थ-ते अधि मनकरके संपादन करी हैं, मनकरके स्थापन करी 
हैं, अहा/ नाम मन अभ्रिमें पान्नोंकी अहण किया है. अहणकर्ता स्वुतिं करे है, 
उद्भाता होता शंसन करे हैं, उपकारक यज्ञअर्थ कम किया जाय सो 
सनकरही होवे है. इति ॥ ५० ॥ * 

अच०-पूर्व मानस अश्विको मानसवत्‌ कहा, सो तिस इृष्टांतसें अप्निको 
किया अंग माने तो तिसका निषेध करे हैं-- 


ब्घेग त्युवन्नहि लोकापत्ति ८ 

न सामान्यादप्युपलब्धेसत्युवन्नहि पः ॥५१॥ 
: न। सामान्याव्‌ | अपि । उपलब्धेः । सत्युवत्‌ । नहिं।  #॥# 
लोकापत्तिः । इति प०। कक 

अर्थ-मानस अप्रिमैं मानसिकत्व तुल्य है; तोभी क्रियाका अंग नहीं. अतिसें 
झत्युवत्‌ अभिकी स्वतंत्रता 'डपलब्घेः! नाम अतीत होबे है; यातें 'सामा- 
न्‍्यात! नाम मानसत्वतुल्य, हुए भी कर्मोंका अंग नहीं. यथा-“ख वा एप: 
एच सृत्युर्य एप एतस्सिन सण्डले पुरुषों दृइयते” जा वाक्‍्यमें आदि- 
कफ कहा है. “अग्रियैं सत्यु/” जामें अप्रिको- मृत्यु ' कहा है. उभय, 
ई आदित्य अश्निवाचक सृत्युशव्द उमयमें तुल्य है . तोभी ते. पंरस्परः 
विलक्षण हैं. और “यथा झुल़ोकोडपरिः .तस्य जादिल्यः ,समितर. जानें 


२०६ | : - अद्वयत्राणि । [ अ० ह पा० ३ सू० ५४ ] 


समित्‌की तुल्यतासें घुलोककों “आपत्ति” नाम अश्नित्वकी प्रासि नहीं, किंतु 
परस्पर विलक्षण हैं, तथा मानसिकत्व तुल्यतासें मानस-अश्विको कम-अगत्वकी 
प्राप्ति नहीं. इति ॥ ५१॥ 

अव०-ननु परन्राह्मणमैं छोकको अप्ित्व भ्रतीत होवे है जा शंकासें 
कहे हैं कि-- 


परेण च शब्दस्य ताहिध्यं म्यस्त्वात्ततुबन्धः ॥५२॥ 
परेण । च। शब्दस्य । तादिध्यम्‌ । भूयस्वात्‌ । तु । 
अनुबन्धः । इति प० । ् 

अधै-सानस अश्रि घाह्मणसें 'परेण च' नाम पर ब्राह्मणमें “अर्थ वाव 
लोक एषोउप्रिश्चितः” इत्यादिक शब्दको तादिध्यम नाम अश्निस पृथिवी 
हष्टिरूप स्व॒तंत्रविद्याविधित्व प्रतीत होबे है; कर्मोगविधित्व नहीं. मानस अग्नि 
विद्यामें संपादनयोग्य कर्मोके अंग 'भ्रूयस्त्वात! नाम अनेक हैं; यातें तत्‌- 
आरंभर्से विद्याका 'अजुबन्ध। नास अतिपादन है, यातें मानस-अशप्निविद्या 
स्वतंत्र फलका हेतु है, इति सिद्धमु॥ ५२० हे... 

अच०-आत्मा देह है वा देहसें भिन्न है? जा संदेहसें पूंवपक्षी कद्दे है कि- 


, एक आत्मनः शरीरे भावात्‌ ॥ ५३ ॥ 


एके । आत्मनः । शरीरे । भावात्‌ । इति प०। 
अथे-एके' नाम देहात्मवादी देहसें भिन्न आत्माके असत्वको मानते 
हुएं देहकोही आत्मा माने हैं. “दरीर” नाम शरीर होवे तो चेतनता सुखादिक 
“भावात! नाम होवे है; नहीं होवे तो नहीं होवे है; यातें देहही आत्मा है- 
इति ॥ ५३ ॥ 
सिद्धांत-- 


व्यतिरिकस्तद्भावाभावित्वान्न तूपलब्धिवत्‌ ॥ ५४ ॥ 
व्यतिरिकः । तद्भावाभावित्वात्‌। न। तु । उपलब्धिवत। इति प० ।- 

अथे-आत्मा देहस्वरूप नहीं किंतु देहसें “यतिरेकः” नाम भिन्न है. चेत- 
नतादिक जे घर्म ते मरण-अवस्थामें 'तद्भाव” नाम शरीरके विद्यमान होते भी 
“अभावित्वात' नाम रहें नहीं; यातें ते देहके घर्म नहीं 'उपछाब्धिवत! नोम 
यथा घटादिकोंकी उपलब्धि देहका घर्म नहीं और देहका घ्े मानें तो रो 


| [ ञज० ३ पा० ३ सू० प७ |] भाषाटीकासहितानि । २०७ 


'ज्ञान घटप्रकाशक नहीं सिद्ध होवेगा; यथा देहघर्म रूपादिक घटके प्रकाशक 
नहीं याने चेतनतादिकोंको देहघम असंभवसें आत्मा देहसें मिन्न है. इति ५४ 

अच०-“लोकेघु पश्चवि्ध सामोपासीत* इत्यादिक छांदोग्यके